By अपर्णा पाटनी
हिंदू महीनों के नाम चंद्र और नक्षत्रों से जुड़े हैं

अक्सर जब हिंदू कैलेंडर के महीनों के नाम सुने जाते हैं तो मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ या आषाढ़ जैसे नाम आखिर आए कहां से। सामान्य बातचीत में लोग केवल यह जानते हैं कि बारह हिंदू महीने होते हैं, लेकिन उनके नामों के पीछे छिपा खगोलिक और वैदिक आधार अधिकतर लोगों को ज्ञात नहीं होता। वास्तव में हिंदू मास और नक्षत्रों के बीच बहुत गहरा संबंध है और मास की अवधारणा का मूल केंद्र चंद्रमा को ही माना गया है।
संस्कृत में मास शब्द का एक अर्थ ही चंद्र बताया गया है। यही शब्द परिवर्तित होकर माह बना है। चंद्रवाचक शब्द मास में प्रयुक्त स धीरे धीरे ह में परिवर्तित होकर माह बन गया। वैदिक मन्त्रों में चंद्रमा को ही मासों का निर्माता कहा गया है, क्योंकि मास का ज्ञान उसी की गति और कलाओं से होता है। इसीलिए जब हिंदू मासों की बात होती है तो मूल संदर्भ चांद्र मास का ही माना जाता है।
धार्मिक और खगोलिक दृष्टि से मासों के कई प्रकार समझाए गए हैं। प्रमुख रूप से मास इस प्रकार बताए जाते हैं।
व्यवहार में जो प्रणाली सर्वाधिक प्रचलित है वह चंद्र मास की ही मानी जाती है। इसलिए जब सामान्य रूप से मास शब्द बोला जाता है तो उससे चंद्र मास ही समझा जाता है।
चंद्र मास का आधार चंद्रमा की पूर्णिमा की अवस्था मानी गई है। यह सिद्धांत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि जिस दिन पूर्णिमा के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र पर स्थित होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम रखा जाता है।
अमरकोष का प्रसिद्ध श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है।
पुष्ययुक्ता पौर्णमासी पौषी मासे तु यत्र सा।
नाम्ना स पौषो माघाद्याश्चैवमेकादशापरे।
अर्थ यह है कि जिस पूर्णिमा के दिन आकाश में पुष्य नक्षत्र रहता है उस पूर्णिमा को पौर्णमासी पौषी कहते हैं और जिस मास में ऐसी पूर्णिमा आती है उसे पौष मास कहा जाता है। ठीक इसी प्रकार अन्य ग्यारह मासों के नाम भी संबंधित नक्षत्रों के आधार पर ही रखे गए हैं।
पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी के अनुसार नीचे बताए गए मासों के नाम बने हैं।
इस प्रकार देखा जाए तो हर चंद्र मास का नाम सीधे सीधे एक विशेष नक्षत्र से जुड़ा हुआ है और यह संबंध पूर्णिमा के दिन की स्थिति से तय होता है।
एक मास में चंद्रमा की दो स्पष्ट अवस्थाएँ मानी जाती हैं जिन्हें पक्ष कहा गया है।
शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक अथवा कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की अवधि को ही एक चंद्र मास कहा गया है। परंपरा में मास गिनने की दो शैली प्रचलित हैं।
उत्तर भारत में अधिकतर पूर्णिमांत मास की परंपरा प्रचलित है जबकि दक्षिण भारत में अमान्त मास का उपयोग अधिक होता है। पूर्णिमांत मास में मास का अंत पूर्णिमा के दिन माना जाता है और अमांत मास में अमावस्या को।
पुराने समय में महीनों की गणना मुख्य रूप से पूर्णिमांत पद्धति के अनुसार होती थी। इसका अर्थ यह हुआ कि मास का अंत पूर्णिमा पर माना जाता था।
उदाहरण के लिए होलिका दहन की तिथि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मानी जाती है। उसी दिन फाल्गुन महीना समाप्त होता है और अगली प्रतिपदा के साथ चैत्र मास शुरू माना जाता है। ऐसे बारह मास मिलकर लगभग 354 दिन का एक चंद्र वर्ष बनाते हैं।
