By पं. अमिताभ शर्मा
मार्गशीर्ष में आस्था, दान और पवित्र अनुष्ठानों का महत्व

हिंदू पंचांग में मार्गशीर्ष मास को अत्यंत शुभ और प्रभावशाली महीना माना जाता है। यह चंद्र वर्ष का नौवाँ महीना है और वैदिक काल से ही विशेष सम्मान प्राप्त करता आया है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत पद्धति के अनुसार वर्ष 2025 में मार्गशीर्ष मास का आरम्भ 06 नवंबर 2025 से माना जाएगा, जब आश्विन के बाद अग्रहायण या अगहन के रूप में नया मास शुरू होगा।
इस मास को अग्रहायण भी कहा जाता है जो मूल रूप से आग्रहायणी नक्षत्र से संबंधित है। यह वही नक्षत्र है जिसे आगे चलकर मृगशीर्ष या मृगशिरा के नाम से जाना गया। अग्रहायण शब्द का तद्भव रूप अगहन है, जो लोकभाषा में अधिक प्रचलित हुआ। प्राचीन समय में मार्गशीर्ष से ही नववर्ष का प्रारम्भ माना जाता था, इसलिए यह मास केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं बल्कि वर्ष परिवर्तन और नई शुरुआत का प्रतीक भी रहा है।
मार्गशीर्ष मास को सनातन परंपरा में विशेष पवित्रता इसलिए भी मिली कि इसी मास में दो अत्यंत महत्वपूर्ण दिव्य विवाह माने जाते हैं।
इस प्रकार मार्गशीर्ष मास राम विवाह और शिव विवाह दोनों का साक्षी माना जाता है। विवाह, सौभाग्य और दांपत्य जीवन की दृष्टि से यह मास बहुत ही शुभ संकेत देने वाला माना गया है।
मार्गशीर्ष मास की महिमा केवल पुराणों में ही नहीं बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है।
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं
“मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्”
अर्थ
“मासों में मार्गशीर्ष और नक्षत्रों में अभिजित मैं ही हूँ।”
यह कथन मार्गशीर्ष मास को सीधे भगवान की विशेष पहचान से जोड़ देता है। जब स्वयं श्रीकृष्ण किसी मास को अपने स्वरूप के रूप में प्रकट करें तो समझा जा सकता है कि उस समय की साधना, व्रत और दान साधक के जीवन में कितनी गहरी छाप छोड़ सकते हैं।
स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड में मार्गशीर्ष मास के महत्व को अत्यंत सुंदर ढंग से समझाया गया है।
वहाँ श्रीभगवान कहते हैं कि मार्गशीर्ष मास हमेशा उनके लिए प्रिय है। जो मनुष्य इस मास में प्रातःकाल जल्दी उठकर विधिपूर्वक स्नान करता है, उस पर भगवान इतने प्रसन्न होते हैं कि अपने आप को भी उसे समर्पित कर देने की बात करते हैं।
संक्षेप में अर्थ यह समझा जा सकता है कि
ज्योतिषीय दृष्टि से मार्गशीर्ष मास में कुछ विशेष नक्षत्र और तिथियाँ ऐसी मानी गई हैं जिनमें शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।
इस मास में चित्रा और विशाखा को शून्य नक्षत्र कहा गया है।
इन नक्षत्रों में महत्वपूर्ण कार्य करने पर धन हानि की संभावना बताई गई है।
मार्गशीर्ष में सप्तमी और अष्टमी को मासशून्य तिथियाँ माना गया है।
मासशून्य तिथियों में यदि कोई मांगलिक कार्य किया जाए तो वंश और धन दोनों के लिए हानिकारक परिणाम मिलने की परंपरागत मान्यता है।
इन नियमों का अर्थ यह है कि मार्गशीर्ष के दौरान भी तिथि और नक्षत्र देखकर ही विवाह, गृहप्रवेश या बड़े अनुबंध जैसे कार्य तय किए जाएँ, जबकि साधना, दान और पूजा किसी भी दिन की जा सकती है।
महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 106 में मार्गशीर्ष मास के व्रतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहाँ यह बताया गया है कि
वह अनेक प्रकार के रोग और पाप कर्मों से मुक्त हो जाता है।
उसके जीवन में
यहीं भाव स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड में भी दोहराया गया है। जो व्यक्ति पूरे मार्गशीर्ष मास को प्रति दिन एक बार भोजन लेकर और श्रद्धा से ब्राह्मणों को भोजन कराकर बिताता है, वह व्याधि और पापकृत्य दोनों से मुक्त होता है।
दान की दृष्टि से भी मार्गशीर्ष मास अत्यंत फलदायी माना गया है, विशेष रूप से अन्नदान और चाँदी के दान को बहुत महत्व दिया गया है।
शिवपुराण में वर्णन है कि जो व्यक्ति मार्गशीर्ष मास में श्रद्धा से चाँदी का दान करता है, उसके जीवन में वीर्य शक्ति अर्थात धैर्य, जीवन बल और संतुलन की वृद्धि होती है। इसे केवल शारीरिक बल नहीं बल्कि समग्र जीवनी शक्ति के रूप में समझना उचित है।
शिवपुराण, विश्वेश्वर संहिता के अनुसार
