By पं. नरेंद्र शर्मा
24 मिनट नहीं 48 मिनट की शक्ति साधना

महाअष्टमी और महानवमी के बीच का समय संधि पूजा कहलाता है। यह केवल 24 मिनट का समय नहीं होता। शास्त्रीय गणना में अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभिक 24 मिनट मिलकर कुल 48 मिनट का संधि काल बनाते हैं। वर्ष 2026 में इस पूजा का वास्तविक समय स्थानीय पंचांग में नवमी तिथि के आरंभ के अनुसार तय होगा, इसलिए नगर के अनुसार समय में अंतर संभव है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पूजा | संधि पूजा |
| अवसर | महाअष्टमी और महानवमी का संक्रमण |
| कुल अवधि | 48 मिनट |
| अष्टमी का भाग | अंतिम 24 मिनट |
| नवमी का भाग | प्रारंभिक 24 मिनट |
| मुख्य देवी स्वरूप | माँ चामुंडा |
| प्रमुख दीप | 108 दीपक |
| प्रमुख पुष्प | 108 कमल पुष्प |
संधि पूजा की विशेषता इसी संक्रमण में है। यह अष्टमी की साधना और नवमी की सिद्धि के बीच का वह क्षण है जहां साधक परिवर्तन, समर्पण और विजय का अनुभव करता है।
संधि का अर्थ है मिलन या संक्रमण। अष्टमी से नवमी की ओर बढ़ता हुआ यह समय दो तिथियों, दो भावों और दो आध्यात्मिक अवस्थाओं का संगम माना जाता है।
अष्टमी देवी शक्ति की तीव्रता से जुड़ी है। नवमी पूर्णता और सिद्धि की ओर संकेत करती है। इसलिए संधि पूजा में उग्र शक्ति और कल्याणकारी करुणा एक साथ अनुभव की जाती है।
| तत्व | संकेत |
|---|---|
| अष्टमी | शक्ति और संघर्ष |
| नवमी | सिद्धि और पूर्णता |
| संक्रमण | परिवर्तन |
| दीप | अंधकार पर प्रकाश |
| चामुंडा | अधर्म का विनाश |
देवी महात्म्य की परंपरा में चंड और मुंड नामक दैत्य शक्तियों के वध से चामुंडा स्वरूप जुड़ा हुआ है। देवी का यह रूप उस समय प्रकट होता है जब साधारण शक्ति से आगे बढ़कर निर्णायक रक्षा आवश्यक हो जाती है।
इसी कारण संधि पूजा में माँ दुर्गा के चामुंडा रूप का आह्वान किया जाता है। यह आह्वान केवल बाहरी शत्रु के विनाश के लिए नहीं बल्कि भीतर के भय, अहंकार, क्रोध और अज्ञान को समाप्त करने के लिए भी है।
संधि पूजा में 108 दीपक जलाने की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दीपक प्रकाश, जागरण और देवी चेतना का प्रतीक है। 108 की संख्या को देवी के नामों, जपमाला के दानों और व्यापक ब्रह्मांडीय पूर्णता से जोड़ा जाता है। [121][122]
कई पूजा परंपराओं में 108 दीपकों को इस प्रकार सजाया जाता है कि वे ॐ या मंडल का रूप बनाएं। यह व्यवस्था बाहरी प्रकाश को आंतरिक ध्यान से जोड़ती है।
| तत्व | संकेत |
|---|---|
| दीपक | ज्ञान |
| संख्या 108 | पूर्णता |
| लौ | चेतना |
| सामूहिक प्रकाश | नकारात्मकता का नाश |
यदि 108 दीपक जलाना संभव न हो, तो श्रद्धा और सुरक्षा को प्राथमिकता दें। कम दीपक भी शुद्ध भावना से जलाए जा सकते हैं। आग से जुड़ी पूजा में संख्या से अधिक सावधानी आवश्यक है।
कमल कीचड़ में खिलता है, फिर भी उसकी पवित्रता बनी रहती है। इसलिए कमल देवी शक्ति, आत्मशुद्धि और संसार में रहते हुए निर्लिप्त रहने का प्रतीक है।
संधि पूजा में 108 कमल अर्पित करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। जहां कमल उपलब्ध न हो, वहां स्वच्छ और श्रद्धापूर्वक उपलब्ध पुष्प अर्पित किए जा सकते हैं।
संधि पूजा का समय छोटा होता है, इसलिए सामग्री पहले से व्यवस्थित कर लेनी चाहिए। पूजा आरंभ होने के बाद वस्तुएं खोजने से ध्यान भंग हो सकता है।
कुछ शक्त परंपराओं में संधि पूजा के साथ बलि का उल्लेख मिलता है। आधुनिक गृहस्थ पूजा में इसका अर्थ प्रतीकात्मक समर्पण के रूप में समझना अधिक उचित है। बलि का आध्यात्मिक अर्थ अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, भय, लोभ और हिंसक प्रवृत्तियों को देवी के चरणों में अर्पित करना है।
घर पर पशु बलि करना आवश्यक नहीं है। कद्दू, नारियल, फल या अन्य सात्विक वस्तु का प्रतीकात्मक अर्पण किया जा सकता है। पूजा का उद्देश्य जीव हिंसा नहीं बल्कि अधर्म और नकारात्मक प्रवृत्ति का त्याग है।
| अर्पण | प्रतीक |
|---|---|
| नारियल | अहंकार का समर्पण |
| कद्दू | नकारात्मकता का त्याग |
| फल | शुद्ध कर्म |
| नींबू | बाधा का शमन |
