नवरात्रि में श्रीयंत्र स्थापना

By पं. संजीव शर्मा

प्राण प्रतिष्ठा, दैनिक पूजा और लक्ष्मी साधना के सरल नियम

नवरात्रि में श्रीयंत्र स्थापना विधि और पूजा नियम

सामग्री तालिका

पहले जानें स्थापना का शुभ समय

नवरात्रि में श्रीयंत्र की स्थापना को देवी महालक्ष्मी, त्रिपुरसुंदरी और श्रीविद्या परंपरा से जुड़ी साधना माना जाता है। श्रीयंत्र केवल धन प्राप्ति का साधन नहीं है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था, शक्ति और चेतना के संतुलन का प्रतीक है। इसकी स्थापना श्रद्धा, शुद्धता और नियमित पूजा के संकल्प के साथ करनी चाहिए।

नवरात्रि में श्रीयंत्र स्थापित करने के लिए शुक्रवार, अष्टमी, नवमी, पूर्णिमा या किसी शुभ तिथि का चयन किया जा सकता है। स्थापना का वास्तविक समय स्थानीय पंचांग, सूर्योदय, तिथि और पूजा परंपरा के अनुसार बदल सकता है। यदि श्रीयंत्र की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करानी हो तो योग्य आचार्य की सहायता लेना अधिक उचित रहता है।

श्रीयंत्र स्थापना की प्राथमिक जानकारी

  1. उपयुक्त अवसर: नवरात्रि, शुक्रवार, पूर्णिमा, अष्टमी या नवमी
  2. उपयुक्त समय: प्रातः स्नान के बाद या लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त
  3. शुभ दिशा: उत्तर पूर्व दिशा या स्वच्छ पूजा स्थान
  4. स्थापना स्थान: घर का मंदिर, कार्यालय का पूजा स्थल या स्वच्छ तिजोरी का समीप भाग
  5. आधार: लाल या पीला स्वच्छ वस्त्र और ऊंची चौकी
  6. शुद्धि: जल, पंचामृत और गंगाजल की परंपरागत प्रक्रिया
  7. मुख्य सामग्री: दीपक, धूप, पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन और नैवेद्य
  8. प्रमुख मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
  9. दैनिक नियम: दीपक, पुष्प और मंत्र जप
  10. मुख्य सावधानी: श्रीयंत्र को फर्श, गंदे स्थान या अव्यवस्थित अलमारी में न रखें
चरण आवश्यक सामग्री मुख्य भाव
स्थान शुद्धि गंगाजल, स्वच्छ जल पवित्र वातावरण
यंत्र शुद्धि पंचामृत, जल सम्मान और शुद्धता
स्थापना लाल वस्त्र, चौकी स्थिरता और श्रद्धा
पूजन रोली, अक्षत, पुष्प, चंदन देवी आवाहन
दीपदान घी या तिल का तेल प्रकाश और चेतना
मंत्र जप लक्ष्मी मंत्र या श्रीसूक्त समृद्धि और संतुलन
नैवेद्य फल, मिठाई, खीर या नारियल कृतज्ञता और समर्पण
दैनिक सेवा दीपक, जल, पुष्प नियमित साधना

श्रीयंत्र का आध्यात्मिक स्वरूप

श्रीयंत्र को श्रीविद्या परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें ऊपर और नीचे की ओर बने त्रिकोणों का संयोजन शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक समझा जाता है। बाहरी रेखाओं से लेकर मध्य के बिंदु तक इसकी रचना साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाने का संकेत देती है।

श्रीयंत्र का मध्य बिंदु बिंदु कहलाता है। यह परम चेतना, एकाग्रता और सृष्टि के मूल केंद्र का प्रतीक है। इसके चारों ओर बने त्रिकोण शक्ति के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं। कमल दल इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति के विस्तार का संकेत देते हैं। बाहरी भूपुर साधक को मर्यादा, संरक्षण और स्थिरता का भाव देता है।

श्रीयंत्र को केवल धन का यंत्र मानना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। यह समृद्धि, सौंदर्य, ज्ञान, संतुलन, सृजन और आध्यात्मिक एकाग्रता का प्रतीक है। महालक्ष्मी की कृपा का अर्थ केवल धन बढ़ना नहीं है। घर में संतोष, स्वास्थ्य, सद्भाव, उचित अवसर और धर्मपूर्ण उपयोग भी श्री का ही रूप हैं।

