पौष माह: व्रत, दान और आंतरिक साधना

By पं. नरेंद्र शर्मा

पौष में शीतकालीन तपस्या, पूजा और धार्मिक अनुशासन का महत्व

पौष: धार्मिक व्रत और साधना का महीना

सामग्री तालिका

हिंदू पंचांग में पौष मास वर्ष का दसवाँ महीना माना जाता है। यह काल सूर्य के दक्षिणायनांत भाग में आता है, जब शीत अपने चरम की ओर बढ़ता है और मन स्वभाव से अंतर्मुख साधना की ओर आकर्षित होने लगता है। पौष मास की पूर्णिमा प्रायः पुष्य नक्षत्र के योग में आती है, इसी कारण इसे अत्यंत पवित्र और साधना के लिए जाग्रत समय बताया गया है।

वैदिक ग्रंथ तैत्तिरीय संहिता में पौष मास का नाम सहस्य उल्लेखित है, जो इस महीने के गंभीर, संयमी और आध्यात्मिक स्वरूप की ओर संकेत करता है। ज्योतिषीय दृष्टि से पौष के अधिकांश समय में सूर्य धनु राशि में स्थित रहते हैं, जो धर्म, ज्ञान और साधना से जुड़ी राशि मानी जाती है। बहुत से लोग पौष मास को खर मास मानते हैं और विशेष रूप से सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के बाद विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा रखते हैं, जबकि पूजा, दान और तपस्या के लिए यह समय अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

पौष मास में तिथि, नक्षत्र और शुभ अशुभ संकेत

पौष मास की प्रकृति को समझने के लिए इसके नक्षत्र और तिथि संबंधी संकेतों पर ध्यान देना आवश्यक है।

  • इस मास में आर्द्रा, अश्विनी और हस्त को शून्य नक्षत्र माना गया है। इन नक्षत्रों में नए और बड़े कार्य, विशेषकर आर्थिक निर्णय शुरू करने से धन हानि की संभावना बताई गई है।
  • पौष मास में दोनों पक्षों की चतुर्थी और पंचमी तिथियाँ मासशून्य तिथियाँ कही गई हैं। मङ्गलकार्य, विवाह, गृहप्रवेश या बड़े उत्सव यदि इन तिथियों में किए जाएँ तो वंश और धन दोनों के लिए बाधा या हानि का संकेत माना गया है।
  • पारंपरिक मान्यता यह भी है कि पौष मास में गृहप्रवेश करने से घर में चोरों के भय और असुरक्षा की आशंका बढ़ सकती है, इसलिए गृहप्रवेश के लिए अन्य मास अधिक शुभ माने जाते हैं।

इस प्रकार पौष मास भले ही मांगलिक कार्यों के लिए संयम का संकेत दे, पर साधना, जप, तप और दान के लिए इसे अतिरिक्त फलदायी समय के रूप में स्वीकार किया गया है।

पौष मास में एकभुक्त व्रत का महत्व

महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय 106 में पौष मास के व्रत का विशेष वर्णन मिलता है।

वहाँ कहा गया है

“पौषमासं तु कौन्तेय भक्तेनैकेन यः क्षिपेत्।
सुभगो दर्शनीयश्च यशोभागी च जायते।।“

अर्थ यह कि

  • जो व्यक्ति पौष मास को भक्ति भाव से एक समय भोजन करके व्यतीत करता है,
  • वह सौभाग्यशाली, आकर्षक व्यक्तित्व वाला और यशस्वी बनता है।

यह केवल भूखे रहने की कठोरता नहीं बल्कि भोजन में संयम के माध्यम से तेज, व्यक्तित्व और मान के संवर्धन का संकेत है। पौष मास में एकभुक्त व्रत रखने वाला साधक अपने भीतर अधिक स्थिरता और संतोष अनुभव कर सकता है।

रोहिणी योग में आकाश के नीचे शयन का विधान

इसी अनुशासन पर्व में ब्रह्मा जी पौष मास के शुक्ल पक्ष के लिए एक अनूठा तप विधान बताते हैं।