| पुष्प | कोमल भक्ति |
तांत्रिक परंपरा में संक्रमण के क्षणों को विशेष शक्ति वाला माना जाता है। जब एक तिथि समाप्त होती है और दूसरी आरंभ होती है तब साधक का मन परिवर्तन की सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश करता है।
संधि पूजा में चामुंडा शक्ति का आह्वान इसी कारण किया जाता है। यह साधना भय उत्पन्न करने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य मन में छिपी ऊर्जा को अनुशासन और धर्म की दिशा देना है।
गूढ़ साधना करने वाले साधकों को गुरु मार्गदर्शन के बिना उग्र प्रयोग नहीं करना चाहिए। घरेलू पूजा के लिए सरल दीप, पुष्प, मंत्र और प्रार्थना पर्याप्त हैं।
संधि पूजा में दुर्गा नाम, चामुंडा स्तुति और नवार्ण मंत्र का पाठ किया जाता है। यदि उच्चारण पर पूरा विश्वास न हो, तो सरल देवी मंत्र का स्पष्ट और श्रद्धापूर्वक जप करें।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे
ॐ दुं दुर्गायै नमः
ॐ देवी चामुंडायै नमः
मंत्र का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं बल्कि मन को स्थिर करना है। संधि काल में धीमी, स्पष्ट और नियंत्रित वाणी अधिक उपयुक्त रहती है।
ज्योतिष में तिथि चंद्रमा की गति से जुड़ी होती है। अष्टमी से नवमी का संक्रमण मन, संकल्प और भावनात्मक शक्ति में परिवर्तन का प्रतीक माना जा सकता है।
अष्टमी का संबंध संघर्ष और शक्ति से है। नवमी का संबंध पूर्णता और परिणाम से है। संधि पूजा इस अंतर को जोड़ती है।
| तत्व | प्रभाव |
|---|---|
| अष्टमी | साहस |
| नवमी | सिद्धि |
| चंद्र गति | मन का परिवर्तन |
| संधि | नई दिशा |
| देवी साधना | आत्मबल |
नहीं। संधि पूजा घर पर भी की जा सकती है, पर स्थानीय तिथि समय और सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है। बड़े आयोजन में पुरोहित पूरे समय की गणना और विधि संभालते हैं। घर पर साधक सरल रूप अपनाएं।
108 दीपक एक साथ जलाने पर अग्नि सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। दीपकों को स्थिर, अग्निरोधी और खुली जगह में रखें। बच्चों, कपड़ों और पर्दों से दूरी बनाए रखें।
भक्ति और सुरक्षा एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सुरक्षित पूजा ही जिम्मेदार पूजा है।
संधि पूजा व्यक्ति को परिवर्तन स्वीकार करना सिखाती है। जीवन में एक अवस्था समाप्त होती है और दूसरी आरंभ होती है। यह समय उसी सत्य का आध्यात्मिक रूपक है।
108 दीपकों का प्रकाश मन को यह अनुभव कराता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रकाश की दिशा संभव रहती है।
| स्थिति | प्रभाव |
|---|---|
| भय | साहस |
| असमंजस | स्पष्टता |
| थकान | आशा |
| क्रोध | संयम |
| निराशा | आंतरिक प्रकाश |
महाअष्टमी और महानवमी की संधि पूजा अंधकार से प्रकाश, भय से साहस और संघर्ष से सिद्धि की यात्रा है। अंतिम 24 मिनट अष्टमी के और प्रारंभिक 24 मिनट नवमी के मिलकर 48 मिनट का यह काल बनाते हैं। 108 दीपक, कमल पुष्प और चामुंडा आराधना इस क्षण को विशेष बनाते हैं।
इस पूजा का सबसे गहरा अर्थ यही है कि साधक अपने भीतर के चंड, मुंड, भय और अहंकार को देवी के चरणों में अर्पित करे। तभी संधि काल केवल समय नहीं रहता। वह जीवन में परिवर्तन का द्वार बन जाता है।
संधि पूजा कितने मिनट की होती है
संधि पूजा कुल 48 मिनट की होती है, जिसमें अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के प्रारंभिक 24 मिनट शामिल होते हैं।
संधि पूजा में 108 दीपक क्यों जलाए जाते हैं
108 दीपक प्रकाश, देवी नामों और पूर्णता के प्रतीक माने जाते हैं।
संधि पूजा में बलि का क्या अर्थ है
आधुनिक गृहस्थ पूजा में बलि का अर्थ अहंकार, भय, क्रोध और नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक समर्पण है।
क्या संधि पूजा घर पर की जा सकती है
हाँ, स्थानीय पंचांग के अनुसार सही समय देखकर सरल और सुरक्षित विधि से की जा सकती है।
संधि पूजा में कौन सा मंत्र पढ़ें
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे और ॐ दुं दुर्गायै नमः का जप किया जा सकता है।
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