By पं. नीलेश शर्मा
महाभारत में कृष्ण की नारायणी सेना के निर्णय का गहन अर्थ

महाभारत के उस प्रसिद्ध प्रसंग में जब कुरुक्षेत्र का युद्ध तय हो चुका था तब अर्जुन और दुर्योधन दोनों द्वारका में कृष्ण के पास पहुंचे। उद्देश्य एक ही था कि श्रीकृष्ण का सहयोग मिले तो युद्ध में बढ़त मिल जाएगी। कृष्ण ने जो प्रस्ताव रखा वह बाहर से बहुत सरल दिखता है, पर भीतर से अत्यंत सूक्ष्म था।
एक ओर पूरी नारायणी सेना का विकल्प रखा गया। दूसरी ओर स्वयं कृष्ण का, जो बिना शस्त्र के, युद्ध में सीधे भाग न लेने की शर्त पर केवल सारथी और मार्गदर्शक बनकर साथ खड़े रहने वाले थे। निर्णय का अधिकार दोनों में से किसी एक को नहीं बल्कि क्रम और संस्कार के आधार पर दिया गया। जो पहले पहुंचा था उसे बाद में बोलने का अवसर मिला, जो सोया नहीं था उसे पहले विकल्प लेने का अवसर मिला। इस छोटे से क्षण में दोनों के भीतर की प्रवृत्तियां उजागर हो गईं।
पहली दृष्टि से यह प्रश्न स्वाभाविक लगता है कि यदि कृष्ण धर्म पक्ष के साथ थे तो फिर इतनी विशाल सेना दुर्योधन को क्यों दी। ऐसा क्यों हुआ कि अन्याय करने वाले को संख्या और बल दोनों मिल गए और न्याय पक्ष के पास केवल निहत्थे सारथी के रूप में कृष्ण ही बचे। यह प्रश्न जितना सीधा दिखता है, उतना ही गहरा है।
सनातन दृष्टि से समझें तो कृष्ण ने किसी को कुछ थमाया नहीं, केवल दो मार्ग सामने रखे। एक था बाहरी शक्ति का मार्ग। दूसरा था अंतःप्रज्ञा और शुद्ध मार्गदर्शन का मार्ग। जिसे जो प्रिय लगा, उसने स्वयं चुन लिया। इसीलिए इस प्रसंग को दैवी हस्तक्षेप से अधिक आत्म प्रकटीकरण की घड़ी माना जाता है, जहां मन की असली दिशा प्रकट हो जाती है।
कृष्ण की शैली यह नहीं थी कि वे किसी पर धर्म ठूंस दें। उनका मार्ग यह था कि परिस्थिति ऐसी बना दी जाए जिसमें व्यक्ति स्वयं अपना वास्तविक स्वभाव दिखा दे।
जब उन्होंने दो विकल्प रखे
तो किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डाला गया। जो जिस वृत्ति से चला, उसने वैसा ही चुनाव किया।
दुर्योधन की दृष्टि संख्या और बाहरी बल पर ठहर गई। उसे लगा कि जिस पक्ष के पास अधिक सैनिक होंगे, वही विजयी होगा। अर्जुन की दृष्टि अंदर की निश्चितता पर गई। उसे लगा कि यदि कृष्ण साथ हैं तो मार्ग मिल ही जाएगा, चाहे शस्त्र वह खुद संभाले।
यहां कृष्ण ने केवल दर्पण थामा। उसमें दोनों के मन की आसक्ति और परिपक्वता साफ दिख गई। धर्म थोप कर नहीं, चुनावों के माध्यम से प्रकट हुआ।
कृष्ण के प्रस्ताव को केवल राजनीतिक चाल मानना कमज़ोरी होगी। यह दो अलग जीवन दृष्टियों का प्रतीक बन गया।
नारायणी सेना का मार्ग
कृष्ण की निहत्थी उपस्थिति का मार्ग
युद्धभूमि पर दोनों प्रकार की शक्तियां उपस्थित थीं, पर कोण किसने चुना, यह उनके भीतर के संस्कार पर निर्भर रहा। इसी कारण यह प्रसंग आज भी यह प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करता है कि जीवन के मोड़ पर विकल्प क्या चुना जाता है, केवल संसाधन या सही मार्गदर्शन।
| विकल्प | बाहरी रूप | भीतर का संकेत |
|---|---|---|
| नारायणी सेना | विशाल सेना, सर्वोत्तम योद्धा | बाहरी शक्ति, संख्या पर भरोसा |
