By पं. संजीव शर्मा
जन्म का समय, तिथि और नक्षत्र: कृष्ण जन्माष्टमी का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अपने आप में साधारण घटना नहीं था। द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, बुधवार के दिन, गहन रात्रि के समय, रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि में चंद्रमा के योग के बीच उन्होंने मथुरा के कारागार में अवतार लिया। यह वही तिथि और योग है जिसे आज कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े आनंद और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, अर्धरात्रि के समय, वृषराशि स्थित चंद्रमा और रोहिणी नक्षत्र में माना गया है। यह संयोग केवल एक शुभ मुहूर्त नहीं बल्कि अत्यंत दुर्लभ ज्योतिषीय योग भी माना जाता है।
कृष्ण जन्म के संदर्भ में प्रमुख बिंदु।
कई पुराणों में इस योग की विशेष प्रशंसा की गई है और इसे दुर्लभ तथा अत्यंत पुण्यदायक संयोग माना गया है।
श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है। वे माता देवकी और पिता वसुदेव के आठवें पुत्र थे। उनके जन्म की भूमिका भी उतनी ही अद्भुत है जितनी कि उनकी पूर्ण लीला।
देवकी और वसुदेव के विवाह के समय, जब मामा कंस उन्हें विदा कर रहे थे, तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी के आठवें पुत्र के हाथों कंस का वध होगा। इस भविष्यवाणी ने कंस को भयभीत कर दिया।
इसके बाद।
इसी कारागार में, इसी भय और आतंक के वातावरण में, अष्टमी की मध्य रात्रि को श्रीकृष्ण ने अवतार लिया।
जन्म की घड़ी जैसे ही निकट आई, कारागार का वातावरण अचानक बदल गया।
कथा के अनुसार।
इसी दिव्य क्षण में भगवान कृष्ण ने जन्म लिया। जन्म के लिए चुना गया यह नक्षत्र, तिथि और समय अत्यंत महत्वपूर्ण था। आधी रात का यह क्षण केवल अंधकार का नहीं, दिव्य प्रकाश के प्रकट होने का भी संकेत था।
शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान कृष्ण तीनों लोकों में व्याप्त तीन गुणों सत्त्व, रज और तम में से सत्त्व गुण के अधिपति हैं। सत्त्व शुद्धता, प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है।
इस दृष्टि से आधी रात का जन्म भी प्रतीक है कि जब अज्ञान का अंधेरा गहरा लगता है तब ही ईश्वर का प्रकाश सबसे प्रभावशाली रूप में प्रकट होता है।
शास्त्रों में भगवान राम को सूर्यवंशी और भगवान कृष्ण को चंद्रवंशी कहा गया है। यह भी उनके जन्म समय से जुड़ा एक गहरा संकेत है।
भगवान कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ, इसलिए वे चंद्रवंशी कहलाए। चंद्रदेव उनके पूर्वज माने जाते हैं।
चंद्रवंश की सूक्ष्म कड़ी इस प्रकार समझी जाती है।
इस तरह एक ही समय में तिथि, नक्षत्र, वार और कुल सब कुछ चंद्रवंश से जुड़ता दिखता है, जिससे भगवान का अवतार अपने वंश और लोक कल्याण दोनों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बन जाता है।
अष्टमी तिथि को शास्त्रों में विशेष रूप से शक्ति का प्रतीक माना गया है। यह तिथि देवी ऊर्जा, संतुलन और दृढ़ता से जुड़ी मानी जाती है।
इसलिए जन्म के लिए कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र और बुधवार का योग चुना गया, जब चंद्रवंश के पूर्वज, नक्षत्र और तिथि से जुड़ी शक्तियाँ एक साथ उपस्थित थीं। इस दृष्टि से यह केवल एक ज्योतिषीय योग नहीं बल्कि दिव्य योजना का सूक्ष्म संयोजन था।
पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि चंद्रदेव की स्वयं यह इच्छा थी कि भगवान इस बार उनके कुल में जन्म लें।
जब श्रीकृष्ण का रात्रि में प्रादुर्भाव हुआ, तो कहा जाता है कि।
इस प्रकार कारागार का छोटा सा कक्ष भी उस क्षण में समस्त लोकों के आनंद का केंद्र बन गया।
भगवान कृष्ण ने केवल जन्म के लिए ही नहीं बल्कि कारागार से निकलने के लिए भी आधी रात का समय चुना। यह समय बाहरी दृष्टि से भी सुरक्षित और रणनीतिक था।
जन्म होते ही।