नवरात्रि में श्रीयंत्र स्थापना क्यों शुभ मानी जाती है

नवरात्रि में देवी शक्ति के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इस अवधि में घर का वातावरण पूजा, मंत्र, दीपक और संयम से पवित्र बनाया जाता है। ऐसे समय में श्रीयंत्र स्थापित करने से साधक के लिए नियमित श्री साधना का संकल्प बनता है।

नवरात्रि का प्रत्येक दिन साधना की एक सीढ़ी जैसा है। आरंभिक दिनों में घर और मन की शुद्धि, मध्य दिनों में शक्ति और अनुशासन तथा अंतिम दिनों में समर्पण और पूर्णता का भाव विकसित किया जा सकता है। श्रीयंत्र इस पूरी प्रक्रिया को एकाग्रता का केंद्र देता है।

नवरात्रि में स्थापना के लिए उपयुक्त दिन

  1. प्रतिपदा: नए संकल्प और स्थान शुद्धि के लिए
  2. पंचमी: ज्ञान, सौंदर्य और संतुलित समृद्धि के लिए
  3. अष्टमी: शक्ति साधना और बाधा शांति के लिए
  4. नवमी: पूर्णता, कृतज्ञता और देवी कृपा के लिए
  5. शुक्रवार: लक्ष्मी और शुक्र तत्व से जुड़े पूजन के लिए
  6. पूर्णिमा: प्रकाश, शांति और मानसिक स्थिरता के लिए

किसी विशेष वर्ष में तिथि और मुहूर्त जानने के लिए स्थानीय पंचांग देखना आवश्यक है। सामान्य परंपरा को व्यक्तिगत कुंडली या स्थान विशेष का निश्चित मुहूर्त नहीं माना जा सकता।

श्रीयंत्र स्थापना की सरल विधि

घर में रखा जाने वाला श्रीयंत्र धातु, स्फटिक या अन्य परंपरागत सामग्री का हो सकता है। श्रीयंत्र की बनावट स्पष्ट, स्वच्छ और सम्मानपूर्वक रखने योग्य होनी चाहिए। यदि यंत्र पहले से सिद्ध या प्राण प्रतिष्ठित हो तो उसकी पूजा पद्धति अलग हो सकती है।

चरणबद्ध स्थापना विधि

  1. नवरात्रि के चुने हुए दिन प्रातः स्नान करें।
  2. स्वच्छ और संयमित वस्त्र धारण करें।
  3. पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें।
  4. उत्तर पूर्व दिशा में चौकी रखें।
  5. चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
  6. श्रीयंत्र को स्वच्छ पात्र में रखें।
  7. पहले जल से यंत्र को धोएं।
  8. परंपरा अनुसार पंचामृत से स्नान कराएं।
  9. इसके बाद गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करें।
  10. यंत्र को साफ कपड़े से हल्के हाथों पोंछें।
  11. इसे लाल वस्त्र पर स्थापित करें।
  12. दीपक और धूप जलाएं।
  13. रोली, अक्षत, लाल पुष्प और चंदन अर्पित करें।
  14. महालक्ष्मी मंत्र का जप करें।
  15. फल, मिठाई, नारियल या खीर का नैवेद्य रखें।
  16. देवी से घर की शांति, धर्मपूर्ण समृद्धि और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।
  17. आरती करके परिवार में प्रसाद बांटें।

धातु के यंत्र को लंबे समय तक दूध में भिगोकर नहीं रखना चाहिए। शुद्धि के बाद उसे अच्छी तरह साफ और सूखा रखना आवश्यक है। स्फटिक यंत्र को गिरने, टूटने और खरोंच से बचाएं।

प्राण प्रतिष्ठा का वास्तविक अर्थ

प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ श्रीयंत्र में देवी की चेतना को आमंत्रित करना और उसे पूजा का केंद्र बनाना है। इसे केवल जल छिड़कने या मंत्र बोलने की छोटी प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए। विस्तृत प्राण प्रतिष्ठा में संकल्प, आवाहन, न्यास, मंत्र जप, पूजा, हवन और समर्पण जैसे चरण हो सकते हैं।

