By अपर्णा पाटनी
जब जीवन हर मोर्चे पर लड़ाई जैसा लगे सीता की कहानी यह याद दिलाती है कि टूटे बिना भी नरम रहा जा सकता है

कुछ दिन ऐसे होते हैं जब सब कुछ भारी लगने लगता है। काम संभालते-संभालते आप खुद थक जाती हैं रिश्तों में आपने जितना दिया उतना लौटकर नहीं मिला और जो संघर्ष आप रोज़ करती हैं उसका पूरा सच शायद कोई नहीं जानता। आप मुस्कुराती रहती हैं सबके लिए बनी रहती हैं और भीतर से कई बार बस इतना चाहती हैं कि कोई आपके थके कन्धों को सचमुच देख ले। ऐसी हर स्त्री के लिए सीता की कथा सिर्फ पुरानी कहानी नहीं एक दर्पण है।
रामायण की पारंपरिक छवि में सीता को अक्सर शांत चुप धैर्यवान रानी के रूप में दिखाया गया लेकिन आधुनिक पुनर्कथाओं में वह बहुत मानवीय भावुक मज़बूत और कहीं-कहीं टूटी हुई भी दिखती है। उसकी यात्रा उस जीवन जैसी लगती है जिसे आज की असंख्य स्त्रियाँ जी रही हैं जहाँ प्रेम ज़िम्मेदारियाँ अपराधबोध विश्वासघात और स्वाभिमान एक साथ चल रहे होते हैं।
जीवन के कुछ चरण ऐसे आते हैं जब हर मोर्चे पर लड़ाई चल रही होती है। काम में संतोष नहीं घर में अनकहा तनाव अपने लिए समय न के बराबर और ऊपर से यह महसूस होना कि “मैंने तो पूरी कोशिश की फिर भी सब अधूरा है।” सारी ऊर्जा अपना पक्ष समझाने अपनी नीयत साबित करने और थोड़ा-सा सम्मान पा लेने में चली जाती है। थकान सिर्फ शरीर की नहीं आत्मा की भी हो जाती है।
ऐसे समय में सीता की कथा हमें यह दिखाती है कि संघर्ष के बीच भी स्थिर रहना क्या होता है। वह हर निर्णय में पूर्ण नहीं है वह भी टूटती है रोती है सवाल पूछती है पर वह अपनी गरिमा नहीं छोड़ती। वह हर किसी को अपने दर्द की व्याख्या नहीं देती लेकिन अपने सत्य से भी पीछे नहीं हटती। “सीता क्या करती” का उत्तर हर बार एक जैसा नहीं होगा लेकिन एक बात साफ रहती है वह अपने दुख को हथियार नहीं ज्ञान बनने देती है।
आज जब कोई स्त्री खुद से पूछती है “मैं और कितना सहूँ” तो सीता की कहानी उसे सिर्फ सहने के लिए नहीं सही समय पर अपने भीतर की शक्ति पर भरोसा करके निर्णय लेने के लिए भी प्रेरित करती है।
कई आधुनिक कथनों में बताया जाता है कि सीता का पालन-पोषण प्रेम से भरे परिवार में हुआ जहाँ उसे सीखने समझने और यहाँ तक कि युद्ध-कला जैसी विद्या तक पहुँच मिली। यानी उसे योग्य बनाया गया लेकिन उसके असली सामर्थ्य को छिपाकर रखना भी कहा गया ताकि समाज की धारणा न टूटे। यही स्थिति आज भी अनेक स्त्रियों की है जिन्हें कहा जाता है “तुम बहुत सक्षम हो” पर साथ में यह चेतावनी भी कि “बहुत आगे मत बढ़ जाना ज़्यादा मत दिखना।”
उन्हें पढ़ने दिया जाता है पर निर्णय लेने की मेज़ से दूर रखा जाता है। उनसे कहा जाता है तुम घर भी संभालो नौकरी भी करो भावनात्मक सहारा भी बनो और अगर थक जाओ तो भी मुस्कुराती रहो। सीता की कथा हमें दिखाती है कि चुने जाने का अर्थ केवल ताज पहनना नहीं बार-बार कसौटी पर कसना भी है अक्सर बिना उचित समर्थन के।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि “बहुत ज़्यादा होना” कोई दोष नहीं अपनी पूरी क्षमता दिखाने का अधिकार है। सीता हमें यह याद दिलाती है कि अपनी शक्ति छिपाकर रखना हमेशा आदर्श नहीं कई बार वह स्वयं के साथ अन्याय भी हो सकता है।
किसी भी जीवन की तरह सीता के जीवन में भी रिश्ते अनेक रंगों के हैं। कुछ लोग उसके साथ खड़े रहते हैं उसे बचाने का प्रयास करते हैं तो कुछ वही होते हैं जिन पर उसने भरोसा किया और बाद में जिन्होंने उसे चोट पहुँचाई। यह सच लगभग हर स्त्री जानती है बचपन की सहेली किसी करीबी रिश्तेदार या सहकर्मी के रूप में जिन्होंने कभी साथ दिया पर किसी मोड़ पर पीछे हट गए या पीठ में वार कर गए।
समाज अक्सर स्त्रियों से अपेक्षा करता है कि वे हर रिश्ता बचाए रखें हर संबंध की इज़्ज़त अकेले ढोती रहें चाहे वह रिश्ता अंदर से खत्म हो चुका हो। सीता की यात्रा याद दिलाती है कि हर संबंध हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कुछ रिश्ते अपना समय पूरा होने पर बदल जाते हैं कुछ टूट जाते हैं और यह परिवर्तन स्वीकार करना भी जीवन का हिस्सा है।
विश्वासघात की पीड़ा को वह दबाती नहीं पर उसे खुद की कड़वाहट बनने भी नहीं देती। वह सीखती है कि “मैंने भरोसा गलत जगह किया” पर “मैं भरोसा करना छोड़ दूँगी” यह निष्कर्ष नहीं बनाती। यह बहुत सूक्ष्म पर महत्वपूर्ण अंतर है।
सीता का विवाह सिर्फ राजनैतिक समझौता नहीं उसका अपना चयन भी था। वह राम को केवल राजकुमार के रूप में नहीं साथी के रूप में चाहती थी जिस पर वह भरोसा कर सके। पर विवाह के बाद उसकी राह आसान नहीं रही उसे भावनात्मक उलझनों राजनीति युद्ध और निर्णयों के भार से जूझते राम के साथ खड़ा रहना पड़ा।
वह उसके साथ वन में जाती है उसके संघर्षों को साझा करती है कई बार उसके निर्णयों का भार खुद पर उठाती है। वह अपनी भावनाएँ हर समय शब्दों में नहीं रखती लेकिन उसके कर्म दिखाते हैं कि वह बार-बार अपने हिस्से से ज़्यादा दे रही है। यह स्थिति आज भी अनगिनत स्त्रियों की है जो अपने साथी के साथ आर्थिक कठिनाई परिवार के दबाव समाज की नज़र और भीतर की घबराहट सब कुछ बाँटती हैं और फिर भी उनकी देखभाल को “स्वाभाविक” मान लिया जाता है।
सीता हमें यह दिखाती है कि प्रेम का अर्थ केवल साथ निभाना नहीं बल्कि कभी-कभी स्वयं के लिए कठिन निर्णय लेना भी है जब self-respect और सुरक्षित सीमा की ज़रूरत सामने खड़ी हो।
आज की दुनिया में भी कितनी स्त्रियाँ हैं जो अपने साथी के साथ संघर्षों में खड़ी रहती हैं कभी नौकरी न होने की चिंता कभी मानसिक तनाव कभी परिवार या समाज की तिरछी नज़र। वे न केवल साथ देती हैं बल्कि भावनात्मक बोझ भी उठाती हैं यह सोचकर कि “अगर मैं टूट गई तो हमारा सब कुछ टूट जाएगा।”
ऐसे रिश्तों में स्त्री अक्सर अपने दर्द को किनारे रखकर पुरुष की लड़ाई को प्राथमिकता देती है। पर धीरे धीरे उसे यह महसूस होने लगता है कि जहाँ वह दोनों के लिए लड़ रही थी वहाँ कई बार वह अकेली रह गई। आधुनिक सीता की छवि हमें याद दिलाती है कि साथी के लिए खड़ा होना सुंदर है लेकिन इतना कि आप स्वयं पूरी तरह मिट न जाएँ।
सीता की कहानी यहाँ दोहरी सीख देती है हृदय में करुणा रखना पर अपने सीमांत पर पहरा भी रखना।
सीता की जीवनकथा कोई सीधी रेखा नहीं उसमें प्रेम है संदेह है त्याग है क्रोध है मौन भी है और विद्रोह भी। यही उसे आज की स्त्री के लिए प्रासंगिक बनाता है। उसके अनुभवों से कुछ गहरी सीख उभरती हैं
सीता हमें यह नहीं कहती कि तुम हमेशा चुप रहो वह दिखाती है कि कब चुप रहना बुद्धिमानी है और कब अपनी सीमा खींचना भी धर्म है।
