By पं. संजीव शर्मा
नवरात्रि में पुनः प्रज्वलन, प्रायश्चित और सुरक्षा नियम

आश्विन नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाना देवी आराधना का अत्यंत भावपूर्ण संकल्प माना जाता है। नौ दिनों तक जलने वाली यह ज्योति साधक के लिए केवल दीपक नहीं होती। यह घर में जाग्रत देवी चेतना, आशा, अनुशासन और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक बन जाती है।
इसी कारण जब हवा के तेज झोंके, तेल या घी की कमी, बाती के पूरी तरह जल जाने, दीपक के असंतुलित होने या किसी अन्य अनजाने कारण से अखंड ज्योति बुझ जाती है तब मन में भय उत्पन्न हो सकता है। कई लोग इसे अनिष्ट का संकेत मानकर चिंतित हो जाते हैं। परंतु दीपक का बुझना हमेशा किसी अशुभ घटना का संकेत नहीं होता। यह अनेक बार एक स्वाभाविक भौतिक कारण से होता है।
देवी उपासना में भाव, श्रद्धा, शुद्ध आचरण और संकल्प को प्रधानता दी जाती है। इसलिए ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय शांत मन से दीपक को फिर से प्रज्वलित करना, क्षमा प्रार्थना करना और पूजा जारी रखना उचित माना जाता है।
यदि अखंड ज्योति बुझ जाए तो पहले आग और तेल से जुड़ी सुरक्षा को ध्यान में रखें। दीपक गर्म हो सकता है। उसे तुरंत हाथ से उठाने या तेल डालने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जब पात्र सुरक्षित रूप से संभालने योग्य हो जाए तभी आगे की विधि करें।
| क्रम | क्या करें |
|---|---|
| 1 | मन को शांत करके माता दुर्गा का स्मरण करें |
| 2 | दीपक के पास एक छोटा साक्षी दीपक जलाएं |
| 3 | अखंड दीपक को सुरक्षित होने तक न छुएं |
| 4 | जली हुई या अधजली बाती को सावधानी से हटाएं |
| 5 | पात्र को साफ करके शुद्ध घी या उपयुक्त तेल डालें |
| 6 | नई और पर्याप्त लंबी बाती रखें |
| 7 | साक्षी दीपक की लौ से अखंड ज्योति फिर जलाएं |
| 8 | माता से क्षमा प्रार्थना करें |
| 9 | संकल्प दोहराकर पूजा जारी रखें |
| 10 | कुछ समय तक दीपक की लौ पर ध्यान रखें |
यदि साक्षी दीपक पहले से जल रहा हो तो उसी से अखंड ज्योति को दोबारा जलाना कई घरेलू परंपराओं में शुभ माना जाता है। यदि साक्षी दीपक नहीं रखा गया था तो नया छोटा दीपक जलाकर उसके बाद अखंड ज्योति प्रज्वलित की जा सकती है।
अखंड ज्योति बुझने को लेकर अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग मान्यताएं मिलती हैं। कुछ लोग इसे संकल्प में आई बाधा मानते हैं। कुछ परंपराएं इसे केवल दीपक की लौ से जुड़ी सामान्य घटना मानती हैं। किसी एक मत को सभी परिवारों पर अनिवार्य नियम की तरह लागू करना उचित नहीं है।
ज्योति बुझने के सामान्य कारण हो सकते हैं।
• तेल या घी का समाप्त हो जाना
• बाती का बहुत छोटी हो जाना
• बाती का एक ओर झुक जाना
• दीपक में नमी या अशुद्धि आ जाना
• तेज हवा या पंखे की हवा
• दीपक का असंतुलित स्थान पर रखा होना
• तेल की तुलना में बाती का अधिक मोटा होना
• पात्र में कालिख का जम जाना
इन कारणों को समझे बिना ज्योति बुझने को भविष्य की अनहोनी से जोड़ना मन में अनावश्यक भय पैदा कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से भय के बजाय सजगता और श्रद्धा अधिक उपयोगी हैं।
दीपक की लौ को भारतीय परंपरा में अग्नि तत्त्व, ज्ञान और चेतना का प्रतीक माना गया है। जब भक्त अखंड ज्योति जलाता है तब वह अपने भीतर के अज्ञान, आलस्य, भय और नकारात्मकता को प्रकाश में बदलने का संकल्प लेता है।