अर्थ यह कि यह मास किसी भी प्रकार के दान के लिए शुभ है, पर विशेष रूप से अन्नदान को सबसे बड़ा यज्ञ माना गया है।
मार्गशीर्ष मास का एक अत्यंत सुंदर और विशिष्ट पहलू मथुरापुरी निवास से जुड़ा हुआ है।
स्कन्दपुराण में श्रीभगवान स्वयं ब्रह्मा जी से कहते हैं कि
इससे यह समझ आता है कि मार्गशीर्ष मास में मथुरा को विशेष रूप से तप और भक्ति का केंद्र माना गया है।
जो भी साधक इस समय मथुरा, वृंदावन या श्रीकृष्ण से जुड़े पवित्र स्थलों पर रहकर जप, स्मरण और सेवा करता है, उसके लिए यह मास अत्यंत उच्च आध्यात्मिक परिणाम देने वाला कहा गया है।
मार्गशीर्ष मास में भगवान विष्णु के अभिषेक की परंपरा भी बहुत प्राचीन है।
यह विश्वास है कि मार्गशीर्ष में किया गया विष्णु अभिषेक
मार्गशीर्ष मास का एक गहरा पक्ष भटके हुए जीवों और departed आत्माओं के कल्याण से भी जुड़ता है।
यह भाव साधक को यह भी सिखाता है कि केवल अपने परिवार या पितरों के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के भटके हुए जीवों के लिए भी शांति की प्रार्थना करना एक उच्चतम धर्म है।
मार्गशीर्ष मास में भगवान विष्णु की प्रतिष्ठा करना अत्यंत शुभ माना गया है।
भविष्यपुराण, उत्तरपर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को श्रीपंचमी कहा है।
इस तिथि पर
| विषय | विवरण |
|---|---|
| मास की पहचान | हिंदू वर्ष का नौवाँ मास, अग्रहायण या अगहन |
| विशेष नाम और नक्षत्र | अग्रहायणी, मृगशीर्ष या मृगशिरा से संबंध |
| आरम्भ वर्ष 2025 | 06 नवंबर 2025 से उत्तर भारत पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार |
| प्रमुख दिव्य विवाह | राम विवाह, शिव विवाह |
| गीता में उल्लेख | “मासानां मार्गशीर्षोऽहं” द्वारा श्रीकृष्ण की विशेष पहचान |
| विशेष नक्षत्र और तिथियाँ | चित्रा और विशाखा शून्य नक्षत्र, सप्तमी और अष्टमी मासशून्य |
| व्रत का विशेष स्वरूप | पूरे मास एकभुक्त व्रत, ब्राह्मण भोजन |
| दान की मुख्य परंपरा | चाँदी का दान, विशेष रूप से अन्नदान |
| तीर्थ और स्थान विशेष | मार्गशीर्ष में मथुरापुरी निवास अत्यंत फलदायी |
| अन्य मुख्य साधनाएँ | विष्णु अभिषेक, विश्वदेवताओं का पूजन, विष्णु प्रतिष्ठा, श्रीपंचमी पर लक्ष्मी कृपा |
मार्गशीर्ष मास साधक को यह दिशा देता है कि
जीवन को अंदर से बहुत गहराई तक बदल सकते हैं।
जो व्यक्ति पूरे मार्गशीर्ष में पूर्ण व्रत न भी रख सके, वह भी
मार्गशीर्ष मास को अग्रहायण या अगहन क्यों कहा जाता है?
यह नाम अग्रहायणी नक्षत्र से जुड़ा है जो मृगशीर्ष या मृगशिरा का ही रूप है। इसी से अग्रहायण शब्द बना और लोक बोलचाल में इसका तद्भव रूप अगहन प्रचलित हुआ, जो मार्गशीर्ष मास की ही पहचान है।
क्या मार्गशीर्ष में हर दिन व्रत आवश्यक है या केवल एकभुक्त नियम भी पर्याप्त है?
शास्त्रों में पूरे मास एकभुक्त रहने की महिमा बताई गई है, पर व्यक्ति अपनी क्षमता अनुसार भी व्रत कर सकता है। मुख्य बात यह है कि मार्गशीर्ष में संयमित भोजन, एक समय भोजन और ब्राह्मण अथवा जरूरतमंदों को भोजन कराना अत्यंत फलदायी माना गया है।
मार्गशीर्ष में किस प्रकार का दान सबसे शुभ माना गया है?
शिवपुराण के अनुसार इस मास में विशेष रूप से अन्नदान सर्वोत्तम है। चाँदी का दान वीर्य और जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला बताया गया है, पर सामान्य गृहस्थ के लिए अन्न का दान ही सबसे प्रभावी साधन माना गया है।
मथुरापुरी में मार्गशीर्ष के दौरान निवास का महत्व क्या है?
स्कन्दपुराण के अनुसार तीर्थराज प्रयाग में हजार वर्ष निवास करने जितना फल मथुरा में केवल मार्गशीर्ष मास में रहने से मिल जाता है। इसका अर्थ है कि इस काल में मथुरा और श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों पर भक्ति, जप और सेवा साधना को असाधारण आध्यात्मिक फल प्राप्त होते हैं।
विश्वदेवताओं का पूजन मार्गशीर्ष मास में क्यों किया जाता है?
मार्गशीर्ष में विश्वदेवताओं का पूजन उन सभी departed आत्माओं की शांति के लिए किया जाता है जिन्हें जीवन में या मृत्यु के बाद सहज विश्रांति न मिल सकी हो। यह पूजन भटके हुए जीवों के सद्गति हेतु सामूहिक प्रार्थना है जो साधक को करुणा और व्यापक दृष्टि का संस्कार भी देता है।
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