वैष्णव पुत्रदा एकादशी 2027 क्यों अलग है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

दशमी विद्ध का नियम, राजा अंबरीष की कथा और श्री कृष्ण के जन्म नक्षत्र का दुर्लभ संयोग

वैष्णव पुत्रदा एकादशी 2027: तिथि, पारण और नियम

जब भक्ति का व्रत पंचांग की सूक्ष्मता से जुड़ता है

वैष्णव परंपरा में एकादशी को केवल एक व्रत नहीं बल्कि हरि वासर कहा गया है, यानी भगवान हरि का दिन। वैष्णव भक्त के लिए यह वह दिन है जब वह अपना सब कुछ छोड़कर केवल भगवान के नाम, रूप और लीला में डूब जाता है। इसी भाव के कारण वैष्णव संप्रदायों ने एकादशी की गणना के नियम भी अत्यंत सूक्ष्म और शुद्ध रखे हैं। कई बार इन नियमों के कारण वैष्णव एकादशी सामान्य स्मार्त एकादशी से एक दिन बाद पड़ती है।

वर्ष 2027 में पौष पुत्रदा एकादशी के साथ यही हो रहा है। स्मार्त पुत्रदा एकादशी सोमवार, 18 जनवरी को है, जबकि वैष्णव पौष पुत्रदा एकादशी मंगलवार, 19 जनवरी को मनाई जाएगी।

विवरण जानकारी
व्रत का नाम वैष्णव पौष पुत्रदा एकादशी
तिथि 19 जनवरी 2027
वार मंगलवार
हिंदू मास पौष
पक्ष शुक्ल पक्ष
तिथि एकादशी, जो सुबह कुछ समय बाद द्वादशी में बदलेगी
स्मार्त पुत्रदा एकादशी 18 जनवरी 2027, सोमवार
पारण का दिन 20 जनवरी 2027, बुधवार
पारण का नियम सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले
चंद्रमा की स्थिति वृषभ राशि, रोहिणी नक्षत्र
सूर्य की स्थिति मकर राशि
दिल्ली में सूर्योदय प्रातः लगभग 7:15 बजे
आराध्य देव भगवान विष्णु, श्री कृष्ण

20 जनवरी को ही बुध प्रदोष व्रत है, जो त्रयोदशी तिथि पर पड़ता है। इसका अर्थ है कि उस दिन द्वादशी तिथि कुछ समय बाद समाप्त होकर त्रयोदशी में बदल जाएगी। वैष्णव परंपरा में द्वादशी के भीतर पारण करना बहुत आवश्यक माना गया है। इसलिए अपने संप्रदाय या मंदिर के पंचांग में दिया गया पारण समय ध्यान से देखें और उसी के भीतर व्रत खोलें।

एक नज़र में मुख्य नियम

  • दशमी की संध्या से ही संयम और सात्विक प्रसाद
  • एकादशी पर अन्न, दालों और फलियों का पूर्ण त्याग
  • ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और तुलसी तथा भगवान की सेवा
  • हरिनाम जप, कीर्तन और श्रीमद्भागवत का श्रवण
  • दिन में शयन से बचना और रात्रि जागरण
  • द्वादशी के भीतर भगवान को भोग लगाकर प्रसाद से पारण

वैष्णव एकादशी स्मार्त एकादशी से अलग क्यों होती है?

वैष्णव परंपरा में एकादशी की शुद्धता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। इस परंपरा के अनुसार एकादशी का निर्धारण केवल सूर्योदय से नहीं बल्कि अरुणोदय काल से होता है। अरुणोदय सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले का समय है, जब आकाश में पहली लालिमा दिखाई देती है।

यदि अरुणोदय के समय दशमी तिथि का थोड़ा सा भी अंश हो, तो उस एकादशी को दशमी विद्ध कहा जाता है। विद्ध का अर्थ है स्पर्श से प्रभावित। वैष्णव शास्त्रों के अनुसार दशमी से विद्ध एकादशी का व्रत नहीं किया जाता और व्रत अगले दिन रखा जाता है। इसके पीछे भावना यह है कि भगवान को अर्पित व्रत पूरी तरह शुद्ध होना चाहिए, उसमें किसी अन्य तिथि का मिश्रण नहीं होना चाहिए।

