By पं. अमिताभ शर्मा
धर्म, तपस्या और भगवान विष्णु से जुड़े वैशाख महीने के पुण्यकारी पहलू

हिंदू पंचांग में वैशाख मास को अत्यंत पुण्यप्रद और धर्म साधक माह माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि जैसे माता अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी करने का प्रयास करती है वैसे ही वैशाख मास भी योग्य साधक की अनेक कामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है। यह महीना विशेष रूप से भगवान विष्णु को प्रिय कहा गया है और धर्म, यज्ञ, श्रेष्ठ कर्म तथा तपस्या की साररूप अभिव्यक्ति समझा गया है।
स्कंद पुराण के अनुसार वैशाख का स्थान उतना ही उच्च है जितना वेद विद्या का विद्या में, प्रणव मंत्र का मंत्रों में, कल्पवृक्ष का वृक्षों में, सूर्य देव का तेजस्वी देवताओं में, सुदर्शन चक्र का अस्त्रों शस्त्रों में, स्वर्ण का धातुओं में, शिव का वैष्णवों में और कौस्तुभ मणि का रत्नों में माना गया है। इस मास में जो व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व स्नान करता है उसे विशेष रूप से नारायण का प्रिय समझा गया है।
शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि जैसे वैशाख का महत्त्व अद्वितीय है वैसे ही सत्ययुग का कोई दूसरा युग नहीं, जलदान जैसा कोई अन्य दान नहीं, खेती जैसी कोई समृद्धि नहीं, उपवास जैसी कोई तपस्या नहीं, दान देने जैसा कोई सुख नहीं, दया जैसा कोई धर्म नहीं, श्रेष्ठ स्वास्थ्य जैसा कोई ऐश्वर्य नहीं और अंततः भगवान विष्णु जैसा कोई अन्य देव नहीं।
वैशाख मास की सबसे प्रमुख साधना जलदान मानी गई है। विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में जब प्यास से व्याकुल जनों को थोड़ी सी शीतल छाया और पानी जीवनदान जैसा अनुभूत होता है तब जल की व्यवस्था करना अत्यंत महापुण्य का कार्य बताया गया है।
इस मास में इन कार्यों को विशेष फलदायी माना गया है।
ऐसी सेवा से मनुष्य को केवल इस जीवन में ही नहीं बल्कि परलोक में भी बड़े लाभ प्राप्त होते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार जो व्यक्ति वैशाख मास में इस प्रकार की दानपरक व्यवस्था करता है उसे इहलोक में सुख, प्रतिष्ठा और संतति का सुख मिलता है तथा परलोक में नरक लोकों से रक्षा और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
वैशाख मास में विविध प्रकार के दान बताए गए हैं जिनके विशिष्ट फल माने गए हैं।
इसके साथ ही कंद, मूल, फल, शाक, नमक, गुड़, खाद्य पत्तियों और जल के दान को भी इस मास में विशेष रूप से अनंत फलदायक कहा गया है।
स्कंद पुराण में वैशाख मास में कुछ आचरणों से बचने की स्पष्ट शिक्षा दी गई है। इन्हें आठ प्रकार के परहेज के रूप में बताया गया है।
जो व्यक्ति इन परहेजों का पालन करते हुए वैशाख के व्रत, दान और स्नान करता है उसके लिए इस मास का फल और बढ़ जाता है।
वैशाख मास में सूर्योदय से पूर्व पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत श्रेष्ठ फलदायी माना गया है। कहा गया है कि यदि व्यक्ति वैशाख में प्रातः काल इन सात नदियों में से किसी में भी विधि से स्नान कर ले तो वह पंच महापातकों तक से भी मुक्त हो सकता है।
इन सात पवित्र नदियों का उल्लेख किया गया है।
जो साधक इन नदियों में स्नान करने में समर्थ न हो वह घर पर भी शुद्ध जल में स्नान करते समय इन नदियों का स्मरण कर सकता है।
वैशाख स्नान के समय भगवान मधुसूदन और माधव का ध्यान करते हुए विशेष प्रार्थना की जाती है।
“मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।
प्रातः स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।”
इस मंत्र का अर्थ है कि हे मधुसूदन, देवेश, माधव। जब सूर्य मेष राशि में स्थित हैं तब वैशाख मास में प्रातः स्नान करने का संकल्प किया जा रहा है, इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए और कृपा कीजिए।
स्नान के उपरांत अर्घ्य प्रदान करते समय यह भावना की जाती है।
“वैशाखे मेषगे भानौ प्रातः स्नान परायणः।
अर्घ्यं तेऽहं प्रददामि गृहाण मधुसूदन।”