ऋतु विभाजन के अनुसार एक वर्ष में छः ऋतुएँ मानी जाती हैं और हर ऋतु में दो मास आते हैं। प्रारम्भिक परंपरा में ऋतुएँ तीन मानी जाती थीं।
बाद में इन्हीं तीन ऋतुओं के दो दो भाग मानकर छः ऋतुओं की विस्तृत व्यवस्था बनाई गई।
इस प्रकार चंद्र मास, नक्षत्र और ऋतु तीनों के बीच समन्वय स्थापित किया गया।
वैदिक परंपरा में चंद्र मासों के साथ साथ उनके वैदिक नाम भी बताए गए हैं। ये नाम इस प्रकार हैं।
इन वैदिक नामों का संबंध भी ऋतुओं से जोड़ा गया है और प्रत्येक ऋतु के अंतर्गत दो दो मास रखे गए हैं।
हर ऋतु का अर्थ वहाँ शामिल मासों के अर्थ से मिलता जुलता है। जब ऋतुओं के वैदिक अर्थ समझ में आते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वसंत का संबंध मधु मास से, ग्रीष्म का संबंध शुक्र से, वर्षा का संबंध नभस् से, शरद का संबंध इष से, हेमंत का संबंध सहस् से और शिशिर का संबंध तपस् से कितना गहरा है।
| आधार | क्या दर्शाता है | विशेषता |
|---|---|---|
| मास शब्द | चंद्र से संबंधित समय इकाई | चंद्र की कलाओं से अवधि का ज्ञान |
| चंद्र मास | पूर्णिमा या अमावस्या से जुड़ी अवधि | लगभग 29 से 30 दिन के बीच |
| नक्षत्र | चंद्रमा के ठहरने का तारामंडल | मास का नाम उसी नक्षत्र पर आधारित |
| अमान्त मास | अमावस्या पर समाप्त होने वाला मास | दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित |
| पूर्णिमांत मास | पूर्णिमा पर समाप्त होने वाला मास | उत्तर भारत में अधिक प्रचलित |
| वैदिक मास नाम | मधु से तपस्य तक बारह नाम | ऋतुओं के साथ सीधा अर्थपूर्ण संबंध |
हिंदू पंचांग को केवल त्योहारों की सूची मानकर देखने से उसका पूरा स्वरूप सामने नहीं आता। जब यह समझ में आता है कि महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं और वैदिक नाम ऋतुओं की प्रकृति से जुड़े हैं तब समय की धारणा अधिक गहरी और अर्थपूर्ण लगने लगती है।
जो व्यक्ति चंद्र मास, पक्ष, नक्षत्र और ऋतु के इस संबंध को समझ लेता है वह त्योहारों की तिथियाँ, व्रत और अनुष्ठान किस मौसम और किस खगोलीय स्थिति में हो रहे हैं यह अधिक स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता है। इसी समझ से जीवन की दिनचर्या, साधना और उत्सव सब प्रकृति के साथ अधिक सहज रूप से जुड़ जाते हैं।
मास शब्द का मुख्य अर्थ क्या माना गया है?
मास शब्द का संबंध सीधे चंद्र से बताया गया है और माह शब्द इसी चंद्रवाचक मास से बना है इसलिए हिंदू पंचांग में मास की बात हो तो मूल संदर्भ चांद्र मास ही माना जाता है।
चंद्र मासों के नामकरण का आधार क्या है?
चंद्र मासों के नाम उस नक्षत्र के आधार पर रखे गए हैं जिसमें पूर्णिमा के दिन चंद्रमा स्थित होता है। जैसे पुष्य नक्षत्र वाली पूर्णिमा वाले मास को पौष कहा जाता है।
अमान्त और पूर्णिमांत मास में क्या अंतर है?
जिस मास का अंत अमावस्या पर माना जाए वह अमान्त मास कहलाता है जबकि जो मास पूर्णिमा के दिन समाप्त हो उसे पूर्णिमांत मास कहा जाता है। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण भारत में अमान्त पद्धति अधिक प्रचलित है।
चंद्र वर्ष में कुल कितने दिन होते हैं?
बारह चंद्र मासों से मिलकर लगभग 354 दिन का एक चंद्र वर्ष बनता है क्योंकि हर मास की अवधि लगभग 29 से 30 दिनों के बीच रहती है।
वैदिक मास नामों और ऋतुओं के बीच क्या संबंध है?
वैदिक नाम जैसे मधु, माधव, शुक्र, शुचि आदि सीधे ऋतुओं से जुड़े हैं। प्रत्येक ऋतु में दो वैदिक मास रखे गए हैं जिससे स्पष्ट होता है कि ऋतु का स्वभाव और उस माह का अर्थ आपस में मेल खाते हैं।
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