By पं. नरेंद्र शर्मा
मंगल, शनि, राहु-केतु, नाड़ी दोष: लीला, कष्ट और धर्म की दिव्यता

माता सीता, लक्ष्मी स्वरूपा, त्याग, शुद्धता और देवी-धैर्य की प्रतीक हैं। उनके जीवन की विषम परिस्थितियाँ, रावण द्वारा हरण, अग्नि परीक्षा, श्रीराम से वियोग, सदियों से आचार्यों, ज्योतिषियों और भक्तों के गंभीर चिंतन के विषय रहे हैं। वैदिक ज्योतिष की दृष्टि से, ये कष्ट किन-किन ग्रहदोषों से जुड़े हैं? आइए, शास्त्र की व्याख्या और ग्रहों के योग-दोषों के माध्यम से इस रहस्य को समझें।
ज्योतिषीय तर्क:
कहते हैं कि माता सीता की जन्मकुंडली में मंगल दोष था, अर्थात् मंगल का अशुभ भाव में स्थित होना। मंगल जब विवाह/सप्तम, अष्टम, द्वादश, चतुर्थ, लग्न, द्वितीय में दोषकारी होता है, तो वैवाहिक संबंधों में क्लेश, वियोग व संघर्ष ला सकता है।
चरित-परिलक्षण:
श्रीरामसे विवाह के उपरान्त, वनवास, रावण-हरण, लंका में कष्ट और आगे चलकर गर्भावस्था में भी वियोग, मंगल दोष की वैवाहिक विछोह संकेतिका मानी गईं।
शास्त्रीय दृष्टिकोण:
अर्थपूर्ण: श्रीराम की कुण्डली में भी मंगल दोष संकेतित है। सामान्यतः इसे "कैंसलिंग" (एक-दूसरे के दोष को निरस्त) माना जाता है; किंतु लीला में संकल्पनागत वियोग का दिव्य कारण था।
ज्योतिष तर्क:
शनि जब अशुभ भाव, लग्न या सप्तम/अष्टम में स्थित हो, संतान, वैवाहिक सुख, प्रतिष्ठा व दीर्घ दुःख की कारक बनता है। लंबी उपेक्षा, कष्ट, अपमान, विलंब व त्याग का संकेत।
जीवन-छाया:
रावण का हरण, अशोक वाटिका में बंदी जीवन, अग्नि परीक्षा, गर्भावस्था में वनवास व अयोध्या त्याग, सब शनि के दीर्घ, कर्म-संबंधी और दुःखद परिणाम माने जाते हैं।
दर्शन-संदेश:
शनि-पीड़ा धैर्य, तप, क्षमा और सहज स्वीकृति का पाठ पढ़ाती है; माता सीता ने उन्हीं गुणों का आदर्श स्थापित किया।
ज्योतिष तर्क:
जब जन्मकुंडली में चंद्रमा अशुभ भाव या किसी पापग्रह (राहु/शनि) से पीड़ित हो तो मानसिक अस्थिरता, गृह-क्लेश, वियोग व संवेदनशीलता आती है।
जीवन में परिलक्षण:
अयोध्या-प्रासाद में आनंद के स्थान पर वनवास, मिलन-वियोग का कभी न खत्म होने वाला चक्र, परीक्षा, अशांति और गहराई से जुड़ा संतोषहीन मन, चंद्र दोष की भोग कथा।
ज्योतिषीय तर्क:
राहु-केतु छाया ग्रह हैं, माया, छल, प्रतारणा, आकस्मिक परिवर्तन, भ्रष्ट आपाद, सार्वजनिक आरोप/परीक्षा का कारण बनते हैं।
परिणाम:
रावण का मायावी वेश, छल से हरण, एक क्षण में रानी से कैदी, अग्नि परीक्षा व लोक-दोषारोपण, राहु-केतु की तीव्र छाया।
गूढ़ संदेश:
राहु-केतु का योग कर्म-विपाक, जन्म-जगत के नियोजन व जीवन की अलौकिकता को दर्शाता है; माता सीता ने सबका संतुलन अपने धर्मबल से किया।
ज्योतिषीय तर्क:
नाड़ी दोष, अर्थात श्रीराम व सीता की कुण्डलियों में समान नाड़ी, वैवाहिक जीवन में वियोग, संतान, स्वास्थ्य कष्ट व बार-बार बिछोह का कारण बनता है।
जीवन में लागू:
शेष सभी आदर्शों के होते हुए, स्थाई मिलन न होना, अलगाव की पुनरावृत्ति; यह नाड़ी दोष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
ज्योतिषीय तर्क:
राज्यभंग योग, अर्थात सत्ता, सुख, समृद्धि की बार-बार हानि; खास रूप से जब योगों में शनि-राहु, सप्तम अथवा दशम भाव हेतु दोषकारी हो।
जीवन-परिलक्षण:
अयोध्या की रानी से वनवासिनी, लंका में कैद, अंतिम अवस्था में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निर्वासन, यह अनवरत उत्थान-पतन राज्यभंग योग का परिणाम माना जाता है।
यद्यपि माता सीता के जीवन के कष्टों के लिए ज्योतिष के दोष विद्यमान माने जाते हैं, किंतु शास्त्र मानता है, धर्मस्थापना हेतु यह लीला अनिवार्य थी। देवी स्वरूपा होते हुए उन्होंने धैर्य, शुद्धता, नारी बल, क्षमा और सहिष्णुता का अनुपम आदर्श स्थापित किया।
सीता का दुःख ‘भूमि’ (पृथ्वी) की सहनशीलता, परीक्षा और पोषण की अमर कथा है। जीवन की प्रत्येक पीड़ा, शुद्धता, सत्य और साधना के लिए थीं, क्योंकि कठिन परिस्थितियों में ही चरित्र की गहनता प्रकट होती है।
माता सीता की कुंडली से जुड़े दोष, मंगल, शनि, चंद्रमा, राहु-केतु, नाड़ी दोष और राज्यभंग योग, केवल ज्योतिषीय अलंकरण नहीं बल्कि उनके आदर्श और धैर्य की गाथा के ब्रह्मसूत्र हैं।
इन दोषों ने सीता की कमजोरियों को नहीं बल्कि उनकी साधना, धैर्य और धर्म-समर्पण को ही उजागर किया।
प्रश्न 1. माता सीता को सबसे प्रमुख कौन सा दोष प्रभावित करता है?
उत्तर: मंगल एवं शनि दोष; इनसे वैवाहिक जीवन में वियोग और संघर्ष जुड़े दिखाए जाते हैं।
प्रश्न 2. क्या राम व सीता दोनों को एक जैसा दोष था?
उत्तर: मान्यता है दोनों में मंगल दोष था, जिससे दोष का प्रभाव आंशिक रूप से निरस्त हुआ।
प्रश्न 3. नाड़ी दोष का क्या प्रभाव था?
उत्तर: वैवाहिक बिछोह, संतान या स्वास्थ्य संबंधी क्लेश की पुनरावृत्ति।
प्रश्न 4. सीता के जीवन की कठिनाइयाँ कौन-कौन से योग दर्शाते हैं?
उत्तर: राज्यभंग योग, राहु-केतु दोष, शनि की दशा, चंद्र दोष।
प्रश्न 5. इन दोषों के गूढ़ शास्त्रीय अर्थ क्या हैं?
उत्तर: जीवन के हर संघर्ष में धर्म-बल, धैर्य और आदर्श जीवन-संदेश ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
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