By पं. नीलेश शर्मा
जन्म, शिक्षा, विवाह, वनवास, परीक्षा, व्रत और प्रेरणा - विस्तारिक गाथा

अद्भुत श्रद्धा, निश्छल त्याग और अपराजिता नारी शक्ति का नाम है माता सीता। उनके जीवन की प्रत्येक घटना, उनके गुण, उनका धैर्य और बलिदान वैदिक काल से लेकर आज के मानव समाज तक गूंजता रहा है। वे केवल श्रीराम की सहधर्मिणी नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की गहनतम जड़ों में अंकित एक सार्वकालिक प्रेरणा हैं। उनके प्राकट्य से लेकर धरती में विलय तक का प्रत्येक क्षण धर्म, प्रेम और सत्य के नवपुष्पों से सुसज्जित है।
प्राचीन शास्त्रों अनुसार राजा जनक अत्यंत धर्मनिष्ठ, योगी और तत्त्वज्ञानी सम्राट थे। मिथिला की धरती पर जब होल यज्ञ का आयोजन हुआ तो जनक जी स्वयं कृषि का कर्मकाण्ड निभाने हेतु हल चलाने लगे। उस यज्ञ की बेला में उनके हल का फल एक स्थान पर अत्यंत दृढ़ता से अटक गया। गूढ़ जिज्ञासा के साथ वहाँ की भूमि खोदी गई, जहाँ से एक देवी तुल्य बालिका प्रकट हुई। उसका दिव्य तेज और शांतिमा ऐसा था कि समस्त मुनिगण एवं ब्राह्मण विस्मित रह गए।
माता सीता का यह जन्म दिव्यता, प्रकृति के रहस्य तथा लोककल्याण का अद्भुत उदाहरण है। उन्हें ‘सीता’ नाम दिया गया-संस्कृत शब्द ‘सीत’ अर्थात भूमि की रेखा से।
राजा जनक वेदांत और योग के अनन्य साधक थे। तत्त्वज्ञान के क्षेत्र में श्री याज्ञवल्क्य से उनके संवाद-‘जनक याज्ञवल्क्य संवाद’-भारतीय उपनिषदों का अमूल्य रत्न है। जनक का दृष्टिकोण सहिष्णुता, साधना और कर्तव्यनिष्ठा का संगम था, जिनके कारण उन्हें ‘विदेह’ और ‘राजर्षि’ की उपाधि प्राप्त हुई थी।
प्रतिष्ठा और संस्कारों के बीच सीता का पालन हुआ। उन्होंने वेद, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद और राज्यकला की शिक्षा प्राप्त की। माता सुनयना के आशीर्वाद और जनक की तत्त्व-चर्चा से उनका हृदय निर्मल और तीक्ष्ण बना।
सीता बाल्यकाल से ही पशुओं, पक्षियों और वृक्षों से गहरा प्रेम करती थीं। प्रजा में उनकी सहृदयता और दया के कारण सभी जन उन्हें ‘जनकनन्दिनी’ कहकर पुकारते थे।
माता सीता ने शील, विनम्रता, ज्ञान एवं सर्वस्वर्पण की पराकाष्ठा स्थापित की है। वे केवल गृहलक्ष्मी नहीं थी बल्कि योग, धर्म, तप और भक्ति की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं। वेद-पुराणों और लोकपरंपराओं में उनके समय-समयी वर्गों से संवाद के उदाहरण मिलते हैं।
उपनिषदों में माता सीता का स्पष्ट उल्लेख है कि वे आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति की रहस्य को जानने की इच्छा प्रकट करती थीं। जनक के राज्य में विद्वानों, ऋषियों और योगियों के साथ ज्ञानगोष्ठियों में वे अवश्य उपस्थित रहती थीं।
जनक के पास भगवान शिव का परम अद्भुत धनुष था, जिसे उन्होंने गुरुओं के अद्भुत संयोग और तपस्वियों की कृपा से प्राप्त किया था। स्वयंवर के समय घोषणा की गई कि जो धनुष को उठा कर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा, वही सीता का वरण करेगा।
देश-देशांतर के सभी राजकुमार आये मगर धनुष उठाने का साहस किसी में नहीं था।
विश्वामित्र ऋषि की संगति में श्रीराम और लक्ष्मण मिथिला नगर पहुंचे। स्वयंवर के महासभा में श्रीराम ने, बिना अहंकार, पूर्ण विनम्रता से धनुष को उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई और तीन टुकड़ों में तोड़ दिया।
यह घटना केवल बाह्य शक्ति का नहीं बल्कि उनकी दिव्यता का प्रमाण थी।
सर्व भ्रांतियों के बाद, सीता जी ने अपने हृदय की गंभीर गूंज सुनकर श्रीराम को चुन लिया। देवताओं की उपस्थिति में उन्होंने श्रीराम के गले में स्वर्णमाल्य डाला। विवाह महोत्सव की ऐसी दिव्यता थी कि मिथिला के लोग, प्रकृति और देवगण, सभी आनंदित हुए।
