By अपर्णा पाटनी
राम-सीता विक्रांत विवाह पर्व: पौराणिक कथा, पूजा-विधि, आदर्श धर्म

हिंदू संस्कृति में विवाह पंचमी एक अत्यंत पवित्र और भव्य पर्व है, जो माता सीता और भगवान श्रीराम के दिव्य विवाह की वर्षगांठ के रूप में मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह उत्सव केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं बल्कि प्रेम, धर्म, समर्पण और जीवन के सर्वोत्तम आदर्शों का पूर्ण प्रतीक माना जाता है। भारत और नेपाल समेत पूरे विश्व में श्रद्धालुजन गहन श्रद्धा और उल्लास के साथ विवाह पंचमी का पर्व मनाते हैं।
विवाह पंचमी का आयोजन हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष (अगहन) शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। यह समय विवाह, मांगलिक कार्य के लिए अत्यंत शुभ एवं उत्तम माना गया है। पर्व के अनुष्ठान कुछ दिन पहले से ही आरंभ हो जाते हैं, जिसमें पारंपरिक मंगल गीत, मंडप सज्जा, स्वस्तिवाचन और पूजन-हवन शामिल होते हैं।
हर वर्ष प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र, तिथि और मुहूर्त का सूक्ष्म आकलन किया जाता है; 2024 में विवाह पंचमी 5 दिसंबर को पड़ी थी। भक्तजन प्रातःकाल में शुभ मुहूर्त चुनकर पूजन आरंभ करते हैं और जन्म, विवाह, प्रेम एवं दांपत्य सुख का संकल्प लेते हैं।
रामायण के अनुसार विवाह पंचमी वह ऐतिहासिक दिन है जब भगवान श्रीराम मिथिला नगरी में राजर्षि जनक की पुत्री सीता के स्वयंवर में पहुंचे। सीता के जन्म का मूल स्वयं भूमि की रेखा में हुआ था-वे पवित्रता और त्याग की साक्षात मूर्ति मानी जाती हैं।
स्वयंवर में श्रीराम ने भगवान शंकर के दिव्य धनुष को उठाकर उसे तोड़ डाला-यह शौर्य, विनम्रता और दिव्यता का संयोग था। सृष्टि में मंगल ध्वनि, पुष्पवर्षा और देवगणों का उल्लास हुआ। वरमाला के साथ माता सीता और श्रीराम का मिलन, आत्मा और परमात्मा की दिव्य संगति बन गई।
राम-सीता का विवाह केवल लौकिक मिलन नहीं, अपितु जीवात्मा व परमात्मा की एकता का दिव्य प्रतीक है। विवाह पंचमी व्रत, समर्पण, प्रेम, कर्तव्य और धर्मनिष्ठ जीवन का पथ प्रशस्त करती है।
अयोध्या, जनकपुर और भारत-नेपाल के राम-सीता मंदिरों में दीपमाला, पुष्प सज्जा, व झांकियों की भव्यता से यह पर्व मनाया जाता है। मंदिरों में राम-सीता प्रतिमाओं का अलंकरण, अखंड भजन व रामलीला का आयोजन, भक्तों के लिए आध्यात्मिक संपदा का अनुभव कराता है।
श्रद्धालु वैदिक मंत्रों के साथ राम-सीता की पूजा करते हैं; साथ ही भजन-कीर्तन, कथा-पाठ, अरदास और सामूहिक भोजन व दान का आयोजन होता है। रामलीला में स्वयंवर, धनुष-भंग और विवाह के दृश्य मंचित किए जाते हैं जो पूरे समुदाय को धर्म एवं प्रेम से जोड़ते हैं।
विवाह पंचमी की तिथि और माता सीता का जन्म पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से जुड़ा है, जो पोषण, शुभता और दिव्यता का द्योतक है। इस विवाह का समय सुख और वृद्धि के लिए आदर्श माना जाता है।
ग्रह-नक्षत्र, चंद्रपुष्य तथा सूर्योदय के समय के योग कर्म-धर्म, मृत्यु-अमृत और भक्ति-विश्राम के संदेश देते हैं। यह पर्व शुभ विवाह, प्रसन्नता और जीवन में शुभ ऊर्जा की स्थापना करता है।
विवाह पंचमी का सबसे भव्य आयोजन अयोध्या व जनकपुर (नेपाल) के श्रीराम-सीता मंदिरों, जनकपुरधाम और भारत-नेपाल के अन्य प्रमुख तीर्थों पर होता है। राम-सीता प्रतिमाओं का विशेष श्रृंगार, महाआरती, हवन, भजन-कीर्तन, व्रत, कथा-पाठ और भंडारा का आयोजन होता है।
समाज एवं परिवार में इस पर्व का उल्लास, समर्पण और सांस्कृतिक एकता का भाव प्रकट होता है।
विवाह पंचमी के विशाल उत्सव, धार्मिक विधि, कथा-पाठ, व आध्यात्मिक अनुष्ठान समाज में प्रेम, सत्य, धर्म और विश्वास का प्रवाह करते हैं। यह पर्व उस दिव्यता का प्रतीक है जिसमें राम-सीता के जीवन की शिक्षा, पूजा και साधना आज भी मानवता के लिए शाश्वत दीपशिखा है।
हर श्रद्धालु इस पर्व पर अपना आत्म-संकल्प, समर्पण और सुख-समृद्धि की कामना करता है, जिससे वह धर्म और प्रेम के पथ पर अग्रसर रह सके।
प्रश्न 1. विवाह पंचमी किस दिन मनाई जाती है?
उत्तर: मार्गशीर्ष (अगहन) शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को, अर्थात शुक्ल पंचमी को।
प्रश्न 2. विवाह पंचमी का विशेष धार्मिक महत्व क्या है?
उत्तर: यह माता सीता और श्रीराम के पावन विवाह की स्मृति है, जो प्रेम, धर्म और आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक है।
प्रश्न 3. इस दिन की प्रमुख पूजा-विधियां कौन-सी हैं?
उत्तर: श्रीराम-सीता पूजन, झांकी, भजन-कीर्तन, रामलीला, महाआरती, कथा-पाठ तथा सामूहिक भंडारा।
प्रश्न 4. विवाह पंचमी किन स्थलों पर खास मनाई जाती है?
उत्तर: अयोध्या, जनकपुर (नेपाल) तथा समस्त श्रीराम-सीता मंदिरों में विशेष रूप से।
प्रश्न 5. विवाह पंचमी के पीछे आध्यात्मिक संदेश क्या है?
उत्तर: आत्म-परमात्मा की एकता, धर्मपरायण जीवन, प्रेम और सत्य की विजय।
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