By पं. अभिषेक शर्मा
पितृ पक्ष और नवरात्रि में आहार तथा आचरण के नियम

आश्विन मास हिन्दू पंचांग का ऐसा समय है जिसमें पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, विजयादशमी और शरद पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण पर्व आते हैं। यह मास एक ओर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का अवसर देता है और दूसरी ओर देवी शक्ति की आराधना के माध्यम से आत्मशुद्धि का मार्ग खोलता है।
इस कारण आश्विन मास में आहार, व्यवहार और दिनचर्या के संबंध में अनेक नियम बताए गए हैं। कुछ नियम पूरे मास के लिए माने जाते हैं। कुछ केवल पितृ पक्ष के लिए होते हैं। कुछ नियम नवरात्रि के व्रत और पूजा के नौ दिनों से जुड़े होते हैं। इन सभी को एक ही कठोर सूची मानना उचित नहीं है।
क्षेत्र, परिवार, संप्रदाय, स्वास्थ्य और व्रत की परंपरा के अनुसार नियमों में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी भोजन या दैनिक कार्य को सभी लोगों के लिए अनिवार्य रूप से वर्जित बताने से पहले संदर्भ समझना आवश्यक है। आश्विन मास का मूल भाव सात्विकता, संयम, सेवा और शांत मन है।
आश्विन मास में अलग अलग पर्व होने के कारण नियमों को अवधि के अनुसार समझना चाहिए। पितृ पक्ष में पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण का भाव रहता है। नवरात्रि में देवी आराधना और व्रत का भाव प्रमुख होता है। विजयादशमी पर धर्म और विजय का उत्सव मनाया जाता है।
| अवधि | मुख्य भाव | प्रमुख संयम |
|---|---|---|
| आश्विन कृष्ण पक्ष | पितृ स्मरण और तर्पण | तामसिक भोजन, झगड़ा और दिखावा |
| पितृ तिथि | श्राद्ध और कृतज्ञता | शुभ मांगलिक आयोजन से दूरी |
| शारदीय नवरात्रि | देवी साधना और व्रत | मांस, मदिरा और व्रत विरोधी भोजन |
| अष्टमी और नवमी | शक्ति पूजा और कन्या सम्मान | क्रोध, अपशब्द और असंयम |
| विजयादशमी | धर्म विजय और नया उत्साह | अहंकार, हिंसा और अनावश्यक विवाद |
| शरद पूर्णिमा | चंद्र शांति और समृद्धि | अस्वच्छता, अति भोजन और लापरवाही |
आश्विन मास में विशेष रूप से पितृ पक्ष और नवरात्रि के दौरान मांस, मदिरा, अंडे और अन्य तामसिक पदार्थों से बचने की परंपरा है। इसका संबंध केवल धार्मिक निषेध से नहीं है। तामसिक आहार मन में भारीपन, आलस्य, उत्तेजना और असंयम बढ़ा सकता है। साधना और व्रत के समय मन को शांत रखने के लिए हल्का और सात्विक भोजन उपयोगी माना जाता है।
नवरात्रि व्रत में कई लोग प्याज, लहसुन, अनाज और सामान्य नमक से भी परहेज करते हैं। कुछ परिवार केवल मांस और मदिरा का त्याग करते हैं। कुछ लोग फलाहार या एक समय भोजन करते हैं। इसलिए भोजन का नियम परिवार की परंपरा और शरीर की क्षमता के अनुसार अपनाना चाहिए।
सामान्य रूप से इन पदार्थों से बचना उचित माना जाता है।
• मांसाहारी भोजन
• मदिरा और नशीले पदार्थ
• अंडे
• बासी और दूषित भोजन
• अत्यधिक तला हुआ भोजन
• बहुत तीखा और भारी भोजन
• व्रत के दौरान अनाज और सामान्य नमक, यदि परिवार की परंपरा में इनका त्याग किया जाता हो
बीमारी, गर्भावस्था, वृद्धावस्था या औषधि सेवन की स्थिति में कठोर उपवास नहीं करना चाहिए। धर्म शरीर की उपेक्षा को साधना नहीं मानता।
प्याज और लहसुन को अनेक साधना परंपराओं में राजसिक या तामसिक प्रभाव बढ़ाने वाला माना जाता है। नवरात्रि के दौरान इनके सेवन से बचने का कारण यह है कि व्रत और जप के समय मन को स्थिर रखा जा सके। तेज गंध, पाचन पर प्रभाव और शरीर में उत्तेजना बढ़ने की धारणा के कारण इन्हें सात्विक भोजन से अलग रखा जाता है।