अर्थ यह कि वैशाख मास में, जब सूर्य मेष राशि में हैं, प्रातः स्नान के पश्चात यह अर्घ्य भगवान मधुसूदन को अर्पित किया जा रहा है, कृपया इसे स्वीकार कीजिए।
स्कंद पुराण में काशीपुरी के राजा कीर्तिमान की कथा वर्णित है। एक बार वे वन विहार के लिए निकले और वसिष्ठ ऋषि के आश्रम के समीप पहुँचे। उन्होंने देखा कि आश्रम के शिष्य मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों को छाया, फल और शीतल जल दे रहे हैं। वे राजा सहित किसी के उच्च या निम्न होने की परवाह किए बिना सबकी सेवा में लगे थे।
राजा ने आश्चर्य से पूछताछ की पर शिष्यों ने विनम्र मौन रखा। बाद में वसिष्ठ ऋषि ने राजा को वैशाख मास के महात्म्य के बारे में बताया और समझाया कि इस मास में जलदान, अन्नदान, छाया और विश्राम की सुविधा देना कितने बड़े पुण्य का कारण है।
प्रभावित होकर राजा कीर्तिमान ने अपने समूचे राज्य में यह व्यवस्था करवा दी कि वैशाख मास में हर स्थान पर पियाऊ, वृक्षारोपण, विश्राम गृह, अन्नदान और यात्रियों के लिए सुविधा की व्यवस्था की जाए। इसके फलस्वरूप उनके राज्य में विशेषकर ब्राह्मणों के बीच मृत्यु दर अत्यंत कम हो गई और जो भी विरले लोग वैशाख में संसार से विदा होते वे भी सीधे वैकुण्ठ के योग्य बनते दिखाई दिए।
कहा जाता है कि जब यह स्थिति बनी तो यमराज ने ब्रह्मा जी से शिकायत की कि कीर्तिमान के राज्य में मृत्यु और जन्म की सामान्य व्यवस्था बाधित होने लगी है और नरक और स्वर्ग के बीच का अंतर भी कम होता दिख रहा है।
ब्रह्मा जी ने यमराज के साथ क्षीरसागर में जाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए बोले कि वे अपने श्रीवत्स, कौस्तुभ मणि, विजयन्ती माला, श्वेतद्वीप, वैकुण्ठ, क्षीरसागर, शेष नाग, गरुड़ या यहाँ तक कि लक्ष्मी जी का भी त्याग कर सकते हैं, किंतु अपने वैशाख भक्त राजा कीर्तिमान को कभी नहीं छोड़ेंगे।
भगवान ने कहा कि वे ऐसे भक्तों के उदाहरणों को बढ़ाना चाहते हैं और उनके जीवन काल को अत्यंत दीर्घ करना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यमराज को आदेश दिया कि वैशाख मास के महात्म्य को बाधित करने का प्रयास न किया जाए।
हाँ, न्याय के संतुलन के लिए भगवान विष्णु ने यमराज के पक्ष में एक विशेष व्यवस्था अवश्य की। यह कि वैशाख मास के साधक पूर्णिमा से पूर्व प्रथम पक्ष में यमराज के लिए विशेष पूजा करें और जल, दही और अन्न से भरा हुआ पात्र दान दें।
वैशाख के प्रथम पक्ष में जो भक्त यथाशक्ति यमराज की प्रार्थना और संतुष्टि के लिए पूजा करते हैं उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे पहले यमराज का सम्मान करें। उसके बाद ही पितरों, गुरुओं और भगवान विष्णु के नाम से पूजा और दान किया जाए।
इस विशेष पूजा के अंतर्गत ब्राह्मणों को शीतल जल, दही, अन्न, फलों, ताम्बूल, उचित दक्षिणा, एक ताँबे का पात्र और महा विष्णु की प्रतिमा का दान करने की सलाह दी गई है। इस प्रकार यमराज और देवताओं के बीच संतुलन बनाए रखते हुए वैशाख के धर्मसाधक स्वरूप को और मजबूत किया गया है।
स्कंद पुराण में अक्षय तृतीया की कथा भी वैशाख मास के संदर्भ में आती है। पांचाल देश के राजा पुरुषय का उल्लेख है जो स्वभाव से धार्मिक और उदार थे, किंतु पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के कारण उनके राज्य में अकाल पड़ा और पड़ोसी राजाओं ने उनका राज्य छीन लिया।
बाद में दो ऋषियों ने उन्हें बताया कि पूर्व जन्म में वे एक निर्दयी शिकारी थे, लेकिन संयोग से उन्होंने दो वृद्ध और प्यासे व्यक्तियों को एक जलाशय का रास्ता दिखाया था। उसी एक पुण्य के फलस्वरूप उन्हें इस जन्म में राजपद मिला, किंतु दान और वैशाख धर्म का पालन न करने की वजह से कठिनाई आई।
ऋषियों ने उन्हें बताया कि अगले दिन वैशाख शुक्ल तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया है। उस दिन प्रातः स्नान, लक्ष्मीपति विष्णु की पूजा, जलदान, अन्नदान आदि करने से उनके जीवन की दिशा बदल सकती है। राजा ने ऐसा ही किया। उन्होंने अक्षय तृतीया से अमावस्या तक अनेक दान किए, जलाशयों और पियाऊ की व्यवस्था की, भूखों को भोजन कराया। इससे उनका खोया हुआ राज्य वापस मिला और वे हर वर्ष वैशाख मास में इसी प्रकार दान करते रहे। अंततः वे भगवान विष्णु के महान भक्त बने, साक्षात दर्शन प्राप्त किए और सायुज्य की प्राप्ति की।
