By पं. सुव्रत शर्मा
माता पार्वती का दिव्य वेल, इडुंबन की कथा और पुष्य नक्षत्र में मुरुगन भक्ति का महापर्व

तमिलनाडु के पलनी पर्वत की सीढ़ियों पर, मलेशिया की बातू गुफाओं के रास्तों पर और दुनिया के हर उस कोने में जहां तमिल भक्त बसे हैं, थाई मास की पूर्णिमा के आसपास एक अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। पीले और केसरिया वस्त्रों में हजारों भक्त अपने कंधों पर सजी हुई कावड़ी उठाए, नंगे पैर, "वेल वेल मुरुगा" और "हरो हरा" के जयघोष के साथ आगे बढ़ते हैं। किसी के सिर पर दूध से भरा कलश होता है, किसी के कंधे पर मोर पंखों से सजी कावड़ी। थकान उनके शरीर में होती है, लेकिन चेहरे पर एक अलौकिक शांति। यह थाईपूसम है, भगवान मुरुगन की भक्ति का सबसे भव्य उत्सव।
वर्ष 2027 में थाईपूसम शुक्रवार, 22 जनवरी को मनाया जाएगा। यह पर्व तमिल थाई मास में पूसम यानी पुष्य नक्षत्र के दिन मनाया जाता है और इस वर्ष यह पौष पूर्णिमा के साथ पड़ रहा है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | थाईपूसम |
| तिथि | 22 जनवरी 2027 |
| वार | शुक्रवार |
| तमिल मास | थाई |
| नक्षत्र | पूसम (पुष्य) |
| पंचांग का आधार | तमिल सौर पंचांग और नक्षत्र |
| चंद्र तिथि | पौष पूर्णिमा |
| चंद्रमा की स्थिति | कर्क राशि |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| चेन्नई में सूर्योदय | प्रातः लगभग 6:35 बजे |
| चेन्नई में सूर्यास्त | सायं लगभग 6:10 बजे |
| राहु काल (चेन्नई) | प्रातः लगभग 10:55 से दोपहर 12:20 बजे तक |
| आराध्य देव | भगवान मुरुगन (कार्तिकेय, सुब्रमण्यम) |
| उसी दिन के अन्य पर्व | शाकम्भरी पूर्णिमा, पौष पूर्णिमा |
पूसम नक्षत्र के आरंभ और समाप्ति का समय स्थान के अनुसार बदलता है। मंदिरों में थाईपूसम का मुख्य उत्सव, कावड़ी यात्रा और अभिषेक इसी दिन होते हैं। अपने क्षेत्र के मुरुगन मंदिर या तमिल पंचांग से कार्यक्रम का सटीक समय अवश्य देख लें।
"थाई" तमिल सौर पंचांग का दसवां मास है, जो मकर संक्रांति से आरंभ होता है। "पूसम" पुष्य नक्षत्र का तमिल नाम है। थाई मास में जिस दिन चंद्रमा पूसम नक्षत्र में होते हैं, उस दिन थाईपूसम मनाया जाता है। यह दिन प्रायः पूर्णिमा के आसपास पड़ता है।
यह पर्व भगवान मुरुगन को समर्पित है, जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद, सुब्रमण्यम, षण्मुख और कुमार के नाम से भी जाना जाता है। तमिल परंपरा में मुरुगन को तमिल भूमि का विशेष देवता माना जाता है। थाईपूसम तमिलनाडु के साथ साथ मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका और फिजी जैसे देशों में भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है, जहां तमिल समाज बसा हुआ है। मलेशिया में कुआलालंपुर के पास बातू गुफाओं का थाईपूसम उत्सव विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समागमों में गिना जाता है।
