By अपर्णा पाटनी
धर्म, सत्ता और मौन के मध्य भीष्म के पाँच निर्णायक विकल्पों का विश्लेषण

शांतनु के पुत्र की छवि में शौर्य के साथ मर्यादा की चमक दिखाई देती है। वही तेज जब निर्णय के ठीक क्षणों पर साहस से नहीं जुड़ता तो इतिहास अपनी दिशा बदल देता है। महाभारत की कथा यह दिखाती है कि बड़े व्यक्तित्व भी नियमों की दीवारों में कैद हो सकते हैं। पाठक जब इन मोड़ों को समझते हैं तो धर्म की सूक्ष्मता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।
| क्रम | स्थिति | भीष्म क्या कर सकते थे | संभावित परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1 | द्रौपदी के वस्त्रहरण का सभाकक्ष | दृढ़ शब्दों में निषेध, आवश्यकता होने पर शारीरिक अवरोध | द्रौपदी की गरिमा सुरक्षित रहती, प्रतिशोध की ज्वाला शांत होती, दरबार में अन्याय की सीमा तय होती |
| 2 | कौरव सेना का सर्वाधिनायक पद | अनुचित युद्ध में नेतृत्व से इंकार, मध्यस्थता का प्रस्ताव | कौरव पक्ष की वैधता कमजोर होती, समझौते की जमीन बनती |
| 3 | युद्ध से पहले पांडवों के न्यायोचित दावे का समर्थन | पाँच ग्राम या अधिकार की स्पष्ट वकालत, असमर्थन पर सार्वजनिक विरोध | धृतराष्ट्र हस्तक्षेप को बाध्य होते, राजनीतिक समाधान उभरता |
| 4 | शकुनि की चालों का निराकरण | राज-द्रोह के आरोप, निर्वासन या दंड की पहल | द्यूत क्रीड़ा रुकती, अपमान और वनवास टलते, द्वेष की मशीनरी टूटती |
| 5 | सार्वजनिक रूप से पांडवों का पक्ष लेना | कौरव समर्थन से अलग होकर धर्म-पक्ष की घोषणा | कौरव गठबंधन बिखरता, युद्ध असंभव या बहुत अल्पकालिक होता |
सभामंडल में धर्म का सबसे ऊँचा आसन मौन नहीं रह सकता। भीष्म यदि एक स्पष्ट वाक्य कहते कि यह अन्याय उनकी उपस्थिति में संभव नहीं है तो कौरव शूरवीर भी आगे बढ़ने का साहस खो देते। आवश्यकता पड़ती तो वह दुर्योधन और दुःशासन के बीच दीवार बन सकते थे। इससे द्रौपदी सम्मानित रहती। पांडवों के मन में पला क्रोध थमता। दरबार को यह सीख मिलती कि राज-सत्ता भी न्याय की सीमा में बंधी रहनी चाहिए। यही वह क्षण था जहाँ राजनीति व्यक्तिगत प्रतिशोध में बदल गई। वही ज्वाला युद्ध की जमीन बनी।
जब दुर्योधन ने आज्ञा-रूपी आग्रह रखा तो एक वचन यह भी हो सकता था कि अन्याय से जन्मा युद्ध धर्म से नहीं जीता जा सकता। नेतृत्व का इंकार कौरव सेना की रीढ़ में दरार डाल देता। मनोबल गिरता। कृष्ण और पांडव समझौते की शर्तें कठोर रखते। द्रोण जैसे वृद्ध योद्धा भी अलग राह चुन सकते थे। युद्ध होता तो भी छोटी अवधि में समाप्त होता। दीर्घकालीन विनाश से राज्य बच सकता था। यहाँ भीष्म के नाम की वैधता ने अन्याय को गरिमा का आवरण दे दिया।
अनिर्णय अक्सर अन्याय का सहायक बनता है। यदि भीष्म दृढ़ स्वर में कहते कि पांडवों का अधिकार निर्विवाद है, कम से कम पाँच ग्राम उन्हें मिलने चाहिए, तो दुर्योधन के लिए अस्वीकार करना कठिन होता। अस्वीकार करने पर भी वे सार्वजनिक रूप से समर्थन वापस ले सकते थे। धृतराष्ट्र को कड़े कदम उठाने पड़ते। पांडव राजनीति से अपनी स्थिति सुदृढ़ करते। शांति की राह बनती। राज्य का भविष्य रक्तरंजित हुए बिना आगे बढ़ता।