| स्वयं कृष्ण बिना शस्त्र | केवल सारथी, मार्गदर्शक | अंतःप्रज्ञा, धर्म के साथ खड़े रहने की भावना |
नारायणी सेना को शारीरिक बल और युद्ध कौशल के स्तर पर अद्वितीय माना जाता है। इतने प्रशिक्षित योद्धा जिस पक्ष में खड़े हों, उसकी विजय लगभग सुनिश्चित दिखती है। फिर भी कृष्ण स्वयं जानते थे कि केवल सैनिकों की संख्या युद्ध का अंतिम सत्य नहीं।
कृष्ण स्वयं उस चेतना के प्रतीक थे जो
जब उन्होंने सेना को एक ओर और स्वयं को दूसरी ओर रख दिया, तो मानो यह भी स्पष्ट कर दिया कि
इस विभाजन ने युद्ध को केवल शस्त्रों का संघर्ष नहीं रहने दिया बल्कि उद्देश्य और निर्णय क्षमता की परीक्षा भी बना दिया।
महाभारत की कथा मूल रूप से कर्मफल के सिद्धांत को सामने रखती है। वर्षों तक जो अन्याय, छल और अपमान हुआ
इन सबका कोई न कोई परिणाम होना ही था। यदि कृष्ण पूरी सेना और अपना मार्गदर्शन दोनों एक ही पक्ष को दे देते तो यह कर्म परिणति दब जाती।
यहीं पर वे संतुलित दिखते हैं। उन्होंने
इसके बाद जो हुआ, वह स्वयं कर्मचक्र का परिणाम बना। दुर्योधन और कौरवों के वर्षों के कर्म उनके अपने ही विकल्पों के माध्यम से सामने आए। कृष्ण ने मंच बनाया, पर नाटक का कथानक उन कर्मों ने तय किया जो पहले ही हो चुके थे।
यदि विजय को धर्म विजय कहा जाना है, तो यह आवश्यक है कि वह ऊपर से पक्षपातपूर्ण न दिखे। यदि कृष्ण ने एक ही ओर सेना भी रख दी होती और स्वयं भी शस्त्र उठाकर उसी ओर से लड़े होते, तो आने वाली पीढ़ियां यह कह सकती थीं कि यह जीत केवल ईश्वर के सीधे हस्तक्षेप से हुई।
धर्म युद्ध की पवित्रता के लिए यह ज़रूरी था कि
कृष्ण ने सेना देकर भी निष्पक्षता बनाए रखी और स्वयं को निहत्था रखकर भी धर्म पक्ष का मार्गदर्शन नहीं छोड़ा। इस प्रकार युद्ध का मैदान न्यायोचित दिखाई दिया, जहां अंतिम परिणाम संख्या नहीं, आचरण और नीति से तय हुआ।
कुरुक्षेत्र की धरती पर केवल बाण और शंख ही नहीं, एक और महान घटना घटनी थी। वह था अर्जुन का मोहभंग और फिर श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में ज्ञान का प्राकट्य।
यदि कृष्ण शस्त्रधारी योद्धा के रूप में सामने होते तो
गीता के प्रत्येक अध्याय में जो कर्तव्य, वैराग्य, भक्ति और समत्व का भाव समझाया गया, वह केवल दो के बीच हुई संवाद यात्रा से जन्म ले सका। इसलिए यह व्यवस्था ही ऐसी बनाई गई कि कृष्ण रथ पर खड़े होकर सारथी और गुरु की भूमिका में रहें, न कि हाथ में शस्त्र लेकर योद्धा की पंक्ति में।
जब कृष्ण के सामने दोनों विकल्प रखे गए तब मन की गहराई कई स्तरों पर खुलती है।
दुर्योधन की दृष्टि में विजय का समीकरण यह था कि जितनी अधिक सेना होगी, परिणाम उतना ही उसके पक्ष में झुकेगा। अर्जुन की दृष्टि में प्रश्न यह था कि कठिन घड़ी में कौन ऐसा है जो धर्म का मार्ग दिखा सके। एक ही स्थिति थी, पर दो मानस पटल ने उसे दो विपरीत कोणों से देखा।
इसलिए यह प्रसंग केवल इतिहास नहीं, एक मनोवैज्ञानिक दर्पण भी है। आज भी जीवन की मोड़ों पर यही प्रश्न सामने आता है कि चुनते समय क्या पसन्द किया जाता है, केवल साधन या सही साथ।
क्रोध और अहंकार की दृष्टि से देखने पर लगता है कि