थाईपूसम की मुख्य कथा भगवान मुरुगन के दिव्य अस्त्र वेल से जुड़ी है। सूरपद्मन नाम का असुर और उसके भाई तीनों लोकों में आतंक फैला रहे थे। उन्हें केवल भगवान शिव का पुत्र ही पराजित कर सकता था। जब मुरुगन देवताओं के सेनापति बने और सूरपद्मन से युद्ध के लिए चले तब माता पार्वती ने अपनी समस्त शक्ति को एक दिव्य भाले में भरकर उन्हें दिया। यही भाला वेल कहलाया और इसे शक्ति वेल भी कहा जाता है।
परंपरा के अनुसार माता पार्वती ने यह वेल थाई मास के पूसम नक्षत्र के दिन मुरुगन को प्रदान किया था। इसी वेल से मुरुगन ने सूरपद्मन को पराजित किया। कथा के अनुसार सूरपद्मन दो भागों में बंटकर मोर और मुर्गा बना। मोर मुरुगन का वाहन बना और मुर्गा उनके ध्वज का चिह्न।
वेल केवल एक अस्त्र नहीं है। इसका नुकीला सिरा तीक्ष्ण बुद्धि का प्रतीक है, जो अज्ञान को भेदती है। इसका चौड़ा भाग विशाल ज्ञान का प्रतीक है और लंबी डंडी गहरी स्थिरता का। इसीलिए तमिल भक्त कहते हैं कि वेल ज्ञान का अस्त्र है। माता की शक्ति से बना यह वेल बताता है कि हर विजय के पीछे माता का आशीर्वाद होता है।
थाईपूसम की सबसे प्रसिद्ध परंपरा कावड़ी अट्टम है, यानी कावड़ी उठाकर नृत्य करते हुए मंदिर तक जाना। इस परंपरा के पीछे इडुंबन की सुंदर कथा है।
महर्षि अगस्त्य ने कैलाश से दो पर्वत, शिवगिरि और शक्तिगिरि, दक्षिण भारत लाने का कार्य इडुंबन नाम के एक बलवान व्यक्ति को सौंपा। इडुंबन ने एक लंबी डंडी के दोनों सिरों पर दोनों पर्वत बांधे और उन्हें कंधे पर उठाकर दक्षिण की ओर चल पड़ा। पलनी के पास पहुंचकर वह थोड़ा विश्राम करने के लिए रुका और पर्वतों को नीचे रख दिया।
जब वह फिर से उन्हें उठाने लगा, तो एक पर्वत हिला ही नहीं। उसने देखा कि उस पर्वत पर एक बालक खड़ा है, जो पर्वत छोड़ने को तैयार नहीं। क्रोधित होकर इडुंबन उस बालक से लड़ने लगा और गिर पड़ा। वह बालक स्वयं भगवान मुरुगन थे। इडुंबन को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने मुरुगन की शरण ली। मुरुगन ने उसे क्षमा करके वरदान दिया कि जो भक्त इडुंबन की तरह कंधे पर कावड़ी उठाकर उनके मंदिर आएगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। तभी से इडुंबन को पलनी पर्वत के रक्षक के रूप में पूजा जाता है और भक्त उनकी स्मृति में कावड़ी उठाते हैं।
| कावड़ी का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| पाल कावड़ी | दूध से भरे कलशों वाली कावड़ी, अभिषेक के लिए |
| पाल कुडम | सिर पर दूध का कलश लेकर यात्रा |
| पन्नीर कावड़ी | गुलाब जल से भरे पात्रों वाली कावड़ी |
| पुष्प कावड़ी | फूलों से सजी कावड़ी |
| मयिल कावड़ी | मोर पंखों से सजी कावड़ी, मुरुगन के वाहन का प्रतीक |
| शक्कर कावड़ी | शक्कर या गुड़ का भोग लेकर जाने वाली कावड़ी |
कावड़ी का अर्थ है भार। आध्यात्मिक दृष्टि से कावड़ी उठाना अपने जीवन के बोझ, पाप और दुखों को भगवान के चरणों तक ले जाकर वहां छोड़ देने का प्रतीक है। भक्त जब कंधे पर कावड़ी उठाता है, तो वह मानो कहता है कि हे मुरुगन, यह भार मैं आपके पास ला रहा हूं, अब आप ही इसे संभालिए।
