By पं. नीलेश शर्मा
2026 व्रत तिथि, पूजा विधि, कथा, पारण और पितृ समर्पण

इंदिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी है। वर्ष 2026 में यह व्रत मंगलवार, 6 अक्टूबर को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को रात्रि 2:07 बजे आरंभ होकर 7 अक्टूबर को रात्रि 12:34 बजे समाप्त होगी। व्रत का पारण 7 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि में किया जाना चाहिए।
पारण का वास्तविक समय शहर, सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकता है। सामान्य गणना में 7 अक्टूबर को प्रातः 6:17 बजे से 10:11 बजे के बीच पारण का समय बताया गया है। हरि वासर समाप्त होने के बाद और द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना उचित माना जाता है। अंतिम समय के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
| चरण | समय या तिथि | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| दशमी तैयारी | 5 अक्टूबर की संध्या | सात्विक भोजन और संयम |
| व्रत आरंभ | 6 अक्टूबर प्रातः | स्नान, संकल्प और विष्णु पूजा |
| दिन की साधना | 6 अक्टूबर | जप, कथा, दान और ध्यान |
| रात्रि पूजा | 6 अक्टूबर संध्या | दीपक, तुलसी, विष्णु मंत्र और आरती |
| व्रत समापन | 7 अक्टूबर | सूर्योदय के बाद पारण |
| पितृ समर्पण | व्रत के बाद | अन्न दान, तर्पण और सेवा |
इंदिरा एकादशी को पितृ एकादशी भी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन इसका विशेष संबंध पितरों की शांति और सद्गति से जोड़ा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष स्वयं पितृ स्मरण का समय माना जाता है। इसी कारण इस पक्ष में आने वाली एकादशी का महत्व और बढ़ जाता है।
पुराणों में वर्णित मान्यता के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य पितरों को समर्पित करने से उन्हें अधोगति और कष्टों से मुक्ति मिलती है। कुछ कथाओं में स्वर्ग से पतित हुए राजा के पिता को इस व्रत के प्रभाव से सद्गति प्राप्त होने का वर्णन मिलता है।
यह फल धार्मिक विश्वास का हिस्सा है। किसी व्रत से किसी आत्मा को तुरंत मोक्ष मिलना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं है। फिर भी इस परंपरा का आध्यात्मिक अर्थ गहरा है। व्रत व्यक्ति को संयम, प्रार्थना, दान, पूर्वज स्मरण और आत्मशुद्धि की दिशा में ले जाता है।
इंदिरा एकादशी से जुड़ी कथा में राजा इंद्रसेन का वर्णन मिलता है। राजा धर्मप्रिय, प्रजावत्सल और भगवान विष्णु के भक्त थे। एक दिन नारद मुनि उनके पास आए और बताया कि उनके पिता को पूर्व कर्मों के कारण कठिन अवस्था का सामना करना पड़ रहा है।
राजा इंद्रसेन अपने पिता की स्थिति जानकर दुखी हुए। उन्होंने नारद मुनि से पितृ मुक्ति का उपाय पूछा। नारद मुनि ने आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत करने, भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करने की सलाह दी।
राजा ने दशमी से ही संयम आरंभ किया। एकादशी के दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा की, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराया और व्रत का पुण्य अपने पिता को समर्पित किया। कथा के अनुसार उनके पिता को कष्ट से मुक्ति मिली और राजा के राज्य में धर्म, शांति और समृद्धि बनी रही।
कथा का मूल संदेश यह है कि संतान का धर्म केवल अपने सुख तक सीमित नहीं होना चाहिए। पूर्वजों का स्मरण, परिवार की जिम्मेदारी और धर्मपूर्ण कर्म भी जीवन का आवश्यक भाग हैं।
इंदिरा एकादशी का व्रत केवल एक दिन की अचानक शुरुआत नहीं है। दशमी तिथि से ही भोजन और व्यवहार में संयम रखा जाता है। भोजन हल्का, सात्विक और सुपाच्य रखना चाहिए।
दशमी की रात्रि में अति भोजन या जागरण करने से अगले दिन व्रत कठिन हो सकता है। व्रत का अर्थ शरीर को अनावश्यक कष्ट देना नहीं बल्कि इंद्रियों और मन को अनुशासित करना है।
व्रत की विधि व्यक्ति की क्षमता, स्वास्थ्य और परिवार की परंपरा के अनुसार होनी चाहिए। निर्जल व्रत हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता। रोगी, वृद्ध, गर्भवती महिला, बच्चे और नियमित औषधि लेने वाले लोग चिकित्सकीय तथा पारिवारिक सलाह के अनुसार व्रत रखें।
भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय मानी जाती है। तुलसी दल अर्पित करते समय पौधे का सम्मान रखें। द्वादशी के दिन या विशेष निषेध होने पर तुलसी तोड़ने से संबंधित परिवार परंपरा का पालन करें।
व्रत के दौरान सरल मंत्रों का जप किया जा सकता है। मंत्र की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उच्चारण, श्रद्धा और एकाग्रता है।
पितृ समर्पण के समय साधक मन में यह भाव रख सकता है कि व्रत, जप, पूजा और दान का पुण्य समस्त पितरों की शांति और सद्गति को समर्पित है। यह भाव किसी सौदे की तरह नहीं होना चाहिए। पूजा का उद्देश्य कृपा मांगने के साथ अपने कर्म और जीवन को भी शुद्ध करना है।
इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का स्मरण करते समय सरल तर्पण और दान किया जा सकता है। विस्तृत श्राद्ध विधि के लिए कुल पुरोहित या योग्य आचार्य से मार्गदर्शन लेना उचित है।
जल और तिल का अर्पण धार्मिक प्रतीक है। इसे पितरों तक भौतिक रूप से पहुंचने वाली वस्तु के रूप में प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इसका महत्व स्मरण, मन की शांति और सेवा में है।
एकादशी व्रत में अन्न त्याग की परंपरा है। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, कुछ केवल जल लेते हैं और कुछ फलाहार या सात्विक व्रत भोजन करते हैं। शरीर की स्थिति और परंपरा अनुसार विकल्प चुनना चाहिए।
व्रत में कमजोरी, चक्कर, उल्टी या अत्यधिक थकान हो तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। व्रत तोड़ने के लिए चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर दोष भाव न रखें।
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण का अर्थ केवल खाना शुरू करना नहीं है। यह व्रत के संयम को संतुलित रूप से पूरा करने की विधि है।
7 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना चाहिए। स्थानीय सूर्योदय के कारण समय में बदलाव हो सकता है।
पारण समय की उपेक्षा करना एकादशी व्रत की पारंपरिक विधि को अधूरा कर सकता है। यदि किसी कारण से समय छूट जाए तो स्थानीय आचार्य से मार्गदर्शन लें।
इंदिरा एकादशी को पितृ शांति से जोड़कर देखा जाता है। ज्योतिष में पितृ दोष के संबंध में सूर्य, राहु, शनि, नवम भाव और पंचम भाव का अध्ययन किया जाता है। फिर भी केवल एक ग्रह स्थिति देखकर पितृ दोष घोषित करना उचित नहीं है।
कई बार परिवार में स्वास्थ्य, धन या संबंधों की समस्या के वास्तविक कारण व्यावहारिक होते हैं। गलत आर्थिक योजना, उपचार में देरी, संवाद की कमी या पारिवारिक तनाव को केवल पितृ दोष कह देना समस्या को और जटिल बना सकता है।
इंदिरा एकादशी के फल धार्मिक परंपरा में अत्यंत ऊंचे बताए गए हैं। पितरों को नरक यातना से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का वर्णन आस्था का विषय है। इसे तुरंत और निश्चित भौतिक परिणाम की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं।
व्रत का उद्देश्य शरीर को नुकसान पहुंचाना नहीं है। फलाहार, एक समय सात्विक भोजन या मानसिक संयम भी श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।
इंदिरा एकादशी की कथा यह सिखाती है कि पितृ मुक्ति की कामना केवल मंत्र और उपवास से पूरी नहीं होती। परिवार में सत्य, सेवा, करुणा और जिम्मेदारी का वातावरण बनाना भी पितृ सम्मान है।
पूर्वजों के नाम पर किसी विद्यार्थी की फीस देना, रोगी की दवा खरीदना, वृद्ध की सेवा करना या भूखे को भोजन कराना उस पुण्य को जीवित रूप देता है जिसे धार्मिक परंपरा पितृ समर्पण कहती है।
इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी अर्पण, व्रत, कथा, तर्पण, दान और पारण श्रद्धा से करें। पितरों को नरक से मुक्त कराने की कथा को भय के रूप में नहीं बल्कि प्रेम और कृतज्ञता के रूप में समझें। जब व्रत व्यक्ति को अधिक संयमी, अधिक करुणामय और अधिक धर्मपूर्ण बनाता है तब यही इसकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक सिद्धि है।
इंदिरा एकादशी 2026 कब है?
इंदिरा एकादशी 2026 में मंगलवार, 6 अक्टूबर को है। एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को रात्रि 2:07 बजे से 7 अक्टूबर को रात्रि 12:34 बजे तक रहेगी।
इंदिरा एकादशी 2026 का पारण कब करें?
पारण 7 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि में करना चाहिए। सामान्य समय 6:17 बजे से 10:11 बजे के बीच बताया जाता है। स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
क्या इंदिरा एकादशी का पुण्य पितरों को समर्पित किया जा सकता है?
हां, धार्मिक परंपरा में व्रत, जप, पूजा और दान का पुण्य पितरों की शांति और सद्गति के लिए समर्पित किया जाता है।
इंदिरा एकादशी में क्या खा सकते हैं?
फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, शकरकंद, नारियल और सेंधा नमक आधारित भोजन लिया जा सकता है।
क्या इंदिरा एकादशी से पितृ दोष समाप्त होता है?
यह व्रत पितृ शांति की धार्मिक साधना माना जाता है। पितृ दोष का निर्णय कुंडली, दशा और पारिवारिक परिस्थिति देखकर ही किया जाना चाहिए।
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