जनकपुर, मिथिला तथा नेपाल के जनश्रुतियों में विवाह प्रसंग के समय के लोकगीत, स्वादिष्ट व्यंजन, पारंपरिक परिधान और भव्यता का विस्तृत उल्लेख मिलता है। महर्षि वाल्मीकि, तुलसीदास और कल्किः पुराण में इस प्रसंग की गौरवपूर्ण छटा वर्णित है।
सीता जी ने अयोध्या में श्रीराम के साथ धर्म, सेवा और सारे परिवार के हितों का निर्वाह किया। वे राजा दशरथ, माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी का आदर, महारानी सरीखा सम्मान करती थीं।
अपनी सखियों और अयोध्या की स्त्रियों के साथ वे सदा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को व्यावहारिक रूप देने का आग्रह करती थीं।
सीता ने नारी का सशक्त आदर्श स्थापित किया। उनकी शिक्षा, सेवा, भक्ति और विनम्रता आज भी भारतीय घरों में महिला सशक्तीकरण का मूल भाव है।
राजसी वैभव और ऐश्वर्य का त्याग सीता जी ने बिना किसी संकोच के कर दिया। वनवास के समय वे श्रीराम और लक्ष्मण के साथ नंदीग्राम, चित्रकूट, पंचवटी आदि स्थलों पर रहीं। उन्हीं के आगमन से वन के फूलों, पक्षियों और वातावरण में सात्विकता और सौंदर्य का संचार हुआ।
वनवास के समय सीता ने कठिन व्रत, तप और साधना की। उन्होंने जलकंद, मूल, फल का सेवन और बेसहारा प्राणियों का संरक्षण किया। उनके कृतज्ञ रहने का भाव जीवन के प्रत्येक पल में व्याप्त रहा।
शूर्पणखा, मारीच, रावण आदि के उपद्रवकाल में सीता देवी ने श्रीराम को साहस के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वे पतिव्रता, कर्तव्यनिष्ठा और आत्मबल की अनूठी मिसाल बनीं।
सीता का रावण द्वारा अपहरण धन, शक्ति और सत्य के संघर्ष का चरमोत्कर्ष है। अशोकवाटिका में बंदी होकर भी सीता ने रावण के किसी प्रलोभन, धमकी या भय को स्वीकार नहीं किया।
हनुमान जी ने सीता को श्रीराम की अंगूठी दी। यह प्रतीक था विश्वास, आश्वासन और रक्षक का। सीता ने हनुमान जी को चूड़ामणि दी, जो संदेश स्वरूप श्रीराम तक पहुँची।
सीता ने प्राचीन शास्त्रों, स्तोत्रों और श्लोकों का जप कर अपना आत्मबल बनाए रखा। वे देवी पार्वती, गौरी और भूमिदेव से शक्ति प्राप्त करने का स्तोत्र गायन करती थीं।
रावण के वध के पश्चात जब श्रीराम लौटे तब समाज और राजदरबार में सीता के पवित्रता पर प्रश्न उठाया गया। यह पीड़ादायक घटना थी, फिर भी माता सीता धैर्यपूर्वक अग्नि-परीक्षा के लिए तत्पर हुईं।
सीता ने अग्नि देवता के सम्मुख प्रवेश कर निश्चल पावनता का प्रमाण प्रस्तुत किया। देवताओं ने घोषणा की कि वे भगवती लक्ष्मी की साक्षात स्वरूपा हैं।
अग्नि परीक्षा का शास्त्रीय अर्थ है-नारी शक्ति, सत्य और श्रद्धा का दिव्य स्वरूप।
समाज में आज भी यह प्रश्न चर्चा का विषय है कि अग्नि-परीक्षा न्यायोचित थी या नहीं। शास्त्रार्थों, लोककथाओं और कवियों की दृष्टि में यह संकट नारी की आंतरिक शक्ति और संस्कृति की कसौटी है।
अयोध्या लौटने पर समाज में पुनः सीता के शील पर संदेह उठा। माता सीता ने राजदरबार में, सभी प्र्जाओं के समक्ष धरती माता को साक्षी मानकर स्वयं को सत्य के लिए समर्पित किया। तुरंत प्रविष्ट हवेली में एक सिंहासन प्रकट हुआ और माता सीता folded hands के साथ उसी में विलीन हो गईं।
धरती में विलीन हो जाना, केवल नारी का त्याग नहीं बल्कि जीवन के अंतिम सत्य, धर्म और प्रेम का महाकाव्य है। उनका यह विलेय त्याग आज भी प्रत्येक पीढ़ी को सत्य, आस्था और श्रद्धा का सन्देश देता है।
भारत तथा नेपाल में सीता के नाम से अनगिनत मंदिर, कुंड और तीर्थ स्थापित हैं। यहाँ उनकी पावन गाथा, दर्शन, उपासना और सम्मान परंपरा का स्वरुप लेती है।
| मंदिर/स्थान | प्रदेश/देश |
|---|---|
| पुनौरा धाम एवं सीता कुंड | बिहार |
| जनकपुर मंदिर | नेपाल |
| सीता माता मंदिर | राजस्थान |
| सीता देवी मंदिर | केरल |
| सीता मंदिर | उत्तराखंड |
| सीता मंदिर | हरियाणा |
| शीतलामाता मंदिर | उत्तर प्रदेश |