कुछ भक्त अपनी तपस्या के रूप में शरीर पर छोटे वेल या कांटे धारण करते हैं। यह अत्यंत कठोर साधना है, जो लंबे व्रत, अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन और मंदिर के नियमों के अंतर्गत ही की जाती है। सामान्य भक्तों के लिए पाल कुडम, पुष्प कावड़ी या केवल श्रद्धा से मंदिर दर्शन भी उतना ही पुण्यदायी माना गया है।
परंपरा में भक्त थाईपूसम से पहले कई दिनों तक विरतम यानी व्रत रखते हैं। कई भक्त 48 दिनों का मंडल व्रत करते हैं, जबकि कई भक्त कुछ दिनों का संयम रखते हैं। इस दौरान ये नियम पालन किए जाते हैं।
जो लोग मंदिर नहीं जा सकते, वे घर पर ही वेल या मुरुगन के चित्र का दूध से अभिषेक करके, दीप जलाकर और मंत्र जप करके यह पर्व मना सकते हैं।
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ शरवणभवाय नमः | षडक्षर मंत्र, मुरुगन की कृपा | 108 बार |
| ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि, तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात् | स्कंद गायत्री, बुद्धि और शक्ति | 108 बार |
| ॐ सुब्रह्मण्याय नमः | बाधाओं से रक्षा और विजय | 108 बार |
| स्थान | विशेषता |
|---|---|
| पलनी, तमिलनाडु | मुरुगन का प्रमुख धाम, इडुंबन कथा का स्थान, सबसे बड़ी कावड़ी यात्रा |
| तिरुच्चेंदूर, तमिलनाडु | समुद्र तट पर स्थित, सूरपद्मन पर विजय का स्थान |
| स्वामीमलै, तमिलनाडु | मुरुगन के आरुपडै वीडु में से एक |
| बातू गुफाएं, मलेशिया | विश्व के सबसे बड़े थाईपूसम समागमों में से एक |
| सिंगापुर | श्री श्रीनिवास पेरुमल मंदिर से श्री तेंडायुतपाणि मंदिर तक कावड़ी यात्रा |
| वडलूर, तमिलनाडु | संत रामलिंग स्वामी, जिन्हें वल्ललार कहा जाता है, के सत्य ज्ञान सभा में ज्योति दर्शन |
वडलूर में थाईपूसम का विशेष महत्व है। यहां संत रामलिंग स्वामी द्वारा स्थापित सत्य ज्ञान सभा में थाईपूसम के दिन सात पर्दों को हटाकर ज्योति दर्शन कराया जाता है। ये सात पर्दे आत्मा पर पड़े अज्ञान के सात आवरणों के प्रतीक माने जाते हैं।
थाईपूसम का आधार पुष्य नक्षत्र है, जिसे वैदिक ज्योतिष में सबसे शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है। पुष्य का अर्थ है पोषण करने वाला। इस नक्षत्र के देवता बृहस्पति हैं, जो ज्ञान और गुरु के कारक हैं और इसके स्वामी ग्रह शनि माने जाते हैं, जो तप और धैर्य के कारक हैं। ज्ञान और तप का यह मेल थाईपूसम के स्वभाव से पूरी तरह मेल खाता है, जहां भक्त कठोर व्रत और तपस्या से ज्ञान के देवता मुरुगन की कृपा पाना चाहता है।
2027 में थाईपूसम पौष पूर्णिमा के साथ पड़ रहा है। इस दिन चंद्रमा अपनी ही राशि कर्क में पूर्ण बलवान होंगे और सूर्य ठीक सामने मकर राशि में। बलवान चंद्रमा मन को स्थिर और श्रद्धा को गहरा करता है, जो लंबी कावड़ी यात्रा और व्रत के लिए आवश्यक है।
ज्योतिष में भगवान मुरुगन को मंगल ग्रह का अधिष्ठाता माना जाता है। मंगल साहस, ऊर्जा, भूमि, भाई और रक्त के कारक हैं। जिनकी कुंडली में मंगल दोष हो, विवाह में बाधा हो, भूमि विवाद हो या अधिक क्रोध की समस्या हो, उनके लिए थाईपूसम पर मुरुगन उपासना को विशेष फलदायी माना जाता है। इस वर्ष यह पर्व शुक्रवार को है, जो शुक्र का दिन है। शुक्र प्रेम और दांपत्य के कारक हैं, इसलिए विवाह संबंधी बाधाओं के लिए इस दिन मुरुगन और उनकी पत्नियों वल्ली तथा देवसेना की संयुक्त पूजा भी शुभ मानी जा सकती है।
