By पं. संजीव शर्मा
कलश स्थापना मुहूर्त तिथि और पूरी पूजा विधि

वर्ष 2026 की शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष में माता दुर्गा की नौ दिवसीय आराधना का पवित्र काल है। इस वर्ष नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 रविवार से आरंभ होकर 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार तक रहेगी। पहले दिन घटस्थापना अर्थात कलश स्थापना से ही देवी कृपा का द्वार खुलता है। प्रतिपदा तिथि पर शुद्ध मुहूर्त में की गई स्थापना पूरे नवरात्रि साधना का आधार मानी जाती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| नवरात्रि आरंभ | 11 अक्टूबर 2026 रविवार |
| नवरात्रि समाप्ति | 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार |
| प्रतिपदा तिथि आरंभ | 10 अक्टूबर 2026 रात्रि 09:19 |
| प्रतिपदा तिथि समाप्ति | 11 अक्टूबर 2026 रात्रि 09:30 |
| मुख्य घटस्थापना मुहूर्त | प्रातः 06:19 से 10:12 |
| अभिजित मुहूर्त | 11:44 से 12:31 |
| पक्ष | आश्विन शुक्ल |
| देवता | माता दुर्गा के नौ रूप |
नगर और पंचांग भेद से कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि कर लेना उचित रहता है। फिर भी ऊपर दी गई सारिणी सामान्य रूप से भारत के अनेक क्षेत्रों के लिए मार्गदर्शक मानी जाती है।
घटस्थापना केवल औपचारिक कर्म नहीं है। कलश को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। जल पृथ्वी आकाश और जीवन शक्ति का संयोग इसमें होता है। जब भक्त श्रद्धा से कलश स्थापित करता है तब घर को देवी उपस्थिति के योग्य क्षेत्र माना जाता है।
वैदिक दृष्टि में नवरात्रि शक्ति साधना का काल है। प्रथम दिन की शुद्ध शुरुआत बाकी आठ दिनों की साधना को स्थिर बनाती है। अधूरी तैयारी या अशुद्ध मुहूर्त में स्थापना से मन में संशय बना रह सकता है। इसलिए शास्त्र मुहूर्त और विधि दोनों पर बल देते हैं।
| तत्व | प्रतीक |
|---|---|
| कलश | ब्रह्मांड और पूर्णता |
| जल | जीवन और शुद्धता |
| आम्रपल्लव | वृद्धि और मंगल |
| नारियल | दिव्य चेतना |
| मौली | संरक्षण और संकल्प |
अभिजित मुहूर्त दिन के मध्य के निकट आने वाला अत्यंत शुभ काल माना जाता है। जब प्रातः का मुख्य मुहूर्त छूट जाए तब अभिजित में घटस्थापना करना शास्त्रसम्मत विकल्प है। यह काल विघ्नबाधा को कम करने वाला और कार्यों को सिद्ध करने वाला माना जाता है।
2026 में 11 अक्टूबर को अभिजित मुहूर्त लगभग 11:44 से 12:31 तक रहेगा। इस अवधि में भी मन को शांत रखकर विधि पूरी करें। जल्दबाजी से बचें और प्रत्येक कदम को भावपूर्वक करें।
स्थापना से पहले सामग्री एकत्र कर लेना साधना को सरल बनाता है।
| सामग्री | उपयोग |
|---|---|
| सुपारी | संकल्प स्थिरता |
| सिक्का | समृद्धि भाव |
| दुर्गा सप्तशती | पाठ |
| आसन | ध्यान और जप |
विधि को क्रम से करना आवश्यक है ताकि कोई चरण छूटे नहीं।
आह्वान मांगने की भाषा नहीं बल्कि निमंत्रण की भाषा है। मन में यह भाव रखें कि माता घर में पधारें और परिवार को शक्ति विवेक और रक्षा दें। वाणी मधुर रखें और बच्चों को भी शांत बैठने का अभ्यास कराएं।
घर का वह कोना चुनें जहां आवागमन कम हो। स्थल पर कूड़ा बिखराव या भारी शोर न हो। दीवार स्वच्छ हो और यदि संभव हो तो लाल या पीले रंग का हल्का स्पर्श शुभ माना जाता है।
जब स्थल सात्विक होता है तब मन भी सहज ही एकाग्र होता है। देवी कृपा बाहरी सजावट से अधिक आंतरिक शुद्धता पर निर्भर करती है।
प्रत्येक दिन देवी के एक रूप का स्मरण साधना को गहराई देता है।
| दिन | रूप | गुण |
|---|---|---|
| 1 | शैलपुत्री | स्थिरता और मूल शक्ति |
| 2 | ब्रह्मचारिणी | तप और संयम |
| 3 | चंद्रघंटा | साहस और रक्षा |
| 4 | कूष्मांडा | सृजन ऊर्जा |
| 5 | स्कंदमाता | वात्सल्य और पोषण |
| 6 | कात्यायनी | विजय और बल |
| 7 | कालरात्रि | भय नाश |
| 8 | महागौरी | शुद्धि और शांति |
| 9 | सिद्धिदात्री | पूर्णता और सिद्धि |
पहले दिन शैलपुत्री के ध्यान के साथ घटस्थापना जोड़ने से साधना की नींव मजबूत मानी जाती है।
आश्विन मास में प्रकृति में संतुलन और शरद की स्पष्टता होती है। यह काल चंद्रमा और मन की शुद्धि से भी जुड़ा माना जाता है। जब भक्त व्रत जप और सात्विक आहार रखता है तब ग्रह संबंधी चंचलता का प्रभाव भी नरम पड़ सकता है।
| भाव | साधना फल |
|---|---|
| मन | शांति और स्थिरता |
| वाणी | मधुरता और सत्य |
| कर्म | अनुशासन |
| गृह | सुख और सुरक्षा |
ज्योतिष यहां भय फैलाने के लिए नहीं बल्कि यह समझने के लिए है कि बाहरी योग तब फलित होते हैं जब आंतरिक पात्रता तैयार हो।
व्रत की कठोरता व्यक्ति की शक्ति के अनुसार तय करें। अन्न का त्याग अनिवार्य नहीं यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे। परंतु सात्विकता अवश्य रखें।
| करें | न करें |
|---|---|
| सत्य बोलें | क्रोध और कटुता |
| दान और सेवा | निंदा |
| नियमित आरती | आलस्य |
| मौन जप | अनावश्यक विवाद |
घटस्थापना के साथ जौ या गेहूं बोना केवल परंपरा नहीं है। अंकुर जीवन शक्ति का प्रत्यक्ष चिह्न है। नौ दिनों में उनकी वृद्धि साधक के संकल्प की जीवंतता का संकेत बनती है। उन्हें प्रतिदिन हल्का जल दें और स्वच्छ रखें। विसर्जन के समय उन्हें सम्मानपूर्वक जल में या उपयुक्त स्थान पर विसर्जित करें।
हां। श्रद्धा और शुद्धि मुख्य हैं। रजस्वला अवधि में परंपरा के अनुसार प्रत्यक्ष स्पर्श वाले कर्म में संयम रखने की सलाह दी जाती है। परिवार का कोई अन्य सदस्य विधि पूरी कर सकता है। भाव की एकता सबसे बड़ी पूजा है।
दीर्घ पाठ सबके लिए संभव नहीं होता। सरल क्रम भी पूर्ण फलदायी माना जाता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ अनुभवी मार्गदर्शन में करें। बिना समझे केवल गति से पढ़ना आवश्यक नहीं। भावयुक्त अल्प जप अधिक श्रेष्ठ है।
अष्टमी नवमी पर हवन और कन्या पूजन की विशेष महत्ता है। क्षमता अनुसार कन्याओं को सात्विक भोजन दक्षिणा और सम्मान दें। यह देवी के बाल रूप के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। दिखावा नहीं सेवा का भाव रखें।
नवरात्रि परिवार को एक सूत्र में बांधती है। बच्चे जब दीप जलाते हैं तो संस्कार गहराते हैं। वृद्ध सदस्य कथा सुनाएं। घर में संगीत भक्तिमय रखें। बाहरी उत्सव की चमक से अधिक आंतरिक अनुशासन स्थायी संपत्ति है।
नियमित आरती और जप मन की भागदौड़ को कम करते हैं। निश्चित समय पर दीप जलाना अवचेतन को सुरक्षा का संदेश देता है। व्रत इच्छाशक्ति बढ़ाता है। सात्विक दिनचर्या नींद और मूड को संतुलित कर सकती है। यह वैज्ञानिक चमत्कार का दावा नहीं बल्कि अनुशासन का स्वाभाविक फल है।
कई लोग सोचते हैं कि केवल महंगे अनुष्ठान से फल मिलता है। शास्त्र इसके विपरीत सरल श्रद्धा को ऊंचा मानते हैं। दूसरी भ्रांति यह है कि एक दिन चूकने पर सब व्यर्थ। सच यह है कि भूल सुधार और निरंतरता अधिक महत्वपूर्ण है।
नवमी या दशमी पर स्थानीय परंपरा के अनुसार विसर्जन करें। कलश के जल को पौधों में देना शुभ माना जाता है। जौ को नदी तालाब या उपयुक्त स्थान पर विसर्जित करें। अंत में माता से क्षमा मांगें कि अनजाने में कोई कमी रह गई हो।
कृपा केवल अचानक चमत्कार नहीं होती। कभी यह निर्णय क्षमता के रूप में आती है। कभी घर में शांति के रूप में। कभी भय के कम होने के रूप में। साधक को बाहरी हलचल से अधिक अपने व्यवहार में कोमलता और साहस देखना चाहिए।
घटस्थापना से शुरू हुआ संकल्प यदि पूरे वर्ष सत्यता सेवा और आत्म संयम में ढल जाए तो नवरात्रि केवल नौ दिन का उत्सव नहीं रहती। वह जीवन शैली बन जाती है। माता की वास्तविक पूजा वही है जो चरित्र में उतरे।
शारदीय नवरात्रि 2026 कब से कब तक है
11 अक्टूबर 2026 रविवार से 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार तक शारदीय नवरात्रि मानी जाती है।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है
प्रातः 06:19 से 10:12 तक मुख्य मुहूर्त है और 11:44 से 12:31 तक अभिजित मुहूर्त है।
यदि प्रातः मुहूर्त छूट जाए तो क्या करें
अभिजित मुहूर्त में विधिपूर्वक कलश स्थापना की जा सकती है।
घर पर घटस्थापना कैसे करें
स्वच्छ स्थल पर कलश जल आम्रपल्लव नारियल मौली से स्थापित कर देवी का आह्वान दीप धूप और पुष्प से करें।
पूजा स्थल को शुभ कैसे बनाएं
स्वच्छता सात्विक वातावरण नियमित आरती और शांत व्यवहार से स्थल देवी योग्य बनता है।
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