By पं. नरेंद्र शर्मा
कलश, ज्वार और प्रतिमा का सम्मानजनक तथा पर्यावरण अनुकूल विसर्जन

नवरात्रि की पूजा समाप्त होने के बाद कलश, ज्वार, नारियल, पूजा सामग्री और प्रतिमा का विसर्जन श्रद्धा तथा सम्मान के साथ किया जाता है। विसर्जन का अर्थ पूजा का अंत नहीं बल्कि देवी शक्ति को हृदय में स्थापित करके बाहरी प्रतीकों को प्रकृति को वापस सौंपना है।
चैत्र नवरात्रि 2026 में 19 मार्च से 27 मार्च तक मानी गई थी। कई पंचांगों में नवमी के बाद 27 मार्च को दशमी आरंभ होने पर विसर्जन का समय बताया गया है, जबकि पूरे 9 दिन का व्रत रखने वाले साधक 28 मार्च की सुबह दशमी तिथि में विसर्जन कर सकते हैं। स्थानीय पंचांग और पूजा परंपरा के अनुसार समय में अंतर हो सकता है। [141][143][144]
शारदीय नवरात्रि 2026 में 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक मानी जाती है और विजयादशमी 20 अक्टूबर को होगी। शारदीय नवरात्रि में कलश तथा ज्वार का विसर्जन नवमी पूजा के बाद या दशमी तिथि में स्थानीय पंचांग के अनुसार किया जा सकता है। [81][83]
| पूजित सामग्री | पारंपरिक विधि | पर्यावरण अनुकूल विकल्प |
|---|---|---|
| कलश का जल | पवित्र जल में अर्पण | पौधों या मिट्टी में डालें |
| ज्वार या जवारे | जल या मिट्टी में विसर्जन | गमले, बगीचे या खेत की मिट्टी में मिलाएं |
| नारियल | प्रसाद के रूप में ग्रहण | परिवार में बांटें या भोजन में उपयोग करें |
| सुपारी और सिक्का | पूजा में सुरक्षित रखें | अगली पूजा में उपयोग करें |
| पुष्प और पत्तियां | जल में अर्पण | खाद या मिट्टी में डालें |
| मिट्टी का कलश | परंपरा अनुसार विसर्जन | साफ करके पौधों के लिए उपयोग करें |
| प्रतिमा | स्वच्छ जल में विसर्जन | मिट्टी की प्रतिमा को घर की मिट्टी में मिलाएं |
नवरात्रि के दिनों में कलश को देवी शक्ति का आसन माना जाता है। उसमें रखा जल जीवन का, नारियल चेतना का, मौली संकल्प का और ज्वार विकास का प्रतीक बनता है। जब पूजा समाप्त होती है तब इन प्रतीकों का विसर्जन साधक को याद दिलाता है कि कोई भी बाहरी रूप स्थायी नहीं होता।
देवी को विदा करना वास्तव में देवी को दूर भेजना नहीं है। यह पूजा के दौरान जाग्रत हुई शक्ति को अपने विचारों, कर्मों और व्यवहार में बनाए रखने का संकल्प है। जल में विसर्जन इसी परिवर्तन का प्रतीक है। जो वस्तु पूजा के दिनों में पवित्र मानी गई, उसे विसर्जन के बाद भी सम्मान से संभालना चाहिए।
विसर्जन के समय मन में यह भाव रखा जा सकता है कि माँ दुर्गा परिवार को शक्ति, विवेक, स्वास्थ्य और सद्भाव प्रदान करें। अगले वर्ष फिर से देवी आराधना का अवसर मिले, ऐसी प्रार्थना के साथ पूजा का समापन किया जाता है।
कलश विसर्जन अचानक नहीं करना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद सभी सामग्री को क्रम से अलग करना उचित रहता है।
कलश पर रखे नारियल को सामान्यतः प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। यदि नारियल पूजा के दौरान खराब हो गया हो, दुर्गंध दे रहा हो या भीतर से सड़ा हुआ हो तो उसे खाने के बजाय मिट्टी में सम्मानपूर्वक दबाना उचित है।
जलाशय तक जाना संभव न हो तो घर पर भी सम्मानपूर्वक कलश विसर्जन किया जा सकता है। यह विधि अपार्टमेंट, वृद्ध साधकों और ऐसे परिवारों के लिए उपयोगी है जहां सार्वजनिक विसर्जन संभव नहीं।
गमले में विसर्जन करते समय जल इतना अधिक न डालें कि पौधा खराब हो जाए। यदि कलश का जल बहुत अधिक हो तो उसे कई पौधों में थोड़ा थोड़ा डालें। स्वच्छ जल को नाली या गंदे स्थान पर बहाना उचित नहीं माना जाता।
नवरात्रि में ज्वार बोना उर्वरता, जीवन, वृद्धि और शुभ परिणामों का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों में ज्वार का बढ़ना साधक को याद दिलाता है कि नियमित साधना का परिणाम धीरे धीरे दिखाई देता है।
कई परिवार ज्वार को घर के सदस्यों के कान या सिर पर रखकर विजय और मंगल की शुभकामना देते हैं। यह परंपरा क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है। ज्वार को पैरों के नीचे या कूड़े में फेंकना उचित नहीं है।
कलश में रखी हर वस्तु का उपयोग एक जैसा नहीं होता। कुछ सामग्री प्रसाद होती है, कुछ अगली पूजा में रखी जा सकती है और कुछ मिट्टी में मिलाई जा सकती है।
पूजा सामग्री को पवित्र मानने का अर्थ यह नहीं है कि उसे बिना विचार के जल में डाल दिया जाए। प्रकृति भी देवी का ही रूप है। जल को प्रदूषित करना देवी के प्रति सम्मान नहीं माना जा सकता।
