By पं. सुव्रत शर्मा
चतुर्मास के दौरान भाद्रपद में उपवास, पूजा और धार्मिक अनुशासन का महत्व

सावन के समाप्त होते ही हिंदू पंचांग में भाद्रपद मास या भादो महीना शुरू हो जाता है। यह हिंदू वर्ष का छठा मास और चातुर्मास का दूसरा चरण माना जाता है, इसलिए भाद्रपद का ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इस समय वर्षा ऋतु अपने चरम पर रहती है, मौसम अस्थिर होता है और इसी के साथ भक्ति, व्रत और संयम की परंपराएँ भी गहरी होती जाती हैं।
भाद्रपद मास को देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे भाद्रपद, कहीं भाद्र, कहीं भादवा और कई स्थानों पर भादो कहा जाता है। नाम भले बदल जाए, पर भाव यही रहता है कि यह महीना भगवान श्रीकृष्ण की कृपा, गणेश जी के आगमन और अनेक व्रत त्योहारों के कारण अत्यंत शुभ और जागृति देने वाला समय है।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद मास वर्ष का छठा महीना है। यह सीधे श्रावण के बाद आता है और चातुर्मास के दूसरे चरण की शुरुआत करता है। ज्यादातर वर्षों में यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के अगस्त और सितंबर के बीच पड़ता है।
चातुर्मास का क्रम इस प्रकार रहता है।
भाद्रपद जैसे जैसे आरम्भ होता है, सावन के सोमवार व्रत और श्रावण की साधना आगे बढ़कर कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और हरितालिका तीज जैसे पर्वों से जुड़ जाती है। इस कारण भाद्रपद मास को चातुर्मास का उत्सवी और साथ ही संयमपूर्ण चरण कहा जाता है।
भादो मास के महत्व के पीछे कई गहरी मान्यताएँ जुड़ी हैं। धार्मिक दृष्टि से यह महीना इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी मास में अनेक महत्वपूर्ण देवी देवताओं के उत्सव मनाए जाते हैं।
मुख्य मान्यताएँ इस प्रकार समझी जा सकती हैं।
इसलिए भाद्रपद मास को केवल कैलेंडर का एक महीना नहीं बल्कि श्रीकृष्ण भक्ति, गणेश आराधना, स्त्री व्रत साधना और ऋषियों के स्मरण का संयुक्त समय माना गया है।
भादो मास व्रत और उत्सवों से भरपूर होता है। इन पर्वों के माध्यम से ही भाद्रपद का महत्व व्यवहार में उतरता है।
भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
इस दिन श्रीकृष्ण के अवतरण की स्मृति में रात भर कीर्तन, झाँकी, व्रत और जन्माभिषेक किया जाता है।
गणेश चतुर्थी
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की स्थापना और पूजा पूरे उत्साह से की जाती है। कई स्थानों पर दस दिन तक चलने वाले अनुष्ठान भी इसी से शुरू होते हैं।
हरितालिका तीज
यह स्त्रियों का अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जहाँ सौभाग्य, पति की दीर्घायु और गृहस्थ जीवन की सुख शांति के लिए उपवास और पूजा की जाती है।
अनंत चतुर्दशी
भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना, अनंत सूत्र धारण और संकल्प का दिन। कई स्थानों पर इसी दिन गणेश विसर्जन भी होता है।
डोल ग्यारस
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की झूले पर शोभा यात्रा, डोल उत्सव और भजन कीर्तन का विशेष आयोजन होता है।
ऋषि पंचमी
ऋषियों के प्रति कृतज्ञता का पर्व, जहाँ विशेष रूप से स्त्रियाँ यह व्रत करके अपने कर्तव्यों की शुद्धि का संकल्प लेती हैं।
इन सबके बीच भाद्रपद मास लगातार साधक को यह याद दिलाता है कि व्रत, उत्सव और भक्ति साथ साथ चलकर जीवन को संतुलन देते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में भाद्रपद मास के लिए कुछ विशेष सावधानियाँ बताई गई हैं। इनका उद्देश्य केवल भय पैदा करना नहीं बल्कि स्वास्थ्य, संयम और आध्यात्मिक एकाग्रता की रक्षा करना है।
भादो महीने में सामान्यतः इन कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।
भोजन से जुड़े कुछ निषेध भी बताए गए हैं।
इन नियमों का उद्देश्य यह है कि भाद्रपद मास में शरीर को भारी और तामसिक भोजन से बचाकर व्रत और भक्ति के अनुकूल सात्त्विक परिस्थिति बनाई जाए।
