By पं. नरेंद्र शर्मा
पौष में शीतकालीन तपस्या, पूजा और धार्मिक अनुशासन का महत्व

हिंदू पंचांग में पौष मास वर्ष का दसवाँ महीना माना जाता है। यह काल सूर्य के दक्षिणायनांत भाग में आता है, जब शीत अपने चरम की ओर बढ़ता है और मन स्वभाव से अंतर्मुख साधना की ओर आकर्षित होने लगता है। पौष मास की पूर्णिमा प्रायः पुष्य नक्षत्र के योग में आती है, इसी कारण इसे अत्यंत पवित्र और साधना के लिए जाग्रत समय बताया गया है।
वैदिक ग्रंथ तैत्तिरीय संहिता में पौष मास का नाम सहस्य उल्लेखित है, जो इस महीने के गंभीर, संयमी और आध्यात्मिक स्वरूप की ओर संकेत करता है। ज्योतिषीय दृष्टि से पौष के अधिकांश समय में सूर्य धनु राशि में स्थित रहते हैं, जो धर्म, ज्ञान और साधना से जुड़ी राशि मानी जाती है। बहुत से लोग पौष मास को खर मास मानते हैं और विशेष रूप से सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के बाद विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा रखते हैं, जबकि पूजा, दान और तपस्या के लिए यह समय अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
पौष मास की प्रकृति को समझने के लिए इसके नक्षत्र और तिथि संबंधी संकेतों पर ध्यान देना आवश्यक है।
इस प्रकार पौष मास भले ही मांगलिक कार्यों के लिए संयम का संकेत दे, पर साधना, जप, तप और दान के लिए इसे अतिरिक्त फलदायी समय के रूप में स्वीकार किया गया है।
महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय 106 में पौष मास के व्रत का विशेष वर्णन मिलता है।
वहाँ कहा गया है
“पौषमासं तु कौन्तेय भक्तेनैकेन यः क्षिपेत्।
सुभगो दर्शनीयश्च यशोभागी च जायते।।“
अर्थ यह कि
यह केवल भूखे रहने की कठोरता नहीं बल्कि भोजन में संयम के माध्यम से तेज, व्यक्तित्व और मान के संवर्धन का संकेत है। पौष मास में एकभुक्त व्रत रखने वाला साधक अपने भीतर अधिक स्थिरता और संतोष अनुभव कर सकता है।
इसी अनुशासन पर्व में ब्रह्मा जी पौष मास के शुक्ल पक्ष के लिए एक अनूठा तप विधान बताते हैं।
कथन है कि ऐसा करने से साधक को महायज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। चंद्र किरणों का स्पर्श मन को शांत, विचारों को शीतल और भावनाओं को संतुलित करने में सहायक माना गया है। इस प्रकार पौष मास का यह रोहिणी योग साधक को प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का अनुभव कराता है।
शिवपुराण में वर्णित है कि जब सूर्य धनु संक्रांति के साथ पौष मास में स्थित हों, उस समय उषःकाल में भगवान शिव और अन्य देवताओं का पूजन अत्यंत सिद्धिदायक होता है।
इसी क्रम में पौष शुक्ल एकादशी को मन्वंतर आदि तिथि कहा गया है, जो दान के पुण्य को अक्षय बनाने वाली मानी जाती है। ऐसे समय
ग्रंथों में संक्षेप में वर्णित है
“पौषे तु नर्मदा पुण्या स्नान दानादि कर्मणि”
अर्थात
नर्मदा को पापनाशिनी नदी माना गया है। पौष के शीतकालीन वातावरण में नर्मदा के तट पर स्नान, जप, ध्यान और दान साधक के लिए पिछले जन्मों के कर्म बोझ को हल्का करने में सहायक माने जाते हैं।
पौष मास सूर्य उपासना और गायत्री साधना से गहराई से जुड़ा हुआ है।
शिवपुराण के अनुसार
ऐसा साधक ज्ञान प्राप्त कर शरीर छोड़ने के पश्चात मोक्ष को प्राप्त होता है, ऐसा कथन है। चूँकि गायत्री जप के लिए दीक्षा आवश्यक मानी गई है, इसलिए यह साधना सद्गुरु या योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में ही उचित रहती है।
पौष मास के रविवार, विशेष रूप से सूर्योदय के समय, सूर्य पूजा की महिमा और भी बढ़ जाती है।
विधान है कि
सूर्य की कृपा से नेत्रज्योति, आत्मविश्वास और जीवन शक्ति में वृद्धि के संकेत दिए गए हैं।
भविष्य पुराण में ऋषि सुमन्तु द्वारा बताए गए सूर्यव्रत को कृत्यरत्नाकर ग्रंथ में विस्तार से उद्धृत किया गया है।
इस व्रत की मुख्य रेखा इस प्रकार समझी जा सकती है।
मास के अंत में, विशेष रूप से सप्तमी के दिन
ग्रंथों में इस व्रत के फल के रूप में
पौष मास को दान के लिए विशेष काल माना गया है। विभिन्न ग्रंथों में दान की अलग अलग विधाएँ और उनके फल बताए गए हैं।
साथ ही
दानदीपिका में पौष मास में
आदि के दान का विशेष महत्व बताया गया है।
गुड़ के दान के संदर्भ में कहा गया है कि
कम्बल और ऊर्णवस्त्र के दान के मंत्रों में
स्कन्दवचनों में वर्णित है कि पौष मास में
ऐसा कम्बल जिसकी भीतरी सतह पर रेशम हो, वह
स्कन्दवचनों में यह भी कहा गया है कि जब सूर्य धनुराशि में स्थित हों, उस समय
“गोविन्दः प्रीयताम्” की भावना से दीपदान करना कोटि यज्ञ के समान पुण्य देने वाला होता है।
इसके साथ ही पुरुष द्वारा दीप बुझाने और स्त्री द्वारा कद्दू काटने के जो दोष बताए गए हैं,
वे भी इस दीपदान से शांत होते हैं, अर्थात शुभता को बाधित करने वाली प्रवृत्तियों का क्षय होता है।
शिवपुराण के अनुसार पौष मास में नमक का दान करने से जीवन में षडरसयुक्त संतुलित भोजन की प्राप्ति होती है।
कृत्यतत्त्वार्णव में वर्णन है कि पौष शुक्ल त्रयोदशी को
पौष मास में घी, औषधियाँ और वस्त्र दान करने से समृद्धि और स्थिरता आने की बात कही गई है।
जब पौष मास में शतभिषा नक्षत्र का योग आए, तो
यह पूजन विघ्नों की शांति, कार्य सिद्धि और मानसिक स्पष्टता प्रदान करने वाला माना गया है।
नारदपुराण के अनुसार पौष शुक्ल दशमी को विश्वदेव पूजा का विधान है।
यह पूजन
ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड में वर्णित है कि
वर्ष के अंत में पौष संक्रांति के दिन
ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्रीकृष्णजन्मखण्ड, अध्याय 76 के अनुसार
कृत्यरत्नाकर के अनुसार
त्रिपुरारहस्य में दुर्गा के बत्तीस नामों की माला का विधान है, जिसका विशेष महत्व शाकंभरी नवरात्र में माना गया है।
यह स्तोत्र तीनों लोकों में अद्वितीय बताया गया है और इसका नियमित पाठ साधक को दुःख, आपदा और भय से शीघ्र रक्षा प्रदान करने वाला माना गया है।
पौष मास में भगवान विष्णु के द्वादश नाम अत्यंत सरल, प्रभावी और सात्त्विक साधना माने जाते हैं।
लक्ष्मी स्तोत्र में ईश्वर कहते हैं
**“त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुवल्लभे।
यथा त्वं सुस्थिरा कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा॥
ईश्वरी कमला लक्ष्मीश्चला भूतिर्हरिप्रिया।
पद्मा पद्मालया सम्पत्सृष्टिः श्रीः पद्मधारिणी॥
द्वादशैतानि नामानि लक्ष्मीं संपूज्य यः पठेत्।
स्थिरा लक्ष्मीर्भवेत् तस्य पुत्रदारादिभिः सह॥”**
अर्थ यह कि जो साधक इन बारह नामों से लक्ष्मी की पूजा और पाठ करता है,
उसके जीवन में स्थिर लक्ष्मी, परिवार सहित सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
विष्णुस्मृति, अध्याय 90 के अनुसार यदि पौष पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र से युक्त हो, तो उस दिन का विधान अत्यंत विशेष माना जाता है।
इस प्रकार की साधना साधक के जीवन में समृद्धि, आरोग्य और दीर्घकालीन शुभफल की वृद्धि करने वाली मानी गई है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पंचांग में स्थान | हिंदू वर्ष का दसवाँ मास, तैत्तिरीय संहिता में सहस्य |
| पूर्णिमा और नक्षत्र | अधिकतर पौष पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र से युक्त |
| सूर्य की स्थिति | प्रायः धनु राशि में, दक्षिणायनांत काल |
| ज्योतिषीय सावधानियाँ | आर्द्रा, अश्विनी, हस्त शून्य नक्षत्र, दोनों पक्ष की चतुर्थी पंचमी मासशून्य, गृहप्रवेश से चोर भय |
| मुख्य व्रत | पूरे मास या कुछ दिनों तक एकभुक्त व्रत, रोहिणी योग में आकाशशयन |
| प्रमुख साधना | सूर्य पूजा, पौष सूर्यव्रत, गायत्री जप, नर्मदा स्नान, विष्णु नाम जप |
| दान के मुख्य रूप | स्वर्ण, गुड़, ऊनी वस्त्र, कम्बल, गोदान, धान्य, नमक, घृत, चांदी, नारियल, कद्दू, नींबू आदि |
| विशेष पूजन | विश्वदेव पूजा, लक्ष्मी पूजन, गणेश पूजा, दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला |
| विशेष पूर्णिमा योग | पुष्य युक्त पौष पूर्णिमा पर वासुदेव अभिषेक, घृत और स्वर्णदान |
| आध्यात्मिक भाव | संयम, तप, कर्म शुद्धि, स्वास्थ्य, समृद्धि और स्थिर भक्ति की दिशा |
पौष मास साधक के लिए जैसे एक शांत निमंत्रण की तरह आता है।
यह सिखाता है कि
भी जीवन के भीतर बहुत गहरा परिवर्तन ला सकते हैं।
जो व्यक्ति कठोर व्रत न भी रख सके, वह
अपनाकर पौष मास की विशेष ऊर्जा को महसूस कर सकता है।
धीरे धीरे यह महीना उसे शांत मन, शुद्ध कर्म और स्थिर भक्ति की ओर ले जाने वाला शुभ मार्गदर्शक बन जाता है।
पौष मास को खर मास क्यों कहा जाता है और क्या हर प्रकार का शुभ कार्य वर्जित है?
पौष में सूर्य प्रायः धनु राशि में रहते हैं, जिसे कई मतों में मांगलिक कार्यों के लिए कम अनुकूल माना गया है, इसलिए इसे खर मास कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर शुभ कार्य वर्जित है बल्कि विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य टालने की सलाह है, जबकि पूजा, जप, दान, तीर्थस्नान और साधना पौष में विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।
क्या पौष मास में हर दिन एकभुक्त व्रत आवश्यक है?
शास्त्र पूरे पौष मास को एकभुक्त बिताने की महिमा बताते हैं, पर यह नियम साधक की क्षमता पर निर्भर करता है। जो पूरा मास न कर सके, वह सप्ताह में कुछ दिन या विशेष तिथियों पर एकभुक्त रहकर भी फल प्राप्त कर सकता है, मुख्य बात भोजन में संयम और भक्ति भाव है।
पौष मास में कौन से दान सबसे प्रभावी माने जाते हैं?
विभिन्न ग्रंथों के अनुसार इस मास में अन्नदान, कम्बल और ऊनी वस्त्र, गुड़, नमक, घी, चांदी, स्वर्ण, गोदान, धान्य, नारियल, कद्दू और नींबू का दान अत्यंत फलदायी है। साधारण गृहस्थ के लिए विशेष रूप से अन्न, वस्त्र और गुड़ का दान सरल और प्रभावी साधन माना जा सकता है।
क्या पौष मास में गृहप्रवेश या नया घर लेना ठीक है?
परंपरा के अनुसार पौष में गृहप्रवेश से चोर भय और अस्थिरता की आशंका कही गई है, इसलिए सामान्यतः इस मास में गृहप्रवेश से बचने की सलाह दी जाती है। यदि मजबूरीवश करना ही हो तो अनुभवी ज्योतिषी से तिथि, नक्षत्र और मुहूर्त देख कर, विशेष शांति पूजन के साथ प्रवेश करना अधिक संतुलित रहता है।
पौष मास में साधारण व्यक्ति के लिए कौन सी सरल साधना सबसे व्यावहारिक है?
साधारण गृहस्थ के लिए पौष मास में प्रातः स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देना, दिन में कम से कम कुछ माला विष्णु के द्वादश नामों या गायत्री मंत्र का जप करना, सप्ताह में कभी एकभुक्त नियम अपनाना और समय समय पर अन्न, गुड़, कम्बल या नमक का छोटा दान करना अत्यंत व्यावहारिक और फलदायी सिद्ध हो सकता है।
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