By पं. सुव्रत शर्मा
घंटी की ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर करें

शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह स्वरूप साहस, रक्षा, सौम्यता और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति का प्रतीक है। मस्तक पर अर्धचंद्र और अलौकिक घंटी की ध्वनि इस दिन की साधना को विशेष बनाती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पर्व | शारदीय नवरात्रि तीसरा दिन |
| देवी | माँ चंद्रघंटा |
| मुख्य प्रतीक | अर्धचंद्र और घंटी की ध्वनि |
| प्रिय भोग | दूध से बने पदार्थ |
| मुख्य फल | भय से मुक्ति और रक्षा |
| साधना भाव | साहस, शांति, संतुलन |
नवरात्रि का तीसरा दिन साधक के भीतर की रक्षा शक्ति को जाग्रत करता है। यह वह क्षण है जब साधना केवल प्रार्थना नहीं रहती बल्कि आंतरिक निर्भयता का अभ्यास बन जाती है।
माँ चंद्रघंटा देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है और उनके स्वरूप में अद्भुत तेज तथा करुणा दोनों दिखाई देती हैं। वे सिंह पर आरूढ़ होती हैं और उनका स्वरूप युद्ध और शांति दोनों का संतुलन है।
उनकी घंटी की ध्वनि को दुष्ट शक्तियों को दूर करने वाली माना जाता है। यह ध्वनि केवल बाहरी कंपन नहीं बल्कि मन के भीतर जागने वाली निर्भय चेतना का प्रतीक भी है।
| तत्व | संकेत |
|---|---|
| अर्धचंद्र | शीतलता और मानसिक संतुलन |
| घंटी | नकारात्मकता का नाश |
| सिंह | साहस और शक्ति |
| तेज | रक्षा और जागरण |
दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी से तप और संयम की शक्ति मिलती है। तीसरे दिन चंद्रघंटा से उस तप को रक्षा शक्ति मिलती है। यह वह दिन है जब साधक भय से ऊपर उठकर स्थिरता की ओर बढ़ता है।
माँ चंद्रघंटा की साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी मानी जाती है जिनके जीवन में डर, असुरक्षा, मानसिक दुविधा या छिपी हुई बाधाएं हों।
घंटी या घण्टा बजाने से पूजा स्थल में केवल ध्वनि नहीं फैलती। शास्त्रीय दृष्टि में यह ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है और चित्त को एकाग्र करती है।
घंटी की ध्वनि से विचारों की बिखराव कम होती है। मन बाहर की हलचल से हटकर भीतर की उपस्थिति में आता है। यही कारण है कि चंद्रघंटा की पूजा में घंटी का विशेष महत्व है।
माँ चंद्रघंटा को दूध से बने भोग प्रिय माने गए हैं। दूध शीतलता, पोषण और कोमलता का प्रतीक है। इससे बनी मिठाइयां या भोग सात्विक भाव को प्रकट करते हैं।
| पक्ष | अर्थ |
|---|---|
| दूध | शीतलता और पोषण |
| मिष्ठान्न | मधुरता |
| भोग | समर्पण |
| शुद्धता | देवी प्रसन्नता |
दूध का भोग इस बात का संकेत देता है कि साधक को केवल शक्ति नहीं बल्कि संतुलित सौम्यता भी चाहिए। चंद्रघंटा का रूप यही संतुलन सिखाता है।
माँ चंद्रघंटा की साधना भय को दूर करने वाली मानी जाती है। भय केवल बाहरी नहीं होता। वह मन के भीतर छिपी अनिश्चितता, अपेक्षा और अविश्वास से भी जन्म लेता है।
जब साधक घंटी की ध्वनि, देवी ध्यान और मंत्र जप के साथ पूजा करता है तब भीतर की आशंका धीरे धीरे कम होती है।
| रूप | प्रभाव |
|---|---|
| बाहरी भय | परिस्थिति से डर |
| आंतरिक भय | मन की असुरक्षा |