जहाँ कुछ कामों से बचने की सलाह दी गई है, वहीं भादो मास में कई शुभ कार्य विशेष रूप से करने के लिए प्रेरित भी किया गया है।
धर्मशास्त्रों और आचार्यों की मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास में ये काम निःसंकोच किए जा सकते हैं।
भाद्रपद मास की एक मान्यता यह भी है कि इस महीने में भक्ति से की गई प्रार्थना को भगवान श्रीकृष्ण विशेष रूप से सुनते हैं और उचित समय पर उसके अनुरूप मार्ग भी दिखाते हैं।
भोजन में इन बातों का ध्यान रखना शुभ माना गया है।
यदि कोई घर पर ही स्नान कर रहा हो तो सामान्य जल में गोमूत्र की कुछ बूंदें मिलाकर स्नान करने की भी मान्यता बताई गई है। यह प्रतीक रूप में पाप और दोषों की धुलाई का संकेत माना जाता है।
| पक्ष | भाद्रपद मास में क्या न करें | भाद्रपद मास में क्या करें |
|---|---|---|
| मांगलिक कार्य | विवाह, गृह प्रवेश जैसे बड़े शुभ कार्य आरम्भ न करें | पूजा पाठ, व्रत, दान और तीर्थ स्नान करें |
| भोजन संबंधी नियम | दही, गुड़, मांसाहार, लहसुन, प्याज, मछली से बचें | शुद्ध शाकाहारी भोजन, दूध, घी और माखन का सेवन |
| विशेष दिन की सावधानियाँ | भादो के रविवार को बाल न कटवाएँ, नमक न खाएँ | रविवार को साधारण और सात्त्विक भोजन रखें |
| जीवन शैली | तामसिकता, आलस्य और क्रोध से बचें | संयम, सेवा और सत्संग में समय दें |
| स्नान और शुद्धि | लापरवाह स्वच्छता न रखें | नदियों में स्नान या घर पर जल में गोमूत्र मिलाकर स्नान |
| देव पूजन | पूजा की उपेक्षा न करें | श्रीकृष्ण, गणेश और विष्णु की नियमित आराधना करें |
भाद्रपद मास एक तरफ जहाँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी जैसे उत्सवों से जीवन में हर्ष और उत्साह लाता है, वहीं दूसरी ओर यह संयम, सात्त्विक आहार और सेवा के माध्यम से साधक को भीतर से हल्का और सजग भी बनाता है।
यह महीना सिखाता है कि अस्थिर मौसम, वर्षा और प्रकृति के बदलाव के बीच यदि आहार, व्यवहार और विचार में थोड़ी सावधानी रखी जाए तो न केवल शरीर सुरक्षित रहता है बल्कि भक्ति का मार्ग भी अधिक साफ दिखाई देने लगता है।
जो भी व्यक्ति भाद्रपद मास में अपने स्वास्थ्य, भोजन, दान और पूजा की थोड़ी अधिक चिंता करता है, उसके लिए यह समय आगे आने वाले महीनों के लिए शक्ति संचय और आध्यात्मिक तैयारी का सुंदर अवसर बन जाता है।
भाद्रपद मास को भादो या भादवा क्यों कहा जाता है?
हिंदू पंचांग का छठा मास भाद्रपद कहलाता है। क्षेत्रीय बोलियों में यही नाम बदलकर भादो, भाद्वा या भाद्र बन गया, पर सभी का संकेत उसी भाद्रपद मास की ओर रहता है।
भादो में दही और गुड़ खाने से क्यों मना किया जाता है?
वर्षा ऋतु में दही और गुड़ दोनों ही कई लोगों के पाचन तंत्र पर भारी पड़ते हैं। इससे पेट संबंधी रोग और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए भाद्रपद में इनसे बचने की परंपरा बनी।
क्या भाद्रपद में हर प्रकार का शुभ कार्य वर्जित है?
सामान्य मान्यता यह है कि विवाह, गृह प्रवेश या बड़े मांगलिक कार्य इस महीने में न किए जाएँ। परंतु पूजा, दान, व्रत, अध्ययन, यात्रा या सामान्य गृहस्थ जीवन के कार्य भक्ति भाव से किए जा सकते हैं।
भाद्रपद में श्रीकृष्ण की पूजा किस रूप में करनी चाहिए?
इस मास में श्रीकृष्ण को तुलसी युक्त जल, माखन, मिश्री और साधारण भोग अर्पित करके नियमित आरती, नाम जप और प्रार्थना करना शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस महीने की श्रद्धा पूर्ण प्रार्थनाएँ लंबे समय तक जीवन में मार्गदर्शन देती हैं।
भाद्रपद मास में नदियों में स्नान और दान का क्या महत्व है?
वर्षा ऋतु में नदियाँ पवित्रता और प्रवाह का प्रतीक होती हैं। इस समय नदी स्नान और उसके बाद गरीबों को अन्न, वस्त्र या धन का दान दे देना आत्मशुद्धि और करुणा, दोनों को जागृत करने वाला माना गया है।
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