  • पौष शुक्ल पक्ष में जिस दिन रोहिणी नक्षत्र का योग हो, उस दिन रात्रि में विशेष साधना का नियम बताया गया है।
  • साधक प्रातः स्नान करके, पवित्र होकर एक स्वच्छ वस्त्र धारण करे।
  • उसी रात खुले आकाश के नीचे, किसी साफ मैदान या छत पर आकाश शयन करे।
  • श्रद्धा और एकाग्रता के साथ वह रात्रि भर चंद्रमा की किरणों को ग्रहण करता रहे, जागरण या विश्राम दोनों को साधना का हिस्सा मानते हुए।

कथन है कि ऐसा करने से साधक को महायज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। चंद्र किरणों का स्पर्श मन को शांत, विचारों को शीतल और भावनाओं को संतुलित करने में सहायक माना गया है। इस प्रकार पौष मास का यह रोहिणी योग साधक को प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का अनुभव कराता है।

शिवपुराण के अनुसार पौष मास में देवपूजन

शिवपुराण में वर्णित है कि जब सूर्य धनु संक्रांति के साथ पौष मास में स्थित हों, उस समय उषःकाल में भगवान शिव और अन्य देवताओं का पूजन अत्यंत सिद्धिदायक होता है।

  • पौष मास में अगहनी के चावल से तैयार किए गए हविष्य का नैवेद्य श्रेष्ठ माना गया है।
  • विभिन्न प्रकार के अन्न से बने नैवेद्य भी इस मास में विशेष महत्व रखते हैं।

इसी क्रम में पौष शुक्ल एकादशी को मन्वंतर आदि तिथि कहा गया है, जो दान के पुण्य को अक्षय बनाने वाली मानी जाती है। ऐसे समय

  • द्विजों को भोजन,
  • श्राद्ध,
  • तथा विभिन्न प्रकार के दान
    अत्यंत शुभ माने गए हैं।

नर्मदा स्नान और तट पर दान का विशेष फल

ग्रंथों में संक्षेप में वर्णित है

“पौषे तु नर्मदा पुण्या स्नान दानादि कर्मणि”

अर्थात

  • पौष मास में नर्मदा नदी में स्नान और
  • नर्मदा के तट पर दान आदि शुभ कर्म
    बहुत पुण्य देने वाले बताए गए हैं।

नर्मदा को पापनाशिनी नदी माना गया है। पौष के शीतकालीन वातावरण में नर्मदा के तट पर स्नान, जप, ध्यान और दान साधक के लिए पिछले जन्मों के कर्म बोझ को हल्का करने में सहायक माने जाते हैं।

सूर्य पूजा, गायत्री जप और जितेन्द्रिय साधना

पौष मास सूर्य उपासना और गायत्री साधना से गहराई से जुड़ा हुआ है।

पौष मास में गायत्री जप

शिवपुराण के अनुसार

  • पौष मास में जितेन्द्रिय और यथाशक्ति निराहार या संयमित भोजन रखकर
  • प्रातःकाल से मध्याह्न तक वेदमाता गायत्री मंत्र का जप करना अत्यंत कल्याणकारी है।
  • दिन के शेष भाग में पंचाक्षर मंत्र या अन्य शिव मंत्रों का जप करते हुए
    ब्रह्मचर्य, सात्त्विक भोजन और भूमिशयन जैसे नियमों का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है।

ऐसा साधक ज्ञान प्राप्त कर शरीर छोड़ने के पश्चात मोक्ष को प्राप्त होता है, ऐसा कथन है। चूँकि गायत्री जप के लिए दीक्षा आवश्यक मानी गई है, इसलिए यह साधना सद्गुरु या योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में ही उचित रहती है।

रविवार के दिन सूर्य पूजा

पौष मास के रविवार, विशेष रूप से सूर्योदय के समय, सूर्य पूजा की महिमा और भी बढ़ जाती है।

विधान है कि

  • जो साधक पौष मास के सूर्य दिवस पर प्रातः स्नान कर
  • दान, होम, जप और सूर्य की विधिपूर्वक अर्चना करे,
    उसके लिए यह पूजा आरोग्य, तेज और समृद्धि देने वाली मानी गई है।

सूर्य की कृपा से नेत्रज्योति, आत्मविश्वास और जीवन शक्ति में वृद्धि के संकेत दिए गए हैं।