मिल जाएं तो सफलता सुनिश्चित है। पर महाभारत का यह प्रसंग दिखाता है कि बाहरी संसाधन यदि धर्म से न जुड़े हों, तो उनकी पकड़ कमजोर हो जाती है।
कृष्ण की सेना भले दुर्योधन के साथ खड़ी थी, पर उसका मूल स्वभाव कृष्ण के ही मूल्यों से जुड़ा रहा। शक्ति का प्रवाह अंततः उसी दिशा में स्थिर होता है जहां धर्म की धारा बह रही हो। इसलिए अन्याय के पक्ष में खड़ी कोई भी बड़ी शक्ति धीरे धीरे अपने भीतर की अशांति से टूटने लगती है।
| पक्ष | संकेत |
|---|---|
| केवल बाहरी शक्ति | आरंभ में मजबूत, अंत में अस्थिर |
| केवल मार्गदर्शन | धीमी शुरुआत, पर स्थायी और गहरा प्रभाव |
| शक्ति और धर्म का मेल | संतुलित, दीर्घकालिक और स्पष्ट विजय |
कुरुक्षेत्र की यह घटना केवल प्राचीन कथा नहीं। आधुनिक जीवन में भी बार बार यह प्रश्न सामने आता है कि
जीवन के
सभी में यही दो मार्ग सामने रहते हैं।
एक मार्ग है आसान दिखने वाली बाहरी सुविधा का। दूसरा मार्ग है कठिन दिखने वाली पर अंततः सही दिशा का, जहां मार्गदर्शन, धैर्य और सत्य के साथ खड़ा होना पड़ता है। कृष्ण और नारायणी सेना का प्रसंग बताता है कि दीर्घकाल में वही निर्णय टिकते हैं जो धर्म और दीर्घदृष्टि के साथ लिए जाते हैं।
1. कृष्ण ने अपनी नारायणी सेना दुर्योधन को क्यों दे दी
कृष्ण ने दोनों पक्षों के लिए समान अवसर रखते हुए दो अलग प्रकार की सहायता सामने रखी। एक में बाहरी शक्ति थी, दूसरे में स्वयं का निहत्था मार्गदर्शन। दुर्योधन की वृत्ति संख्या और बल की ओर झुकी, इसलिए सेना उसी को मिली। इस तरह कृष्ण ने कर्म के परिणामों को बाधित किए बिना दोनों पक्षों को उनकी प्रवृत्ति के अनुसार सहयोग दिया।
2. क्या कृष्ण चाहते तो युद्ध को रोक सकते थे
ईश्वरत्व के स्तर पर सामर्थ्य होना और उसका उपयोग करना दो अलग बातें हैं। महाभारत की कथा में कृष्ण युद्ध को पूरी तरह रोकने की जगह उसे धर्म युद्ध के रूप में संतुलित और न्यायपूर्ण बनाते हैं, ताकि वर्षों से संचित कर्मफल स्वाभाविक रूप से सामने आ सके।
3. अर्जुन ने सेना की जगह कृष्ण को क्यों चुना
अर्जुन जानता था कि युद्ध में केवल शस्त्र नहीं, सही समय पर सही निर्णय भी आवश्यक है। उसे विश्वास था कि कृष्ण साथ होंगे तो धर्म की दिशा स्पष्ट रहेगी और भ्रम की स्थिति में भी मार्गदर्शन मिलता रहेगा। इसी भरोसे के कारण उसने संख्या के ऊपर उपस्थिति को प्राथमिकता दी।
4. क्या कृष्ण की सेना दुर्योधन के पक्ष में होने से युद्ध अन्यायपूर्ण हो गया
बाहरी रूप से देखे तो यह असंतुलन जैसा लग सकता है, परंतु कृष्ण के निहत्थे मार्गदर्शन ने संतुलन बना दिया। एक ओर संख्या बल, दूसरी ओर नीति और धर्म दृष्टि। इस प्रकार युद्ध का परिणाम केवल शस्त्र शक्ति से नहीं बल्कि नीति, चरित्र और कर्म से तय हुआ।
5. इस प्रसंग का मुख्य संदेश आधुनिक जीवन के लिए क्या है
प्रमुख संदेश यह है कि जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में केवल तुरंत मिलने वाले लाभ या संसाधन नहीं बल्कि साथ खड़े मूल्यों और मार्गदर्शन को भी देखें। वही चुनाव स्थिर और दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जाते हैं जो धर्म, विवेक और गहरी समझ के आधार पर किए जाते हैं।
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