घर पर सामान्य पूजा करने वाला व्यक्ति सरल रूप से श्रीयंत्र का शुद्धिकरण, ध्यान और मंत्र अर्पण कर सकता है। लेकिन यदि कोई साधक विशेष श्रीविद्या साधना, पुरश्चरण या विस्तृत प्राण प्रतिष्ठा करना चाहता है तो आचार्य की देखरेख आवश्यक है।

सरल घरेलू प्राण भाव

  1. देवी महालक्ष्मी का ध्यान करें।
  2. श्रीयंत्र को प्रकाश और चेतना का केंद्र मानें।
  3. मन में शुद्ध संकल्प रखें।
  4. ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का जप करें।
  5. यंत्र के मध्य बिंदु पर शांत दृष्टि रखें।
  6. घर की समृद्धि के साथ सद्बुद्धि और सेवा की प्रार्थना करें।
  7. अंत में देवी को प्रणाम करके संकल्प पूर्ण करें।

प्राण प्रतिष्ठा का सबसे महत्वपूर्ण भाग साधक का व्यवहार है। यदि यंत्र स्थापित हो लेकिन घर में छल, अत्यधिक लोभ, अपमान और अव्यवस्था बनी रहे, तो पूजा का आध्यात्मिक उद्देश्य कमजोर हो जाता है।

श्रीयंत्र के प्रमुख मंत्र

श्रीयंत्र पूजा में मंत्र का चयन परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। सरल गृह पूजा के लिए छोटे मंत्र पर्याप्त हैं।

दैनिक जप के लिए मंत्र

  1. ॐ श्रीं नमः
  2. ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
  3. ॐ महालक्ष्म्यै नमः
  4. श्रीसूक्त का पाठ
  5. लक्ष्मी गायत्री मंत्र

लक्ष्मी गायत्री मंत्र का एक प्रचलित रूप है

ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्

इसका सरल भाव है कि साधक महालक्ष्मी और विष्णु पत्नी शक्ति का ध्यान करके उनसे बुद्धि, प्रकाश और शुभ प्रेरणा की प्रार्थना करता है।

मंत्र का उच्चारण जितना संभव हो स्पष्ट रखें। संख्या पूरी करने से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और नियमितता है। जटिल बीज मंत्रों का लंबा अनुष्ठान गुरु निर्देश के बिना न करें।

श्रीयंत्र को घर में कहां रखें

श्रीयंत्र के लिए पूजा घर सबसे उचित स्थान माना जाता है। यदि पूजा घर उपलब्ध न हो तो उत्तर पूर्व दिशा में स्वच्छ चौकी या ऊंचे स्थान पर रखा जा सकता है। कुछ परिवार इसे तिजोरी या धन रखने के स्थान के पास भी रखते हैं, लेकिन वहां स्वच्छता और सम्मान बना रहना चाहिए।

स्थापना स्थान के नियम

  1. श्रीयंत्र को फर्श पर सीधे न रखें।
  2. जूते, कूड़ा और गंदे कपड़ों के पास न रखें।
  3. बाथरूम या रसोई की अस्वच्छ अलमारी में न रखें।
  4. शयनकक्ष में रखने से पहले परंपरा और स्थान की पवित्रता देखें।
  5. मुख्य द्वार के नीचे या पैर लगने वाले स्थान पर न रखें।
  6. पूजा स्थान में पर्याप्त प्रकाश और स्वच्छ हवा रखें।
  7. एक ही स्थान पर बहुत सारे सक्रिय यंत्र न रखें।
  8. श्रीयंत्र को उल्टा न रखें।
  9. उस पर धूल न जमने दें।
  10. स्थापना स्थान बार बार बदलने से बचें।

श्रीयंत्र को तिजोरी में रखना हो तो तिजोरी का स्थान केवल धन संचय का नहीं, अनुशासन और जिम्मेदारी का भी प्रतीक होना चाहिए। अवैध या अनुचित कमाई के साथ लक्ष्मी पूजा का भाव विरोधाभासी हो जाता है।

दैनिक श्रीयंत्र पूजा के नियम

स्थापना के बाद श्रीयंत्र को छोड़ देना उचित नहीं है। नियमित पूजा का अर्थ लंबा अनुष्ठान नहीं है। कुछ मिनटों का स्वच्छ और ध्यानपूर्ण पूजन भी पर्याप्त हो सकता है।

