योग में मंत्रों का महत्व और उनका वैज्ञानिक रहस्य

By अपर्णा पाटनी

जानिए कैसे योग साधना के साथ मंत्रों का संयोजन आपके जीवन को रूपांतरित करता है

योग में मंत्र योग का विज्ञान | मानसिक शांति और स्वास्थ्य

सनातन वैदिक परंपरा और अष्टांग योग विज्ञान में मंत्रों को मात्र कुछ शब्दों का समूह नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना को जगाने वाली परम दिव्य ध्वनियां स्वीकार किया गया है। आज के आधुनिक युग में जब योग को केवल शारीरिक आसनों, व्यायाम और स्ट्रेचिंग तक ही सीमित मान लिया गया है तब मंत्रों का यह प्राचीन विज्ञान हमें योग की वास्तविक गहराई से परिचित कराता है। 'मंत्र' शब्द दो मूल धातुओं से मिलकर बना है-'मन' अर्थात हमारा मस्तिष्क या विचार और 'त्र' अर्थात मुक्ति या संरक्षण देना। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि जो ध्वनि हमारे मन को विकारों, चिंताओं और भटकाव से मुक्ति प्रदान करे वही मंत्र है।

जब योग साधना के दौरान आसनों और प्राणायाम के साथ मंत्रों का वैज्ञानिक संयोजन किया जाता है तो यह अभ्यास केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं रहता बल्कि हमारे सूक्ष्म प्राणिक शरीर, चक्रों और अंतःकरण को पूरी तरह से रूपांतरित कर देता है। यह गाथा केवल शब्दों के उच्चारण की कहानी नहीं है बल्कि यह हमारे भीतर छिपी हुई उस वाक् शक्ति और नाद ब्रह्म का रहस्य है जो मनुष्य को सीधे उस परमेश्वर से जोड़ देती है।

योग में मंत्रों की ऐतिहासिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

मंत्र विज्ञान की जड़ें भारत के अति प्राचीन वेदों, उपनिषदों और महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में गहराई से समाहित हैं। वैदिक ऋषियों ने अपने गहरे ध्यान की अवस्था में ब्रह्मांड के शून्य से निकलने वाली जिन अनाहत ध्वनियों को सुना उन्हें ही मंत्रों के रूप में लिपिबद्ध किया। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के प्रथम पाद में स्पष्ट रूप से लिखा है कि उस ईश्वर का वाचक नाम 'प्रणव' अर्थात 'ॐ' है और उसका निरंतर जप करना ही योग की प्राप्ति का मार्ग है।

प्राचीन काल में योग की शुरुआत कभी भी बिना मंत्रोच्चार के नहीं होती थी क्योंकि मंत्र हमारे आस-पास के वातावरण को शुद्ध करते हैं और हमारे भीतर के तामसिक व राजसिक विकारों को नष्ट कर सात्विक ऊर्जा का संचार करते हैं। योग में मंत्रों का उपयोग केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही नहीं बल्कि मन को एकाग्र करने के लिए 'धारणा' और 'ध्यान' की एक अत्यंत शक्तिशाली विधा के रूप में प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है।

योग अभ्यास के दौरान प्रमुख मंत्रों का विस्मयकारी वर्गीकरण और उनका विज्ञान

योग साधना के विभिन्न चरणों में अलग-अलग मंत्रों का उपयोग किया जाता है जो हमारे शरीर और मस्तिष्क पर अलग-अलग प्रभाव डालते हैं। इन प्रमुख मंत्रों के अर्थ, उनके वैज्ञानिक प्रभाव और अभ्यास के सही तरीकों को निम्नलिखित विस्तृत तालिका के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है

प्रमुख दिव्य मंत्र मंत्र का मूल अर्थ और भाव चक्रों और शरीर पर वैज्ञानिक प्रभाव योग साधना में उपयोग का सही समय
ॐ (प्रणव मंत्र) ब्रह्मांड की आदि ध्वनि, संपूर्ण सृष्टि का मूल स्वरूप और परम सत्य। अजना (आज्ञा) और सहस्रार चक्र को जाग्रत करता है, मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है। योग अभ्यास के प्रारंभ और अंत में, ध्यान की अवस्था में प्रवेश के लिए।
गायत्री मंत्र हे परमेश्वर! हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, हमें प्रखर प्रकाश दें। हृदय और मस्तिष्क की नसों को शुद्ध करता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। सूर्य नमस्कार के अभ्यास के साथ अथवा प्रात: काल योग प्रारंभ करते समय।
महामृत्युंजय मंत्र हम त्रिनेत्रधारी शिव की पूजा करते हैं जो हमें मृत्यु के भय और बंधनों से मुक्त करें। शरीर के प्रत्येक ऊतक और कोशिका में हीलिंग ऊर्जा का संचार करता है, अकाल मृत्यु का भय मिटाता है। कठिन आसनों के अभ्यास के बाद, प्राणायाम के समय अथवा शांति पाठ के रूप में।
सो-हम (अजपा गायत्री) 'वह परमेश्वर ही मैं हूँ'-सांसों के आने-जाने की प्राकृतिक ध्वनि। अनाहत (हृदय) चक्र को संतुलित करता है, रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। प्राणायाम के दौरान प्रत्येक सांस के आने और जाने के साथ मूक मानसिक जप।

सोचिए उस ध्वनि विज्ञान की महिमा कैसी होगी जिसके केवल सही उच्चारण मात्र से हमारे शरीर की सोई हुई कुंडलिनी शक्ति और बंद पड़े ऊर्जा केंद्र स्वतः ही जाग्रत होने लगते हैं।

मंत्रों के उच्चारण का वैज्ञानिक और तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव

मंत्रों का प्रभाव कोई काल्पनिक या अंधविश्वास नहीं है बल्कि आधुनिक न्यूरोसाइंस और ध्वनि विज्ञान ने भी इसके पीछे छिपे रहस्यों को पूरी तरह से स्वीकार किया है। जब हम किसी संस्कृत मंत्र का सही ढंग से उच्चारण करते हैं तो हमारी जीभ तालू के विशेष एक्यूप्रेशर बिंदुओं को स्पर्श करती है जिससे हमारे मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस, पीनियल और पिट्यूटरी ग्रंथियां तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। इन ग्रंथियों के सक्रिय होने से शरीर में एंडोर्फिन, सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे 'हैप्पी हार्मोन्स' का स्राव तेजी से बढ़ने लगता है जो तनाव और अवसाद को एक ही पल में समाप्त कर देते हैं।

इसके साथ ही मंत्रों के उच्चारण से निकलने वाला नाद कंपन हमारी वेगस तंत्रिका (Vagus Nerve) को उत्तेजित करता है जो हमारे हृदय की गति, पाचन तंत्र और फेफड़ों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से संतुलित रखती है। योग के दौरान मंत्रों का कंपन शरीर के भीतर जमा हो चुके विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने में साक्षात डिटॉक्सिफिकेशन की भांति कार्य करता है जिससे साधक का शरीर अत्यंत हल्का और ऊर्जस्वित हो जाता है।

वैदिक ज्योतिष, ग्रहों की तरंगें और मंत्र योग का अटूट वैज्ञानिक संबंध

यदि हम योग में मंत्रों के इस अद्भुत उपयोग को वैदिक ज्योतिष के सिद्धांतों और नवग्रहों की रश्मियों के माध्यम से समझने का प्रयास करें तो इसके पीछे एक अत्यंत गूढ़ ब्रह्मांडीय संतुलन दिखाई देता है

  • बुध और बृहस्पति का वाक् शक्ति पर पूर्ण नियंत्रण: ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को हमारी वाणी, जीभ, तंत्रिका तंत्र और बुद्धि का मुख्य कारक माना गया है जबकि देवगुरु बृहस्पति को आकाश तत्व, ज्ञान और मंत्र शक्ति का अधिपति स्वीकार किया गया है। जब कोई साधक योग के दौरान शुद्ध संस्कृत मंत्रों का उच्चारण करता है तो उसकी कुंडली का बुध और बृहस्पति पूरी तरह से बलवान और शुभ फल देने वाला बन जाता है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य की निर्णय क्षमता तीव्र होती है और उसकी वाणी में एक ऐसा आकर्षण आ जाता है जो किसी को भी प्रभावित कर सकता है।
  • सूर्य नमस्कार और सूर्य के मंत्रों का कर्मिक संतुलन: सूर्य नमस्कार के प्रत्येक आसन के साथ सूर्य के बारह विशेष मंत्रों (जैसे ॐ मित्राय नमः, ॐ रवये नमः) का जप करना सीधे तौर पर जातक की कुंडली में सूर्य को उच्च का फल देने के लिए प्रेरित करता है। सूर्य का मजबूत होना व्यक्ति को समाज में उच्च पद, मान-सम्मान, हड्डियों की सुदृढ़ता और अदम्य आत्मविश्वास प्रदान करता है।
  • राहु-केतु के मानसिक विक्षेप और भ्रम का समूल नाश: राहु और केतु को ज्योतिष में मानसिक भ्रम, चंचलता, एकाग्रता की कमी और विचारों के भटकाव का मुख्य कारण माना गया है। योग साधना के दौरान किया जाने वाला महामंत्रों का मानसिक जप राहु के इस मायाजाल को तुरंत छिन्न-भिन्न कर देता है और साधक के चित्त को पूरी तरह से एकाग्र कर देता है जिससे ध्यान लगाना अत्यंत सहज हो जाता है।

आधुनिक जीवन में मंत्र योग के अभ्यास का सही विज्ञान और नियम

आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में यदि आप योग के साथ मंत्रों का पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो इसके अभ्यास के कुछ कड़े नियमों और विज्ञान को समझना अत्यंत आवश्यक है। मंत्रों के जप की तीन मुख्य विधियां प्राचीन शास्त्रों में बताई गई हैं। प्रथम है 'वैखरी' अर्थात ऊंचे स्वर में मंत्र का उच्चारण करना जो हमारे आस-पास के भौतिक वातावरण और स्थूल शरीर को शुद्ध करता है। द्वितीय है 'उपांशु' अर्थात केवल होठों को हिलाकर अत्यंत मंद स्वर में जप करना जो हमारी प्राण ऊर्जा को संतुलित करता है।