पौष सूर्यव्रत की विस्तृत विधि

भविष्य पुराण में ऋषि सुमन्तु द्वारा बताए गए सूर्यव्रत को कृत्यरत्नाकर ग्रंथ में विस्तार से उद्धृत किया गया है।

इस व्रत की मुख्य रेखा इस प्रकार समझी जा सकती है।

  • पौष मास के दौरान साधक इंद्रियों को वश में रखे, सत्य बोले और संयमित जीवन जीए।
  • शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की सप्तमी तिथि तक वह उपवास रखे और दिन भर निराहार रहकर केवल नक्त भोजन करे।
  • भोजन में स्वाती धान्य, गेहूँ और गोरस अर्थात दूध के साथ बना हुआ सादा भोजन ग्रहण करे।
  • प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या तीनों समय भगवान सूर्य तथा शाण्डिल्य कुल के देव रूपों की पूजा करे।
  • प्रतिदिन भूमि पर शयन करे, भोग विलास और अतिशय आराम से दूरी बनाए रखे।

मास के अंत में, विशेष रूप से सप्तमी के दिन

  • घृत आदि से सूर्य का स्नपन और महापूजा की जाती है।
  • दूध में पकाए गए चावल का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
  • आठ सूर्यभक्त सामग ब्राह्मणों को बुलाकर उनका आदर और भोजन कराया जाता है।
  • अंत में कपिल वर्ण की गाय का दान भास्कर को समर्पित करने का विधान है।

ग्रंथों में इस व्रत के फल के रूप में

  • दिव्य विमान,
  • अप्सराएँ,
  • धन और ऐश्वर्य,
  • तथा दीर्घकालीन स्वर्गवास
    का वर्णन आता है, जिन्हें प्रेरक फलश्रुति के रूप में समझना उचित है। वास्तविक भाव यह है कि यह सूर्यव्रत पुण्य, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति का अत्यंत प्रभावशाली साधन है।

पौष मास में दान के विविध रूप

पौष मास को दान के लिए विशेष काल माना गया है। विभिन्न ग्रंथों में दान की अलग अलग विधाएँ और उनके फल बताए गए हैं।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णित दान

  • पौष मास में स्वर्णदान करने से परम संतुष्टि प्राप्त होती है।
  • शुक्ल पक्ष में फूलों का दान करना लक्ष्मीप्रद माना गया है।
  • कृष्ण पक्ष में फलों का दान अत्यंत महाफल देने वाला माना गया है।

साथ ही

  • महल,
  • नगर,
  • घर
    और आवरण वस्त्र जैसी वस्तुओं का दान भी नारायण की तुष्टि के लिए शुभ बताया गया है, जिन्हें आज के समय में आश्रय, वस्त्र और सुविधा उपलब्ध कराने के रूप में समझा जा सकता है।

दानदीपिका में सुझाया गया दान

दानदीपिका में पौष मास में

  • गुड़,
  • ऊनी वस्त्र,
  • कम्बल

आदि के दान का विशेष महत्व बताया गया है।

गुड़ के दान के संदर्भ में कहा गया है कि

  • गन्ने का रस सभी रसों में श्रेष्ठ माना गया है,
  • इसलिए गुड़ का दान दाता को उच्च शांति प्रदान करने वाला समझा गया है।

कम्बल और ऊर्णवस्त्र के दान के मंत्रों में

  • शीतहारी,
  • बलवर्धक,
  • सुखद स्पर्श
    जैसे गुणों का उल्लेख कर अंत में अपने लिए शांति और स्थिरता की प्रार्थना की जाती है।

गोदान, धान्य, नमक और अन्य दान

स्कन्दवचनों में वर्णित है कि पौष मास में

  • गोदान,
  • वस्त्रदान,
  • धान्यदान,
  • लवणदान,
  • गुड़दान,
  • विशेष रूप से चांदी, घृत, नारियल, बिजौरा नींबू और भूरे कद्दू का दान अत्यंत फलदायी है।

ऐसा कम्बल जिसकी भीतरी सतह पर रेशम हो, वह

  • घोर शीत को नष्ट करने वाला माना गया है।
    इसी प्रकार कुछ वर्णनों में उपयुक्त कम्बल अत्यधिक वर्षा जैसी स्थितियों को संतुलित करने वाला भी बताया गया है।

