By अपर्णा पाटनी
अश्विन में नवरात्रि, विजयादशमी और पितृपक्ष के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ

हिंदू पंचांग में आश्विन मास को अत्यंत विशेष और शुभ महीना माना जाता है। यह चातुर्मास का तीसरा चरण है और सामान्यतः सितंबर और अक्टूबर के बीच आता है। सूर्य दक्षिणायन में होता है, आकाश साफ रहता है, कमल और अन्य शरद ऋतु के पुष्प खिलने लगते हैं और वातावरण में एक अलग प्रकार की शांति तथा उत्सवमय ऊर्जा अनुभव की जाती है।
आश्विन मास को कई नामों से जाना जाता है। कहीं इसे आश्विन, कहीं आश्वयुज या अश्वयुजा कहा जाता है। यह वही महीना है जो शारदीय नवरात्र, विजयदशमी, शरद पूर्णिमा और पितृपक्ष के समापन जैसे अनेक महत्वपूर्ण उत्सवों और व्रतों से भरा रहता है। चंद्रमास की दृष्टि से आश्विन मास अक्सर शरद विषुव के बाद अमावस्या से आरम्भ माना जाता है और देवी पूजा तथा पितृ तर्पण दोनों का संतुलित संगम इसी महीने में दिखाई देता है।
आश्विन शब्द का संबंध आकाश में दिखने वाले अश्विनी नक्षत्र से जोड़ा जाता है। हिंदू चंद्रसौर पंचांग में अश्विनी उन सत्ताईस नक्षत्रों में से पहला नक्षत्र माना जाता है जो संध्या समय आकाश में पहले दिखाई देता है।
अश्विनी नक्षत्र के देवता अश्विनीकुमार माने जाते हैं। इन्हें दिव्य जुड़वाँ देवता, दृष्टि देने वाले और आयुर्वेदिक औषधि तथा चिकित्सा के देव रूप में भी समझा जाता है। अश्विनी नक्षत्र को सूर्योदय और सूर्यास्त की आभा, तेज, स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा का भी प्रतीक माना गया है। आश्विन मास का नाम और भाव इसी दिव्य तेज, चिकित्सा और अशुभता को दूर करने वाली ऊर्जा से जुड़ता है।
कई परंपराओं में आश्विन के एक रूप को योद्धा, साहसी रक्षक और धर्म का प्रहरी भी माना गया है जो संकट की घड़ी में रक्षा करने की प्रेरणा देता है।
आश्विन मास को हिंदू धर्म में इसलिए भी प्रमुख स्थान दिया गया है क्योंकि माना जाता है कि इस समय पितरों की कृपा और देवताओं का आशीर्वाद एक साथ साधक के जीवन को स्पर्श करता है।
भक्ति, पितृ तर्पण और देवी आराधना का यह संगम आश्विन मास को वर्ष के सबसे संतुलित और फलप्रद महीनों में शामिल कर देता है।
आश्विन मास की शुरुआत प्रायः पितृपक्ष से मानी जाती है। यह वह काल है जब हिंदू परिवार अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन इस काल की अंतिम अमावस्या मानी जाती है। इसे सर्वपितृ अमावस्या, महालय अमावस्या या सरवपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।
इस दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है जिनकी तिथि निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है या जिनके लिए अलग से श्राद्ध न हो पाया हो। इसे समस्त पितृगण के लिए विशेष कृतज्ञता का दिवस माना गया है।
आश्विन मास को पहचानने का सबसे सरल तरीका यह है कि यदि कैलेंडर में शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजन और दशहरा एक साथ दिख रहे हों तो वह चंद्रमास प्रायः आश्विन ही होता है।
इंदिरा एकादशी
यह एकादशी चौबीस एकादशी व्रतों में से एक मानी जाती है। इसे पितृपक्ष की एकादशी भी कहा जाता है। श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और पितरों की शांति की भी प्रार्थना करते हैं।
जीवितपुत्रिका व्रत