द्यूत क्रीड़ा ने द्वेष को आयोजन का रूप दिया। भीष्म राज-नैतिक अधिकार के साथ शकुनि को षड्यंत्रकारी ठहरा सकते थे। निर्वासन या दंड का प्रस्ताव रख सकते थे। इससे दुर्योधन की महत्वाकांक्षा को दिशा देने वाला मस्तिष्क हट जाता। द्रौपदी का अपमान न होता। वनवास न होता। यदि भविष्य में संघर्ष होता तो भी समय और परिस्थिति अलग होती। यहाँ सीमाएँ अवश्य थीं क्योंकि औपचारिक दंड के लिए राजाज्ञा आवश्यक थी, फिर भी नैतिक दबाव और सार्वजनिक मत से रास्ता निकल सकता था।
एक सार्वजनिक घोषणा कि धर्म-पक्ष पांडवों के साथ है, राजनीतिक संतुलन उलट देती। अनेक योद्धा जो केवल भीष्म के कारण कौरवों के साथ थे, अपनी आस्था बदल देते। भीष्म का रणनीतिक कौशल पांडव पक्ष में आता। दुर्योधन समझौते पर उतर आता या प्रतिरोध टूट जाता। यदि युद्ध होता भी तो अल्पकाल में समाप्त होता। जनहानि बहुत कम होती। इतिहास उन्हें धर्म-रक्षक के रूप में याद करता।
| कारण | व्याख्या |
|---|---|
| भूमिका-आसक्ति | जीवन का केंद्र सिंहासन-रक्षा बन गया। उस भूमिका से हटना उन्हें आत्म-परित्याग जैसा लगा। |
| संस्थागत निष्ठा | राज्य-संरचना को न्याय पर प्राथमिक मान लिया गया। नियमों ने नैतिक साहस पर पर्दा डाल दिया। |
| स्थिरता का मोह | प्रतिष्ठा और प्रभाव की परिचित भूमि से बाहर निकलना असुविधाजनक लगा। परिवर्तन के जोखिम से दूरी बनी रही। |
| भाग्यवादी दृष्टि | घटनाओं को नियति मानकर सक्रिय हस्तक्षेप से दूरी बनी। यह दृष्टि सहज बहाना बन गई। |
धर्म केवल नियमों का पालन नहीं है। यह अन्याय रोकने का जीवंत साहस भी है। जब सत्ता अनुचित हो जाए तो मौन भी सहभागिता बन जाता है। महाकाव्य यही सिखाता है कि वैधता का आवरण अन्याय को धर्म नहीं बना देता। बड़ी शक्तियाँ जब चुप रहती हैं तो छोटी आवाजें दब जाती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ नैतिकता परीक्षा लेती है।
| संदर्भ | सही प्रश्न | मार्गदर्शन |
|---|---|---|
| सत्ता बनाम न्याय | क्या नियम न्याय से ऊपर हैं | नियम न्याय की सेवा करें तो ही अर्थपूर्ण हैं |
| पारिवारिक निष्ठा | क्या संबंध धर्म से पहले हैं | संबंध तब ही टिकते हैं जब न्याय सुरक्षित रहे |
| राज-नीति | क्या वैधता नैतिकता के बराबर है | वैधता की जड़ नैतिकता में हो तो नीति फलती है |
प्रश्न 1. क्या द्रौपदी के अपमान पर भीष्म का हस्तक्षेप युद्ध रोक सकता था
उत्तर. हाँ, क्योंकि वही घटना प्रतिशोध का केंद्र बनी। सम्मान सुरक्षित रहता तो मनोवृत्ति बदल जाती और सुलह की संभावना बढ़ती।
प्रश्न 2. यदि भीष्म सेना-नायक बनने से इंकार करते तो क्या बदलता
उत्तर. कौरव पक्ष की नैतिक वैधता टूटती। मनोबल घटता। मध्यस्थता मजबूत होती। युद्ध अल्पकालिक या टल सकता था।
प्रश्न 3. पांडवों के दावे की सार्वजनिक वकालत का वास्तविक प्रभाव क्या होता
उत्तर. दुर्योधन पर दबाव बढ़ता। धृतराष्ट्र को हस्तक्षेप करना पड़ता। राजनीतिक समाधान उभरता और रक्तपात घटता।
प्रश्न 4. शकुनि को निष्क्रिय करने से कथा कैसे बदलती
उत्तर. द्यूत की भूमि ही तैयार न होती। अपमान और वनवास रुकते। शत्रुता की मशीनरी टूटती और समय की धारा बदलती।
प्रश्न 5. पांडव-पक्ष में खुलकर खड़े होने के परिणाम क्या होते
उत्तर. कौरव गठबंधन बिखरता। भीष्म की रणनीति धर्म- पक्ष को मिलती। युद्ध क्षीण होता और जनहानि कम होती।
महाभारत का यह पाठ बताता है कि शक्ति और मौन का साथ इतिहास को भारी कीमत चुकवाता है। निर्णय के क्षणों में नैतिक साहस ही धर्म का असली स्वरूप बनता है। जब बड़े लोग बोलते हैं तो अनगिनत जीवन बचते हैं। जब वे चुप रहते हैं तो युग घायल हो जाते हैं।
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