दीपदान का पौष योग

स्कन्दवचनों में यह भी कहा गया है कि जब सूर्य धनुराशि में स्थित हों, उस समय

  • कुरुक्षेत्र,
  • प्रयाग,
  • और गोदावरी के तट पर

“गोविन्दः प्रीयताम्” की भावना से दीपदान करना कोटि यज्ञ के समान पुण्य देने वाला होता है।
इसके साथ ही पुरुष द्वारा दीप बुझाने और स्त्री द्वारा कद्दू काटने के जो दोष बताए गए हैं,
वे भी इस दीपदान से शांत होते हैं, अर्थात शुभता को बाधित करने वाली प्रवृत्तियों का क्षय होता है।

नमक, घृत और समृद्धि

शिवपुराण के अनुसार पौष मास में नमक का दान करने से जीवन में षडरसयुक्त संतुलित भोजन की प्राप्ति होती है।

कृत्यतत्त्वार्णव में वर्णन है कि पौष शुक्ल त्रयोदशी को

  • भगवान की पूजा कर
  • घृतदान करने से
    सभी कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं।

पौष मास में घी, औषधियाँ और वस्त्र दान करने से समृद्धि और स्थिरता आने की बात कही गई है।

विशेष तिथियाँ, नक्षत्र और पूजन विधियाँ

शतभिषा नक्षत्र और गणेश पूजा

जब पौष मास में शतभिषा नक्षत्र का योग आए, तो

  • उस दिन भगवान गणेश की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

यह पूजन विघ्नों की शांति, कार्य सिद्धि और मानसिक स्पष्टता प्रदान करने वाला माना गया है।

विश्वदेव पूजा

नारदपुराण के अनुसार पौष शुक्ल दशमी को विश्वदेव पूजा का विधान है।
यह पूजन

  • समस्त दिशाओं की शांति,
  • भटके हुए जीवों की सद्गति,
  • और departed आत्माओं की आत्मिक विश्रांति के लिए किया जाता है।

लक्ष्मी पूजा और दर्शन की परंपरा

ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड में वर्णित है कि

  • चैत्र, पौष और भाद्रपद मास के पवित्र मंगलवार को
  • भगवान विष्णु ने तीनों लोकों में लक्ष्मी पूजा का महोत्सव स्थापित किया।

वर्ष के अंत में पौष संक्रांति के दिन

  • मनु ने अपने प्रांगण में लक्ष्मी की प्रतिमा का आवाहन कर उनकी पूजा की
    और तब से तीनों लोकों में यह पूजा प्रचलित हो गई।

ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्रीकृष्णजन्मखण्ड, अध्याय 76 के अनुसार

  • पौष शुक्ल पक्ष की रात में
  • जहाँ कहीं भी साधक माँ पद्मा अर्थात लक्ष्मी की प्रतिमा का दर्शन और पूजन करता है,
    वह अपने जन्मबंधनों को धीरे धीरे काटने वाला पुण्य अर्जित करता है।

पौष मास की एकादशी से पूर्णिमा तक की साधना

कृत्यरत्नाकर के अनुसार

  • पौष शुक्ल एकादशी को व्रत रखना चाहिए।
  • द्वादशी को भगवान विष्णु नारायण की विशेष पूजा करनी चाहिए।
  • त्रयोदशी यात्रा के लिए अनुकूल मानी गई है।
  • चतुर्दशी को पुनः उपवास रखकर
  • पूर्णिमा को यथाशक्ति विस्तृत रूप से विष्णु यज्ञ, पूजन और दान किया जाए तो मास की साधना पूर्ण मानी जाती है।

शाकंभरी नवरात्र और दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला

त्रिपुरारहस्य में दुर्गा के बत्तीस नामों की माला का विधान है, जिसका विशेष महत्व शाकंभरी नवरात्र में माना गया है।