इसे प्रायः जीतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माताएँ अपने बच्चों की दीर्घायु और कुशलता के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। रात दिन बिना जल ग्रहण किए यह व्रत करना अत्यंत कठोर माना गया है, पर इसकी आस्था बहुत गहरी होती है।
शारदीय नवरात्र
आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला यह नवरात्र सभी नवरात्रों में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इसे महा नवरात्र भी कहा जाता है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा, व्रत, कीर्तन, हवन और ध्यान के माध्यम से साधक अपने भीतर की नकारात्मकता से संघर्ष करता और शक्ति प्राप्त करता है।
सरस्वती आवाहन
नवरात्र के मध्य भाग में एक विशेष दिन सरस्वती आवाहन का होता है। आवाहन का अर्थ है आमंत्रण और आविर्भाव। इस दिन मां सरस्वती का विधिवत आवाहन करके ज्ञान, वाणी और कला की सिद्धि का प्रार्थनापूर्वक आरम्भ होता है।
सरस्वती पूजा
इसके बाद आने वाले दिन को सरस्वती प्रधान पूजा का दिन माना जाता है। छात्र, कलाकार, लेखक और विद्वान अपनी पुस्तकें, वाद्य और उपकरण मां सरस्वती के चरणों में रखकर आशीर्वाद की कामना करते हैं।
दुर्गाष्टमी
आश्विन शुक्ल अष्टमी का दिन दुर्गाष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है। इसे महाष्टमी भी कहा जाता है। इस दिन देवी के उग्र और रक्षक रूप की पूजा होती है, बलि या प्रतीकात्मक नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं और कई स्थानों पर कन्या पूजन भी इसी के आसपास किया जाता है।
महानवमी
नवरात्र के नौवें दिन को महानवमी कहा जाता है। यह दुर्गा पूजा के समापन की ओर अग्रसर सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। कई परंपराओं में संधि पूजा के बाद होने वाला मुख्य नवमी पूजन यहीं सम्पन्न होता है।
विजयादशमी या दशहरा
नवरात्र और दुर्गा पूजन की पूरे नौ दिन की साधना के बाद आश्विन की शुक्ल दशमी को विजयादशमी, दशहरा या दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय का स्मरण किया जाता है। यह तिथि अच्छे की बुराई पर विजय का प्रतीक मानी जाती है।
पापांकुशा एकादशी
यह एकादशी भी उन चौबीस एकादशी में से एक है जो वर्ष भर में आती हैं। आश्विन मास की इस एकादशी को पापों को नष्ट करने वाली एकादशी के रूप में समझा जाता है। इस दिन विष्णु भक्ति, उपवास और दान के माध्यम से साधक अपने भीतर के दोषों को घटाने का संकल्प लेता है।
शरद पूर्णिमा
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। भक्तों की मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं सहित पूर्ण तेज के साथ आकाश में उदित होता है। कई लोग इस रात खीर या अन्य सात्त्विक भोजन को चंद्रमा की चांदनी में रखकर प्रातः सेवन करते हैं और इसे आरोग्य तथा शीतलता देने वाला मानते हैं।
ललिता पंचमी
नवरात्र के दौरान आने वाली यह पंचमी ललिता पंचमी के नाम से जानी जाती है। यह देवी ललिता त्रिपुरा सुंदरी की उपासना का दिन माना जाता है जिसे कई स्थानों पर उपांग ललिता व्रत के रूप में भी मनाया जाता है।
कोजागरा पूजा
शरद पूर्णिमा की रात कई प्रदेशों में कोजागरी पूजा या कोजागरा लक्ष्मी पूजन के नाम से मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से महालक्ष्मी की आराधना के लिए माना जाता है। बंगाल सहित कई क्षेत्रों में इसे बंगाल लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| मास का नाम | आश्विन, आश्वयुज, अश्वयुजा |