दैनिक पूजा क्रम

  1. पूजा स्थान साफ करें।
  2. श्रीयंत्र के सामने दीपक जलाएं।
  3. यदि संभव हो तो धूप या सुगंधित सामग्री अर्पित करें।
  4. जल का हल्का छिड़काव करें।
  5. पुष्प या अक्षत अर्पित करें।
  6. ॐ श्रीं नमः का 11 बार जप करें।
  7. शुक्रवार को लक्ष्मी मंत्र या श्रीसूक्त पढ़ें।
  8. धन के साथ संतोष, सेवा और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।
  9. अंत में प्रणाम करके दीपक सुरक्षित रखें।

श्रीयंत्र को रोज दूध से धोना आवश्यक नहीं है। अधिक जल या द्रव्य से धातु खराब हो सकती है। समय समय पर साफ कपड़े से पोंछना और पूजा स्थान को स्वच्छ रखना पर्याप्त है।

श्रीयंत्र पूजा और आर्थिक समृद्धि

श्रीयंत्र को महालक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता में यह घर में शुभता, संतुलन और समृद्धि का वातावरण बनाने वाला प्रतीक माना जाता है। फिर भी श्रीयंत्र को धन प्राप्ति की मशीन समझना उचित नहीं है।

आर्थिक समृद्धि के लिए पूजा के साथ बजट, बचत, कौशल, ईमानदारी और उचित निवेश आवश्यक हैं। यदि व्यक्ति हर शुक्रवार दीपक जलाए लेकिन अनावश्यक खर्च, ऋण और दिखावे को नियंत्रित न करे, तो साधना का व्यावहारिक पक्ष अधूरा रहेगा।

श्री साधना के साथ आर्थिक अनुशासन

  1. आय और व्यय का नियमित लेखा रखें।
  2. अनावश्यक ऋण से बचें।
  3. कमाई के साधनों में ईमानदारी रखें।
  4. आय का एक भाग सेवा या दान के लिए रखें।
  5. परिवार की आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझें।
  6. निवेश से पहले उचित सलाह लें।
  7. केवल भाग्य पर निर्भर न रहें।
  8. धन का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण में करें।

ज्योतिषीय दृष्टि से श्रीयंत्र

श्रीयंत्र को शुक्र, गुरु और चंद्रमा से जुड़े गुणों का प्रतीकात्मक केंद्र माना जा सकता है। शुक्र सौंदर्य, सुख, कला और वैवाहिक सामंजस्य से जुड़ा है। गुरु ज्ञान, धर्म, विस्तार और शुभ मार्गदर्शन का संकेत देता है। चंद्रमा मन, शांति और गृहस्थ भावनाओं से संबंधित है।

किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र या गुरु कमजोर हो तो लक्ष्मी पूजा, दान, स्त्री सम्मान, गुरु सेवा, स्वच्छता और संयमित जीवनशैली सहायक हो सकती है। केवल श्रीयंत्र स्थापित करने से ग्रह दोष समाप्त होने का निश्चित दावा नहीं किया जा सकता।

ग्रह गुणों का संतुलन

  1. शुक्र के लिए स्वच्छता, मधुर वाणी और कला का सम्मान
  2. गुरु के लिए ज्ञान, दान और धर्मपूर्ण निर्णय
  3. चंद्रमा के लिए मानसिक शांति और पारिवारिक प्रेम
  4. बुध के लिए सही लेखा, व्यापारिक विवेक और संवाद
  5. शनि के लिए श्रम, अनुशासन और जिम्मेदारी

कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए

श्रीयंत्र अत्यंत पवित्र प्रतीक माना जाता है। इसे केवल सजावट या भय आधारित उपाय के रूप में उपयोग करना उचित नहीं है।

  1. बिना समझे जटिल तांत्रिक प्रयोग न करें।
  2. इंटरनेट या बाजार के दावे पर आंख बंद करके विश्वास न करें।
  3. श्रीयंत्र को गंदे स्थान पर न रखें।
  4. पूजा के नाम पर अत्यधिक धन खर्च न करें।
  5. आर्थिक समस्या में वास्तविक योजना को न छोड़ें।
  6. यंत्र को दूसरों के घर में बिना अनुमति न रखें।
  7. टूटे हुए यंत्र की पूजा जारी न रखें।
  8. प्राण प्रतिष्ठित यंत्र को लापरवाही से इधर उधर न ले जाएं।
  9. मंत्र जप को भय और लालच से न जोड़ें।
  10. श्रीयंत्र की स्थापना को स्थायी धन गारंटी न मानें।