  • पौष पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है।
  • इस अवसर पर दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला का पाठ करने वाला
    हर प्रकार के भय, संकट, कारावास और शत्रु पीड़ा से मुक्त हो जाता है, ऐसा कहा गया है।
  • जिनकी कुण्डली में राहु दोष हो या राहु महादशा चल रही हो, उनके लिए यह अनुष्ठान अत्यंत सहायक माना जाता है।

यह स्तोत्र तीनों लोकों में अद्वितीय बताया गया है और इसका नियमित पाठ साधक को दुःख, आपदा और भय से शीघ्र रक्षा प्रदान करने वाला माना गया है।

पौष मास में प्रतिदिन जप योग्य नाम और लक्ष्मी स्तोत्र

पौष मास में भगवान विष्णु के द्वादश नाम अत्यंत सरल, प्रभावी और सात्त्विक साधना माने जाते हैं।

  • श्रीकेशवाय नमः
  • नारायणाय नमः
  • माधवाय नमः
  • गोविंदाय नमः
  • विष्णवे नमः
  • मधुसूदनाय नमः
  • त्रिविक्रमाय नमः
  • वामनाय नमः
  • श्रीधराय नमः
  • हृषीकेशाय नमः
  • पद्मनाभाय नमः
  • दामोदराय नमः

लक्ष्मी स्तोत्र में ईश्वर कहते हैं

**“त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुवल्लभे।
यथा त्वं सुस्थिरा कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा॥

ईश्वरी कमला लक्ष्मीश्चला भूतिर्हरिप्रिया।
पद्मा पद्मालया सम्पत्सृष्टिः श्रीः पद्मधारिणी॥

द्वादशैतानि नामानि लक्ष्मीं संपूज्य यः पठेत्।
स्थिरा लक्ष्मीर्भवेत् तस्य पुत्रदारादिभिः सह॥”**

अर्थ यह कि जो साधक इन बारह नामों से लक्ष्मी की पूजा और पाठ करता है,
उसके जीवन में स्थिर लक्ष्मी, परिवार सहित सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पुष्य नक्षत्र युक्त पौष पूर्णिमा का विशेष विधान

विष्णुस्मृति, अध्याय 90 के अनुसार यदि पौष पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र से युक्त हो, तो उस दिन का विधान अत्यंत विशेष माना जाता है।

  • साधक को पहले गौमूत्र, गौघृत और विभिन्न औषधियों का उबटन लगाकर स्नान करना चाहिए।
  • इसके बाद घृत से भरे कलश से स्नान करे और उसी प्रकार भगवान वासुदेव का अभिषेक करे।
  • धूप, दीप और नैवेद्य से वासुदेव की आराधना के पश्चात
  • ब्राह्मणों को घी और सोने का दान करे।
  • वस्त्रदान भी इस अनुष्ठान का आवश्यक अंग है।

इस प्रकार की साधना साधक के जीवन में समृद्धि, आरोग्य और दीर्घकालीन शुभफल की वृद्धि करने वाली मानी गई है।

पौष मास की मुख्य बातें सारणी में

विषय विवरण
पंचांग में स्थान हिंदू वर्ष का दसवाँ मास, तैत्तिरीय संहिता में सहस्य
पूर्णिमा और नक्षत्र अधिकतर पौष पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र से युक्त
सूर्य की स्थिति प्रायः धनु राशि में, दक्षिणायनांत काल
ज्योतिषीय सावधानियाँ आर्द्रा, अश्विनी, हस्त शून्य नक्षत्र, दोनों पक्ष की चतुर्थी पंचमी मासशून्य, गृहप्रवेश से चोर भय
मुख्य व्रत पूरे मास या कुछ दिनों तक एकभुक्त व्रत, रोहिणी योग में आकाशशयन
प्रमुख साधना सूर्य पूजा, पौष सूर्यव्रत, गायत्री जप, नर्मदा स्नान, विष्णु नाम जप
दान के मुख्य रूप स्वर्ण, गुड़, ऊनी वस्त्र, कम्बल, गोदान, धान्य, नमक, घृत, चांदी, नारियल, कद्दू, नींबू आदि
विशेष पूजन विश्वदेव पूजा, लक्ष्मी पूजन, गणेश पूजा, दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला
विशेष पूर्णिमा योग पुष्य युक्त पौष पूर्णिमा पर वासुदेव अभिषेक, घृत और स्वर्णदान
आध्यात्मिक भाव संयम, तप, कर्म शुद्धि, स्वास्थ्य, समृद्धि और स्थिर भक्ति की दिशा

