By पं. अभिषेक शर्मा
जानिए कैसे रोगानशेषानपहंसि मंत्र बदलता है स्वास्थ्य और भाग्य

सनातन परंपरा में आदि शक्ति भगवती दुर्गा की आराधना समस्त भौतिक और मानसिक संतापों से मुक्ति पाने का अचूक मार्ग मानी गई है। मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित श्री दुर्गा सप्तशती महाग्रंथ में एक ऐसा ही परम कल्याणकारी मंत्र निहित है जो स्वास्थ्य, शांति और पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इस मंत्र की साधना के लिए शास्त्रों में कुछ विशिष्ट नियम और विधियाँ निश्चित की गई हैं जिनका विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किया गया है।
| साधना का उत्तम समय | अनुशंसित दिशा | जप की संख्या | सहायक सामग्री | मुख्य आध्यात्मिक नियम |
|---|---|---|---|---|
| ब्रह्ममुहूर्त | पूर्व दिशा | प्रतिदिन 108 बार | रुद्राक्ष की माला | स्थान की शुद्धता और पूर्ण मानसिक एकाग्रता |
इस अनुष्ठान को नियमित रूप से संपन्न करने पर जातक के शरीर और मन के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आभामंडल निर्मित हो जाता है।
हिंदू धर्म में माता दुर्गा को परम योद्धा देवी के रूप में पूजा जाता है जो संपूर्ण ब्रह्मांड की सर्वोच्च स्त्री शक्ति अर्थात शक्ति का साक्षात् प्रतीक हैं। जब महिषासुर नामक पराक्रमी और इच्छाधारी भैंस रूपी राक्षस ने अपनी तामसिक शक्तियों से तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था तब देवताओं की प्रार्थना पर महाशक्ति का प्राकट्य हुआ। देवी ने अपने प्रचंड पराक्रम से उस दुष्ट राक्षस का वध करके ब्रह्मांड में धर्म और संतुलन की पुनर्स्थापना की। देवताओं और पीड़ित मानवता के प्रति अपनी मर्मज्ञ करुणा के कारण ही जगदम्बा को महिषासुरमर्दिनी के नाम से जाना गया। उनके इस ममतामयी और रक्षक स्वरूप की स्तुति में ही दुर्गा सप्तशती के मंत्रों की रचना की गई है जो आज भी साधकों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं।
श्री दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित यह श्लोक आरोग्य और आत्मिक बल प्राप्ति के लिए अमोघ माना गया है। वह पावन मंत्र इस प्रकार है।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
इस महामंत्र का गूढ़ दार्शनिक अर्थ अत्यंत गहरा है। हे भगवती, जब आप प्रसन्न होती हैं तो जगत के समस्त रोगों और दुखों का समूल नाश कर देती हैं परंतु जब आप रुष्ट होती हैं तो मनुष्य की समस्त इच्छाओं और कामनाओं को नष्ट कर देती हैं। जो शरणागत जीव आपकी शरण में आ जाते हैं उन पर कभी कोई विपत्ति या रोग नहीं आता है। आपकी शरण में गए हुए भक्त न केवल सुरक्षित होते हैं बल्कि वे स्वयं इस संसार में दूसरों को आश्रय देने में समर्थ हो जाते हैं। यह मंत्र साक्षात् आदि शक्ति के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण का मार्ग दर्शाता है।
इस महामंत्र का नियमित और विधिपूर्वक जप करने से जातक को बहुआयामी लाभ प्राप्त होते हैं जो उसके जीवन की दिशा को बदल देते हैं।
इस मंत्र की शक्ति को जाग्रत करने के लिए केवल यांत्रिक जप पर्याप्त नहीं है बल्कि अंतःकरण में अटूट विश्वास और निष्कपट भाव का होना अनिवार्य है।
इस मंत्र की आवृत्ति ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का माध्यम है इसलिए साधना के समय स्थान की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। शांत वातावरण में बैठकर जब रुद्राक्ष की माला से 108 बार इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है तो मन स्वतः ही समाधि की स्थिति में पहुँच जाता है। उगते हुए सूर्य की ऊर्जा से तालमेल बिठाने के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना ही शास्त्रों में सर्वोत्तम माना गया है।
संसार की समस्त औषधियां केवल शरीर को ठीक कर सकती हैं परंतु आत्मा और मन को निरोगी बनाने का सामर्थ्य केवल देवकृपा में ही होता है। दुर्गा सप्तशती का यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि जब चारों ओर अंधकार हो और कोई मार्ग दिखाई न दे तब महाशक्ति की शरण में जाना ही अंतिम और अचूक आश्रय है। श्रद्धापूर्वक किया गया यह लघु प्रयास भी पूरे परिवार के जीवन में सुख, समृद्धि और आरोग्यता का प्रकाश फैला सकता है।
रोगानशेषानपहंसि मंत्र का मुख्य लाभ क्या है
यह मंत्र मुख्य रूप से सभी प्रकार के शारीरिक रोगों, मानसिक चिंताओं और अज्ञात भयों को नष्ट करके पूर्ण आरोग्य और मानसिक शांति प्रदान करता है।
इस मंत्र का जप किस माला से करना चाहिए
इस महामंत्र का जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला को सबसे अधिक पवित्र और प्रभावी माना गया है क्योंकि यह एकाग्रता को बढ़ाती है।
क्या इस मंत्र का जप महिलाएं भी कर सकती हैं
हां माता दुर्गा स्वयं सर्वोच्च स्त्री शक्ति हैं इसलिए महिलाएं पूरी शुद्धता और श्रद्धा के साथ इस मंत्र का जप कर सकती हैं।
यदि ब्रह्ममुहूर्त में जप न हो पाए तो क्या अन्य समय पर कर सकते हैं
हां ब्रह्ममुहूर्त सर्वोत्तम है परंतु समय के अभाव में संध्याकाल या सुबह स्नान के पश्चात भी स्वच्छ स्थान पर बैठकर इसका जप किया जा सकता है।
इस मंत्र के प्रभाव से जीवन में क्या सामाजिक बदलाव आता है
यह मंत्र जातक को इतना सक्षम और ऊर्जावान बना देता है कि वह समाज में दूसरों की मदद करने और उन्हें आश्रय देने के योग्य बन जाता है।
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