यदि नवरात्रि में मिट्टी की छोटी प्रतिमा स्थापित की गई हो, तो उसका विसर्जन स्वच्छ जल या घर की मिट्टी में किया जा सकता है। प्लास्टर, रासायनिक रंग और धातु से बनी प्रतिमाओं का जल में विसर्जन पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है।
घर पर प्रतिमा विसर्जन के लिए बाल्टी या टब का उपयोग किया जा सकता है। बाद में मिट्टी को गमले में डालें। यदि सार्वजनिक विसर्जन करना हो तो प्रशासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम तालाब या निर्धारित स्थान को प्राथमिकता दें।
नवरात्रि में अखंड ज्योति रखने वाले परिवारों के लिए अंतिम दिन दीपक को लेकर अलग परंपराएं होती हैं। कुछ परिवार पूजा समाप्त होने तक ज्योति जलाते हैं और कुछ उसे देवी आरती के बाद शांत होने देते हैं।
अखंड ज्योति का आध्यात्मिक अर्थ साधना की निरंतरता है। दीपक बुझने के बाद भी साधना का प्रकाश सत्य, संयम और सेवा के रूप में जीवन में बना रहना चाहिए।
विसर्जन के समय लंबा मंत्र पढ़ना अनिवार्य नहीं है। सरल और श्रद्धापूर्ण प्रार्थना पर्याप्त है।
प्रार्थना के बाद विसर्जन सामग्री को धीरे और सम्मान से प्रकृति को सौंपें। मंत्र का उच्चारण स्पष्ट न हो तो सरल हिंदी प्रार्थना करें। भाव और विनम्रता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।
विसर्जन पूजा का अंतिम चरण है, इसलिए इसमें असावधानी से बचना चाहिए।
व्रत रखने वाले साधक विसर्जन और पारण का समय अपनी परंपरा के अनुसार तय करें। कई परिवार नवमी पूजा और कन्या पूजन के बाद पारण करते हैं, जबकि कुछ परिवार दशमी तिथि में कलश विसर्जन के बाद व्रत खोलते हैं।
पारण में हल्का और सात्विक भोजन लेना चाहिए। लंबे उपवास के बाद अत्यधिक तला, बहुत मसालेदार या बहुत अधिक भोजन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं होता।
विसर्जन प्रकृति चक्र की याद दिलाता है। मिट्टी से बना रूप मिट्टी में लौटता है। जल पूजा को आगे ले जाता है। ज्वार मिट्टी में मिलकर फिर जीवन का आधार बनता है। यह प्रक्रिया सृष्टि, पालन और विलय के सिद्धांत को सरल रूप में समझाती है।
ज्योतिषीय दृष्टि से विसर्जन आसक्ति कम करने का अभ्यास है। चंद्रमा मन का, शनि कर्म और धैर्य का तथा केतु वैराग्य का संकेत देता है। पूजा के बाद सामग्री को सम्मानपूर्वक छोड़ना व्यक्ति को यह सिखाता है कि श्रद्धा बनाए रखते हुए वस्तुओं से अत्यधिक चिपकाव कम किया जा सकता है।
नवरात्रि विसर्जन देवी को विदा करने की बाहरी विधि है, लेकिन भीतर यह देवी शक्ति को जीवन में बनाए रखने का संकल्प है। कलश का जल मिट्टी में जाता है, ज्वार धरती में लौटता है और प्रतिमा अपने मूल तत्व में विलीन होती है। यही विसर्जन का प्राकृतिक और आध्यात्मिक क्रम है।
2026 में चाहे चैत्र नवरात्रि का विसर्जन हो या शारदीय नवरात्रि का, स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा का सम्मान करें। जल उपलब्ध न हो तो गमला, बगीचा या स्वच्छ मिट्टी अपनाएं। पूजा सामग्री को प्रकृति के लिए बोझ नहीं, सेवा और संरक्षण का अवसर बनाएं।
देवी की विदाई तब पूर्ण मानी जाती है जब घर में पूजा के बाद भी मधुर वाणी, संयमित जीवन, स्वच्छता, करुणा और सत्य का दीपक जलता रहे।
नवरात्रि 2026 में कलश विसर्जन कब करना चाहिए?
चैत्र नवरात्रि में 27 मार्च को नवमी के बाद या 28 मार्च को दशमी तिथि में विसर्जन किया जा सकता है। शारदीय नवरात्रि में 19 अक्टूबर की पूजा के बाद या 20 अक्टूबर को स्थानीय पंचांग अनुसार विसर्जन करें।
ज्वार या जवारे का विसर्जन कैसे करें?
ज्वार को सम्मानपूर्वक उठाकर थोड़ा प्रसाद रूप में परिवार में बांटें और शेष को गमले, बगीचे या खेत की मिट्टी में मिला दें।
क्या कलश का जल घर में पौधों को दे सकते हैं?
हां, कलश का स्वच्छ जल पौधों, तुलसी या मिट्टी में डाला जा सकता है। अधिक जल एक ही पौधे में न डालें।
जल में प्रतिमा विसर्जन न कर सकें तो क्या करें?
मिट्टी की प्रतिमा को बड़े पात्र में स्वच्छ जल में घोलकर उस मिट्टी को गमले या बगीचे में डालें। बड़ी प्रतिमा के लिए निर्धारित कृत्रिम विसर्जन केंद्र का उपयोग करें।
क्या नारियल और सुपारी का विसर्जन करना जरूरी है?
नहीं। नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है और सुपारी को अगली पूजा में रखा जा सकता है। पूजा सामग्री का सम्मानजनक उपयोग विसर्जन से अधिक महत्वपूर्ण है।
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