By पं. नीलेश शर्मा
वनवास, स्त्री ऋषियों और आत्मस्वाभिमान से जुड़ी सीता की शिक्षाएँ

“सीता केवल राम की अर्धांगिनी नहीं बल्कि धरती की आत्मा, ब्रह्मांड का सार और समस्त प्राणियों के लिए ज्ञान और करुणा का शाश्वत दीप स्तंभ हैं।”
रामायण में सीता को प्रायः राम की भक्तिप्रधान पत्नी के रूप में देखा गया है, एक ऐसी नायिका, जिसने अनगिनत कठिनाइयों, वनवास, अपहरण और अग्निपरीक्षा झेली। किंतु ‘सीता की अनकही कथा’ इन सबके परे जाकर हमें उनका गहन आध्यात्मिक और दैवी स्वरूप दिखाती है। सीता केवल पति-भक्त नहीं बल्कि देवी नारायणी का अवतार हैं, प्रकृति की आदिम शक्ति, जो मानवता को धर्म, करुणा और प्रकृति संतुलन की राह दिखाने के लिए इस पृथ्वी पर अवतरित हुईं।
दण्डकारण्य का वनवास सीता के जीवन का सबसे परिवर्तनकारी काल है। पारंपरिक दृष्टि में इसे केवल कष्ट और त्याग का समय माना गया है, परंतु वास्तव में यह उनकी आत्मा और प्रकृति के बीच पवित्र संवाद था। वहाँ उन्होंने वृक्षों, नदियों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों को आत्मीयता से अपनाया। तुलसी और अशोक वृक्ष के साथ उनके वार्तालाप, वनवासियों और तपस्वियों को दिए गए उनके उपदेश इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि वे केवल राम की अनुयायी नहीं बल्कि एक स्वतंत्र साधिका और मार्गदर्शक थीं।
यह वनवास उनके लिए आत्मचेतना और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का अवसर था। वे केवल सहन नहीं कर रही थीं; वे सीख रही थीं, सिखा रही थीं और धरती को अपनी संतान की तरह पोषित कर रही थीं।
सीता का आध्यात्मिक मार्ग केवल पुरुष ऋषियों से प्रभावित नहीं था बल्कि महान स्त्रियों, अनसूया, गार्गी और मैत्रेयी, के ज्ञान से भी आलोकित हुआ।
अनसूया ने उन्हें त्याग, संयम, करुणा और निष्काम प्रेम का पाठ पढ़ाया। उनके द्वारा भेंट किए गए दिव्य वस्त्र धैर्य और गरिमा के प्रतीक थे, जो विपत्तियों के बावजूद नष्ट नहीं होती।
गार्गी और मैत्रेयी जैसे विदुषियों के दर्शन-भरे संवादों ने सीता के बौद्धिक और आध्यात्मिक पक्ष को नया आयाम दिया। उन्होंने सीता को यह सिखाया कि धर्म केवल नियमों और सामाजिक संरचनाओं का पालन नहीं है बल्कि यह सामूहिक करुणा, प्रेम और सृष्टि-संतुलन के प्रति सजगता की जीवन-दृष्टि है। इन संवादों ने उन्हें बौद्धिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक प्रखरता प्रदान की।
सीता के जीवन की वास्तविक शक्ति उनके निर्णयों और प्रतिकूलताओं का सामना करने में दिखाई देती है। रावण द्वारा अपहरण के समय उन्होंने न भय व्यक्त किया, न ही आश्रय की याचना की बल्कि अपने आत्मबल और गरिमा का उद्घोष किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे राम की पत्नी हैं और उनका गौरव अडिग है।
अग्निपरीक्षा का प्रसंग प्रायः स्त्री परंपरा में एक प्रकार की पितृसत्ता के रूप में देखा गया। किन्तु यह कथा इसे नए रूप में प्रस्तुत करती है। अग्नि में प्रवेश कर सीता ने केवल अपनी पवित्रता नहीं बल्कि अपनी स्वतंत्रता और दैवी सत्ता का पुनः उद्घोष किया। यह परीक्षा उनके लिए बाध्यता नहीं बल्कि आत्मनिर्णय और दिव्यता का उद्घोष था।
