By पं. नरेंद्र शर्मा
महाभारत के संदर्भ में धृतराष्ट्र का चरित्र, नेतृत्व में चूक और उसके विनाशकारी परिणामों की गहराई से विवेचना

महाभारत का नैतिक परिदृश्य अनेक जटिलताओं से भरा हुआ है और इन्हीं में धृतराष्ट्र का स्थान अत्यधिक दुःखदायी तथा विचारोत्तेजक है। वह न खुल कर बुराई करने वाला व्यक्ति था, न ही पूरी तरह परिस्थितियों का शिकार। उसका सबसे अधिक त्रासद पहलू था उसके भीतर की दुर्बल इच्छाशक्ति, भावनात्मक अंधता और नैतिक अधिकार का अभाव। सामर्थ्य और सत्ता का संयोजन जब साधारण मानवीय कमज़ोरियों के साथ हुआ, तो इतिहास में अभूतपूर्व विनाश का मार्ग खुला।
धृतराष्ट्र दुष्ट नहीं था। उसमें स्नेहभाव था, वह धर्म के नियम समझता था और पांडवों के प्रति भी उसका प्रेम था। उसने अपनी गलतियों का भान किया और आखिर में आत्मिक शांति की खोज की। परंतु यही भावनात्मक सामर्थ्य उसकी असफलता को और गहरा बनाता है। उसने सदैव सही और गलत की समझ तो रखी, पर साहसिक निर्णय नहीं ले सका। उसे द्यूत क्रीड़ा की अनैतिकता पता थी, द्रौपदी के चीरहरण का अन्याय समझ में आता था, युद्ध की अनिवार्यता और उसकी अप避्यता का भी ज्ञान था, फिर भी वह मौन रहा। इस विरोधाभास में ही उसकी त्रासदी छिपी है। अच्छे व्यक्तित्व और अच्छे नेतृत्व में मूलभूत अंतर है। धृतराष्ट्र के पास अच्छा स्वभाव था, पर नेतृत्व के गुणों की भारी कमी थी।
धृतराष्ट्र की शारीरिक अंधता केवल जैविक परिस्थिति नहीं, बल्कि उसके मूल स्वभाव का प्रतीक थी। जन्म से अंधा होना उसकी मां की अनजाने में हुई प्रतिक्रिया का परिणाम था। इससे उसे सिंहासन से वंचित किया गया, जो उसके भीतर गहरा ज़ख्म छोड़ गया। पर महाभारत में ऐसे कई पात्र हैं जो शारीरिक दृष्टि से वंचित हैं, लेकिन नैतिक दृष्टि रखते हैं। धृतराष्ट्र की अंधता कहीं अधिक गहरी, मानसिक और नैतिक, थी। जब व्यास ने उसे दिव्यदृष्टि देने का प्रस्ताव दिया, उसने अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह अपने पुत्रों की मृत्यु देख नहीं सकता था। इस प्रकार वह अंध बनने के लिए स्वयं जिम्मेदार रहा, क्योंकि सच्चाई को जानने का साहस उसमें नहीं था।
धृतराष्ट्र द्वारा राज्य का विभाजन वह निर्णायक क्षण था, जब आने वाले विनाश का बीज बोया गया। उसने दो राज्यों की रचना कर यह समझा कि इससे संघर्ष टल जाएगा। पर राजा का कर्तव्य न्यायिक और स्पष्ट निर्णय लेना था, न कि सुविधा के लिए समझौते करना। राज्य विभाजन के कारण शक्ति, धन और सत्ता में असंतुलन उत्पन्न हुआ। इससे संघर्ष की नींव पड़ी और दुर्योधन को अनुचित रूप से साहस मिला।
राज्य विभाजन के परिणाम
| निर्णय | परिणाम |
|---|---|
| राज्य दो भागों में विभाजित | सत्ता संघर्ष को प्रोत्साहन |
| दुर्योधन को समर्थन | अनुचित दावों का अप्रत्यक्ष अनुमोदन |
| स्पष्ट निर्णय का अभाव | साम्राज्य में अस्थिरता |
द्यूत क्रीड़ा महाभारत की सबसे निर्णायक घटनाओं में एक थी। शाकुनि के फरेबी स्वभाव का उसे भान था, फिर भी उसने निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की। उसने खेल के अनुचित परिणाम का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ भी प्राप्त किया। और जब द्रौपदी को अपमानित किया गया, वह तुरंत हस्तक्षेप नहीं कर सका। इस प्रकार धृतराष्ट्र धोखाधड़ी का सहभागी बना।
