By पं. सुव्रत शर्मा
जन्म, विवाह, पूजा, त्याग व आध्यात्मिकता - पुष्य के गुणों से माता सीता का जीवन विस्तार

माता सीता, श्रीराम की देवी सहधर्मिणी और भारतीय संस्कृति की शाश्वत नारी आदर्श, उनके जीवन की प्रत्येक घटना में आध्यात्मिकता, संवेदनशीलता और धर्म की गहराई समाहित है। रामायण के प्रसंगों में सीता का त्याग, साहस और भक्ति जगत के सभी साधकों के लिए प्रेरणा है, किंतु ज्योतिष के प्राचीन सूत्रों में उनके व्यक्तित्व का विशेष संबंध पुष्य नक्षत्र से प्रतिपादित है। यह संबंध नक्षत्र विज्ञान, धर्म, प्रकृति और चरित्र की गहराइयों तक फैला है-पुष्य के पोषण, संरक्षण और आध्यात्मिकता के आदर्श माताजी की प्रत्येक सांस, हर निर्णय और हर तप में साकार हैं।
पुष्य नक्षत्र भारतीय खगोलशास्त्र का आठवां चंद्र नक्षत्र है, जो कर्क राशि में 3°20' से 16°40' तक फैला है। इसका अधिपति ग्रह शनि है, जो जीवन में तप, संयम, कर्म और कष्ट को साधना का माध्यम बनाता है। अधिदेवता बृहस्पति (गुरु) हैं, जो ज्ञान, नैतिकता और धर्म के परम स्रोत। पुष्य “पोषणकर्ता”-इसका पुनर्नवा भाव है जीवन को पोषित, संजीवनी और संरक्षण का आश्रय देना।
चिन्ह के रूप में पुष्य को रथ का चक्र, गाय का थन या कमल की कली कहा जाता है-जो जीवन, संवर्धन और मातृत्व का गहरा बोध कराता है। जल तत्व की प्रधानता पुष्य को भावनाओं, संवेदनशीलता, संयम और आत्मज्ञान से जोड़ती है।
कथा के अनुसार माता सीता ने पुष्य नक्षत्र के मंगल-प्रभाव में मंगलवार को पृथ्वी से जन्म लिया। मिथिला के राजा जनक ने यज्ञ भूमि में हल चलाते वक्त स्वर्ण मंजूषा में सीता को पाया-“सीता” नाम ही संस्कृत में “सीर” (हल की रेखा) का द्योतक है। उनका जन्म उस पृथ्वी से हुआ जिसकी कोख स्वयं पोषण, सुरक्षा, उर्वरा और मातृत्व की दैवी ऊर्जा लिए थी।
पुष्य की चंद्रशक्ति ने सीता को भावनात्मक गहराई, पवित्रता और प्रकृति के विराट जीवन-चक्र से जोड़ दिया। उनका हर संकल्प, त्याग, प्रेम और सेवा, प्रकृति की धारा तथा पुष्य नक्षत्र के मूल तत्वों से शक्ति प्राप्त करता रहा।
सीता माता संपूर्ण भूमंडल की पोषक शक्ति का जीवंत उदाहरण हैं। उन्होंने वन, समाज, परिवार और जीव-जंतुओं के हित में असीम त्याग दिखाया-हर संबंध व सेवा ने पुष्य नक्षत्र की पोषण और रक्षा ऊर्जा को बढ़ाया। वनवास, बच्चे, समाज-हर भूमिका में उनका संरक्षण, संवेदनशीलता और करुणा पुष्य के मूल भाव को उजागर करती है।
पुष्य नक्षत्र सदा पवित्रता, शुद्धता और शुभता का प्रतीक रहता है। माता सीता का जीवन, विशेषतः अग्नि परीक्षा के दौरान, विश्व के समक्ष पतिव्रता धर्म और सत्यनिष्ठा का दिव्य उदाहरण पेश करता है। उनकी निष्ठा और धर्म-पालन, पुष्य के नैतिक आदर्शों की साक्षात छाया है।
पुष्य नक्षत्र व्यक्ति में विपरीत परिस्थितियों में स्थिरता, सहनशीलता और संतुलन देता है। वनवास, रावण का अपहरण, समाज की शंका-इन समस्त कठिन क्षणों में माता सीता ने अनंत आत्मबल, संयम और धैर्य का प्रदर्शन किया। उन्होंने पुष्य की जल तत्व शक्ति से भावनात्मक संतुलन और अनुशासन पाया।
जनक द्वारा हल चलाते समय भूमि में सीता का प्राकट्य-पूरा घटनाक्रम पुष्य नक्षत्र के पोषण, उर्वरा, मातृत्व और जीवनदायिनी ऊर्जा का संयोग है। यह देवीत्व और सांस्कृतिक मूल्यों का अद्भुत अनुवर्तन है।