इस दिव्य व्यवस्था के बीच वसुदेव शिशु कृष्ण को लेकर यमुना पार कर गोकुल पहुँच सके। वहाँ नंद बाबा और यशोदा के घर भगवान को सुरक्षित रखा और बदले में एक बालिका लेकर वापस कारागार लौट आए, ताकि देवकी और वसुदेव पर तत्काल कोई संदेह न हो। इस योजना को सफल बनाने के लिए आधी रात का समय अत्यंत उपयुक्त था, जब पूरे नगर में स्वाभाविक रूप से सन्नाटा और गहरा अंधकार होता है।
जन्माष्टमी के पर्व के संदर्भ में भी एक विशेष वर्ष का वर्णन मिलता है, जब तिथि और योग अत्यंत दुर्लभ रूप में एक साथ आए।
एक उदाहरण के रूप में।
ऐसे योग में।
श्लोक में कहा गया है।
“सोमहाणि बुधवारे वा अष्टमी रोहिणी युता।
जयन्ती सा समारभ्याता हन्ति पाप त्रिजन्मजम्॥”
अर्थ यह कि जब सोमवार या बुधवार को अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो, तो उसे जयन्ती जन्माष्टमी कहा जाता है और वह तीन जन्मों के पापों को नष्ट करने वाली मानी जाती है।
शास्त्रीय मत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का मूल जन्मकाल भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, सोमवार, वृषराशि में चंद्रमा और अर्धरात्रि के समय का माना जाता है।
श्रीमद्भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, भविष्य पुराण आदि ग्रंथों में ऐसे दुर्लभ योग की खुलकर प्रशंसा मिलती है।
कृष्ण जन्म के समय जिन छह विशेष योगों को अत्यंत दुर्लभ माना गया, वे किसी एक जन्माष्टमी में साथ आ जाएँ तो उस दिन।
ये सब साधना के रूप में अत्यंत अक्षय फलदायक माने जाते हैं और राष्ट्र तथा समाज के लिए कल्याणकारी समझे जाते हैं। ऐसे योग कई बार बहुत लंबे अंतराल पर बनते हैं, जैसे किसी विशेष वर्ष में यह संयोग लगभग 18 वर्ष बाद पुनः एक साथ उपस्थित माना गया।
भगवान कृष्ण के आधी रात के जन्म की कथा केवल भावनात्मक प्रसंग नहीं बल्कि जीवन के लिए एक गहरा संकेत भी देती है।
इसलिए जन्माष्टमी के दिन जब लोग आधी रात को कृष्ण जन्म के भजन गाते हैं, तो वे केवल एक तिथि नहीं मनाते बल्कि यह भी याद करते हैं कि भीतर के अंधकार में भी आध्यात्मिक जन्म कभी भी लिया जा सकता है, यदि हृदय तैयार हो।
क्या भगवान कृष्ण का जन्म हमेशा कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में ही माना जाता है
हाँ, परंपरा, पुराण और ज्योतिषीय मत सभी इसी बात पर सहमत हैं कि श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, अर्धरात्रि, वृषराशि स्थित चंद्रमा और रोहिणी नक्षत्र में ही हुआ माना जाता है, इसी आधार पर जन्माष्टमी तय होती है।
भगवान कृष्ण को चंद्रवंशी कहने का मुख्य कारण क्या है
उनका जन्म रात्रि में हुआ, कुल परंपरा चंद्रदेव से जुड़ी मानी जाती है, चंद्रदेव उनके पूर्वज हैं और जन्मकाल भी चंद्रमा और रोहिणी नक्षत्र के योग से जुड़ा है। इन सब कारणों से वे चंद्रवंशी माने जाते हैं।
आधी रात का समय ही कारागार से निकलने के लिए क्यों चुना गया
आधी रात का समय स्वाभाविक रूप से शांत, अंधकारमय और निगरानी के लिए भी अपेक्षाकृत ढीला होता है। उसी समय भगवान की कृपा से ताले टूटे, सैनिक सो गए और वसुदेव को गोकुल पहुँचने का अवसर मिला, इसलिए यह समय अत्यंत उपयुक्त था।
क्या हर जन्माष्टमी में वही दुर्लभ छह योग बनते हैं जो कृष्ण जन्म के समय थे
नहीं, वे छह योग अत्यंत दुर्लभ माने गए हैं। कुछ विशेष वर्षों में ही तिथि, नक्षत्र, वार, चंद्र स्थिति और अर्धरात्रि का ऐसा संयोग बन पाता है, जिसे भगवान के वास्तविक जन्मकाल के समान माना जाता है। ऐसे योग कई बार बहुत लंबे समय बाद दोहराए जाते हैं।
जयन्ती जन्माष्टमी और सामान्य जन्माष्टमी में क्या अंतर माना जाता है
जब अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र के साथ सोम या बुध के दिन, विशेष चंद्र स्थिति में आए, तो उसे जयन्ती जन्माष्टमी कहा जाता है। शास्त्रों में इसे अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है, जो तीन जन्मों के पापों को भी नष्ट करने वाला माना जाता है।
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