द्रौपदी के चीरहरण के समय धृतराष्ट्र की चुप्पी सबसे बड़ी नैतिक विफलता थी। जब द्रौपदी ने अपने अधिकार के लिए न्याय मांगा, धृतराष्ट्र को न्याय सुनिश्चित करना चाहिए था। उसकी चुप्पी ने अन्याय को सहमति दी। बाद में, गंधारी के कहने पर थोड़ी बहुत राहत दी, परंतु वह अपर्याप्त रही। द्रौपदी का उत्पीड़न असंख्य पांडवों के संघर्ष की जड़ बन गया।
द्रौपदी के अपमान से जुड़ी तथ्य तालिका
| विषय | संक्षिप्त जानकारी |
|---|---|
| न्याय का प्रश्न | द्रौपदी ने धर्म का संदर्भ उठाया |
| धृतराष्ट्र की भूमिका | राहत में देरी, अपर्याप्त हस्तक्षेप |
| परिणाम | चिरस्थायी मनोबलगात |
धृतराष्ट्र के जीवन में बार-बार निर्णय न लेने की आदत दिखती है। यह मात्र परिस्थिति विशेष में नहीं था। उसमें बचपन से असंतोष, दुर्योधन के प्रति अत्यधिक मोह, कमजोर इच्छाशक्ति और आत्मवंचना का संगम था। वह सिंहासन से वंचित रहने की पीड़ा से ग्रसित रहा। पुत्रमोह ने उसके राजा धर्म में बाधा डाली। उसका आत्मवंचना उसे वास्तविकता को देखने से रोकता रहा।
प्रश्न उठता है: क्या धृतराष्ट्र पापी या दुष्ट था? उत्तर उतना सीधा नहीं। उसमें ईर्ष्या या जान-बूझकर हानि पहुंचाने की प्रवृत्ति नहीं थी, पर अपनी कमजोरी और निष्क्रियता के कारण वह नायकत्व विफलता का जिम्मेदार था। गलत इरादे के बिना भी कोई अपनी भूमिका से विमुख होकर अपराध कर सकता है। महाभारत में यही दिखाया गया कि वह दोषी था, परंतु उसका प्रायश्चित संभव था।
धृतराष्ट्र की विफलताओं का प्रभाव
धृतराष्ट्र का चरित्र महाभारत में 'नैतिक अंधता' का प्रेरक उदाहरण है। शारीरिक अंधता के साथ मानसिक और आत्मिक अंधता ने उसकी नेतृत्व क्षमता को कुंठित कर दिया। जब भी उसे सच्चाई पहचानने या सलाह मानने का अवसर मिला, उसने अनदेखा किया।
तुलना तालिका
| पात्र | विफलता के कारण |
|---|---|
| भीष्म | वचनबद्धता, संस्थागत मर्यादा |
| कर्ण | सामाजिक स्थिति, गहरा मोह |
| युधिष्ठिर | मनःस्थिति जन्य अनिर्णय |
| धृतराष्ट्र | कमजोर इच्छाशक्ति, पुत्रमोह |
दुनिया के सभी बड़े नेतृत्व पदों पर नैतिक बल आवश्यक है। महाभारत यह सिखाता है कि मात्र व्यक्तिगत गुण पर्याप्त नहीं, साहसी नेतृत्व ही न्याय की स्थापना कर सकता है। धृतराष्ट्र का पतन साधारण मानवीय कमजोरियों के कारण हुआ, अपना आराम, संकोच या मोह सार्वजनिक कर्तव्यों से ऊपर रखना। उसकी कथा चेतावनी है कि नेतृत्व में आंखें मूंदे रहना, जान-बूझकर न देखना, समाज के लिए कितना घातक हो सकता है।
1. क्या धृतराष्ट्र पूरी तरह निष्कलंक था? धृतराष्ट्र के पास सही सिद्धांत और प्रेमभाव थे, पर निर्णय न ले पाने की आदत और पुत्रमोह ने उसे दोषी बना दिया।
2. द्यूत क्रीड़ा में उसकी भूमिका क्यों संदिग्ध मानी जाती है? वह जानते-boojhte धोखाधड़ी को रोका नहीं, जिससे पांडवों की संपत्ति छिनी गई। उसके हस्तक्षेप से यह टल सकता था।
3. क्या द्रौपदी के अपमान में वह प्रत्यक्ष दोषी था? उसकी चुप्पी प्रत्यक्ष अपराध थी, क्योंकि न्याय और धर्म सुनिश्चित करने की शक्ति उसी के पास थी।
4. क्या उसका प्रायश्चित उसे अभयदान देता है? महाभारत में उसका तप व प्रायश्चित महत्व रखते हैं, पर वे भूतकाल की भूलों को पूरी तरह मिटा नहीं सकते।
5. अन्य प्रमुख पात्रों से उसकी विफलता कैसे अलग थी? अन्य पात्रों पर परिस्थितियों व मर्यादाओं का दबाव था, धृतराष्ट्र को विफलता उसकी आत्मिक कमजोरी के कारण मिली।
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