By पं. नरेंद्र शर्मा
गर्मियों के बीच इस माह में तपस्या, साधना और धर्म का महत्व

हिंदू पंचांग में ज्येष्ठ मास को ग्रीष्म ऋतु के मध्य का अत्यंत प्रभावशाली महीना माना जाता है। तेज धूप, तपता हुआ वातावरण और भीतर से संयम तथा श्रद्धा की परीक्षा लेने वाला यह समय साधक को भीतर से मजबूत बनाता है। यह महीना प्रायः मई जून के बीच आता है और अधिकांश वर्षों में लगभग 29 या 30 दिनों का होता है। जब भी ज्येष्ठ मास आरम्भ होता है, उसी दिन से तीर्थ स्नान, संयमित जीवन और जरूरतमंदों को दान की विशेष परंपरा निभाई जाती है।
ज्येष्ठ मास की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मास की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित रहता है। इसी के कारण इस मास का नाम ज्येष्ठ पड़ा। इस मास के स्वामी ग्रह मंगल माने गए हैं, इसलिए इस अवधि में साहस, पराक्रम, संयम और तप का विशेष महत्व बढ़ जाता है।
ज्येष्ठ मास को हनुमान जी का अत्यंत प्रिय महीना माना गया है। मान्यता है कि इसी ज्येष्ठ मास में पहली बार हनुमान जी और भगवान श्रीराम का पावन मिलन हुआ था। इसीलिए इस महीने के मंगलवार को अत्यंत शुभ माना जाता है। इन्हीं खास मंगलवारों को बड़ा मंगल भी कहा जाता है।
श्रद्धालु मानते हैं कि ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले हर मंगलवार को यदि नियमपूर्वक हनुमान जी की विशेष पूजा की जाए, मंगलवार का व्रत रखा जाए, हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या राम नाम का जप किया जाए तो अनेक प्रकार की परेशानियाँ, बाधाएँ और भय दूर होने लगते हैं। इस समय मंगल की ऊर्जा और हनुमान जी की कृपा मिलकर साधक को बल, उत्साह और सुरक्षा प्रदान करती है।
चंद्र मासों का नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की स्थिति के आधार पर रखा गया है। जिस मास की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित होता है उसे ज्येष्ठ मास कहा जाता है। ज्येष्ठा शब्द में वरिष्ठता, अग्रता और विशेष महत्त्व का संकेत छिपा है।
ज्येष्ठ मास में ताप और परिश्रम की अधिकता रहती है, इसलिए यह मास किसी भी साधक की धैर्य, संयम और श्रद्धा की परीक्षा जैसा माना जाता है। जो व्यक्ति इस समय नियमपूर्वक व्रत, स्नान, जप और दान कर पाता है, उसके लिए यह महीना अत्यंत पुण्यदायक बन जाता है।
ज्योतिष परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ मास में कुछ नक्षत्र और तिथियाँ शून्य मानी गई हैं। शून्य का अर्थ है कि उन समयों में आरम्भ किए गए शुभ कार्यों से अपेक्षित फल नहीं मिलता, उल्टी बाधाएँ या हानि की सम्भावना बढ़ जाती है।
इस मास से संबंधित अशुभ नक्षत्र और तिथियाँ इस प्रकार समझी जाती हैं।
इसी प्रकार ज्येष्ठ मास में दो तिथियाँ विशेष रूप से शून्य तिथियाँ कहलाती हैं।
इन तिथियों पर भी कोई बड़ा शुभ कार्य, विशेष संस्कार या नए कार्य की शुरुआत न करने की परंपरा मानी गई है। इन दिनों को साधक प्रायः जप, ध्यान या शांत पठन अध्ययन के लिए रखते हैं, लेकिन मांगलिक कार्यों से दूर रहना श्रेष्ठ माना जाता है।
ज्येष्ठ मास का स्वभाव तेज है, इसलिए इस महीने में संयमित जीवन पर विशेष बल दिया गया है। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि इस मास में यदि मनुष्य अपनी दिनचर्या नियमपूर्वक रखे तो उसकी आयु बढ़ती है और रोगों से रक्षा होती है।
इस महीने के लिए कुछ प्रमुख अनुशासन इस प्रकार बताए गए हैं।
जो व्यक्ति इन नियमों के साथ ज्येष्ठ मास बिताता है उसके लिए यह महीना आंतरिक शक्ति और दीर्घकालिक स्वास्थ्य का आधार बन सकता है।
धार्मिक ग्रंथों में ज्येष्ठ मास में विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा का विधान बताया गया है। इस मास में भगवान के त्रिविक्रम रूप की उपासना अत्यंत शुभ मानी गई है।
विशेष तिथियाँ जिन पर विष्णु पूजा का फल और अधिक बढ़ जाता है, इस प्रकार हैं।
इन तिथियों पर प्रातः या संध्या के समय भगवान त्रिविक्रम की मूर्ति या चित्र के समक्ष शुद्ध मन से बैठकर ध्यान किया जाता है।
पूजा की सरल विधि इस प्रकार रखी जा सकती है।
इस प्रकार ज्येष्ठ मास के महत्वपूर्ण दिनों में त्रिविक्रम रूप की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में धैर्य, स्थिरता और सद्बुद्धि की वृद्धि मानी जाती है।
शास्त्रों में ज्येष्ठ मास को अश्वमेध और गोमेध जैसे महान यज्ञों के समान पुण्य देने वाला भी बताया गया है। यह पुण्य केवल बाहरी कर्मकांड से नहीं बल्कि व्रत, संयम, स्नान और दान के सही पालन से प्राप्त होता है।
यानी जो व्यक्ति ज्येष्ठ मास की द्वादशी और पूर्णिमा पर श्रद्धापूर्वक व्रत, स्नान और तिल दान करता है, उसके लिए यह महीना साधारण नहीं रह जाता। उसकी तपस्या और दान का प्रभाव लंबे समय तक जीवन और कुल दोनों पर दिखाई देता है।