सीता का विवाह धार्मिक, सामाजिक और ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ योग और संतुलन में संपन्न हुआ। राम और सीता-पृथ्वी और आकाश, मानव और दिव्य, धर्म और प्रेम-उनका मिलन पुष्य के गुणों को संपुष्ट करता है।
वनवासी जीवन में उनकी प्रकृति सच्चे साधक की तरह थी-व्रत, सेवा, साधना तथा वन-संस्कृति के प्रति उनका समर्पण पुष्य के जल तत्व की गहनता से जुड़ा था। उनका तप, आत्मचिंतन, प्रकृति के साथ एकत्व पुष्य नक्षत्र का प्रमाण है।
लंका की कैद ने उनकी भक्ति, धर्म और मातृत्व को अत्याधिक प्रमुखता दी। सीता ने विपत्ति में भी धर्म, साहस, पोषण और रक्षा-भाव को पुष्य के मूल मंत्र से साधा।
सीता के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा-अग्नि परीक्षा-पुष्य के अग्नि तत्व, पवित्रता और सत्य के अजगर भावों का सर्वोच्च प्रमाण है। अग्नि के बीच उनकी पवित्रता ने पुष्य के दिव्यतम आयामों को जगजाहिर किया।
सीता का पृथ्वी में जाना, जन्म के स्रोत में पुनः समाहित होना-यह पुष्य नक्षत्र के चक्र, पोषण, पुनरागमन और मातृत्व की ऊर्जाओं से संलग्न है। उनका अंतिम फैसला सम्पूर्ण जीवन चक्र की सिद्धि है।
वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता जन्मोत्सव “सीता नवमी” मनाया जाता है। यह पर्व पुष्य नक्षत्र की स्मृति और माता सीता के दिव्य अवतरण के लिए समर्पित है।
माता सीता की कृपा प्राप्ति एवं परिवार के कल्याण हेतु महिलाएँ पुष्य नक्षत्र में व्रत, पूजन, कथा-पाठ एवं धर्म-संकल्प करती हैं।
पारिवारिक सुख, संतान-संपदा, वैवाहिक शांति व संतुलन हेतु पुष्य नक्षत्र का प्रयोग व्यापक है।
पुष्य योग के समय रामायण का पाठ, सीता की अग्नि परीक्षा, वनवासी जीवन, विवाह-ये सब धर्म, भक्ति और सत्य की प्रेरणा बढ़ाते हैं।
माता सीता का जीवन-परीक्षाएँ, त्याग, संयम और धर्म-हर घटनाक्रम में पुष्य नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़ा है। उनके गुण, संतुलन, प्रेम और भक्ति का शाश्वत स्वरूप पुष्य चंद्र नक्षत्र के प्रभाव से सम्पन्न है। यह संबंध केवल शास्त्र या ज्योतिष के बल पर नहीं बल्कि प्रत्येक साधक के जीवन में वास्तविकता, शक्ति और आध्यात्मिकता की रीढ़ है।
माता सीता काल की हर धारा में पुष्य की मशाल जलाती हैं-उनके जीवन, त्याग और नक्षत्र-संबंध को साधना से जानें, आत्मकल्याण, धर्म, प्रेम और संतुलन का अनुभव करें।
प्रश्न 1. माता सीता का पुष्य नक्षत्र से क्या संबंध है?
उत्तर: माता सीता के जीवन व गुणों में पुष्य नक्षत्र की पोषण, भक्ति, धैर्य तथा आस्था की छवि प्रत्यक्ष है।
प्रश्न 2. पुष्य नक्षत्र का कौन-सा ग्रह एवं देवता है?
उत्तर: शनि इसका अधिष्ठाता ग्रह है जबकि बृहस्पति देवता हैं।
प्रश्न 3. पुष्य नक्षत्र में कौन से कार्य शुभ माने जाते हैं?
उत्तर: विवाह, शिक्षा, गृह-स्थापन, कोई धार्मिक अनुष्ठान या नवीन कार्य आरंभ करना।
प्रश्न 4. माता सीता ने कौन-से गुण पुष्य नक्षत्र से ग्रहण किए?
उत्तर: पोषण, भक्ति, साहस, आत्मबल, भावनात्मक स्थैर्य और सत्यनिष्ठा।
प्रश्न 5. पुष्य नक्षत्र के योग में माता सीता की आराधना कैसे की जाती है?
उत्तर: देवी स्तोत्र, संकल्प, जप, कथा-पाठ एवं विशेष पूजन विधि द्वारा।
मेरा जन्म नक्षत्र क्या है?
मेरा जन्म नक्षत्र
अनुभव: 27
इनसे पूछें: विवाह, करियर, संपत्ति
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि., ओडि
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