पौष मास साधक को कौन सा मार्ग दिखाता है

पौष मास साधक के लिए जैसे एक शांत निमंत्रण की तरह आता है।
यह सिखाता है कि

  • थोड़ी इंद्रियनिग्रह,
  • सीमित और सात्त्विक भोजन,
  • प्रातःकाल का स्नान और सूर्य स्मरण,
  • दिन में कुछ समय जप और स्तोत्र पाठ,
  • तथा अपनी सामर्थ्य अनुसार दान

भी जीवन के भीतर बहुत गहरा परिवर्तन ला सकते हैं।

जो व्यक्ति कठोर व्रत न भी रख सके, वह

  • सप्ताह में कुछ दिन एकभुक्त नियम,
  • अवसर मिलने पर नर्मदा या किसी अन्य पवित्र नदी में स्नान,
  • नियमित सूर्य और विष्णु नाम स्मरण,
  • तथा समय समय पर अन्न, वस्त्र या गुड़, नमक, घी आदि का दान

अपनाकर पौष मास की विशेष ऊर्जा को महसूस कर सकता है।
धीरे धीरे यह महीना उसे शांत मन, शुद्ध कर्म और स्थिर भक्ति की ओर ले जाने वाला शुभ मार्गदर्शक बन जाता है।

पौष मास से जुड़े सामान्य प्रश्न

पौष मास को खर मास क्यों कहा जाता है और क्या हर प्रकार का शुभ कार्य वर्जित है?
पौष में सूर्य प्रायः धनु राशि में रहते हैं, जिसे कई मतों में मांगलिक कार्यों के लिए कम अनुकूल माना गया है, इसलिए इसे खर मास कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर शुभ कार्य वर्जित है बल्कि विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य टालने की सलाह है, जबकि पूजा, जप, दान, तीर्थस्नान और साधना पौष में विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।

क्या पौष मास में हर दिन एकभुक्त व्रत आवश्यक है?
शास्त्र पूरे पौष मास को एकभुक्त बिताने की महिमा बताते हैं, पर यह नियम साधक की क्षमता पर निर्भर करता है। जो पूरा मास न कर सके, वह सप्ताह में कुछ दिन या विशेष तिथियों पर एकभुक्त रहकर भी फल प्राप्त कर सकता है, मुख्य बात भोजन में संयम और भक्ति भाव है।

पौष मास में कौन से दान सबसे प्रभावी माने जाते हैं?
विभिन्न ग्रंथों के अनुसार इस मास में अन्नदान, कम्बल और ऊनी वस्त्र, गुड़, नमक, घी, चांदी, स्वर्ण, गोदान, धान्य, नारियल, कद्दू और नींबू का दान अत्यंत फलदायी है। साधारण गृहस्थ के लिए विशेष रूप से अन्न, वस्त्र और गुड़ का दान सरल और प्रभावी साधन माना जा सकता है।

क्या पौष मास में गृहप्रवेश या नया घर लेना ठीक है?
परंपरा के अनुसार पौष में गृहप्रवेश से चोर भय और अस्थिरता की आशंका कही गई है, इसलिए सामान्यतः इस मास में गृहप्रवेश से बचने की सलाह दी जाती है। यदि मजबूरीवश करना ही हो तो अनुभवी ज्योतिषी से तिथि, नक्षत्र और मुहूर्त देख कर, विशेष शांति पूजन के साथ प्रवेश करना अधिक संतुलित रहता है।

पौष मास में साधारण व्यक्ति के लिए कौन सी सरल साधना सबसे व्यावहारिक है?
साधारण गृहस्थ के लिए पौष मास में प्रातः स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देना, दिन में कम से कम कुछ माला विष्णु के द्वादश नामों या गायत्री मंत्र का जप करना, सप्ताह में कभी एकभुक्त नियम अपनाना और समय समय पर अन्न, गुड़, कम्बल या नमक का छोटा दान करना अत्यंत व्यावहारिक और फलदायी सिद्ध हो सकता है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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