अखंड का अर्थ केवल यह नहीं कि लौ हर क्षण बिना किसी भौतिक बाधा के जलती रहे। इसका एक गहरा अर्थ निरंतर स्मरण भी है। यदि लौ किसी अनजाने कारण से बुझ जाए और भक्त शांत मन से उसे पुनः जलाकर पूजा जारी रखे तो संकल्प का भाव समाप्त नहीं होता।
दीपक की ज्योति तीन स्तरों पर समझी जा सकती है।
| स्तर | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| बाहरी लौ | पूजा स्थल में प्रकाश और पवित्रता |
| स्थिर लौ | मन की एकाग्रता और अनुशासन |
| पुनः प्रज्वलित लौ | भूल के बाद सुधार और विश्वास |
इस दृष्टि से बुझी हुई ज्योति भय का कारण नहीं बल्कि सावधानी और आत्मस्मरण का अवसर भी बन सकती है।
अखंड ज्योति को दोबारा जलाने से पहले पूजा स्थल को व्यवस्थित करें। यदि तेल या घी फैल गया हो तो फर्श और चौकी को साफ करें। जली हुई बाती को सम्मानपूर्वक हटाएं। उसे पूजा स्थान के आसपास न छोड़ें।
हाथ जोड़कर माता दुर्गा का स्मरण करें
एक छोटा दीपक जलाकर उसे साक्षी दीपक के रूप में रखें
अखंड दीपक के पात्र को ठंडा होने दें
बची हुई अधजली बाती को निकाल दें
पात्र को साफ कपड़े से पोंछें
शुद्ध घी या तिल का तेल डालें
नई रूई की लंबी बाती रखें
साक्षी दीपक से अखंड ज्योति जलाएं
दोनों हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें
दुर्गा मंत्र का जप करके संकल्प दोहराएं
बुझी हुई या आधी जली बाती को उसी रूप में फिर से जलाने के विषय में परिवारों की परंपराएं अलग हो सकती हैं। अनेक पूजा पद्धतियों में नई बाती लगाने की सलाह दी जाती है ताकि लौ स्थिर रहे और जली हुई बाती से धुआं न बने।
अखंड ज्योति दोबारा जलाते समय सरल और श्रद्धापूर्ण मंत्र का जप किया जा सकता है। मंत्र का उच्चारण स्पष्ट हो और मन में क्षमा तथा समर्पण का भाव रहे।
ॐ दुं दुर्गायै नमः
इसका भावार्थ है, दुर्गा देवी को नमस्कार। यह मंत्र रक्षा, साहस और देवी शरण का स्मरण कराता है।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इस मंत्र का संबंध देवी चामुंडा की शक्ति से माना जाता है। ऐं विद्या, ह्रीं शक्ति और क्लीं आकर्षण तथा चेतना के संकेंद्रण का बीज भाव रखता है। नवर्ण मंत्र का जप गुरु परंपरा और उचित उच्चारण के साथ करना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि।
इसका सरल अर्थ है कि दिन रात अनेक भूलें होती रहती हैं। भक्त स्वयं को देवी का सेवक मानकर क्षमा की प्रार्थना करता है।
यदि किसी व्यक्ति को संस्कृत मंत्रों का उच्चारण ठीक से ज्ञात न हो तो वह सरल हिंदी में भी प्रार्थना कर सकता है। सच्चे भाव से कही गई प्रार्थना पूजा का महत्वपूर्ण अंग है।
यदि ज्योति अनजाने में बुझी है तो संकल्प को पूरी तरह टूट गया मानना आवश्यक नहीं है। फिर भी दीपक दोबारा जलाने के बाद संकल्प को मन में दोहराना शुभ और मन को स्थिर करने वाला माना जाता है।
संकल्प में निम्न भाव रखा जा सकता है।
• नवरात्रि की पूजा श्रद्धा से पूरी करने का संकल्प
• देवी के प्रति क्षमा और समर्पण
• घर में शांति, स्वास्थ्य और सद्बुद्धि की प्रार्थना
• किसी जरूरतमंद को अन्न या वस्त्र देने का भाव
• क्रोध, असत्य और निंदा से दूर रहने का प्रयास
संकल्प किसी सौदे की तरह नहीं होना चाहिए। देवी से यह कहना कि ज्योति बुझ गई इसलिए निश्चित रूप से कोई वस्तु प्राप्त होनी चाहिए, पूजा के भाव को कमजोर करता है। संकल्प आत्मअनुशासन और भक्ति का साधन है।
ज्योति बुझने पर प्रायश्चित का अर्थ भय में किया गया कठिन कर्म नहीं है। प्रायश्चित का अर्थ है भूल को स्वीकार करना, पूजा को शुद्ध भाव से जारी रखना और अपने व्यवहार में सुधार लाना।
सामर्थ्य के अनुसार निम्न सात्विक उपाय किए जा सकते हैं।
• माता दुर्गा के सामने क्षमा प्रार्थना
• 11, 21 या 108 बार दुर्गा मंत्र का जप
• दुर्गा सप्तशती के किसी अध्याय का पाठ
• जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न दान
• कन्या को फल, भोजन या उपयोगी वस्तु देना
• मंदिर या घर के पूजा स्थल की सफाई
• किसी बुजुर्ग, रोगी या असहाय व्यक्ति की सेवा
• नवरात्रि के शेष दिनों में दीपक की सावधानीपूर्वक देखभाल
दान का उद्देश्य डर दूर करना नहीं बल्कि सेवा और विनम्रता विकसित करना होना चाहिए। किसी पंडित, ज्योतिषी या साधक द्वारा भय दिखाकर महंगे अनुष्ठान कराने का दबाव उचित नहीं है।
नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाने के लिए श्रद्धा के साथ व्यावहारिक सावधानी भी आवश्यक है। दीपक को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां हवा का सीधा प्रवाह न हो, लेकिन उसे पूरी तरह बंद और असुरक्षित स्थान में भी नहीं रखना चाहिए।
| सावधानी | कारण |
|---|---|
| दीपक को स्थिर चौकी पर रखें | गिरने का खतरा कम होता है |
| पंखे या खुली खिड़की से दूर रखें | हवा से लौ बुझ सकती है |
| घी या तेल की मात्रा देखते रहें | ईंधन समाप्त होने से दीपक बुझ सकता है |
| बाती की स्थिति जांचें | झुकी या छोटी बाती लौ को कमजोर करती है |
| आसपास कपड़ा और कागज न रखें | आग फैलने का खतरा कम होता है |
| बच्चों और पालतू पशुओं से दूर रखें | दुर्घटना से बचाव होता है |
| दीपक को अकेला असुरक्षित न छोड़ें | अग्नि सुरक्षा बनी रहती है |
अखंड ज्योति की देखभाल के लिए परिवार में जिम्मेदारी बांटी जा सकती है। यदि घर में कोई व्यक्ति लगातार उपस्थित नहीं रह सकता तो छोटी और स्थिर ज्योति रखने की परंपरा अपनाई जा सकती है। पूजा का उद्देश्य घर को जोखिम में डालना नहीं है।
परंपरा में घी और तिल के तेल दोनों से दीपक जलाने का विधान मिलता है। घी की लौ को सात्विक और पूजा के लिए शुभ माना जाता है। तिल का तेल शनि शांति, पितृ स्मरण और नकारात्मकता से रक्षा के भाव से जोड़ा जाता है।
कौन सा ईंधन उपयोग करना है यह परिवार की परंपरा, उपलब्धता और दीपक की बनावट पर निर्भर कर सकता है। घी और तेल को बिना समझे एक ही पात्र में मिलाना उचित नहीं माना जाता। दीपक में जो भी ईंधन डाला जाए वह स्वच्छ और सुरक्षित होना चाहिए।
| ईंधन | सामान्य धार्मिक भाव |
|---|---|
| गाय का घी | सात्विकता, पवित्रता और देवी आराधना |
| तिल का तेल | शनि शांति, पितृ स्मरण और संरक्षण |
| सरसों का तेल | कुछ परंपराओं में बाधा शमन और शक्ति भाव |
| मिश्रित ईंधन | परिवार की परंपरा के बिना प्रयोग न करें |
यहां सबसे आवश्यक बात अग्नि सुरक्षा है। किसी भी तेल या घी को दीपक के बाहर फैलने नहीं देना चाहिए।
यदि ज्योति बार बार बुझती है तो इसे केवल अशुभ संकेत मानना उचित नहीं है। पहले भौतिक कारणों की जांच करें। कई बार बाती का आकार, दीपक की गहराई, हवा का प्रवाह या ईंधन की गुणवत्ता इसका कारण होती है।
जांच के लिए निम्न बातों पर ध्यान दें।
• क्या बाती बहुत मोटी या बहुत पतली है