गौड़ीय वैष्णव परंपरा में श्री सनातन गोस्वामी द्वारा संकलित हरि भक्ति विलास ग्रंथ को वैष्णव आचार का प्रमुख आधार माना जाता है। इसमें एकादशी के नियमों का बहुत विस्तार से वर्णन मिलता है। इसी प्रकार श्री संप्रदाय, माध्व संप्रदाय, निंबार्क संप्रदाय और वल्लभ संप्रदाय की अपनी अपनी परंपराएं हैं, जिनमें एकादशी की गणना के नियम थोड़े अलग हो सकते हैं।

संप्रदाय प्रमुख आचार्य मुख्य आराध्य
श्री संप्रदाय श्री रामानुजाचार्य लक्ष्मी नारायण
माध्व संप्रदाय श्री मध्वाचार्य श्री कृष्ण, विष्णु
निंबार्क संप्रदाय श्री निंबार्काचार्य राधा कृष्ण
वल्लभ संप्रदाय श्री वल्लभाचार्य श्रीनाथजी, बाल कृष्ण
गौड़ीय संप्रदाय श्री चैतन्य महाप्रभु राधा कृष्ण

इसलिए हर वैष्णव भक्त को अपने संप्रदाय या मंदिर के पंचांग के अनुसार ही व्रत का दिन चुनना चाहिए।

राजा अंबरीष की कथा: एकादशी और द्वादशी का अद्भुत प्रसंग

वैष्णव परंपरा में एकादशी के महत्व को समझाने वाली सबसे प्रसिद्ध कथा राजा अंबरीष की है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध में मिलता है। यह कथा विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह द्वादशी के भीतर पारण के नियम को भी स्पष्ट करती है।

राजा अंबरीष सातों द्वीपों के स्वामी थे, लेकिन उनका मन संसार में नहीं, भगवान में लगा रहता था। वे अपनी वाणी से भगवान का गुणगान करते, हाथों से मंदिर की सेवा करते, कानों से भगवान की कथा सुनते और आंखों से भगवान के दर्शन करते थे। वे पूरे नियम से हर एकादशी का व्रत करते थे।

एक बार राजा ने एक वर्ष तक एकादशी और द्वादशी का विशेष व्रत किया। व्रत की समाप्ति पर द्वादशी के दिन, जब वे पारण करने ही वाले थे, तभी महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ वहां पहुंचे। राजा ने उनका आदर से स्वागत किया और भोजन के लिए आमंत्रित किया। दुर्वासा ने कहा कि वे पहले यमुना में स्नान करके आएंगे और चले गए।

ऋषि को लौटने में बहुत देर हो गई। द्वादशी तिथि समाप्त होने वाली थी। राजा धर्म संकट में पड़ गए। यदि वे अतिथि के बिना भोजन करते, तो अतिथि का अपमान होता। और यदि द्वादशी के भीतर पारण न करते, तो व्रत भंग हो जाता। तब ब्राह्मणों की सलाह पर राजा ने केवल जल पीकर पारण किया, क्योंकि शास्त्रों में जल ग्रहण को भोजन भी माना गया है और नहीं भी।

जब दुर्वासा लौटे और यह जाना, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी जटा से एक भयंकर कृत्या उत्पन्न की और उसे राजा को मारने भेजा। राजा शांत खड़े रहे, क्योंकि उन्हें भगवान पर पूर्ण विश्वास था। तभी भगवान का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ, जिसने कृत्या को नष्ट कर दिया और फिर दुर्वासा का पीछा करने लगा।

दुर्वासा ब्रह्मा, शिव और अंत में स्वयं भगवान विष्णु के पास रक्षा के लिए गए। भगवान ने कहा, "मैं अपने भक्तों के अधीन हूं। भक्त मेरे हृदय हैं और मैं भक्तों का हृदय हूं। तुम्हारी रक्षा केवल अंबरीष ही कर सकते हैं।" अंत में दुर्वासा अंबरीष के पास लौटे। राजा ने विनम्रता से सुदर्शन चक्र की स्तुति की और ऋषि की रक्षा की। इतने समय तक राजा ने स्वयं भी भोजन नहीं किया था, क्योंकि वे अतिथि के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

कथा के संदेश

  • एकादशी का व्रत भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है
  • द्वादशी के भीतर पारण करना व्रत का अनिवार्य अंग है
  • सच्चे भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं
  • अहंकार, चाहे वह तपस्वी का ही क्यों न हो, अंत में झुकता है
  • भक्त का सबसे बड़ा गुण विनम्रता और क्षमा है