| ज्योतिषीय तत्व | स्थिति | संकेत |
|---|---|---|
| नक्षत्र | पुष्य (पूसम) | पोषण, ज्ञान और शुभता |
| चंद्रमा | कर्क राशि, पूर्ण | मन की स्थिरता और श्रद्धा |
| सूर्य | मकर राशि | तप और उत्तरायण का पुण्य काल |
| आराध्य से जुड़ा ग्रह | मंगल | साहस, विजय और मंगल दोष शांति |
| वार | शुक्रवार | प्रेम, सौभाग्य और दांपत्य |
| समस्या | थाईपूसम पर उपाय |
|---|---|
| मंगल दोष | मुरुगन को लाल पुष्प अर्पित करें और षडक्षर मंत्र का जप करें |
| विवाह में देरी | मुरुगन, वल्ली और देवसेना की संयुक्त पूजा करें |
| भूमि या संपत्ति विवाद | मुरुगन मंदिर में दूध का अभिषेक कराएं |
| अधिक क्रोध | स्कंद षष्ठी कवचम् का पाठ करें |
| शनि का कष्ट | अन्नदान करें, क्योंकि पुष्य के स्वामी शनि माने जाते हैं |
| चंद्रमा कमजोर हो | रात्रि में पूर्ण चंद्रमा को दूध मिला जल अर्पित करें |
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| व्रत के दिनों में सात्विक जीवन जिएं | मांस, मदिरा और नशे का सेवन न करें |
| पीले या केसरिया वस्त्र पहनें | कावड़ी को अपवित्र स्थान पर न रखें |
| कावड़ी यात्रा में जयघोष करें | बिना तैयारी और मार्गदर्शन के कठोर तप न करें |
| अन्नदान और सेवा करें | यात्रा में किसी से विवाद न करें |
| भीड़ में सावधानी और अनुशासन रखें | स्वास्थ्य की अनदेखी न करें |
थाईपूसम सिखाता है कि भक्ति केवल मांगने का नाम नहीं बल्कि अपना भार भगवान के चरणों तक ले जाने का साहस है। इडुंबन ने जो भार अहंकार में उठाया था, वही भार मुरुगन की कृपा से उसकी पूजा बन गया। 22 जनवरी 2027 को, जब पूर्ण चंद्रमा पुष्य नक्षत्र को प्रकाशित करेंगे और लाखों भक्त "वेल वेल मुरुगा" के जयघोष के साथ आगे बढ़ेंगे तब कंधे पर उठाई गई हर कावड़ी और सिर पर रखा हर दूध का कलश जीवन के बोझ को हल्का करने का संकल्प बन सकता है। जो अपना भार मुरुगन को सौंप देता है, उसके मार्ग में वेल स्वयं प्रकाश बनकर चलता है।
थाईपूसम 2027 कब है?
थाईपूसम 2027 शुक्रवार, 22 जनवरी को मनाया जाएगा, जब तमिल थाई मास में पूसम नक्षत्र होगा। इसी दिन पौष पूर्णिमा भी है।
थाईपूसम क्यों मनाया जाता है?
परंपरा के अनुसार इसी दिन माता पार्वती ने भगवान मुरुगन को दिव्य वेल प्रदान किया था, जिससे उन्होंने सूरपद्मन असुर को पराजित किया।
थाईपूसम पर कावड़ी क्यों उठाते हैं?
कावड़ी इडुंबन की कथा से जुड़ी है, जिसने पलनी के पर्वत कंधे पर उठाए थे। भक्त अपने जीवन का भार मुरुगन को सौंपने के प्रतीक के रूप में कावड़ी उठाते हैं।
थाईपूसम पर कौन सा मंत्र जपें?
"ॐ शरवणभवाय नमः" षडक्षर मंत्र का 108 बार जप सबसे शुभ माना जाता है। स्कंद षष्ठी कवचम् का पाठ भी किया जाता है।
थाईपूसम सबसे बड़ा कहां मनाया जाता है?
तमिलनाडु में पलनी और मलेशिया में बातू गुफाओं का थाईपूसम सबसे भव्य होता है। सिंगापुर और श्रीलंका में भी बड़े उत्सव होते हैं।
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