सीता का वनवास केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं बल्कि पृथ्वी के संरक्षण का संदेश था। उन्होंने स्थानीय समुदायों को सतत विकास और प्रकृति-सम्मान का मार्ग दिखाया। वे नदियों को पवित्र बनाए रखने की प्रार्थना करती थीं। गोदावरी नदी के तट पर उनके आँसुओं का मिलना इस बात का प्रतीक है कि वे भविष्य में आने वाले पर्यावरणीय संकट की दूरदर्शी थीं।
उनकी करुणा और शिक्षा यह स्पष्ट करती हैं कि मानवता का भविष्य केवल प्रकृति की रक्षा पर आधारित है। धरती और उसके संसाधनों का सम्मान ही जीवन-संपन्नता का आधार है।
पारंपरिक कथा राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहती है। किंतु यह दृष्टिकोण राम और सीता दोनों को समान भागीदार और सहमार्गी के रूप में प्रस्तुत करता है। सीता केवल पति के पीछे चलने वाली पत्नी नहीं थीं बल्कि एक सजग परामर्शदाता भी थीं। स्वर्णमृग प्रसंग इसका उदाहरण है, सीता ने राम को उसके छल का पूर्वाभास दिया।
उनका अंतिम निर्णय भी इसी का प्रमाण है। जब उन्होंने पृथ्वी में समाने का निर्णय लिया, तो यह किसी पराजय का प्रतीक नहीं था। यह अपनी आत्मानुभूति का पुनः दावा था। उन्होंने किसी भी समझौते से परे अपने दैवी स्वरूप को पुनः स्वीकारा।
यह कथा केवल सीता की नहीं बल्कि उन स्त्रियों की भी है जिन्हें प्रायः भुला दिया गया। मंदोदरी, रावण की पत्नी, सत्य और शांति की पक्षधर थीं। उन्होंने कई बार रावण को रोका और सीता के प्रति सम्मान दिखाया। उर्मिला, लक्ष्मण की पत्नी और सीता की बहन, ने मौन साधना और धैर्य का परिचायक प्रस्तुत किया। उनका त्याग सीता की दृश्यमान कठिनाइयों जितना ही महान था।
‘सीता की अनकही कथा’ केवल पुन:कथन नहीं बल्कि देवी स्वरूप सीता का उत्सव है। वे हमें बताती हैं कि स्त्री शक्ति ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की आधारभूत शक्ति है। उनकी कथा करुणा, प्रज्ञा, आत्मसम्मान और पारिस्थितिक संतुलन का आलोक है, जो आज भी प्रासंगिक है और सदैव प्रेरणा देता है।
प्रश्न 1: यह कथा पारंपरिक रामायण से कैसे भिन्न है?
उत्तर: पारंपरिक कथा में मुख्य फोकस राम पर होता है, जबकि इस कथा में सीता केंद्र में हैं, जिन्हें धरती और धर्म की संरक्षिका के रूप में दर्शाया गया है।
प्रश्न 2: सीता के वनवास का वास्तविक महत्व क्या था?
उत्तर: वह मात्र कठिनाई नहीं बल्कि प्रकृति के साथ उनका आध्यात्मिक संवाद था, जिसमें उन्होंने वनों, नदियों और जनजातियों को संरक्षित करने का मार्ग दिखाया।
प्रश्न 3: स्त्री मुनियों का सीता पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: अनसूया ने उन्हें धैर्य और करुणा सिखाई, जबकि गार्गी और मैत्रेयी ने उन्हें धर्म को प्रेम और सामंजस्य का स्वरूप समझाया।
प्रश्न 4: अग्निपरीक्षा का अर्थ इस दृष्टि में क्या है?
उत्तर: सीता की अग्निपरीक्षा स्त्री की दासता नहीं बल्कि आत्म स्वतंत्रता और दिव्यता की उद्घोषणा थी, जिसमें उन्होंने स्वेच्छा से अपनी सत्ता को प्रकट किया।
प्रश्न 5: आधुनिक काल में सीता का संदेश क्यों प्रासंगिक है?
उत्तर: क्योंकि यह हमें पर्यावरणीय जिम्मेदारी, आंतरिक शक्ति और स्त्री बुद्धि की अनिवार्यता का संदेश देता है।
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