| राम सीता मंदिर | महाराष्ट्र |
| सीता छठ घाट | झारखंड |
इन मंदिरों में सीता नवमी, रामनवमी, वनवासोत्सव, विवाह उत्सव, अग्नि-परीक्षा दिवस आदि पर्व बड़े भावविभोर वातावरण में मनाए जाते हैं। भक्तजन व्रत, पूजा, कथा पाठ, आरती और विशेष स्तोत्रों द्वारा माता सीता को पूजते हैं।
सीता नवमी-वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन प्रातः काल स्नान कर, व्रत रखकर, पुष्प, अक्षत व नैवेद्य से पूजन, जनक-सुनयना एवं राम-सीता कथा पाठ, स्तोत्र-आरती तथा विशेष भजन का विधान होता है।
महिलाएँ हर पवित्र कार्य में माता सीता के नाम का व्रत करती हैं।
| पर्व/व्रत | तिथि/समय | प्रधान पूजा-विधि |
|---|---|---|
| सीता नवमी | वैशाख शुक्ल नवमी | व्रत, कथा, पूजन, आरती |
| वनवास उत्सव | चैत्र-आषाढ़ | श्रीराम-सीता दोहा पाठ |
| विवाह उत्सव | मार्गशीर्ष-पौष | वरमाला, भजन, आरती |
| अग्नि परीक्षा दिवस | अश्विन | अग्नि स्तोत्र, कथा |
सीता देवी का प्रत्येक प्रसंग कविता, नाटक, चित्रकला, पटचित्र, लोकगीत, लोक-नृत्य और भजन में समाहित है। मिथिला चित्रकला, राजस्थान की मंडाना कला, महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग्स में माता सीता के विविध रंग देखे जा सकते हैं।
पतिव्रता धर्म, माता का त्याग, वनवास, साधना, धर्म-चर्या-ये सभी बातें लोक संस्कृति की आत्मा में व्याप्त हैं।
माता सीता का जीवन केवल पौराणिक आख्यान नहीं बल्कि भारतीय नारीत्व की पराकाष्ठा, आस्था, संघर्षशीलता और आत्मनिर्भरता का पावन प्रतीक है। उनके व्रत, तप, सेवा, त्याग, शिक्षा और समर्पण हर परिवार, समाज और संस्कृति को विद्युत् शक्ति देते हैं।
आधुनिक समय में माता सीता की शिक्षा, नारी अधिकार, सामाजिक संगठनों, महिला बहनों और परिवारों को प्रेरित करती रही है। उनका आदर्श-धैर्य, सम्मान, आत्मविश्वास-नवयुग के लिए दीपशिखा बना हुआ है।
माता सीता का जीवन एक गहन आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। उनके चरित्र, काव्य व उनकी आस्था की महिमा अविस्मरणीय है।
सत्य, धर्म, प्रेम और त्याग के पथ पर चलकर वे कालजयी आदर्श बन गईं। उनके पूजन, व्रत, कथा एवं आदर्श सबके जीवन में प्रकाश, शक्ति और शांति का स्त्रोत है। माता सीता के पावन जीवन, प्रेरक बलिदान तथा दिव्यता की ऋतु आज भी युगों-युगों तक गूंजती रहेगी।
प्रश्न 1. माता सीता का जन्म कहाँ और किस स्थिति में हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म मिथिला में राजा जनक के हल यज्ञ के समय भूमि की सीर (रेखा) से दिव्यता के साथ हुआ था।
प्रश्न 2. मिथिला के स्वयंवर की पूरी प्रक्रिया क्या थी?
उत्तर: भगवान शिव के धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले वीर को ही सीता वरण की शर्त थी; श्रीराम ने सहजता से धनुष तोड़ा और विवाह संपन्न हुआ।
प्रश्न 3. वनवास में माता सीता की दिनचर्या क्या थी?
उत्तर: वे पर्णकुटी में निवास करती, जलकंद-फल का सेवन करतीं, तप, पूजा-पाठ और सेवा कर कठिनाइयों को प्रसन्नता से निभाती थीं।
प्रश्न 4. अग्नि-परीक्षा का शास्त्रीय अभिप्राय क्या है?
उत्तर: यह नारी शक्ति, पवित्रता और सत्य के प्रति उनकी अडिग आस्था और दिव्यता का अलौकिक द्योतक है।
प्रश्न 5. माता सीता के प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थ कहाँ-कहाँ हैं?
उत्तर: बिहार, नेपाल, राजस्थान, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड में उनके नाम से प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
प्रश्न 6. सीता नवमी, विवाह उत्सव, वनवासोत्सव आदि पर्व कैसे मनाए जाते हैं?
उत्तर: व्रत, कथा पाठ, पूजा, आरती, विशेष भजन, नैवेद्य और स्थानीय लोक संस्कृति के आयोजन द्वारा बड़े भक्तिभाव से पर्व मनाए जाते हैं।
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