अक्सर हम जीवन में किसी बाहरी नायक का इंतज़ार करते हैं जो आकर हमारे सभी प्रश्न और संघर्ष हल कर दे। सीता की कहानी यह संकेत देती है कि बहुत बार जिस नायक का इंतज़ार हम बाहर कर रहे होते हैं वह हमारे भीतर ही सोया होता है। जब काम ठहर जाए रिश्ते डगमगा जाएँ और मन बिखर जाए तब खुद से पूछना “अगर सीता मेरी जगह होती तो क्या करती” हमें अंदर की ताकत से जोड़ सकता है।
वह शायद यह न कहती कि “मैं बेबस हूँ” बल्कि यह देखती कि “मेरे बस में जो है मैं वह करूँगी और जो मेरे बस में नहीं उसके आगे मैं झुकूँगी नहीं सिर्फ स्वीकार करूँगी।” एक प्राचीन पंक्ति में सीता जैसी स्त्री के बारे में कहा गया कि “तुम साधारण नारी नहीं तुम स्वयं धर्म का जीता-जागता स्थान हो।” यह वाक्य आज की हर स्त्री के लिए स्मरण है जो ख़ुद को बार-बार कमतर आँकती रही हो।
जब आप यह मानने लगती हैं कि आपका जीवन केवल भुगतने के लिए नहीं किसी गहरे अर्थ को जीने के लिए है तब आप धीरे-धीरे अपने भीतर बसे नायक को पहचानने लगती हैं।
1. क्या सीता की कथा आज की स्त्री पर सचमुच लागू होती है या यह ज़्यादा खिंचाव है
सीता की हर घटना आधुनिक जीवन में सीधे न सही पर प्रतीकात्मक रूप से ज़रूर दिखती है जैसे बिना सुने रह जाना परिवार और समाज के बीच संतुलन की जद्दोजहद और self-respect के लिए कठिन निर्णय। इसीलिए कई स्त्रियाँ उसे “केवल आदर्श नारी” नहीं बल्कि बहुत मानवीय साथी की तरह देखने लगी हैं।
2. यदि सीता इतनी सहनशील बनी रही तो क्या हमें भी हमेशा चुप रहना चाहिए
नहीं। सहनशीलता और आत्म-निषेध दो अलग बातें हैं। सीता की यात्रा में भी ऐसे क्षण हैं जब वह अपनी बात रखती है विरोध करती है और अंततः अपने लिए अलग रास्ता चुनती है। उसका धैर्य प्रेरणा दे सकता है पर उसकी पीड़ा हमें यह भी सिखाती है कि समय रहते सीमा बनाना आवश्यक है।
3. आधुनिक स्त्री सीता से सबसे महत्वपूर्ण क्या सीख सकती है
शायद सबसे गहरी सीख यह है कि निष्ठा और self-respect का संतुलन कैसे रखा जाए। आप प्रेम करें पर खुद को खोकर नहीं आप साथ दें पर अपने मन और शरीर की सीमा देखकर। सीता दिखाती है कि त्याग की भी एक सीमा होती है उसके बाद चुपचाप दूरी भी एक धर्म बन जाती है।
4. यदि परिवार या समाज “सीता जैसी बनो” कहकर हर त्याग को सहज मान ले तो क्या करें
ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि बहुत बार “सीता जैसी बनो” कहने वाले उसकी पूरी कहानी नहीं सिर्फ सहने वाला हिस्सा याद रखते हैं। आप विनम्रता से अपनी सीमा बता सकती हैं और दिखा सकती हैं कि सीता की शक्ति केवल सहने में नहीं स्वयं के लिए खड़े होने में भी थी। शांति से पर दृढ़ता के साथ अपने निर्णयों के पीछे खड़ी रहना ही उसका सच्चा अनुकरण है।
5. जब कोई स्त्री भीतर से बिल्कुल थक जाए तो “सीता की तरह” जीना practically कैसे मदद कर सकता है
सीता की तरह जीने का अर्थ यह हो सकता है कि आप अपने दर्द को दबाएँ नहीं पर उसे कहानी की तरह बाहर निकालकर देखें लिखें किसी संवेदनशील व्यक्ति से बाँटें। फिर धीरे-धीरे यह पूछें “अब मेरी अगली ईमानदार चाल क्या हो सकती है” चाहे वह मदद माँगना हो थोड़ा विश्राम लेना हो सीमा बनाना हो या किसी पुराने बोझ को छोड़ देना हो। सबसे ज़्यादा मदद इस याद से मिलती है कि आप अकेली नहीं असंख्य स्त्रियाँ इसी राह पर चलकर अपने भीतर नया बल पा चुकी हैं।
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