वैष्णव एकादशी के आहार नियम

वैष्णव परंपरा में एकादशी के आहार नियम सामान्य नियमों से अधिक कठोर हो सकते हैं। ये नियम संप्रदाय के अनुसार अलग अलग हैं, लेकिन सामान्य रूप से इनका पालन किया जाता है।

त्याज्य वस्तुएं ग्रहण योग्य वस्तुएं
चावल, गेहूं, जौ, बाजरा जैसे सभी अनाज फल और सूखे मेवे
सभी दालें, जैसे मूंग, अरहर, चना, उड़द दूध, दही, मक्खन और घी
मटर, राजमा जैसी फलियां आलू, शकरकंद, अरबी जैसी कुछ सब्जियां
अनाज से बना आटा, बेसन कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा का आटा
प्याज, लहसुन और मांसाहार सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
मदिरा और नशीले पदार्थ नारियल और मूंगफली

कई गौड़ीय वैष्णव भक्त इस दिन कुछ मसालों का भी त्याग करते हैं। जो भक्त सक्षम हों, वे निर्जल व्रत भी रखते हैं। लेकिन वैष्णव आचार्यों ने सदा यह कहा है कि व्रत का मूल उद्देश्य भगवान का अधिक स्मरण है। यदि भूख के कारण मन भगवान से हटकर भोजन की चिंता में लगे, तो फलाहार करके मन को भजन में लगाना श्रेष्ठ है।

वैष्णव पुत्रदा एकादशी की पूजा और सेवा विधि

  1. 18 जनवरी की संध्या को सूर्यास्त से पहले सात्विक प्रसाद ग्रहण करें और अगले दिन के व्रत का संकल्प लें।
  2. 19 जनवरी को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और तिलक धारण करें।
  3. तुलसी महारानी को जल अर्पित करें और उनकी परिक्रमा करें। ध्यान रखें कि एकादशी पर तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते।
  4. भगवान श्री कृष्ण या विष्णु की मंगल आरती करें।
  5. भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं, नए वस्त्र और पुष्पों से उनका श्रृंगार करें।
  6. पहले से तोड़े गए तुलसी दल के साथ फल, मेवे और दूध से बने एकादशी भोग अर्पित करें।
  7. हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें। गौड़ीय परंपरा के भक्त इस दिन सामान्य से अधिक माला जपते हैं।
  8. श्रीमद्भागवत, विशेषकर अंबरीष चरित्र या भगवद्गीता का पाठ करें।
  9. पुत्रदा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
  10. संध्या आरती और कीर्तन करें।
  11. रात्रि में भजन और हरि कथा के साथ जागरण करें।
  12. 20 जनवरी को सूर्योदय के बाद भगवान को अन्न का भोग लगाएं और द्वादशी समाप्त होने से पहले उसी प्रसाद से पारण करें।

प्रमुख मंत्र

मंत्र उद्देश्य जप संख्या
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण महामंत्र, शुद्ध भक्ति परंपरा अनुसार माला
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भगवान वासुदेव को समर्पण 108 बार
ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते, देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः संतान गोपाल मंत्र 108 बार

हरे कृष्ण महामंत्र को कलि संतरण उपनिषद में कलियुग के लिए सबसे प्रभावशाली नाम मंत्र बताया गया है। इसमें केवल भगवान के तीन नाम हैं, हरे, कृष्ण और राम, जो 16 बार दोहराए जाते हैं। वैष्णव परंपरा में एकादशी को हरिनाम का विशेष दिन माना जाता है।

वैष्णव पुत्रदा एकादशी का ज्योतिषीय महत्व

2027 की वैष्णव पुत्रदा एकादशी पर एक अत्यंत सुंदर संयोग बन रहा है। इस दिन चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में होंगे। रोहिणी वही नक्षत्र है जिसमें भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी पर भी रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व माना जाता है। इस प्रकार कृष्ण भक्तों की एकादशी स्वयं कृष्ण के जन्म नक्षत्र में पड़ रही है।

इसके साथ ही चंद्रमा वृषभ राशि में हैं, जो चंद्रमा की उच्च राशि है। वृषभ का प्रतीक बैल है और यह राशि गौ, कृषि और पोषण से जुड़ी मानी जाती है। गोपाल कृष्ण, जो गायों के रक्षक हैं, उनकी उपासना के लिए यह स्थिति विशेष रूप से अर्थपूर्ण है।