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी का एक विशेष रूप भी वर्णित है। माना गया है कि यदि कोई साधक इस तिथि को मथुरा में रहकर पूरे मन से उपवास करे, यमुना नदी में स्नान करे और भगवान कृष्ण की पूजा करे तो उसे अश्वमेध यज्ञ का संपूर्ण फल प्राप्त हो सकता है।
इस दिन की साधना की रूपरेखा इस प्रकार समझी जाती है।
कहा गया है कि जो व्यक्ति इस प्रकार श्रद्धा से पूजा करता है, उसके जन्म जन्मांतर के अनेक पाप नष्ट होने लगते हैं और उसके जीवन मार्ग में भक्ति की स्थिर दिशा बनती जाती है।
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा भी अत्यंत पवित्र मानी गई है। धर्मशास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि यदि इस दिन साधक विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना करे, तिल दान करे और श्रद्धापूर्वक नारद पुराण का श्रवण करे तो उसके अनेक जन्मों के पाप क्षीण होने लगते हैं।
ऐसा कहा गया है कि जो व्यक्ति ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तक भगवान विष्णु की नियमित पूजा, व्रत और दान करता है, वह अंततः वैकुण्ठ प्राप्ति का अधिकारी बन सकता है। यहाँ वैकुण्ठ केवल एक लोक का नाम नहीं बल्कि अंतरात्मा की शांति, भक्ति और मुक्ति का प्रतीक भी समझा जाता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| नाम का आधार | पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का ज्येष्ठा नक्षत्र में होना |
| स्वामी ग्रह | मंगल |
| विशेष देवता | भगवान विष्णु का त्रिविक्रम रूप और श्री हनुमान |
| विशेष दिन | बड़ा मंगल, गुरुवार, एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा |
| शून्य नक्षत्र | उत्तराषाढ़ा, पुष्य |
| शून्य तिथियाँ | कृष्ण चतुर्दशी, शुक्ल त्रयोदशी |
| मुख्य व्रत | एक समय भोजन, दिन में न सोना, द्वादशी उपवास |
| प्रमुख दान | तिल दान, अन्न, जल, वस्त्र और जरूरतमंदों की सेवा |
| विशेष फल | गोमेध और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति |
| विशेष स्थल और साधना | मथुरा में द्वादशी, यमुना स्नान और श्रीकृष्ण पूजा |
ज्येष्ठ मास अपने तेज, गर्मी और तप के बीच साधक को यह सिखाता है कि बाहरी कठिनाई को साधना, संयम और सेवा में बदल दिया जाए। जब व्यक्ति इस महीने में थोड़ा कम खाता है, दिन में नहीं सोता, दूसरों को जल और सहयोग देता है, हनुमान जी और भगवान विष्णु की आराधना करता है तब यह महीना केवल कैलेंडर की अवधि नहीं रहता बल्कि अंतर यात्रा का साधन बन जाता है।
जो भी ज्येष्ठ मास में अपनी क्षमता के अनुसार व्रत, जप, तिल दान, तीर्थ स्नान या मानसिक रूप से ही सही, भक्ति और सेवा के संकल्प निभाता है, उसके लिए यह महीना आयु, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक प्रगति का एक मजबूत आधार बन सकता है।
ज्येष्ठ मास का नाम ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर क्यों रखा गया है?
इस मास की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित रहता है। इसी कारण इस चंद्र मास का नाम ज्येष्ठ रखा गया और इसे महत्व तथा अग्रता का सूचक माना गया।
ज्येष्ठ मास में हनुमान जी की आराधना क्यों विशेष मानी जाती है?
मान्यता है कि ज्येष्ठ मास में ही हनुमान जी और भगवान श्रीराम का प्रथम मिलन हुआ था। इसी कारण इस मास के मंगलवार, जिन्हें बड़ा मंगल कहा जाता है, हनुमान जी की विशेष पूजा, व्रत और भजन के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
ज्येष्ठ मास की कौन सी तिथियाँ और नक्षत्र शून्य माने जाते हैं?
इस मास में उत्तराषाढ़ा और पुष्य नक्षत्र शून्य माने जाते हैं। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी शून्य तिथियाँ कही जाती हैं, जिन पर शुभ कार्य न करने की परंपरा है।
अश्वमेध और गोमेध यज्ञ के समान पुण्य ज्येष्ठ मास में कैसे मिलता है?
ज्येष्ठ मास की द्वादशी पर त्रिविक्रम रूप की पूजा और उपवास से गोमेध यज्ञ के समान फल बताया गया है। इसी मास की पूर्णिमा पर तिल दान से अश्वमेध यज्ञ के तुल्य पुण्य का उल्लेख धर्मसिन्धु जैसे ग्रंथों में मिलता है।
ज्येष्ठ मास में भगवान विष्णु की पूजा किस रूप में करनी चाहिए?
इस मास में भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की आराधना विशेष मानी गई है। गुरुवार, एकादशी, द्वादशी और पूर्णिमा के दिन दूध और गंगाजल से अभिषेक, तुलसी पत्र अर्पण, व्रत और जरूरतमंदों को दान करने से यह पूजा पूर्ण मानी जाती है।
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