फिर भी यह नियम सभी परिवारों में समान नहीं है। कुछ लोग पूरे आश्विन मास में प्याज और लहसुन नहीं खाते। कुछ लोग केवल नवरात्रि के नौ दिनों में इनका त्याग करते हैं। कुछ लोग स्वास्थ्य कारणों से इन्हें भोजन में रखते हैं।
नियम का पालन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें।
• अपनी परंपरा को समझकर नियम अपनाएं
• दूसरों की भोजन पद्धति का अपमान न करें
• स्वास्थ्य की आवश्यकता हो तो योग्य चिकित्सक की सलाह लें
• व्रत के नाम पर शरीर को निर्जल और अत्यधिक कमजोर न करें
• भोजन को सात्विक बनाने के लिए कम मसाले, ताजे पदार्थ और स्वच्छता पर ध्यान दें
पितृ पक्ष और नवरात्रि दोनों ही आत्मसंयम के पर्व हैं। मांस, मदिरा, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों से बचने की परंपरा इसलिए है ताकि व्यक्ति का मन पूजा, स्मरण और सेवा में लगा रहे।
मदिरा और नशा विवेक को कमजोर कर सकते हैं। क्रोध, असावधानी और पारिवारिक कलह बढ़ सकती है। पितृ कर्म के दिनों में नशे से दूर रहना पूर्वजों के प्रति सम्मान का व्यवहार माना जाता है। नवरात्रि में यह देवी आराधना के लिए शुद्ध वातावरण बनाने का माध्यम बनता है।
यदि कोई व्यक्ति नशे की आदत से संघर्ष कर रहा हो तो केवल धार्मिक भय दिखाना पर्याप्त नहीं है। परिवार का सहयोग, चिकित्सकीय सहायता और व्यवस्थित उपचार भी आवश्यक हो सकता है। आध्यात्मिक संकल्प को व्यवहारिक सहायता से जोड़ना अधिक प्रभावी रहता है।
आश्विन मास में झगड़ा, अपशब्द, निंदा, अपमान और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। इसका संबंध केवल पुण्य और पाप की धारणा से नहीं है। गृह कलह पूजा स्थल और परिवार दोनों की शांति को प्रभावित करती है।
पितृ पक्ष में परिवार पूर्वजों का स्मरण करता है। यदि उसी समय घर में लगातार कटुता, अपमान और विवाद रहे तो श्राद्ध का कृतज्ञता भाव कमजोर हो जाता है। नवरात्रि में देवी को शक्ति और करुणा की अधिष्ठात्री माना जाता है। इसलिए देवी पूजा के साथ घर में अपमान और हिंसक व्यवहार रखना साधना के मूल भाव से मेल नहीं खाता।
• उत्तर देने से पहले कुछ क्षण रुकें
• क्रोध में निर्णय न लें
• परिवार के बुजुर्गों से कठोर भाषा में बात न करें
• बच्चों के सामने अपशब्दों से बचें
• विवाद को पूजा और व्रत का विषय न बनाएं
• क्षमा मांगने में संकोच न करें
• असहमति को अपमान में न बदलें
शांत वाणी अपने आप में एक प्रकार का देवी पूजन है। शब्दों से किसी को चोट न पहुंचाना आश्विन मास की सबसे उपयोगी साधनाओं में से एक हो सकता है।
पितृ पक्ष में विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन, बड़े उत्सव और नए मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा कई परिवारों में है। इसका कारण यह है कि यह अवधि उत्सव से अधिक पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध के लिए रखी जाती है।
यह नियम हर प्रकार के आवश्यक कार्य पर लागू नहीं होता। स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी, कानूनी आवश्यकता या जीवन की अनिवार्य परिस्थिति में कार्य रोकना उचित नहीं है। पितृ पक्ष में नया व्यवसाय या संपत्ति संबंधी निर्णय लेने से पहले परिवार की परंपरा और स्थानीय आचार्य की सलाह ली जा सकती है।
| कार्य | पितृ पक्ष में सामान्य परंपरा |
|---|---|
| विवाह | सामान्यतः टालने की सलाह |
| गृह प्रवेश | सामान्यतः टालने की सलाह |
| उपनयन | परिवार की परंपरा के अनुसार |
| नया व्यवसाय | मुहूर्त और परिस्थिति देखकर |
| चिकित्सा | आवश्यकता होने पर तुरंत |
| शिक्षा या नौकरी | आवश्यकता अनुसार जारी रखें |
| श्राद्ध और तर्पण | उचित तिथि पर करना शुभ |
धार्मिक नियमों का उद्देश्य जीवन की आवश्यक जिम्मेदारियों को रोकना नहीं है। उनका उद्देश्य समय के भाव के अनुसार प्राथमिकता तय करना है।
आश्विन मास में शरीर पर तेल लगाने से बचने की बात कुछ धार्मिक परंपराओं में कही जाती है, विशेष रूप से पितृ पक्ष या विशेष व्रत के दिनों में। यह नियम हर क्षेत्र और हर परिवार में समान नहीं है। इसे पूरे मास के लिए सार्वभौमिक शास्त्रीय निषेध मानना उचित नहीं है।
आयुर्वेद में ऋतु परिवर्तन के समय शरीर की प्रकृति, त्वचा और वात संतुलन के अनुसार अभ्यंग या तेल मालिश का महत्व भी बताया जाता है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को त्वचा में रूखापन, जोड़ों में पीड़ा या चिकित्सकीय आवश्यकता हो तो केवल भय के कारण तेल मालिश रोकना उचित नहीं है।
इस विषय में संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं।
• पूजा या व्रत की पारिवारिक परंपरा हो तो उसका सम्मान करें
• चिकित्सकीय आवश्यकता में विशेषज्ञ की सलाह लें
• शरीर की स्वच्छता और स्वास्थ्य की उपेक्षा न करें
• तेल लगाने को देवी के क्रोध से न जोड़ें
• नवरात्रि में स्वच्छता, हल्का भोजन और पर्याप्त विश्राम रखें
धार्मिक संयम और स्वास्थ्य देखभाल एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। शरीर साधना का माध्यम है, इसलिए उसकी उचित देखभाल भी आवश्यक है।
पितृ पक्ष और आश्विन मास में पेड़ पौधों और जीवों के प्रति करुणा रखने की परंपरा है। कई परिवार इस समय बिना आवश्यकता पेड़ काटने, पौधे नष्ट करने या पशु पक्षियों को कष्ट देने से बचते हैं।
लोकमान्यता में कहा जाता है कि पितर किसी भी रूप में घर के द्वार पर आ सकते हैं। इस भाव का नैतिक अर्थ यह है कि आने वाले जीव का अपमान न किया जाए। किसी भूखे पशु को भोजन देना, पक्षियों के लिए जल रखना और पेड़ों की रक्षा करना पितृ स्मरण और प्रकृति सम्मान का सुंदर रूप है।
इन कार्यों से बचना चाहिए।
• बिना आवश्यकता पेड़ काटना
• पशु पक्षियों को मारना या डराना
• जल स्रोतों को गंदा करना
• पूजा सामग्री नदी या तालाब में फेंकना
• जीवों को भोजन देकर बाद में उन्हें परेशान करना
• पेड़ की पूजा के नाम पर तने को नुकसान पहुंचाना
धर्म में करुणा का अर्थ केवल पूजा नहीं बल्कि जीवन की रक्षा भी है।
आश्विन मास में असत्य, धोखा, झूठी गवाही, अनुचित लाभ और किसी की संपत्ति हड़पने से विशेष रूप से बचना चाहिए। पितृ पक्ष में पूर्वजों का स्मरण करते समय अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करना आवश्यक है। नवरात्रि में देवी को सत्य और धर्म की शक्ति माना जाता है।
यदि व्यक्ति पूजा में बैठकर बाहर जीवन में छल करता रहे तो साधना का बाहरी रूप और आंतरिक आचरण अलग हो जाते हैं। यही कारण है कि आश्विन मास में सत्य वाणी, ईमानदार कमाई और स्पष्ट व्यवहार को महत्व दिया जाता है।
सत्य का पालन करने का अर्थ कठोरता नहीं है। किसी को चोट पहुंचाने वाले शब्दों को सत्य कहकर बोलना भी अनुचित हो सकता है। सत्य के साथ करुणा और विवेक आवश्यक हैं।
आश्विन मास में पूजा के लिए फूल, पत्ते और लकड़ी का प्रयोग होता है। लेकिन पूजा की सामग्री जुटाने के नाम पर पौधों को नष्ट करना उचित नहीं है। केवल उतने ही फूल या पत्ते लें जितने आवश्यक हों। गिरे हुए पुष्प का प्रयोग कई परंपराओं में स्वीकार किया जाता है।
पूजा समाप्त होने के बाद सामग्री को स्वच्छ स्थान पर रखें। प्लास्टिक, रसायन, सिंथेटिक कपड़ा और सजावटी वस्तुओं को जल स्रोत में प्रवाहित न करें। इससे प्रकृति को हानि पहुंचती है और धार्मिक कर्म का उद्देश्य कमजोर होता है।
आश्विन मास में कुछ खाद्य पदार्थों से बचने की सूची विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग मिलती है। कहीं बैंगन, मूली, मसूर, चना, करेला, लौकी या कुछ पत्तेदार सब्जियों का उल्लेख मिलता है। कहीं केवल मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से बचने की परंपरा है।
इन नियमों के पीछे ऋतु परिवर्तन और पाचन से जुड़े स्थानीय अनुभव भी हो सकते हैं। वर्षा के बाद वातावरण में नमी रहती है। इस समय ताजा, हल्का और स्वच्छ भोजन पाचन के लिए उपयोगी हो सकता है। बासी, बहुत तला या दूषित भोजन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
| भोजन का प्रकार | सामान्य सलाह |
|---|---|
| ताजा और हल्का भोजन | उचित मात्रा में लें |
| बासी भोजन | बचें |
| अत्यधिक तला भोजन | सीमित करें |
| मांस और मदिरा | नवरात्रि और पितृ पक्ष में परंपरा अनुसार त्यागें |
| प्याज और लहसुन | व्रत परंपरा के अनुसार त्यागें |
| दूध और अन्य पदार्थ | स्वास्थ्य और परिवार की परंपरा के अनुसार लें |
| फल और स्वच्छ जल | शरीर की आवश्यकता अनुसार लें |
किसी भोजन को धार्मिक भय से त्यागने के बजाय उसके स्वास्थ्य प्रभाव, उपलब्धता और अपनी शारीरिक स्थिति को भी समझना चाहिए।
हर व्यक्ति के लिए पूरे मास में समान कठोर नियम आवश्यक नहीं होते। कुछ परिवार पूरे आश्विन मास में सात्विक आहार रखते हैं। कुछ लोग केवल पितृ पक्ष में नियम अपनाते हैं। कुछ लोग नवरात्रि के नौ दिनों में व्रत करते हैं।
व्रत और नियम का उद्देश्य शरीर को दंड देना नहीं है। उसका उद्देश्य इंद्रियों पर संयम, मन की एकाग्रता और जीवन में अनुशासन लाना है। यदि कठोर नियम से बीमारी, कमजोरी या मानसिक तनाव बढ़े तो नियम को सरल बनाया जा सकता है।
सात्विकता के लिए निम्न सरल मार्ग अपनाए जा सकते हैं।
• भोजन की मात्रा संयमित रखें
• नियमित समय पर सोएं
• प्रतिदिन कुछ समय मौन या ध्यान रखें
• मोबाइल और अनावश्यक मनोरंजन को सीमित करें
• जरूरतमंद को भोजन दें
• घर की सफाई रखें
• पूजा को दिखावे से दूर रखें
ऋतु परिवर्तन के समय शरीर में कई प्रकार के बदलाव आते हैं। पाचन, नींद, त्वचा और ऊर्जा पर प्रभाव पड़ सकता है। लंबे उपवास, कम पानी, अत्यधिक जागरण या बहुत तीखा भोजन कुछ लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है।
व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी उम्र, स्वास्थ्य और दवाओं का ध्यान रखना चाहिए। मधुमेह, रक्तचाप, गर्भावस्था, स्तनपान, गुर्दे की समस्या या अन्य गंभीर रोग की स्थिति में डॉक्टर की सलाह के बिना उपवास नहीं करना चाहिए।
आध्यात्मिक साधना में शरीर का सम्मान भी शामिल है। बीमारी को देवी परीक्षा मानकर उपचार रोकना उचित नहीं है। औषधि, विश्राम और उचित भोजन भी ईश्वर प्रदत्त साधनों का हिस्सा हैं।
वर्जित कार्यों को समझने के साथ यह जानना भी आवश्यक है कि इस मास में कौन से सकारात्मक कार्य किए जा सकते हैं।
• पितरों के निमित्त तर्पण और दान
• दुर्गा, काली या नवदुर्गा की आराधना
• दुर्गा सप्तशती या देवी स्तुति का पाठ
• कन्या, वृद्ध और जरूरतमंदों की सेवा
• घर और पूजा स्थल की सफाई
• अन्न, वस्त्र और उपयोगी वस्तुओं का दान
• सत्य वाणी और संयम का अभ्यास
• जल स्रोतों और पेड़ पौधों की रक्षा
• परिवार में क्षमा और संवाद
• भोजन की बर्बादी से बचना
इन कार्यों से आश्विन मास का आध्यात्मिक भाव जीवन में उतरता है। केवल निषेधों पर ध्यान देने से मन भयभीत हो सकता है। सकारात्मक सेवा और भक्ति मन को स्थिर बनाती है।
धार्मिक भाषा में कहा जाता है कि गलत आचरण से पितर या देवी रुष्ट हो सकते हैं। इसका गहरा अर्थ यह है कि जब व्यक्ति कृतज्ञता, करुणा, सत्य और संयम से दूर होता है तब उसके जीवन में असंतुलन बढ़ सकता है।
शक्ति किसी बाहरी सत्ता का भय मात्र नहीं है। शक्ति वह जीवन ऊर्जा है जो घर, शरीर, मन, समाज और प्रकृति में काम करती है। गृह कलह से घर की शक्ति कम होती है। नशे से शरीर और विवेक कमजोर होते हैं। झूठ से संबंधों में विश्वास घटता है। प्रकृति के अपमान से जीवन का आधार कमजोर होता है।
इस दृष्टि से वर्जित कार्यों का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं बल्कि संतुलन बचाए रखना है।
आश्विन मास के नियमों को भय, अंधविश्वास या सामाजिक दबाव के कारण नहीं बल्कि समझ और श्रद्धा के साथ अपनाना चाहिए। मांस और मदिरा का त्याग, प्याज और लहसुन से परहेज, कठोर वाणी से दूरी, पितृ पक्ष में संयम और नवरात्रि में सात्विकता जैसे नियम मन को साधना के अनुकूल बनाते हैं।
शरीर पर तेल लगाने का नियम सभी परिवारों और सभी दिनों के लिए समान नहीं है। स्वास्थ्य की आवश्यकता को धार्मिक भय से दबाना उचित नहीं है। भोजन संबंधी निषेध भी परंपरा और शरीर की स्थिति के अनुसार समझे जाने चाहिए।
आश्विन मास का सच्चा अनुशासन यही है कि व्यक्ति कम हिंसक, कम क्रोधी, अधिक सत्यनिष्ठ और अधिक करुणामय बने। जब आहार शुद्ध होता है, वाणी संयमित होती है और व्यवहार में सेवा आती है तब देवी शक्ति प्रसन्न होने का अर्थ जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है।
आश्विन मास में वर्जित कार्यों की सूची का उद्देश्य जीवन को भय से बांधना नहीं है। यह मास व्यक्ति को रोककर देखने का अवसर देता है। क्या भोजन मन को भारी बना रहा है? क्या वाणी से घर का वातावरण बिगड़ रहा है? क्या पूर्वजों की स्मृति केवल कर्मकांड तक सीमित है? क्या पूजा के साथ प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा भी है?
इन प्रश्नों के उत्तर ही वास्तविक साधना बनते हैं। आश्विन मास में सात्विक भोजन, पितृ सम्मान, देवी आराधना, संयमित दिनचर्या और शांत व्यवहार अपनाने से मन में स्थिरता आती है। यही स्थिरता घर में शांति और जीवन में शुभ ऊर्जा का आधार बनती है।
आश्विन मास में कौन से काम नहीं करने चाहिए?
आश्विन मास में तामसिक भोजन, मांस, मदिरा, नशा, गृह कलह, असत्य, अपमान, हिंसा और पितृ पक्ष में अनावश्यक मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है।
क्या आश्विन मास में प्याज और लहसुन खाना वर्जित है?
कई परिवार और व्रत परंपराएं पितृ पक्ष या नवरात्रि में प्याज और लहसुन से बचती हैं। यह नियम सभी परिवारों में समान नहीं है और स्वास्थ्य की आवश्यकता का ध्यान रखना चाहिए।
क्या आश्विन मास में शरीर पर तेल लगाना मना है?
कुछ परंपराओं में विशेष व्रत या पितृ पक्ष के दौरान तेल लगाने से बचा जाता है। यह पूरे मास का सार्वभौमिक नियम नहीं है। स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
क्या पितृ पक्ष में विवाह या गृह प्रवेश करना चाहिए?
कई परिवार पितृ पक्ष में विवाह, गृह प्रवेश और बड़े मांगलिक कार्यों को टालते हैं। आवश्यक चिकित्सा, शिक्षा, नौकरी या कानूनी कार्यों को रोकना उचित नहीं है।
आश्विन मास में सबसे महत्वपूर्ण नियम क्या है?
सत्य, सात्विकता, संयम, पितृ सम्मान, देवी आराधना, सेवा, स्वच्छता और गृह शांति को आश्विन मास के प्रमुख नियम माना जा सकता है।
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