घर और व्यापार स्थल के लिए श्रीयंत्र

घर में श्रीयंत्र का भाव शांति, समृद्धि और पारिवारिक संतुलन से जुड़ा है। व्यापार स्थल पर इसका भाव स्पष्ट निर्णय, ग्राहक विश्वास, उचित लेनदेन और व्यवस्थित विकास से जोड़ा जा सकता है।

व्यापार स्थल पर श्रीयंत्र रखने से पहले स्थान की स्वच्छता, अग्नि सुरक्षा, कर्मचारियों का सम्मान और लेखा व्यवस्था सुधारना भी आवश्यक है। पूजा के साथ अनुचित व्यापार, छल और शोषण बना रहे तो श्रीयंत्र का आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा नहीं होता।

व्यापार स्थल पर दैनिक नियम

  1. श्रीयंत्र को स्वच्छ ऊंचे स्थान पर रखें।
  2. दुकान या कार्यालय खुलने से पहले दीपक जलाएं।
  3. छोटे मंत्र का जप करें।
  4. दिन के आर्थिक निर्णय स्पष्ट लेखे के साथ लें।
  5. कर्मचारियों और ग्राहकों के प्रति उचित व्यवहार रखें।
  6. शुक्रवार को विशेष लक्ष्मी पूजन करें।
  7. महीने में एक बार दान या सेवा से साधना जोड़ें।

श्री के स्थायी भाव का जागरण

नवरात्रि में श्रीयंत्र की स्थापना देवी लक्ष्मी को घर में स्थायी रूप से बुलाने का दावा नहीं, बल्कि घर में श्री के गुणों को जाग्रत करने का संकल्प है। श्री का अर्थ धन के साथ शांति, सौंदर्य के साथ विनम्रता, सफलता के साथ सेवा और समृद्धि के साथ संतोष भी है।

श्रीयंत्र के सामने जलता दीपक साधक को याद दिलाता है कि बाहरी प्रकाश तभी टिकता है जब भीतर की नीयत स्वच्छ हो। दैनिक पूजा, सही आर्थिक निर्णय, परिवार में मधुरता और जरूरतमंदों की सहायता मिलकर लक्ष्मी साधना को जीवंत बनाते हैं।

जब श्रीयंत्र पूजा के साथ लोभ कम होता है, कर्म शुद्ध होते हैं और धन का उपयोग कल्याण में होता है, तब नवरात्रि की स्थापना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं रहती। वह घर के वातावरण, विचारों और जीवन पद्धति में शुभ परिवर्तन का आधार बन जाती है।

FAQ

नवरात्रि में श्रीयंत्र की स्थापना कब करनी चाहिए?

नवरात्रि में शुक्रवार, अष्टमी, नवमी या किसी शुभ तिथि पर श्रीयंत्र स्थापित किया जा सकता है। अंतिम समय स्थानीय पंचांग और पूजा परंपरा के अनुसार चुनें।

श्रीयंत्र को घर में किस दिशा में रखना चाहिए?

श्रीयंत्र को पूजा घर में रखना सबसे उचित माना जाता है। पूजा घर न हो तो उत्तर पूर्व दिशा में स्वच्छ ऊंची चौकी पर रखा जा सकता है।

श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करें?

सरल पूजा में श्रीयंत्र का जल और पंचामृत से शुद्धिकरण करके देवी मंत्र का जप किया जा सकता है। विस्तृत प्राण प्रतिष्ठा के लिए योग्य आचार्य की सहायता लेना उचित है।

श्रीयंत्र के सामने कौन सा मंत्र पढ़ें?

ॐ श्रीं नमः, ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः और लक्ष्मी गायत्री मंत्र का जप किया जा सकता है। श्रीसूक्त का पाठ भी परंपरा अनुसार किया जाता है।

क्या श्रीयंत्र रखने से घर में धन निश्चित रूप से आता है?

श्रीयंत्र समृद्धि और संतुलन का धार्मिक प्रतीक है। आर्थिक उन्नति के लिए पूजा के साथ परिश्रम, बचत, ईमानदारी और उचित वित्तीय योजना भी आवश्यक है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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