• क्या दीपक समतल स्थान पर रखा है
• क्या लौ के पास पंखे की हवा आ रही है
• क्या घी बहुत ठंडा होकर जम रहा है
• क्या तेल में पानी या अशुद्धि है
• क्या पात्र में कालिख जमा है
• क्या बाती को समय पर सीधा किया जा रहा है
आध्यात्मिक साधना में विवेक भी देवी कृपा का ही भाग माना जाता है। भौतिक कारण को समझकर उसे ठीक करना पूजा का अपमान नहीं बल्कि पूजा की जिम्मेदारी है।
यदि दीपक पलट जाए तो सबसे पहले व्यक्ति और घर की सुरक्षा देखें। तेल या घी फैल गया हो तो आग के स्रोत से दूर रहें। बिजली का स्विच या पंखा बंद करें और यदि आग फैलने का खतरा हो तो तुरंत सुरक्षित उपाय अपनाएं।
स्थान सुरक्षित होने के बाद पूजा स्थल को साफ करें। दीपक, बाती और ईंधन को पुनः व्यवस्थित करें। माता से क्षमा मांगकर नया दीपक जलाया जा सकता है। इस स्थिति को अनिवार्य अनिष्ट का संकेत मानना उचित नहीं है।
नवरात्रि में व्यक्ति पहले से ही धार्मिक भावना, संकल्प और अपेक्षा से जुड़ा होता है। अखंड ज्योति उसके लिए नौ दिनों की निरंतरता का प्रतीक बन जाती है। जब लौ बुझती है तो मन को लगता है कि पूरा संकल्प टूट गया। यही विचार भय को जन्म देता है।
शांत मन से स्थिति देखने पर समझ आता है कि दीपक की लौ हवा, ईंधन और बाती पर निर्भर करती है। भक्त का विश्वास केवल लौ पर निर्भर नहीं होना चाहिए। पूजा की निरंतरता मन, वाणी और कर्म में दिखाई देती है।
ज्योति दोबारा जलाना मन को यह शिक्षा देता है कि भूल या बाधा के बाद भी साधना फिर आरंभ की जा सकती है। यही नवरात्रि का आंतरिक संदेश है। अंधकार आने पर प्रकाश को फिर से जगाना ही साधना है।
दीपक अग्नि तत्त्व का प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष में अग्नि तत्त्व का संबंध सूर्य और मंगल से जोड़ा जाता है। चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। नवरात्रि में दीपक बुझने से मन विचलित हो सकता है, परंतु इसे कुंडली में किसी निश्चित दोष का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
किसी एक घटना के आधार पर ग्रह दोष, पितृ दोष या देवी क्रोध की घोषणा करना उचित नहीं है। ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए जन्म कुंडली, दशा, गोचर, लग्न, चंद्र राशि और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को साथ देखना आवश्यक होता है।
साधक के लिए इस घटना का ज्योतिषीय भाव यह हो सकता है कि अग्नि, मन और अनुशासन के बीच संतुलन पर ध्यान दिया जाए।
| प्रतीक | ज्योतिषीय भाव |
|---|---|
| अग्नि | सूर्य, मंगल और चेतना |
| तेल या घी | जीवन शक्ति और पोषण |
| बाती | संकल्प और साधना का माध्यम |
| लौ | ज्ञान, प्रार्थना और जागरण |
| बुझना | सावधानी, विराम या भौतिक कारण |
| पुनः जलना | सुधार, धैर्य और विश्वास |
यह व्याख्या आध्यात्मिक चिंतन के लिए है। इसे भय या निश्चित भविष्यवाणी का आधार नहीं बनाना चाहिए।
अखंड ज्योति बुझने के बाद कुछ लोग घबराकर कई गलतियां कर बैठते हैं। कोई दीपक को तुरंत हाथ से उठाता है। कोई उसमें अत्यधिक तेल डाल देता है। कोई जली हुई बाती को बिना हटाए नई बाती लगा देता है। कुछ लोग डर के कारण पूजा ही छोड़ देते हैं।
इन गलतियों से बचना चाहिए।
• गर्म दीपक को तुरंत हाथ से न उठाएं
• जलते दीपक में अचानक बहुत अधिक तेल या घी न डालें
• जली हुई बाती के ऊपर नई बाती न ठूंसें
