By पं. सुव्रत शर्मा
जहाँ द्रोणाचार्य ने यदि भिन्न निर्णय लिए होते, तो पूरा इतिहास बदल जाता, गहन विश्लेषण

महाभारत की कथा में द्रोणाचार्य ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनके पास असाधारण बुद्धिमत्ता, रणनीतिक कौशल और भारी प्रभावशाली पद था। जबकि अन्य प्रमुख पात्रों के निर्णय वचनों या परिस्थितियों से सीमित थे, द्रोणाचार्य की सबसे बड़ी विफलता उनकी अपनी इच्छाशक्ति में थी। अगर उन्होंने नीचे बताए विकल्प चुने होते, तो महाभारत का इतिहास ही बदल सकता था।
द्रोणाचार्य क्या कर सकते थे:
जब द्रुपद ने मित्रता नकार दी तब द्रोणाचार्य उस अपमान को स्व-विकृति या प्रतिशोध का कारण न बनाकर, वह घाव आध्यात्मिक समझ में रूपांतरित कर सकते थे। वे क्षमा, विरक्ति और द्रुपद की स्थिति पर सहानुभूति रख सकते थे, "द्रुपद का स्वभाव उनका है, मेरा नहीं। मैं उनके निर्णय से अपनी मित्रता की पवित्रता बजाय उपेक्षा के देखूंगा।"
महत्व:
द्रोणाचार्य क्या कर सकते थे:
जब एकलव्य द्रोणाचार्य से शिक्षा माँगने आया, तो वे जाति की दीवारों से ऊपर उठकर उसकी लगन और प्रतिभा को स्वीकृति देते। वे समाज को दिखाते कि सच्चा शिक्षक जाति या कुल के आधार पर ज्ञान नहीं बांटता।
महत्व:
द्रोणाचार्य क्या कर सकते थे:
द्रुपद को बंदी बनवाने की शर्त लगाने की बजाय द्रोणाचार्य शिक्षा और नीति के ध्येय पर ज़ोर देते, "हर शिष्य को न सिर्फ युद्धकला, बल्कि न्याय, साहस और धर्मनिष्ठ निर्णय का पाठ पढ़ाएंगे।"
महत्व:
द्रोणाचार्य क्या कर सकते थे:
तेरह वर्षों के वनवास और संकट में, द्रोणाचार्य भारी प्रभाव डाल सकते थे, धृतराष्ट्र, दुर्योधन और दरबार में न्याय की वकालत करते। वे अन्य नीतिज्ञों (भीष्म, विदुर, कृपाचार्य) के साथ मिलकर स्पष्ट रुख अपनाते, "पांडवों के साथ अन्याय हो रहा है, यह समाप्त होना चाहिए।"
महत्व:
द्रोणाचार्य क्या कर सकते थे:
जब दुर्योधन ने प्रमुख सेनापति बनने का प्रस्ताव रखा, द्रोणाचार्य नैतिकता के नाम पर, बिना कोई शर्त, दृढ़तापूर्वक इंकार कर सकते थे, "मैं अधर्म के पक्ष में युद्ध नहीं लड़ सकता, मेरे पास मौजूद ज्ञान अन्याय के लिए इस्तेमाल नहीं होगा।"
महत्व:
द्रोणाचार्य की सबसे बड़ी विफलता बुद्धि या ज्ञान की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की रही। वे जानते थे क्या ठीक है, लेकिन बार-बार प्रतिशोध, अहंकार व निजी हित में उलझ कर गलत राह चुनते रहे। उन्होंने ऐसे नायक और शिक्षक का आदर्श खो दिया जो धर्म को सर्वोपरि मानता।
यदि ऊपर दिए गए दो-तीन निर्णय भी उन्होंने चुने होते, तो महाभारत की पूरी दिशा और परिणाम बदल सकते थे, युद्ध शायद होता ही नहीं, या हुआ भी, तो उसका स्वरूप, अवधि और विभीषिका बिलकुल अलग रहती।
1. क्या द्रुपद के अपमान को भुलाकर द्रोणाचार्य शिक्षक के आदर्श बन सकते थे?
हां। अगर द्रोण ने अपमान को क्षमा व आत्मसात किया होता तो वे प्रतिशोध की बजाय शिष्यगण के चरित्र व उज्ज्वल भविष्य पर केंद्रित रहते। इससे न युद्ध का स्वरूप इतना उग्र होता, न समाज में वैमनस्य फैलता।
2. यदि द्रोण एकलव्य को शिक्षा देते तो क्या होता?
तब सामाजिक न्याय को वास्तविक बढ़ावा मिलता, शिक्षा का लोकतंत्रीकरण होता और द्रोणाचार्य सर्वत्र सम्मानित होते। यह चिह्नित करता कि योग्यता जाति, कुल से ऊपर है।
3. शिक्षण कैसा होना चाहिए, रणनीति पर या चरित्र पर अधिक बल देने वाला?
शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य है चरित्र निर्माण, नैतिकता व न्याय बोध स्थापित करना। केवल युद्धकौशल या तकनीक नहीं, बल्कि सत्य और धर्मसंगत निर्णय सीखना जरूरी है।
4. द्रोणाचार्य सामरिक प्रमुखता ठुकराते तो युद्ध में क्या बदलाव आता?
कौरव पक्ष बहुत कमज़ोर पड़ जाता, अथवा युद्ध ही टल जाता। अधर्म के लिए कोई भी बड़ा योद्धा न खड़ा होता, तो शायद मनोभूमि ही बदल जाती।
5. क्यों द्रोणाचार्य के विकल्प दूसरों की तुलना में अधिक प्रभावशाली थे?
उनके पास न केवल ज्ञान, बल्कि नेतृत्व, नीति और शिक्षण का गहन मंच था। वे धर्म, न्याय और नीति के पक्ष में खड़े होकर पीढ़ियों को राह दिखा सकते थे, अफसोस कि उन्होंने स्वयं विचलन का आदर्श बना लिया।
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