तृतीय और सबसे शक्तिशाली विधा है 'मानसिक जप' अर्थात बिना होठों और जीभ को हिलाए केवल अपने मन के भीतर ही मंत्र को गूंजने देना। यह मानसिक जप सीधे हमारे अवचेतन मन की गहराइयों में उतर जाता है और पुराने से पुराने मानसिक विकारों को जड़ से उखाड़ फेंकता है। योग अभ्यास के दौरान सांसों की गति के साथ मंत्र को जोड़ना सबसे उत्तम माना जाता है। जैसे पूरक (सांस भरते समय) और रेचक (सांस छोड़ते समय) मंत्र का मन ही मन विचार करना ध्यान की उच्चतम अवस्था की ओर ले जाता है।

अंतःकरण की परम शांति: एक साधक के अंतर्मन का मर्मस्पर्शी अनुभव

इस संपूर्ण वैज्ञानिक, ज्योतिषीय और क्रियात्मक विश्लेषण के उपरांत एक ऐसा मर्मस्पर्शी सत्य सामने आता है जिसे केवल वही साधक महसूस कर सकता है जिसने कभी भोर के सन्नाटे में चटाई पर बैठकर, अपनी आंखें बंद कर, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर 'ॐ' की लंबी ध्वनि का उच्चारण किया हो। वह ध्वनि केवल एक शब्द नहीं होती बल्कि उस क्षण ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारे भीतर की सारी व्याकुलता, संसार की सारी दौड़भाग और मन का सारा कोलाहल उस एक गूंज में पूरी तरह से विलीन हो चुका है।

मंत्र योग हमें यह सिखाता है कि इस संसार में हम जो कुछ भी बाहर ढूंढ रहे हैं-चाहे वह शांति हो, प्रेम हो या आनंद हो-वह सब हमारे भीतर ही शब्द और नाद के रूप में पहले से ही मौजूद है। जब कोई साधक पूरी तरह से टूटकर, मानसिक रूप से थककर योग की शरण में आता है और मंत्रों के इस दिव्य विज्ञान को आत्मसात कर लेता है तो उसकी आत्मा का सीधा संबंध उस परम पिता परमेश्वर से हो जाता है। मंत्रों की यह पावन गूंज सदियों से मानवता को यह मूक आश्वासन दे रही है कि तुम बाहर के कोलाहल से चाहे जितने भी विचलित हो, अपने भीतर के इस दिव्य नाद को सुनो, यहाँ तुम्हें वह परम शांति और मोक्ष मिलेगा जिसे संसार की कोई भी भौतिक वस्तु तुम्हें कभी नहीं दे सकती।

FAQ

योग साधना में मंत्रों का उपयोग क्यों आवश्यक माना गया है
योग साधना में मंत्रों का उपयोग मन की चंचलता को रोकने, एकाग्रता बढ़ाने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए आवश्यक है। यह शारीरिक आसनों के प्रभाव को मानसिक और आध्यात्मिक स्तर तक ले जाता है जिससे संपूर्ण शरीर ऊर्जस्वित होता है।

क्या मंत्रों के उच्चारण का हमारे तंत्रिका तंत्र पर कोई वैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है
हां बिल्कुल। मंत्रों के सही उच्चारण से निकलने वाला नाद कंपन हमारी वेगस तंत्रिका को उत्तेजित करता है और मस्तिष्क की पीनियल व पिट्यूटरी ग्रंथियों को सक्रिय करता है जिससे एंडोर्फिन जैसे हैप्पी हार्मोन्स का स्राव बढ़ता है और तनाव दूर होता है।

सूर्य नमस्कार के साथ सूर्य मंत्रों का जप करने का क्या ज्योतिषीय महत्व है
सूर्य नमस्कार के साथ सूर्य के बारह मंत्रों का जप करने से कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होता है। इसके प्रभाव से जातक को अदम्य आत्मविश्वास, समाज में उच्च मान-सम्मान, प्रखर तेज और शारीरिक आरोग्यता की प्राप्ति होती है।

मंत्र जप की कौन सी विधि सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली मानी गई है
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार 'मानसिक जप' (बिना आवाज और होठों को हिलाए मन के भीतर जप करना) सबसे अधिक शक्तिशाली माना गया है क्योंकि यह सीधे हमारे अवचेतन मन को प्रभावित करता है और पुराने मानसिक विकारों को दूर करता है।

क्या बिना दीक्षा के भी योग के दौरान सामान्य मंत्रों का जप किया जा सकता है
हां योग साधना के दौरान सार्वभौमिक मंत्रों जैसे 'ॐ', गायत्री मंत्र, या 'सो-हम' का जप कोई भी व्यक्ति बिना किसी विशेष दीक्षा के पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ कर सकता है। ये मंत्र सभी के लिए समान रूप से कल्याणकारी हैं।

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