• दीपक के पास कपड़ा, कागज या सूखी सामग्री न रखें
• भय फैलाने वाले संदेशों पर तुरंत विश्वास न करें
• पूजा रोककर स्वयं को दोषी न मानें
• अपनी क्षमता से बाहर महंगे प्रायश्चित न करें
• अग्नि सुरक्षा को धार्मिक नियमों से कम महत्वपूर्ण न समझें
नवरात्रि समाप्त होने पर अखंड ज्योति को लेकर परिवार की परंपरा का पालन करना चाहिए। यदि दीपक अभी जल रहा हो तो उसे फूंक मारकर या अचानक हाथ से बुझाना उचित नहीं माना जाता। कई परिवार इसे स्वाभाविक रूप से शांत होने देते हैं। कुछ परिवार नवमी या दशमी की पूजा के बाद विधिपूर्वक ज्योति का समापन करते हैं।
समापन के समय देवी को नैवेद्य, पुष्प और प्रार्थना अर्पित की जा सकती है। दीपक की शेष सामग्री को स्वच्छ स्थान पर रखें। राख या जली हुई बाती को कूड़े में फेंकने के बजाय परिवार की परंपरा के अनुसार विसर्जित करें।
अखंड ज्योति का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं है। यह घर में अनुशासन, प्रकाश और देवी स्मरण बनाए रखने का माध्यम है। यदि वह बुझ जाए तो माता दुर्गा को दोष देने या स्वयं को अशुभ मानने के बजाय शांत मन से उसे पुनः जलाना चाहिए।
भक्ति का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि किसी दिन लौ कितनी देर जली। भक्ति का मूल्य इस बात से तय होता है कि मन कितना सत्य, करुणामय और संयमित रहा। यदि अनजाने में दीपक बुझ गया और भक्त ने श्रद्धा से क्षमा मांगी, नई बाती रखी, ज्योति फिर जलाई और पूजा जारी रखी तो नवरात्रि का संकल्प अपने मूल भाव में जीवित रहता है।
अखंड ज्योति का बुझना एक क्षणिक बाधा हो सकता है, लेकिन श्रद्धा का प्रकाश उससे कहीं अधिक गहरा होता है। हवा लौ को बुझा सकती है, तेल समाप्त हो सकता है और बाती जल सकती है। इन भौतिक कारणों को समझना आवश्यक है।
साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि देवी साधना केवल दीपक की लौ में नहीं रहती। वह सत्य वाणी, सेवा, संयम, दया और सत्कर्म में भी प्रकट होती है। जब भक्त शांत मन से ज्योति को फिर प्रज्वलित करता है तब वह केवल दीपक नहीं जलाता। वह अपने भीतर के विश्वास को भी फिर से जाग्रत करता है।
आश्विन नवरात्रि में अखंड ज्योति बुझ जाए तो क्या करें?
पहले मन को शांत करें, एक छोटा साक्षी दीपक जलाएं, दीपक को सुरक्षित रूप से साफ करें, नई बाती और घी या तेल डालकर ज्योति फिर जलाएं। इसके बाद माता से क्षमा प्रार्थना करें।
क्या अखंड ज्योति बुझना अशुभ संकेत है?
अखंड ज्योति बुझना हमेशा अशुभ संकेत नहीं होता। हवा, तेल की कमी, बाती का झुकना और दीपक की स्थिति जैसे सामान्य भौतिक कारण भी इसके पीछे हो सकते हैं।
अखंड ज्योति बुझने पर कौन सा मंत्र पढ़ना चाहिए?
ॐ दुं दुर्गायै नमः मंत्र का जप किया जा सकता है। नवर्ण मंत्र या सरल क्षमा प्रार्थना भी श्रद्धा से पढ़ी जा सकती है।
क्या बुझी हुई बाती से अखंड ज्योति दोबारा जला सकते हैं?
कई परंपराओं में जली या अधजली बाती हटाकर नई बाती लगाने की सलाह दी जाती है। इससे लौ स्थिर रहती है और धुआं कम होता है।
अखंड ज्योति को नौ दिनों तक सुरक्षित कैसे जलाएं?
दीपक को स्थिर स्थान पर रखें, तेज हवा और ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें, घी या तेल की मात्रा देखते रहें और बच्चों तथा पालतू पशुओं से सुरक्षित दूरी बनाए रखें।
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