वैशाख मास के प्रत्येक दिन का अपना महत्त्व है, लेकिन विशेष रूप से एकादशी और अमावस्या पर जोर दिया गया है।
वैशाख एकादशी को किये गए स्नान, दान, होम, देव पूजा, जप, स्तोत्र पाठ और कथा श्रवण तुरंत फल देने वाले बताए गए हैं। जो लोग रोग, दरिद्रता या मानसिक कष्ट से पीड़ित हों वे यदि वैशाख एकादशी पर श्रद्धा से पुण्य कर्म करें तो उन्हें विशेष राहत प्राप्त हो सकती है। विभिन्न वर्ग जैसे स्त्री, पुरुष, विधवा, वृद्ध, बालक, युवा और अन्य सभी इस दिन के पुण्य से अपने जीवन के दुःख कम कर सकते हैं।
इसी प्रकार वैशाख अमावस्या को पितृ पूजा के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना गया है। इस दिन श्राद्ध, पिंडदान और तिल तर्पण का विस्तृत विधान बताया गया है। जो साधक वैशाख अमावस्या को पितरों के लिए श्रद्धा से कर्म करते हैं उन्हें पितृ कृपा और वंश में शांति की प्राप्ति होती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| वैशाख का स्वभाव | धर्म साधक, विष्णु प्रिय, तप और दान का माह |
| मुख्य साधना | सूर्योदय पूर्व स्नान, जलदान, अन्नदान, छाया का दान |
| विशेष दान | वस्त्र, शय्या, चटाई, चंदन, पुष्प, जल और अन्न |
| प्रमुख परहेज | तेल मलना, दिन में सोना, रात में भारी भोजन आदि |
| स्नान के पवित्र स्थल | सप्त गंगा और अन्य तीर्थों का स्मरण |
| मुख्य मंत्र | मधुसूदन और माधव का स्मरण करते हुए स्नान संकल्प |
| विशेष कथाएँ | राजा कीर्तिमान, राजा पुरुषय और अक्षय तृतीया |
| मुख्य तिथियाँ | वैशाख स्नान, अक्षय तृतीया, एकादशी और अमावस्या |
| पितृ कर्म | अमावस्या पर श्राद्ध, पिंडदान, तिल तर्पण |
वैशाख मास केवल पंचांग का दूसरा महीना नहीं बल्कि धर्म, दान और तपस्या का संगम है। जलदान, अन्नदान, वृक्षारोपण, पियाऊ की व्यवस्था और साधना के छोटे छोटे संकल्प भी जब वैशाख में किए जाते हैं तो उनका फल दीर्घकाल तक बना रहता है।
जो व्यक्ति इस मास में यथाशक्ति स्नान, दान, जप, पूजा और पितृ कर्म का पालन करता है वह अपने जीवन में ही नहीं बल्कि आगे की यात्रा में भी हल्कापन और सुरक्षा का अनुभव कर सकता है। वैशाख हमें यह सिखाता है कि प्रकृति की गरमी के बीच दूसरों को ठंडक देना ही सबसे बड़ा धर्म है।
वैशाख मास को इतना पुण्यप्रद क्यों माना गया है?
वैशाख मास धर्म, यज्ञ, श्रेष्ठ कर्म और तपस्या का सार कहा गया है और इसे भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय माह माना जाता है। जलदान, स्नान और दान जैसे कार्य इस मास में कई गुना फल देते हैं।
वैशाख में जलदान और वृक्षारोपण का विशेष महत्त्व क्या है?
ग्रीष्म ऋतु में प्यासे और थके यात्रियों के लिये जल, छाया और विश्राम की व्यवस्था करना जीवनरक्षक सेवा मानी गई है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि ऐसे दान से इहलोक और परलोक दोनों में विशाल पुण्य प्राप्त होता है।
वैशाख मास में किन कार्यों से बचना चाहिए?
इस मास में अत्यधिक तेल मलना, दिन में सोना, रात में भारी भोजन करना, काँच के बर्तनों में भोजन करना, जलशैय्या पर सोना और एक दिन में कई बार अधिक भोजन करना त्याज्य माने गए हैं।
अक्षय तृतीया को वैशाख मास में क्यों विशेष माना गया है?
वैशाख शुक्ल तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया को स्नान, विष्णु पूजा, जलदान और अन्नदान के द्वारा ऐसा पुण्य अर्जित होता है जिसे अक्षय माना गया है। राजा पुरुषय की कथा से यह स्पष्ट होता है कि इस तिथि के दान से जीवन की दिशा तक बदल सकती है।
वैशाख की एकादशी और अमावस्या पर कौन से कर्म करना श्रेष्ठ है?
वैशाख एकादशी पर स्नान, दान, जप, स्तोत्र पाठ और कथा श्रवण करना अत्यंत फलदायी है। वैशाख अमावस्या पर पितृ पूजा, श्राद्ध, पिंडदान और तिल तर्पण से पितृ कृपा और वंश की शांति मानी जाती है।
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