By पं. संजीव शर्मा
बारिश के मौसम में श्रवण माह में धर्म, सत्संग और गुरु की शिक्षाओं का महत्व

हिंदू पंचांग में श्रावण मास को चातुर्मास का प्रथम और अत्यंत पवित्र महीना माना जाता है। वर्षा ऋतु के बीच यह महीना भीतर से सुनने, समझने और धर्म को आत्मसात करने का विशेष अवसर देता है। सामान्यतः श्रावण मास वर्ष के मध्य, वर्षा के प्रबल समय में आता है जब प्रकृति भी अपना नया रूप धारण कर रही होती है और मनुष्य के भीतर भी नये संकल्प जागते हैं।
श्रावण शब्द श्रवण से निकला है जिसका अर्थ है सुनना। वेदों को श्रुति कहा गया, अर्थात वह ज्ञान जिसे ऋषियों ने ईश्वर से जैसे सुना, वैसे ही लोक में सुनाया। इसी भाव से श्रावण मास को धर्म श्रवण, satsang, कथा, कीर्तन और गुरु वाणी को सुनकर जीवन बदलने का मास माना गया है। इस मास में किसी भी इष्टदेव की भक्ति की जा सकती है, पर विशेष रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीकृष्ण की पूजा को अत्यंत फलदायी बताया गया है।
हिंदू परंपरा में अनेक व्रत हैं जैसे चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा। फिर भी व्रत साधना के लिए सबसे विशेष समय चातुर्मास को माना गया है।
चातुर्मास की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं।
श्रावण मास चातुर्मास का पहला चरण है। इसलिए जो साधक इस महीने से व्रत, जप, स्वाध्याय और संयम शुरू करता है, उसके लिए आगे के तीन महीने भी उसी दिशा में साधना को गहरा करने के लिए खुल जाते हैं।
श्रावण मास को विशेष रूप से महादेव भगवान शिव का प्रिय माना गया है। पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार जब सनत कुमारों ने महादेव से पूछा कि उन्हें सावन मास इतना प्रिय क्यों है तब उन्होंने देवी सती और पार्वती की कथा बताई।
देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में स्वयं योग शक्ति से देह त्यागने से पूर्व संकल्प किया था कि वे हर जन्म में शिव को ही पति रूप में प्राप्त करेंगी। अगले जन्म में वे पार्वती के रूप में हिमाचल और रानी मैना के घर जन्मीं। युवावस्था में पार्वती ने सावन मास में निराहार रहकर कठोर व्रत किया, गहन तपस्या से महादेव को प्रसन्न किया और अंततः उन्हीं से विवाह किया।
इसी घटना के कारण सावन मास महादेव के लिए विशेष और पवित्र हो गया। श्रावण में रखे जाने वाले सोमवार व्रत उसी प्रेम, समर्पण और अटूट संकल्प की प्रतीक साधना माने जाते हैं।
समय के साथ श्रावण मास को अधिकतर लोग श्रावण सोमवार के रूप में पहचानने लगे, जिससे यह धारणा बन गई कि इस मास में केवल सोमवार को ही व्रत रखना चाहिए। जबकि शास्त्रीय दृष्टि से यह महीना पूरे चातुर्मास के व्रतों का प्रारम्भ बिंदु है।
सामान्य जन सोमवार को व्रत रखकर भी इस मास का फल प्राप्त कर सकते हैं।
श्रद्धा का रूप भिन्न हो सकता है, पर भाव यह है कि श्रावण में जितने अधिक दिन संयम और भक्ति से बिताए जाएँ, उतना ही मन और जीवन पर इसका प्रभाव गहरा होता है।
हिंदू धर्म में श्रावण मास को पूर्ण रूप से व्रत साधना का माह माना गया है।
जो साधक पूरे मास व्रत रखना चाहते हैं, उनके लिए कुछ विकल्प इस प्रकार रहते हैं।
आवश्यक बात यह है कि व्रत शास्त्रसम्मत हो, न कि मनमाने ढंग से बनाया गया नियम। जब व्रत नियमपूर्वक और श्रद्धा से किया जाता है तो श्रावण मास में उसका आध्यात्मिक लाभ अधिक प्राप्त होता है।
श्रावण मास में लगभग हर दिन किसी न किसी दृष्टि से पवित्र माना जाता है। फिर भी कुछ तिथियाँ और व्रत विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने गए हैं।
श्रावण के प्रमुख पवित्र दिनों की सूची इस प्रकार समझी जा सकती है।
इन सभी दिनों का स्वरूप अलग हो सकता है पर मूल भाव भक्ति, संयम और सामूहिक उत्सव ही है।
जो साधक पूरे श्रावण मास व्रत करने का संकल्प लेते हैं, उनके लिए शरीर और मन दोनों के लिए कुछ प्रमुख नियम बताए गए हैं।
इस व्रत में कुछ पदार्थों का त्याग विशेष रूप से बताया गया है।
अग्नि पुराण में कहा गया है कि व्रतधारी को प्रतिदिन स्नान करना, सीमित मात्रा में भोजन करना और संयमित रहना चाहिए। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में यह व्यवस्था है कि जो व्रत उपवास करता है, उसे अपने इष्टदेव के मंत्रों का मौन जप, ध्यान, कथा श्रवण और पूजा अवश्य करनी चाहिए।
श्रावण मास की एक महत्वपूर्ण साधना श्रावणी उपाकर्म के रूप में जानी जाती है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो वैदिक परंपरा और स्वाध्याय से जुड़ना चाहते हैं।
श्रावणी उपाकर्म प्रायः इस प्रकार समझा जाता है।
श्रावणी उपाकर्म के तीन मुख्य पक्ष बताए गए हैं।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रावणी उपाकर्म प्रत्येक सनातनी के लिए अत्यंत उपयोगी साधना मानी गई है। इसमें विभिन्न प्रकार के स्नान, पितरों के लिए तर्पण, जप और हवन के माध्यम से शरीर, मन और इंद्रियों की पवित्रता का अभ्यास किया जाता है। वैदिक काल से यह पर्व आत्मशुद्धि के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
वास्तविक व्रत केवल भोजन बदलने या विशेष व्यंजन खाने का नाम नहीं है।
कई लोग उपवास के नाम पर दो समय भर पेट फरियाली या व्रत वाले व्यंजन खा लेते हैं। कुछ लोग एक समय भोजन का नियम बनाते हैं लेकिन उस एक समय में अत्यधिक भारी भोजन कर लेते हैं। कोई केवल चप्पल छोड़ देता है पर वाणी का संयम, क्रोध और कटुता नहीं छोड़ता।
शास्त्रीय दृष्टि से व्रत में इन बातों से बचना चाहिए।
वास्तविक व्रत यह है कि यात्रा, सहवास, अनावश्यक वार्ता, भारी भोजन आदि का त्याग करके, नियमपूर्वक संयम रखा जाए। तभी व्रत का फल गहरा होता है।
धर्मशास्त्र व्रत के साथ साथ संतुलन भी सिखाते हैं। इसलिए कुछ अवस्थाओं में व्रत से बचने की स्पष्ट सलाह दी गई है।
इन परिस्थितियों में व्रत न रखना ही उचित माना गया है।
उद्देश्य यह है कि धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं। व्रत वही सार्थक है जो शरीर, मन और जीवन की स्थिति को देखते हुए सहोदय संतुलन के साथ लिया जाए।
श्रावण मास में व्रत रखने का उद्देश्य केवल पाप का भय नहीं बल्कि तीन स्तरों पर अपने को मजबूत करना है।
दैहिक लाभ
व्रत से देह की शुद्धि होती है। समय समय पर भोजन से विश्राम मिलने पर शरीर के भीतर जमा विषाक्त तत्व बाहर निकलने लगते हैं। इससे पाचन तंत्र हल्का होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर अधिक सजग रहता है।
मानसिक लाभ
व्रत का मूल उद्देश्य संकल्प को मजबूत करना है। जब मन को कहा जाता है कि आज इतना ही भोजन करना है, इतने समय मौन रखना है, इतना ही बोलना है, तो धीरे धीरे भीतर इच्छाशक्ति का विकास होता है। संकल्पवान मन में ही सकारात्मकता और स्थिरता आती है।
आत्मिक लाभ
जब देह और मन दोनों थोड़े हल्के हो जाते हैं तब साधक अपने भीतर की उपस्थिति को अधिक स्पष्ट रूप से महसूस कर पाता है। यही आत्मिक ज्ञान की शुरुआत है, जिसमें व्यक्ति शरीर और मन से थोड़ा ऊपर उठकर स्वयं को देखने लगता है।
यदि कभी भी व्रत न रखे जाएँ, शरीर को लगातार भारी भोजन मिलता रहे, तो समय के साथ पाचन क्रिया सुस्त पड़ने लगती है। आंतों में सड़न, गैस, पेट फूलना, तोंद निकलना या भविष्य में गंभीर रोगों की सम्भावना बढ़ सकती है।
व्रत का अर्थ यह नहीं कि शरीर को सुखा दिया जाए बल्कि यह है कि कुछ समय के लिए शरीर को आराम दिया जाए और भीतर के विषाक्त तत्वों को बाहर निकलने का अवसर दिया जाए। प्रकृति में देखा जाए तो कई पशु और पक्षी भी बीमार होने या अधिक थकान पर स्वतः भोजन कम कर देते हैं। यह उनका स्वाभाविक व्रत है जो उन्हें स्वस्थ होने में मदद करता है।
श्रावण मास में प्रकृति जैसे पुनर्जन्म लेती हुई प्रतीत होती है।
इसी कारण श्रावण मास में प्रायः उबला या छना हुआ जल लेने की सलाह दी जाती है। भोजन हल्का और शुद्ध रखा जाए तो शरीर को इस परिवर्तनशील मौसम में अधिक सुरक्षा मिलती है।
श्रावण से वर्षा ऋतु का पूर्ण विस्तार शुरू हो जाता है। चारों ओर हरियाली फैलती है। ऐसे समय यदि शरीर को उचित रस, पोषक तत्व और थोड़ा संयम मिले तो वह जैसे नया जीवन और नया यौवन प्राप्त कर सकता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| शब्द का अर्थ | श्रवण से बना, सुनकर धर्म को समझने का मास |
| वर्ष में स्थान | चातुर्मास का प्रथम और वर्षा ऋतु का प्रमुख महीना |
| प्रमुख देवता | भगवान शिव, माता पार्वती, श्रीकृष्ण |
| महत्वपूर्ण आरम्भ | आषाढ़ शुक्ल एकादशी से चातुर्मास, श्रावण पहला मास |
| मुख्य व्रत और साधना | सोमवार व्रत, फलाहार, जप, स्वाध्याय, श्रावणी उपाकर्म |
| पवित्र तिथियाँ | सोमवार, एकादशी, नाग पंचमी, हरियाली अमावस्या, रक्षाबंधन आदि |
| नियम पूर्ण व्रत के लिए | फर्श पर सोना, शीघ्र उठना, मौन, सीमित फलाहार |
| त्याज्य वस्तुएँ | पत्तेदार सब्जियाँ, भारी भोजन, मांस, मदिरा, दाढ़ी बाल कटिंग |
| किन्हें व्रत न रखने की सलाह | अशौच, अस्वस्थ व्यक्ति, रजस्वला स्त्री, युद्ध या आपात स्थिति |
| मुख्य लाभ | देह शुद्धि, मानसिक संकल्प शक्ति, आत्मिक जागृति |
श्रावण मास हर वर्ष यह स्मरण कराता है कि जीवन केवल भागदौड़, कार्य और भोग तक सीमित नहीं है। वर्ष के बीच यह एक ऐसा अध्याय खोलता है जहाँ सुनने, साधना और संकल्प की भाषा में अपने आप से मिलना सम्भव होता है।
जो साधक इस महीने में अपनी क्षमता के अनुरूप सोमवार व्रत, थोड़ा संयम, नाम जप, कथा श्रवण, श्रावणी उपाकर्म, पितृ तर्पण या केवल साधारण नियम लेकर भी चल पड़ता है, उसके लिए श्रावण मास शरीर, मन और आत्मा तीनों स्तरों पर ताज़गी, शुद्धि और दृढ़ संकल्प का मास बन सकता है।
श्रावण शब्द का आध्यात्मिक अर्थ क्या समझना चाहिए?
श्रावण शब्द श्रवण से निकला है, जिसका अर्थ है सुनना। इस मास में वेद, कथा, गुरु वाणी और इष्टदेव के नाम का श्रवण विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि सुनकर ही धर्म भीतर उतरता है।
क्या श्रावण में केवल सोमवार को ही व्रत आवश्यक है?
आमजन के लिए सोमवार व्रत सरल और प्रसिद्ध साधना है, पर शास्त्र के अनुसार श्रावण से पूरे चातुर्मास की व्रत साधना शुरू होती है। जो साधक चाहें वे पूरे मास या अधिक दिनों तक भी संयमित व्रत रख सकते हैं।
श्रावणी उपाकर्म का मुख्य उद्देश्य क्या है?
श्रावणी उपाकर्म का उद्देश्य प्रायश्चित, संस्कार और स्वाध्याय के माध्यम से शरीर, मन और इंद्रियों की शुद्धि करना है। नदी किनारे या आश्रम में गुरु के सान्निध्य में रहकर यह साधना की जाए तो और अधिक फलदायी मानी जाती है।
कौन लोग श्रावण में व्रत न रखें तो बेहतर है?
अशौच में रहने वाले, गंभीर रोग से पीड़ित, ऐसी स्थिति में जहाँ व्रत से स्वास्थ्य बिगड़ सकता हो, रजस्वला स्त्री, अत्यधिक यात्रा या युद्ध जैसी स्थिति में रहने वाले व्यक्तियों के लिए व्रत न रखना ही उचित माना गया है।
श्रावण मास में व्रत न रखने पर क्या आध्यात्मिक हानि होती है?
श्रावण में व्रत न रखने से कोई केवल भय की दृष्टि से दोषी नहीं होता, पर यदि जीवन में कभी भी संयम न अपनाया जाए तो शरीर में विषाक्तता, पाचन की कमजोरी और मानसिक अस्थिरता की सम्भावना बढ़ सकती है। श्रावण में रखा गया उचित व्रत शरीर को विश्राम, मन को संकल्प शक्ति और आत्मा को जागरूकता देता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, आध्यात्मिकता और कर्म
इनके क्लाइंट: दि., उ.प्र., म.हा.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें