By पं. सुव्रत शर्मा
जितिया 2026 तिथि, निर्जला नियम, पूजा विधि और संतान रक्षा

जीमूतवाहन व्रत को जीवित्पुत्रिका, जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। माताएं संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुखमय भविष्य की कामना से यह व्रत करती हैं।
वर्ष 2026 में उदया अष्टमी के आधार पर जितिया व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। नहाय खाय 2 अक्टूबर को होगा और पारण 4 अक्टूबर की सुबह किया जाएगा। अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह लगभग 7:59 बजे आरंभ होकर 4 अक्टूबर को सुबह लगभग 5:51 बजे समाप्त होने की गणना मिलती है। क्षेत्रीय पंचांग, सूर्योदय और परंपरा के अनुसार पूजा तथा पारण समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
यह व्रत कई परिवारों में निर्जला रखा जाता है, लेकिन निर्जल उपवास अत्यंत कठोर होता है। गर्भवती महिलाओं, रोगियों, वृद्धों, बच्चों और नियमित औषधि लेने वालों को स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखना चाहिए। धार्मिक व्रत का उद्देश्य शरीर को गंभीर हानि पहुंचाना नहीं है।
| दिन | तारीख | मुख्य अनुष्ठान | भोजन नियम |
|---|---|---|---|
| पहला दिन | 2 अक्टूबर | नहाय खाय और शुद्धि | एक समय सात्विक भोजन |
| दूसरा दिन | 3 अक्टूबर | निर्जला जितिया व्रत और पूजा | जल और अन्न का त्याग |
| तीसरा दिन | 4 अक्टूबर | पारण और प्रसाद | जल से आरंभ, फिर हल्का भोजन |
जीवित्पुत्रिका शब्द का अर्थ है संतान के जीवन और कल्याण से जुड़ा व्रत। जीमूतवाहन एक ऐसे करुणामय और त्यागी राजा के रूप में स्मरण किए जाते हैं जिन्होंने किसी अन्य माता की संतान की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित करने का संकल्प लिया।
जितिया व्रत में मातृत्व का भाव केवल अपनी संतान तक सीमित नहीं रहता। जीमूतवाहन की कथा यह सिखाती है कि सच्ची करुणा दूसरे के बच्चे और दूसरे के परिवार के दुख को भी अपना समझती है।
यह व्रत माताओं की मानसिक शक्ति, धैर्य और संकल्प का प्रतीक है। परंपरा में संतान की लंबी आयु और रक्षा की कामना की जाती है, लेकिन इसके साथ बालकों के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और भावनात्मक विकास की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
कथा के अनुसार जीमूतवाहन एक दयालु, वीर और धर्मनिष्ठ राजकुमार थे। उन्हें सांसारिक सुखों और राजसी अधिकारों में विशेष आकर्षण नहीं था। उन्होंने राज्य की जिम्मेदारी अपने भाइयों को सौंप दी और वन में तपस्वी जीवन बिताने चले गए।
एक दिन वन में उन्हें एक वृद्धा दिखाई दी जो अत्यंत दुखी थी। जीमूतवाहन ने उसके दुख का कारण पूछा। वृद्धा नाग वंश से संबंधित थी और उसका एकमात्र पुत्र था। नागों और गरुड़ के बीच हुए पुराने समझौते के अनुसार प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के आहार के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। उस दिन वृद्धा के पुत्र की बारी थी।
माता अपने इकलौते पुत्र को खोने के भय से रो रही थी। जीमूतवाहन ने उसकी पीड़ा देखी और नाग कुमार की रक्षा करने का संकल्प लिया। उन्होंने स्वयं को लाल वस्त्र में ढककर उस स्थान पर लेटने का निर्णय लिया जहां गरुड़ अपना आहार लेने आते थे।
गरुड़ वहां पहुंचे और जीमूतवाहन को नाग कुमार समझकर उठा ले गए। जीमूतवाहन के चेहरे पर भय या मृत्यु की चिंता नहीं थी। गरुड़ को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उनकी पहचान पूछी। जब उन्हें पूरी घटना का पता चला तब वे जीमूतवाहन की करुणा और साहस से प्रभावित हुए।
गरुड़ ने जीमूतवाहन को मुक्त किया और नागों से बलिदान लेने की परंपरा समाप्त करने का संकल्प लिया। इस प्रकार नाग कुमार और अनेक नागों का जीवन बच गया।
जितिया व्रत तीन दिनों की प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता है। पहले दिन नहाय खाय होता है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान करके शरीर और मन की शुद्धि करती हैं। घर की सफाई की जाती है और एक समय सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।
नहाय खाय का उद्देश्य अगले दिन के कठिन व्रत के लिए शरीर और मन को तैयार करना है। भोजन हल्का, ताजा और सुपाच्य होना चाहिए। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार भोजन में अलग सामग्री शामिल हो सकती है।
नहाय खाय के दिन अत्यधिक भोजन करना उचित नहीं। अगले दिन निर्जला व्रत रखने की तैयारी में शरीर को संतुलित पोषण देना अधिक उपयोगी है।
जितिया का मुख्य व्रत अष्टमी तिथि पर रखा जाता है। अनेक परिवारों में माताएं सूर्योदय के बाद जल और अन्न का त्याग करती हैं। कुछ परंपराओं में यह व्रत 24 घंटे का निर्जला उपवास माना जाता है।
निर्जला व्रत अत्यंत कठिन हो सकता है। गर्म मौसम, बीमारी, रक्तचाप, मधुमेह या गर्भावस्था में इसका पालन जोखिमपूर्ण हो सकता है। परिवार और समाज को किसी महिला पर कठोर व्रत का दबाव नहीं डालना चाहिए।
व्रत टूट जाए या स्वास्थ्य कारण से जल लेना पड़े तो अपराध भाव न रखें। श्रद्धा मन में है, केवल शरीर को कष्ट देने में नहीं।
कुछ क्षेत्रों में चील और सियार से जुड़े प्रतीक या मिट्टी की आकृतियां बनाई जाती हैं। इनका संबंध जितिया कथा और लोक परंपरा से है। क्षेत्रीय रीति के अनुसार इन्हें पूजा में शामिल किया जा सकता है।
जितिया व्रत में सूर्य देव को जल अर्पित करने की परंपरा कई क्षेत्रों में मिलती है। सूर्य जीवन शक्ति, आरोग्य, आत्मबल और पिता भाव के कारक माने जाते हैं।
संतान की दीर्घायु की प्रार्थना में सूर्य पूजा का भाव यह है कि बच्चों को स्वास्थ्य, ऊर्जा और स्पष्ट जीवन दिशा मिले। सूर्य को अर्घ्य देते समय जल बर्बाद न करें और खुले स्थान पर शांत भाव से पूजा करें।
जीमूतवाहन की कथा में एक माता का दुख, एक पुत्र का भय और एक त्यागी राजा की करुणा दिखाई देती है। यह कथा परिवार और समाज को बताती है कि संतान की सुरक्षा केवल माता की जिम्मेदारी नहीं। पूरे समाज को बच्चों के जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।
आज के समय में जितिया व्रत का आधुनिक रूप बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, टीकाकरण, सुरक्षित वातावरण और भावनात्मक सहारे से जुड़ सकता है।
जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर 2026 की सुबह किया जाएगा, जब अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी आरंभ होगी। स्थानीय सूर्योदय और पंचांग के अनुसार पारण समय अलग हो सकता है।
कठोर निर्जला व्रत के बाद अचानक भारी भोजन करना शरीर के लिए उचित नहीं। पारण जल, हल्के पेय या फल से शुरू करना चाहिए।