| नक्षत्र से संबंध | अश्विनी नक्षत्र, प्रथम नक्षत्र, अश्विनीकुमार देवता |
| ऋतु और वातावरण | शरद ऋतु, साफ आकाश, कमल और शरद पुष्पों का समय |
| पंचांग में स्थान | चातुर्मास का तीसरा मास |
| पितृ संबंधी कर्म | पितृपक्ष, इंदिरा एकादशी, सर्वपितृ अमावस्या |
| देवी उपासना | शारदीय नवरात्र, दुर्गाष्टमी, महानवमी, विजयादशमी |
| विष्णु भक्ति | इंदिरा और पापांकुशा एकादशी व्रत |
| ज्ञान और कला की साधना | सरस्वती आवाहन, सरस्वती पूजा |
| विशेष पूर्णिमा | शरद पूर्णिमा, कोजागरा लक्ष्मी पूजा |
| मुख्य भाव | पितृ तृप्ति, देवी भक्ति, पाप क्षालन, आरोग्य और शांति |
आश्विन मास अपने भीतर तीन धाराएँ समेटे रहता है। एक ओर पितृपक्ष द्वारा पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, दूसरी ओर नवरात्र और दुर्गा पूजन द्वारा शक्ति साधना और तीसरी ओर शरद पूर्णिमा तथा लक्ष्मी पूजा के माध्यम से शांति और समृद्धि की कामना।
यह महीना सिखाता है कि जब पितृ, देवता और देवी, तीनों के प्रति श्रद्धा का संतुलन बने तो जीवन में स्थिरता, साहस और प्रसन्नता साथ साथ बढ़ते हैं। जो व्यक्ति आश्विन मास में अपनी सामर्थ्य के अनुसार पितृ श्राद्ध, नवरात्र व्रत, सत्य और संयम, दान और साधना को स्थान देता है, उसके लिए यह समय केवल उत्सव नहीं बल्कि आंतरिक रूप से प्रकाशमान होने का अवसर बन जाता है।
आश्विन मास का नाम अश्विनी नक्षत्र से कैसे जुड़ता है?
अश्विनी नक्षत्र सत्ताईस नक्षत्रों में प्रथम माना जाता है और संध्या समय सबसे पहले दिखाई देता है। इसके देवता अश्विनीकुमार आरोग्य और तेज के प्रतीक हैं। इसी नक्षत्र से जुड़े तेज और चिकित्सा भाव के कारण इस मास को आश्विन कहा गया।
पितृपक्ष और सर्वपितृ अमावस्या आश्विन में ही क्यों मानी जाती है?
आश्विन मास की कृष्ण पक्ष अवधि को पितृपक्ष कहा जाता है। इसी दौरान मानी गई परंपरा के अनुसार पितृ पृथ्वी पर अपने वंशजों के श्राद्ध को स्वीकार करने आते हैं। अंतिम अमावस्या सर्वपितृ अमावस्या के रूप में सभी पितरों के लिए समर्पित की जाती है।
शारदीय नवरात्र को महा नवरात्र क्यों कहा जाता है?
आश्विन शुक्ल पक्ष में आने वाला नवरात्र पूरे वर्ष के नवरात्रों में सबसे व्यापक रूप से मनाया जाता है। इस समय माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा, हवन, जप और व्रत के कारण इसे महा नवरात्र कहा गया और शक्ति साधना का सर्वोत्तम काल माना गया।
शरद पूर्णिमा की रात को विशेष क्यों माना जाता है?
भक्तों की मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं सहित पूर्ण तेज से प्रकाशित होता है। इस रात चांदनी में रखी खीर या अन्य सात्त्विक भोजन को आरोग्यदायक और मन को शीतल करने वाला माना गया है।
कोजागरा लक्ष्मी पूजन का आश्विन मास से क्या संबंध है?
शरद पूर्णिमा की रात कई स्थानों पर कोजागरा या कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाई जाती है। इस दिन महालक्ष्मी की आराधना, दीप और भोग के माध्यम से घर और जीवन में समृद्धि, संतोष और सौभाग्य की कामना की जाती है, जो आश्विन मास के शांत और उज्ज्वल स्वरूप से गहराई से जुड़ी है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, मुहूर्त
इनके क्लाइंट: म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें