By पं. अमिताभ शर्मा
दस महाविद्याओं की सात्विक साधना और गृहस्थ मार्ग

आश्विन मास हिन्दू पंचांग में वह कालखंड माना जाता है जब प्रकृति स्वयं साधना की ओर झुकती हुई प्रतीत होती है। वर्षा ऋतु का अवसान हो चुका होता है। आकाश अपेक्षाकृत स्वच्छ हो जाता है। चंद्रमा की कलाएँ पुनः स्पष्ट दिखने लगती हैं। इसी सूक्ष्म परिवर्तन के साथ देवी तत्त्व की सक्रियता भी बढ़ जाती है। तंत्र शास्त्र में आश्विन मास की नवरात्रि की रात्रियों को सिद्ध रात्रियां कहा गया है। इन रात्रियों में की गई साधना सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक शीघ्र फल देने वाली मानी जाती है।
यह केवल लोक विश्वास नहीं है। वैदिक ज्योतिष और तंत्र दोनों इस बात पर सहमत हैं कि जब सूर्य कन्या से तुला की ओर संक्रमण करता है और चंद्रमा आश्विन की तिथियों में देवी नक्षत्रों से जुड़ता है तब मन की एकाग्रता सहज हो जाती है। गृहस्थ के लिए यह समय बाहरी उत्सव का है। साधक के लिए यही समय आंतरिक जागरण का द्वार बनता है। काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी सहित दस महाविद्याओं की कृपा पाने का यह मार्ग केवल कठोर तांत्रिकों तक सीमित नहीं रखा गया। सात्विक अनुशासन और गुरु मार्गदर्शन के साथ साधारण गृहस्थ भी इन रात्रियों का लाभ उठा सकता है।
आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि मानी जाती है। दशमी विजय का उत्सव बनती है। तंत्र दृष्टि से रात्रि का मध्य भाग विशेष रूप से बलवान होता है क्योंकि तब इंद्रियां शांत होती हैं और मन बाहरी शोर से कम बंधा रहता है।
| विवरण | विवेचन |
|---|---|
| आश्विन नवरात्रि काल | शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल नवमी तक |
| सर्वाधिक बलवान रात्रियां | सप्तमी, अष्टमी, नवमी तथा संधि काल |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| मुख्य उद्देश्य | देवी कृपा, भय मुक्ति, वाणी शुद्धि, ऐश्वर्य और मोक्ष मार्ग |
| गृहस्थ के लिए मार्ग | सात्विक जप, व्रत, दान, सप्तशती पाठ, ध्यान |
| मूल सावधानी | गुरु बिना उग्र प्रयोग नहीं, हिंसा नहीं, गर्व नहीं |
इन रात्रियों में निम्नलिखित मूल नियम पालन करने योग्य माने गए हैं।
सिद्ध रात्रि वह काल है जब साधक का संकल्प, मंत्र का स्पंदन और काल का सहयोग एक बिंदु पर मिलते हैं। तंत्र ग्रंथों में कहा गया है कि नवरात्रि की रात्रियाँ शक्ति के उतरने का द्वार खोलती हैं। दिन में लोक व्यवहार चलता है। रात्रि में चेतना भीतर की ओर मुड़ती है। इसीलिए इन्हीं रात्रियों में जप, हवन, यंत्र पूजन और ध्यान अधिक फलदायी माने गए।
आश्विन मास की विशेषता यह है कि यह पर्व सार्वजनिक भी है और गुह्य भी। बाहर दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है। भीतर दस महाविद्याओं का रहस्य खुलता है। दोनों धाराएँ एक ही आदिशक्ति की हैं। अंतर केवल दृष्टिकोण का है। भक्त प्रेम से माँगता है। साधक ज्ञान और शक्ति के संतुलन से माँगता है। गृहस्थ दोनों को मिलाकर चल सकता है यदि वह संयम और श्रद्धा को आधार बनाए।
महाविद्या का अर्थ है महान ज्ञान देने वाली शक्ति। ये दस रूप आदिमाया के दस द्वार माने जाते हैं। प्रत्येक रूप जीवन के एक स्तर को स्पर्श करता है। भय, वाणी, सौंदर्य, विस्तार, त्याग, तप, वैराग्य, स्तंभन, कला और ऐश्वर्य। जब ये दस धाराएँ संतुलित होती हैं तब साधक खंडित नहीं रहता। वह पूर्णता की ओर बढ़ता है।
आश्विन में इनकी उपासना इसलिए विशेष मानी गई क्योंकि शारदीय काल में प्रकृति स्वयं संतुलन की ओर लौटती है। गर्मी और वर्षा का अतिरेक कम होता है। शरीर और मन दोनों साधना सहन करने योग्य होते हैं। ज्योतिष दृष्टि से यह काल चंद्र बल और शुक्रीय कोमलता के साथ सूर्य की स्पष्टता मिलाता है। परिणाम यह होता है कि साधक भावुक भी रह सकता है और अनुशासित भी।
| क्रम | महाविद्या | मूल भाव | गृहस्थ के लिए संकेत |
|---|---|---|---|
| 1 | काली | काल और भय का भक्षण | भय, कालचिंता और अहंकार का नाश |
| 2 | तारा | तारण और वाणी | संकट से पार, सही शब्द की शक्ति |
| 3 | त्रिपुरसुंदरी | सौंदर्य और सामंजस्य | प्रेम, आकर्षण और आंतरिक संतुलन |
| 4 | भुवनेश्वरी | लोक विस्तार | आत्मविश्वास, स्थान और प्रभाव |
| 5 | छिन्नमस्ता | अह त्याग | कुसंग से कटान, तीव्र विवेक |
| 6 | त्रिपुरभैरवी | तप और तेज | अनुशासन, साहस, निरंतर अभ्यास |
| 7 | धूमावती | शून्य और वैराग्य | आसक्ति छूटना, दुख से ज्ञान |
| 8 | बगलामुखी | स्तंभन | शत्रु बाधा रुकना, वाणी नियंत्रण |
| 9 | मातंगी | कला और विचार | विद्या, संगीत, स्पष्ट अभिव्यक्ति |
| 10 | कमला | लक्ष्मी तत्त्व | धन, सौभाग्य, स्थिर समृद्धि |
इनमें काली कुल की धारा अधिक उग्र और परिवर्तनकारी मानी गई है। श्रीकुल की धारा सौंदर्य, ऐश्वर्य और क्रमबद्ध विकास से जुड़ी है। गृहस्थ के लिए श्रीकुल के साथ काली और तारा की सात्विक आराधना भी संभव है यदि भाव करुणा और समर्पण का हो न कि प्रदर्शन का।
तंत्र परंपरा में प्रायः तीन महाविद्याएँ प्रथम प्रवेश द्वार मानी जाती हैं। काली समय के भय को तोड़ती हैं। तारा अज्ञान के अंधकार से निकालती हैं। त्रिपुरसुंदरी तीनों लोकों अथवा तीनों अवस्थाओं में सौंदर्य और संतुलन भरती हैं। आश्विन की सिद्ध रात्रियों में यदि साधक केवल इन्हीं तीन पर केंद्रित रहे तो भी जीवन में गहरा परिवर्तन संभव है।
काली की साधना गृहस्थ के लिए श्मशान की उग्र विधि से नहीं अपितु दीप, काला या गहरा नीला वस्त्र का स्पर्श मात्र भाव से और करुणामय जप से हो सकती है। काली माँ काल को निगलती हैं। इसका मनोवैज्ञानिक अर्थ है कि अतीत की ग्लानि और भविष्य का आतंक दोनों को चित्त से हटाना। जब साधक रात्रि में स्थिर बैठकर श्वास देखता है और काली नाम जपता है तब मन की भागदौड़ धीमी पड़ती है।
तारा तारने वाली हैं। नाविक की भाँति वे भवसागर से पार लगाती हैं। वाणी की अशुद्धि, झूठ और कठोर शब्दों का दोष तारा साधना से सुधारने योग्य माना गया है। गृहस्थ यदि प्रतिदिन मधुर और सत्य भाषण का व्रत ले और तारा का स्मरण करे तो संबंधों में शीतलता आती है।
त्रिपुरसुंदरी षोडशी रूप में भी जानी जाती हैं। सोलह कलाओं की पूर्णता का संकेत है यह नाम। सौंदर्य केवल बाह्य नहीं। विचार की सुंदरता, आचरण की सुंदरता और घर के वातावरण की सुंदरता भी इसी कृपा में आती है। आश्विन में जब घर स्वच्छ किए जाते हैं, द्वार पर प्रकाश जलता है और मन उत्सव से भरता है तब त्रिपुरसुंदरी का तत्त्व स्वाभाविक रूप से सक्रिय होता है।
भुवनेश्वरी समस्त भुवनों की अधीश्वरी हैं। उनका ध्यान विस्तार देता है। संकुचित सोच वाला व्यक्ति अवसर नहीं देख पाता। भुवनेश्वरी साधना में साधक प्रार्थना करता है कि दृष्टि बड़ी हो और हृदय छोटा न रहे।
छिन्नमस्ता का रूप तीव्र है। वे स्वयं का मस्तक काट कर शक्ति का दान करती दिखती हैं। इसका गूढ़ अर्थ अहंकार का विसर्जन है। गृहस्थ जीवन में इसका प्रयोग यह है कि गलत आदत, हानिकारक संबंध और व्यर्थ अभिमान को साहसपूर्वक काटा जाए। उग्र बाह्य अनुष्ठान के बिना भी यह आंतरिक छेदन संभव है।
त्रिपुरभैरवी तप की अधिष्ठात्री हैं। बिना अनुशासन के कोई विद्या स्थिर नहीं होती। आश्विन की प्रत्येक रात्रि यदि निश्चित समय पर जप के लिए सुरक्षित रखी जाए तो भैरवी प्रसन्न होती हैं। उनका वर अनुशासन को प्रेम में बदल देता है।
धूमावती विधवा रूप में वर्णित हैं। धुएँ जैसा उनका स्वरूप माया के क्षणभंगुर होने का बोध कराता है। दुख के दिनों में धूमावती स्मरण कराने आती हैं कि वैराग्य भी कृपा है। गृहस्थ के लिए इसका संदेश है कि हानि आने पर विलाप में न डूबे अपितु सार ग्रहण करे।
बगलामुखी शत्रु की वाणी और गति को स्तब्ध करती हैं। न्यायालय, विवाद, झूठे आरोप और वाणीजनित संकट में उनकी कृपा माँगी जाती है। सात्विक रूप में इसका अर्थ है अपनी जीभ पर नियंत्रण और अन्याय के सामने अडिग रहना।
मातंगी विचार, संगीत, लेखन और राजसभा की वाणी से जुड़ी हैं। विद्यार्थी, कलाकार और वक्ता आश्विन रात्रि में मातंगी जप से बुद्धि की स्पष्टता पा सकते हैं।
कमला लक्ष्मी तत्त्व हैं। कमल कीचड़ में खिलता है पर लिप्त नहीं होता। समृद्धि आए पर चित्त मलिन न हो यही कमला का पाठ है। नवरात्रि के अंतिम चरण में कमला आराधना घर में स्थिर लक्ष्मी का संकेत मानी गई है।
तंत्र शब्द सुनते ही अनेक लोग भय या भ्रम में पड़ जाते हैं। वास्तव में तंत्र का मूल अर्थ विस्तार करने वाली विधि है। मंत्र, यंत्र और समाधि तीनों मिलकर तंत्र बनते हैं। गृहस्थ के लिए सात्विक तंत्र ही उपयुक्त मार्ग है। इसमें मद्य मांस का आग्रह नहीं। इसमें मन की शुद्धि, गुरु सम्मान, सत्य और करुणा अनिवार्य हैं।
बहुत से आचार्य नवरात्रि के नौ दिनों को नवदुर्गा के साथ जोड़ते हैं। महाविद्या दृष्टि से भी एक क्रम बनाया जा सकता है ताकि साधक भ्रमित न हो।
| रात्रि | भाव केंद्र | सुझाया गया स्मरण |
|---|---|---|
| प्रथम | भय मुक्ति | काली |
| द्वितीय | तारण | तारा |
| तृतीय | सौंदर्य और प्रेम | त्रिपुरसुंदरी |
| चतुर्थ | विस्तार | भुवनेश्वरी |
| पंचम | अहं त्याग | छिन्नमस्ता |
| षष्ठ | तप तेज | त्रिपुरभैरवी |
| सप्तम | वैराग्य बोध | धूमावती |
| अष्टम | विघ्न स्तंभन | बगलामुखी |
| नवम | विद्या और वाणी | मातंगी |
| दशमी उत्सव | ऐश्वर्य स्थिरता | कमला |
यह क्रम बाध्यता नहीं अपितु दिशा है। जिस साधक की गुरु परंपरा भिन्न हो वह अपनी परंपरा को प्रधान रखे।
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा मन है। नवरात्रि चंद्र आधारित तिथि चक्र पर टिकी है। जब शुक्ल पक्ष बढ़ता है तब मन का प्रकाश भी बढ़ने योग्य माना जाता है। आश्विन मास में प्रायः सूर्य कन्या तुला संधि के आसपास रहता है। कन्या विश्लेषण और शुद्धि देती है। तुला संतुलन और संबंध देती है। दोनों गुण साधना के सहायक हैं।
नक्षत्र दृष्टि से यदि रात्रि में चंद्रमा देवी से जुड़े नक्षत्रों में हो तो जप और अधिक सूक्ष्म हो जाता है। पर साधक को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल योग देखकर बिना श्रद्धा के फल मिल जाएगा। योग द्वार खोलता है। चलना साधक को ही पड़ता है। शनि और राहु के कठोर प्रभाव वाले जातकों के लिए काली तारा साधना विशेष संबल मानी गई है क्योंकि ये रूप काल भय और मोह जाल काटते हैं। शुक्र और चंद्र पीड़ित जातक त्रिपुरसुंदरी तथा कमला से शीतलता पा सकते हैं। बुध संबंधी वाणी दोष में मातंगी और तारा सहायक कही गई हैं।
पुराण कथा कहती है कि सती जब दक्ष यज्ञ में अपमानित हुईं और शिव ने रोकने का प्रयास किया तब उन्होंने दस दिशाओं में दस महाविद्या रूप धरे। शिव जहाँ गए माँ वहीं खड़ी मिलीं। इस आख्यान का भाव यह है कि शक्ति को टाला नहीं जा सकता। सत्य के अपमान पर शक्ति विद्रोह करती है। आश्विन की साधना में यह कथा याद रखने योग्य है। साधना भागने के लिए नहीं अपितु सत्य पर स्थिर रहने के लिए है। जब जीवन में अपमान, हानि या अन्याय आए तब महाविद्या स्मरण कराती हैं कि भीतर की आदिशक्ति अभी भी जाग्रत है।
आधुनिक भाषा में कहें तो रात्रि में बाह्य उत्तेजना कम होती है। मस्तिष्क की चंचलता घटती है। श्वास गहरी होती है। जप की पुनरावृत्ति तंत्रिका तंत्र को एक लय देती है। भय की स्मृतियाँ धीरे शिथिल पड़ती हैं। आश्विन में सामाजिक उत्सव भी मन को आशा से भरता है। दोनों मिलकर उपचार जैसा प्रभाव पैदा करते हैं।
काली साधना दबे हुए क्रोध और भय को चेतना में लाकर उन्हें नाम देकर शांत करती है। तारा अवसाद और अकेलेपन में सहारा बनती है। त्रिपुरसुंदरी आत्मग्लानि को सौंदर्य बोध से धोती है। धूमावती खोने की पीड़ा को अर्थ देती है। कमला अभाव की ग्रंथि खोलती है। इस प्रकार दस महाविद्याएँ दस मनोवैज्ञानिक द्वार भी हैं।
गृहस्थ यदि यंत्र रखे तो प्रामाणिक बीज यंत्र लाल वस्त्र में लपेट कर स्वच्छ स्थान पर रख सकता है। प्रतिदिन पुष्प अक्षत और दीप पर्याप्त हैं। हवन अनिवार्य नहीं। जो कर सकें वे नवमी अथवा विजयदशमी पर लघु हवन गाय के घी और सात्विक सामग्री से करें। माला रुद्राक्ष तुलसी अथवा स्फटिक की हो सकती है। काली तारा के लिए गहरे रंग की माला भाव के अनुकूल मानी गई। माला को अपवित्र स्थान पर न रखें और जप के समय मन मंत्र पर टिकाएं न कि केवल उंगलियों की गति पर।
महाविद्या उपासना में लिंग भेद बाधक नहीं। स्त्री साधिका के लिए ये रूप आत्मशक्ति की पहचान हैं। पुरुष साधक के लिए ये रूप प्रकृति के प्रति सम्मान और अंतरात्मा की करुणा हैं। आश्विन में परिवार यदि साथ बैठकर सरल जप करे तो घर का वातावरण स्वयं यंत्र बन जाता है। बच्चों को भय की कहानियाँ नहीं अपितु माँ की रक्षा का बोध देना उचित है।
निद्रा आना, मन का भटकना, अचानक क्रोध और परिणाम की जल्दबाजी सामान्य विघ्न हैं। समाधान है छोटे बैठक से आरंभ। पंद्रह मिनट की स्थिरता भी मूल्यवान है। यदि रोग हो तो शरीर का अपमान न करें। औषधि और विश्राम भी देवी व्यवस्था का भाग हैं। यदि स्वप्न तीव्र आएं तो भयभीत न हों। स्वप्न चित्त की सफाई भी हो सकते हैं। अधिक गड़बड़ी लगे तो जप घटाकर केवल नाम स्मरण और दीप जलाना पर्याप्त है।
शारदीय नवरात्रि सिद्ध करती है कि भक्ति और तंत्र शत्रु नहीं। कीर्तन भक्ति है। जप तंत्र की रीढ़ है। दोनों का मिलन आश्विन की रात्रि में सहज संभव है। मंदिर में जाकर आरती करना और घर लौटकर मौन जप करना एक ही धारा के दो तट हैं। जो केवल चमत्कार खोजता है वह थक जाता है। जो चरित्र मांगता है वह कृपा पाता है।
आश्विन की सिद्ध रात्रियाँ कैलेंडर की नौ रातें मात्र नहीं। वे साधक के भीतर वह अवसर हैं जब अंधकार शिक्षित हो जाता है। काली से कमला तक की यात्रा भय से ऐश्वर्य तक की यात्रा है। पर ऐश्वर्य का अर्थ केवल धन नहीं। ऐश्वर्य है वह स्थिति जब मन टूटे नहीं, वाणी बिगड़े नहीं और हृदय किसी प्राणी के प्रति क्रूर न हो। गृहस्थ यदि इन रात्रियों में सात्विक जप, शुद्ध आहार, दान और मौन को अपनाए तो दस महाविद्याओं की कृपा उसके जीवन में घटनाओं के शोर के बिना भी उतरती है। शक्ति सदा समीप है। आवश्यक केवल यह है कि रात्रि जागे और साधक सोए नहीं।
आश्विन मास की सिद्ध रात्रियां किसे कहा जाता है?
तंत्र शास्त्र में आश्विन शुक्ल नवरात्रि की रात्रियों को सिद्ध रात्रियां कहा जाता है क्योंकि इन रात्रियों में देवी साधना सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक शीघ्र फलदायी मानी गई है।
दस महाविद्याओं के नाम क्या हैं?
दस महाविद्याएँ काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला हैं।
क्या साधारण गृहस्थ महाविद्या साधना कर सकता है?
हाँ। गृहस्थ सात्विक विधि से जप, ध्यान, सप्तशती पाठ, दीपदान और संयम द्वारा महाविद्या कृपा प्राप्त कर सकता है। उग्र प्रयोग गुरु बिना नहीं करने चाहिए।
आश्विन नवरात्रि में कौन सी रात्रि सबसे बलवान मानी जाती है?
सप्तमी, अष्टमी, नवमी तथा अष्टमी नवमी का संधि काल विशेष बलवान माना गया है। फिर भी श्रद्धा और नियमितता किसी भी रात्रि को सिद्ध बना देती है।
सात्विक तांत्रिक साधना में क्या वर्जित है?
हिंसा, किसी को हानि पहुँचाने का संकल्प, अभक्ष्य सेवन, प्रदर्शन, असत्य और गुरुहीन उग्र अनुष्ठान सात्विक मार्ग में वर्जित माने गए हैं।
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