| कर्मिक भय | अनिश्चित परिणाम की चिंता |
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप इन सभी स्तरों पर साहस प्रदान करता है।
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक माना गया है। चंद्रघंटा के नाम और स्वरूप में चंद्र तत्व का विशेष संबंध है। जब मन कमजोर हो या भावनाएं अस्थिर हों तब इस दिन की साधना विशेष शांति देती है।
यह दिन उन लोगों के लिए विशेष है जो बार बार अनावश्यक चिंता करते हैं या मन की अनिश्चितता से परेशान रहते हैं।
तीसरे दिन की पूजा सरल, शांत और शुद्ध भाव से की जाती है। विधि में क्रम और भावना दोनों का महत्व है।
पूजा में केवल बाहरी कर्म पर्याप्त नहीं। देवी का ध्यान करते समय यह अनुभव करना चाहिए कि भीतर की भयग्रंथि खुल रही है और प्रकाश प्रवेश कर रहा है।
माँ चंद्रघंटा के लिए यह मंत्र प्रचलित है।
ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः
इस मंत्र का जप मानसिक साहस और सौम्यता दोनों को बढ़ाता है। जब जप धीमी सांस और शांत दृष्टि के साथ किया जाए तब उसका प्रभाव गहरा होता है।
चंद्रघंटा का घंटानाद केवल प्रतीक नहीं है। यह प्रतीक बताता है कि साधक अपने भीतर की रक्षा शक्ति को जगाए। जब व्यक्ति सत्य, संयम और श्रद्धा में स्थित होता है तब बाहरी नकारात्मकता कमजोर पड़ती है।
हाँ। यह दिन शांत, संयमित और श्रद्धामय व्यवहार का है। तीव्र वाणी, अनावश्यक विवाद और आलस्य से दूर रहना चाहिए।
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप मनुष्य को भीतर की शक्ति से जोड़ता है। जब मन भय के कारण सिकुड़ता है तब यह साधना उसे विस्तार देती है। घंटी की ध्वनि, दीप का प्रकाश और देवी का ध्यान मिलकर आंतरिक सुरक्षा का अनुभव कराते हैं।
यह दिन उन लोगों के लिए विशेष सहारा है जो बाहरी रूप से मजबूत दिखते हैं, पर भीतर किसी अनकहे डर से ग्रस्त रहते हैं।
सामान्यतः दूध से बने भोग शुभ माने जाते हैं। यदि किसी की शारीरिक प्रकृति या स्वास्थ्य के कारण कुछ सीमाएं हों, तो श्रद्धा और शुद्धता को प्राथमिकता देनी चाहिए। मुख्य बात भाव की पवित्रता है।
निरंतर मंत्र जप, घंटी की नियमित ध्वनि और शुद्ध भावना से यह कृपा स्थिर रहती है। साधक को चाहिए कि वह पूजा को केवल एक दिन का कर्म न माने बल्कि अपने भीतर साहस का अभ्यास माने।
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप बताता है कि सच्ची शक्ति केवल उग्रता नहीं होती। उसमें शीतलता, साहस और रक्षा तीनों का संतुलन होना चाहिए। नवरात्रि का तीसरा दिन साधक को भय से मुक्त कर भीतर के प्रकाश की ओर ले जाता है।
नवरात्रि के तीसरे दिन किस देवी की पूजा होती है
तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है।
माँ चंद्रघंटा को कौन सा भोग प्रिय है
उन्हें दूध से बने भोग प्रिय माने जाते हैं।
चंद्रघंटा पूजा में घंटी क्यों बजाई जाती है
घंटी की ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मन एकाग्र होता है।
चंद्रघंटा पूजा से क्या लाभ मिलता है
भय से मुक्ति, मानसिक शांति और रक्षा शक्ति का जागरण होता है।
कौन सा मंत्र जपना चाहिए
ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः मंत्र जपना चाहिए।
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