आश्विन मास 2026 व्रत कैलेंडर

By पं. संजीव शर्मा

इंदिरा एकादशी से शरद पूर्णिमा तक सभी व्रत और त्योहार

आश्विन मास 2026 व्रत त्योहार कैलेंडर और तिथियां

सामग्री तालिका

पहले जानें मास और तिथि नियम

आश्विन मास हिन्दू पंचांग का अत्यंत महत्वपूर्ण महीना है। वर्ष 2026 में कई उत्तर भारतीय पंचांगों के अनुसार आश्विन मास 27 सितंबर से आरंभ होकर 26 अक्टूबर तक माना जा रहा है। इस अवधि में पितृ पक्ष, इंदिरा एकादशी, सर्व पितृ अमावस्या, शारदीय नवरात्रि, सरस्वती पूजन, विजयादशमी, पापांकुशा एकादशी और शरद पूर्णिमा जैसे प्रमुख पर्व आते हैं।

भारतीय पंचांग चंद्र और सूर्य की गति पर आधारित है। इसलिए किसी तिथि का आरंभ और समाप्ति सूर्योदय, स्थान और पंचांग पद्धति के अनुसार बदल सकता है। नीचे दी गई सूची सामान्य उत्तर भारतीय गणना पर आधारित है। व्रत, श्राद्ध, पारण और पूजा का अंतिम समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से अवश्य मिलाएं।

आश्विन मास 2026 की मुख्य जानकारी

  1. मास आरंभ: रविवार, 27 सितंबर 2026
  2. मास समाप्ति: सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
  3. कृष्ण पक्ष: पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म
  4. अमावस्या: सर्व पितृ अमावस्या और महालय
  5. शुक्ल पक्ष: शारदीय नवरात्रि
  6. दशमी: विजयादशमी और दशहरा
  7. शुक्ल एकादशी: पापांकुशा एकादशी
  8. पूर्णिमा: कोजागरी पूजा और शरद पूर्णिमा
  9. मुख्य साधना: तर्पण, देवी पूजा, दान और व्रत
  10. मुख्य सावधानी: तिथि और पारण समय स्थानीय पंचांग से जांचें

आश्विन मास 2026 का पूरा कैलेंडर

तारीख दिन पर्व या तिथि मुख्य अनुष्ठान
27 सितंबर रविवार पितृ पक्ष आरंभ तर्पण और श्राद्ध संकल्प
29 सितंबर मंगलवार विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी गणेश पूजा और व्रत
3 अक्टूबर शनिवार जीवित्पुत्रिका व्रत और महालक्ष्मी व्रत समापन संतान सुख और लक्ष्मी पूजा
4 अक्टूबर रविवार मातृ नवमी मातृ पक्ष के पितरों का स्मरण
6 अक्टूबर मंगलवार इंदिरा एकादशी विष्णु पूजा और पितृ समर्पण
8 अक्टूबर गुरुवार प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि शिव पूजा और दीपदान
10 अक्टूबर शनिवार सर्व पितृ अमावस्या और महालय तर्पण, श्राद्ध और पितृ विसर्जन
11 अक्टूबर रविवार शारदीय नवरात्रि आरंभ घटस्थापना और शैलपुत्री पूजा
12 अक्टूबर सोमवार द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजा
13 अक्टूबर मंगलवार तृतीया चंद्रघंटा पूजा
14 अक्टूबर बुधवार चतुर्थी कूष्मांडा पूजा
15 अक्टूबर गुरुवार पंचमी और उपांग ललिता व्रत स्कंदमाता और ललिता पूजा
16 अक्टूबर शुक्रवार षष्ठी और सरस्वती आवाहन कात्यायनी पूजा और विद्या साधना
17 अक्टूबर शनिवार सप्तमी और तुला संक्रांति कालरात्रि पूजा और सूर्य साधना
18 अक्टूबर रविवार सरस्वती पूजा विद्या और वाद्य पूजन
19 अक्टूबर सोमवार दुर्गा अष्टमी और महानवमी महागौरी, सिद्धिदात्री और कन्या पूजन
20 अक्टूबर मंगलवार विजयादशमी और दशहरा हवन, शस्त्र पूजा और रावण दहन
22 अक्टूबर गुरुवार पापांकुशा एकादशी पद्मनाभ विष्णु पूजा और व्रत
23 अक्टूबर शुक्रवार शुक्र प्रदोष व्रत शिव पूजा और प्रदोष साधना
25 अक्टूबर रविवार कोजागरी पूजा और शरद पूर्णिमा लक्ष्मी पूजा और चांदनी खीर
26 अक्टूबर सोमवार आश्विन पूर्णिमा और इष्टि पूर्णिमा पूजा और दान

पितृ पक्ष और श्राद्ध कर्म

आश्विन कृष्ण पक्ष का आरंभ पितृ पक्ष से होता है। यह अवधि पूर्वजों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और अन्न दान के लिए समर्पित मानी जाती है। जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करना परंपरागत रूप से उचित माना जाता है।

पितृ पक्ष का भाव भय नहीं बल्कि कृतज्ञता है। शरीर, संस्कार, परिवार और जीवन का आधार पूर्वजों से प्राप्त होता है। श्राद्ध व्यक्ति को अपनी जड़ों और पारिवारिक जिम्मेदारियों का स्मरण कराता है।

पितृ पक्ष में किए जाने वाले कर्म

  1. तिथि अनुसार श्राद्ध
  2. जल और काले तिल से तर्पण
  3. पिंडदान
  4. अन्न और वस्त्र दान
  5. गौ, कौआ, कुत्ता और चींटी को भोजन
  6. वृद्धों और जरूरतमंदों की सेवा
  7. सर्व पितृ अमावस्या पर सामूहिक स्मरण

जीवित्पुत्रिका और महालक्ष्मी व्रत

3 अक्टूबर को कुछ पंचांगों में जीवित्पुत्रिका व्रत और महालक्ष्मी व्रत समापन का उल्लेख है। जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना से किया जाता है। कई क्षेत्रों में इसे कठिन उपवास और मातृ संकल्प से जोड़ा जाता है।

महालक्ष्मी व्रत की अवधि क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। इसमें धन, गृहस्थ सुख, परिवार की समृद्धि और लक्ष्मी कृपा की प्रार्थना की जाती है।

इन व्रतों में सावधानी

  1. कठोर उपवास स्वास्थ्य अनुसार रखें।
  2. गर्भवती महिलाएं चिकित्सकीय सलाह लें।
  3. बच्चों और रोगियों पर व्रत का दबाव न डालें।
  4. पारण समय स्थानीय पंचांग से देखें।
  5. व्रत के साथ दान और सेवा का भाव रखें।

इंदिरा एकादशी

6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी मनाई जाएगी। यह आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी है और पितृ पक्ष में आने के कारण इसका संबंध पितृ शांति से जोड़ा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। व्रत का पुण्य पितरों की शांति और सद्गति के लिए समर्पित किया जा सकता है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप, तुलसी अर्पण, कथा श्रवण और अन्न दान इस दिन उपयोगी माने जाते हैं।

सर्व पितृ अमावस्या और महालय

10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या और महालय मनाया जाएगा। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं, जिनका श्राद्ध छूट गया या जिन्हें परिवार सामूहिक रूप से याद करना चाहता है, उनका तर्पण इस दिन किया जा सकता है।

महालय की सरल विधि

  1. प्रातः स्नान करें।
  2. स्वच्छ स्थान पर जल, तिल और कुशा रखें।
  3. ज्ञात और अज्ञात पितरों का स्मरण करें।
  4. तर्पण और श्राद्ध करें।
  5. जरूरतमंद को भोजन दें।
  6. पीपल के पास सुरक्षित दीपक जलाएं।
  7. पितृ विसर्जन और शांति की प्रार्थना करें।

नदी या तालाब में प्लास्टिक, कपड़ा या पूजा सामग्री न बहाएं। पर्यावरण की रक्षा भी पितृ सेवा का हिस्सा है।

शारदीय नवरात्रि और घटस्थापना

11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि आरंभ होगी। इस दिन घटस्थापना और माँ शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। नवरात्रि के नौ दिनों में नवदुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है।

घटस्थापना का मुख्य मुहूर्त नई दिल्ली के अनुसार प्रातः 6:19 बजे से 10:12 बजे तक माना जा रहा है। अभिजीत मुहूर्त 11:44 बजे से 12:31 बजे तक हो सकता है। स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि आवश्यक है।

नवदुर्गा क्रम

  1. 11 अक्टूबर, शैलपुत्री
  2. 12 अक्टूबर, ब्रह्मचारिणी
  3. 13 अक्टूबर, चंद्रघंटा
  4. 14 अक्टूबर, कूष्मांडा
  5. 15 अक्टूबर, स्कंदमाता
  6. 16 अक्टूबर, कात्यायनी
  7. 17 अक्टूबर, कालरात्रि
  8. 18 अक्टूबर, महागौरी
  9. 19 अक्टूबर, सिद्धिदात्री

कुछ पंचांगों में अष्टमी और नवमी की पूजा तिथि के अनुसार 19 और 20 अक्टूबर को मिलती है। इस कारण कन्या पूजन और हवन का अंतिम निर्णय स्थानीय गणना से करें।

सरस्वती पूजन और विद्या साधना

16 अक्टूबर को सरस्वती आवाहन और 18 अक्टूबर को सरस्वती पूजन की परंपरा कुछ क्षेत्रों में मिलती है। नवरात्रि के अंतिम दिनों में पुस्तक, वाद्य, लेखन सामग्री और अध्ययन साधनों की पूजा की जाती है।

विद्या पूजा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता नहीं है। यह ज्ञान, विवेक, वाणी और सृजनशीलता के सम्मान का पर्व है।

सरस्वती पूजा की सामग्री

  1. पुस्तक
  2. कलम और लेखन सामग्री
  3. वाद्य यंत्र
  4. सफेद पुष्प
  5. दीपक और धूप
  6. अक्षत और चंदन
  7. फल और नैवेद्य
  8. ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः मंत्र

विजयादशमी और दशहरा

20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्रीराम की रावण पर और माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय का स्मरण किया जाता है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजा, शमी पूजा, आयुध पूजा, अपराजिता पूजा, हवन और रावण दहन की परंपरा है। व्यापार, अध्ययन, कृषि, वाहन और कार्य उपकरणों से जुड़े लोग अपने कर्म साधनों का सम्मान करते हैं।

विजयादशमी के प्रमुख कर्म

  1. शमी वृक्ष पूजा
  2. शस्त्र और औजार पूजा
  3. बही खाते और पुस्तक पूजा
  4. श्रीराम और दुर्गा स्मरण
  5. हवन और पूर्णाहुति
  6. जरूरतमंद को दान
  7. रावण दहन में सुरक्षा

पापांकुशा एकादशी

22 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी मनाई जाएगी। यह आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी है। भगवान पद्मनाभ विष्णु की पूजा करके मन और कर्मों पर अंकुश लगाने का संकल्प लिया जाता है।

इस दिन फलाहार या परंपरा अनुसार व्रत रखा जा सकता है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप, तुलसी अर्पण, विष्णु सहस्रनाम, कथा और दान प्रमुख साधना हैं।

पापांकुशा एकादशी दान

  1. अन्न
  2. फल
  3. दूध
  4. पीले वस्त्र
  5. तिल और गुड़
  6. धार्मिक पुस्तक
  7. औषधि
  8. जरूरतमंद को भोजन

शुक्र प्रदोष व्रत

23 अक्टूबर को शुक्र प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। प्रदोष काल भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। शुक्रवार होने के कारण इसमें शिव पूजा के साथ शुक्र से जुड़े सौंदर्य, दांपत्य, सुख और समृद्धि के भाव भी जोड़े जा सकते हैं।

प्रदोष पूजा की सरल विधि

  1. सूर्यास्त से पहले स्नान करें।
  2. शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करें।
  3. बेलपत्र, पुष्प और धूप चढ़ाएं।
  4. ॐ नमः शिवाय का जप करें।
  5. शिव चालीसा या प्रदोष कथा पढ़ें।
  6. दांपत्य शांति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

कोजागरी पूजा और शरद पूर्णिमा

25 अक्टूबर को कोजागरी पूजा और शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। इस रात माँ लक्ष्मी के जागरण, चंद्र दर्शन और चांदनी में रखी खीर की परंपरा है।

को जागर्ति का अर्थ है कौन जाग रहा है। इसका गहरा भाव यह है कि व्यक्ति धन, स्वास्थ्य, समय, कर्म और परिवार की जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक रहे।

शरद पूर्णिमा के प्रमुख कर्म

  1. लक्ष्मी और विष्णु पूजा
  2. चंद्रमा को अर्घ्य
  3. खीर का नैवेद्य
  4. श्रीसूक्त या लक्ष्मी मंत्र
  5. सफेद वस्त्र और चावल का दान
  6. सीमित रात्रि जागरण
  7. खीर को स्वच्छ और सुरक्षित रखना

तिथि और पंचांग में अंतर क्यों होता है

एक ही पर्व की तारीख अलग पंचांगों में अलग दिखाई दे सकती है। इसके प्रमुख कारण हैं।

  1. अमांत और पूर्णिमांत मास पद्धति
  2. स्थानीय सूर्योदय
  3. तिथि का दिन में आरंभ या समाप्त होना
  4. तिथि क्षय या वृद्धि
  5. क्षेत्रीय परंपरा
  6. स्मार्त और वैष्णव व्रत नियम

इसलिए किसी भी एक इंटरनेट सूची को अंतिम मानने के बजाय स्थानीय पंचांग और परिवार परंपरा का पालन करना चाहिए।

आश्विन मास में साधना का क्रम

आश्विन मास की संरचना बहुत अर्थपूर्ण है। आरंभ में पितृ स्मरण, मध्य में देवी शक्ति और अंत में लक्ष्मी, चंद्रमा तथा समृद्धि की साधना आती है।

आध्यात्मिक क्रम

  1. पितृ पक्ष में कृतज्ञता
  2. अमावस्या पर पितृ विसर्जन
  3. नवरात्रि में शक्ति जागरण
  4. अष्टमी और नवमी में करुणा और सिद्धि
  5. दशमी में विजय और कर्म
  6. एकादशी में आत्मसंयम
  7. पूर्णिमा में शांति और समृद्धि

यही क्रम आश्विन मास को व्रत और त्योहारों का महाकुंभ बनाता है। यह महीना व्यक्ति को अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से जोड़ता है।

कैलेंडर का सही उपयोग

त्योहार की तारीख जानना पहला चरण है। सही पूजा के लिए स्थानीय सूर्योदय, तिथि, मुहूर्त, पारण, स्थान और पारिवारिक नियमों का ध्यान रखें।

  1. व्रत से पहले स्वास्थ्य देखें।
  2. पूजा सामग्री पहले से तैयार करें।
  3. स्थानीय पंचांग की तिथि मिलाएं।
  4. पितृ कर्म में कुल परंपरा का पालन करें।
  5. नवरात्रि में घटस्थापना समय जांचें।
  6. एकादशी में पारण न भूलें।
  7. शरद पूर्णिमा की खीर सुरक्षित रखें।
  8. दान उपयोगी और सम्मानजनक करें।

आश्विन मास की समग्र साधना

आश्विन मास केवल बहुत सारे पर्वों का कैलेंडर नहीं है। यह जीवन को क्रम से देखने की साधना है। पितृ पक्ष सिखाता है कि जड़ों को भूलना नहीं चाहिए। नवरात्रि सिखाती है कि भीतर की शक्ति को जाग्रत करना चाहिए। विजयादशमी बताती है कि शक्ति को धर्मपूर्ण कर्म में बदलना चाहिए। पापांकुशा एकादशी मन और कर्म पर अंकुश लगाने की प्रेरणा देती है। कोजागरी पूर्णिमा सिखाती है कि समृद्धि के साथ जागरूकता और संतोष भी आवश्यक हैं।

इस मास में प्रत्येक पर्व एक अलग प्रश्न पूछता है। क्या व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ है। क्या वह अपनी कमजोरियों पर विजय पा रहा है। क्या उसका धन धर्मपूर्ण है। क्या उसका ज्ञान सेवा में बदल रहा है। क्या उसका मन जाग रहा है।

जब इन प्रश्नों का उत्तर जीवन के व्यवहार में दिखाई देता है तब आश्विन मास की साधना पूर्ण होती है। तिथि और मुहूर्त मार्गदर्शन देते हैं, लेकिन श्रद्धा, कर्म, सेवा और सदाचार ही इस पूरे मास को फलदायी बनाते हैं।

FAQ

आश्विन मास 2026 कब से कब तक है?

कई उत्तर भारतीय पंचांगों के अनुसार आश्विन मास 27 सितंबर से 26 अक्टूबर 2026 तक माना जा रहा है। स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

आश्विन मास में सबसे प्रमुख पर्व कौन से हैं?

इंदिरा एकादशी, जीवित्पुत्रिका, सर्व पितृ अमावस्या, शारदीय नवरात्रि, सरस्वती पूजा, विजयादशमी, पापांकुशा एकादशी, शुक्र प्रदोष और शरद पूर्णिमा प्रमुख पर्व हैं।

आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि कब शुरू होगी?

शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी। इसी दिन घटस्थापना और माँ शैलपुत्री की पूजा की जाएगी।

आश्विन मास में दशहरा कब है?

विजयादशमी और दशहरा 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा।

पापांकुशा एकादशी और शरद पूर्णिमा कब है?

पापांकुशा एकादशी 22 अक्टूबर और शरद पूर्णिमा तथा कोजागरी पूजा 25 अक्टूबर 2026 को मानी जा रही है। स्थानीय पंचांग से तिथि और पूजा समय की पुष्टि करें।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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