संतान की कामना से व्रत करने वाले वैष्णव गृहस्थों के लिए भी यह संयोग शुभ है। ज्योतिष में चंद्रमा माता और गर्भ के कारक हैं और संतान का विचार पंचम भाव तथा बृहस्पति से होता है। बलवान चंद्रमा और भगवान विष्णु की उपासना, जो बृहस्पति के अधिष्ठाता माने जाते हैं, दोनों मिलकर संतान सुख के लिए शुभ माने जा सकते हैं।

दिन मंगलवार है और सूर्य मकर राशि में हैं। मंगल की दृढ़ता कठोर व्रत और रात्रि जागरण की शक्ति देती है, जबकि मकर का सूर्य तप और संयम का संकेत है।

ज्योतिषीय तत्व स्थिति संकेत
नक्षत्र रोहिणी श्री कृष्ण का जन्म नक्षत्र
चंद्रमा वृषभ में उच्च मन की स्थिरता, मातृत्व
सूर्य मकर राशि तप और संयम
वार मंगलवार दृढ़ संकल्प
तिथि एकादशी से द्वादशी हरि वासर और भगवान की प्रिय तिथि

वैष्णव एकादशी व्रत के लाभ

  • भगवान श्री कृष्ण और विष्णु की कृपा
  • शुद्ध भक्ति और हरिनाम में रुचि का विकास
  • संतान सुख की कामना की पूर्ति की मान्यता
  • पापों के क्षय और मन की शुद्धि
  • इंद्रिय संयम और आत्मिक बल
  • परिवार में प्रेम, शांति और भगवान के प्रति निष्ठा

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
अपने संप्रदाय के पंचांग के अनुसार व्रत रखें अन्न, दाल और फलियों का सेवन न करें
तुलसी की सेवा और परिक्रमा करें एकादशी पर तुलसी के पत्ते न तोड़ें
हरिनाम जप और कीर्तन करें दिन में शयन न करें
श्रीमद्भागवत का श्रवण करें किसी भी परंपरा की निंदा न करें
द्वादशी के भीतर पारण करें द्वादशी बीतने के बाद पारण न करें
अतिथि और वैष्णवों का सम्मान करें क्रोध और अहंकार से बचें

जब भक्त की शुद्धता भगवान का हृदय जीत लेती है

वैष्णव पुत्रदा एकादशी यह सिखाती है कि भक्ति में सूक्ष्मता भी प्रेम का ही एक रूप है। जैसे प्रेमी अपने प्रिय को अर्पित किए जाने वाले हर उपहार को ध्यान से संवारता है, वैसे ही वैष्णव भक्त अपने व्रत को हर प्रकार से शुद्ध रखना चाहता है। राजा अंबरीष की कथा याद दिलाती है कि ऐसे भक्त की रक्षा के लिए स्वयं सुदर्शन चक्र प्रकट होता है। 19 जनवरी 2027 को, जब चंद्रमा श्री कृष्ण के जन्म नक्षत्र रोहिणी में होंगे तब हरिनाम, तुलसी सेवा और निष्कपट प्रार्थना के साथ किया गया यह व्रत भक्त के जीवन में संतान सुख, शांति और भगवान के प्रेम का द्वार खोल सकता है। भगवान कहते हैं कि भक्त मेरा हृदय है और जो उनका हृदय बन जाता है, उसे फिर किसी बात का भय नहीं रहता।

FAQ

वैष्णव पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है?

वैष्णव पौष पुत्रदा एकादशी 2027 मंगलवार, 19 जनवरी को है। स्मार्त पुत्रदा एकादशी 18 जनवरी को है।

वैष्णव एकादशी एक दिन बाद क्यों होती है?

वैष्णव परंपरा में यदि अरुणोदय काल में दशमी का अंश हो, तो एकादशी दशमी विद्ध मानी जाती है और व्रत अगले दिन रखा जाता है।

वैष्णव पुत्रदा एकादशी का पारण कब करें?

पारण 20 जनवरी को सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले करें। सटीक समय अपने संप्रदाय के पंचांग से देखें।

वैष्णव एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए?

इस दिन सभी अनाज, दालें, फलियां, प्याज, लहसुन और मांसाहार का त्याग किया जाता है। फल, दूध और कुट्टू जैसे फलाहार लिए जा सकते हैं।

एकादशी पर राजा अंबरीष की कथा क्यों पढ़ते हैं?

राजा अंबरीष की कथा एकादशी व्रत की महिमा और द्वादशी के भीतर पारण के महत्व को बताती है और दिखाती है कि भगवान अपने भक्त की रक्षा स्वयं करते हैं।

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पं. नरेंद्र शर्मा

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