कठोर निर्जला व्रत से जल की कमी, कमजोरी, सिरदर्द, चक्कर और रक्तचाप संबंधी समस्या हो सकती है। गर्मी, बीमारी और गर्भावस्था में जोखिम और बढ़ सकता है।
व्रत का विकल्प फलाहार, जल सेवन, एक समय सात्विक भोजन या मानसिक संयम हो सकता है। परिवार को व्रती महिला की स्थिति का सम्मान करना चाहिए।
जीमूतवाहन व्रत में सूर्य, चंद्रमा, गुरु और मंगल से जुड़े भावों को देखा जा सकता है। सूर्य जीवन शक्ति और आरोग्य का, चंद्रमा मातृत्व और मन का, गुरु संतान और ज्ञान का तथा मंगल रक्षा और साहस का संकेत देता है।
संतान संबंधी ज्योतिषीय अध्ययन में पंचम भाव, पंचमेश, गुरु, सूर्य, चंद्रमा और संबंधित दशाओं को देखा जाता है। केवल जितिया व्रत से संतान संबंधी हर समस्या का समाधान हो जाएगा, ऐसा निश्चित दावा नहीं किया जा सकता।
धार्मिक व्रत के साथ चिकित्सा सलाह, पोषण और परिवार का सहयोग भी आवश्यक है।
जितिया व्रत को केवल पुत्र की दीर्घायु तक सीमित करना परंपरा के व्यापक भाव को छोटा कर देता है। आज के समय में संतान शब्द में पुत्र और पुत्री दोनों शामिल हैं। हर बच्चे का जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान समान रूप से महत्वपूर्ण है।
जीमूतवाहन की कथा किसी एक लिंग की संतान नहीं बल्कि जीवन की रक्षा का संदेश देती है। इसलिए इस व्रत का आधुनिक और मानवीय रूप सभी बच्चों के लिए सुरक्षा, पोषण और करुणा का संकल्प होना चाहिए।
जीमूतवाहन व्रत मातृत्व, त्याग और जीवन रक्षा की साधना है। इसकी कठोरता केवल निर्जला उपवास में नहीं, उस संकल्प में है जिसमें माता अपनी संतान के लिए धैर्य, प्रेम और सुरक्षा की प्रार्थना करती है।
जीमूतवाहन की कथा बताती है कि किसी एक बच्चे का दुख पूरे समाज की जिम्मेदारी बन सकता है। गरुड़ का परिवर्तन यह दर्शाता है कि करुणा हिंसा और प्रतिशोध की परंपरा को भी बदल सकती है।
जितिया व्रत में संतान की लंबी आयु की कामना के साथ उसके अच्छे संस्कार, स्वास्थ्य, शिक्षा, आत्मसम्मान और सुरक्षित भविष्य की प्रार्थना करें। निर्जला व्रत श्रद्धा का एक रूप है, लेकिन सच्ची साधना बच्चों के प्रति प्रतिदिन की जिम्मेदारी में दिखाई देती है।
जब माता का व्रत करुणा, पिता का सहयोग, परिवार की सुरक्षा और समाज की जिम्मेदारी से जुड़ता है तब जीवित्पुत्रिका व्रत केवल एक कठिन उपवास नहीं रहता। वह जीवन के प्रति गहरी श्रद्धा और मानवीय सेवा का पवित्र संकल्प बन जाता है।
जितिया व्रत 2026 कब है?
उदया अष्टमी के आधार पर जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत 2026 में शनिवार, 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। नहाय खाय 2 अक्टूबर और पारण 4 अक्टूबर को होगा।
जितिया व्रत में निर्जला उपवास क्यों रखा जाता है?
धार्मिक परंपरा में माताएं संतान की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। यह बहुत कठोर व्रत है, इसलिए स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।
जीमूतवाहन कौन थे?
जीमूतवाहन दयालु और त्यागी राजा या राजकुमार के रूप में वर्णित हैं जिन्होंने नाग कुमार की रक्षा के लिए अपना जीवन गरुड़ के सामने अर्पित किया।
जितिया व्रत का पारण कब करें?
2026 में पारण 4 अक्टूबर की सुबह किया जाएगा। अष्टमी समाप्ति, सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार सही समय निश्चित करें।
क्या जितिया व्रत केवल पुत्र के लिए किया जाता है?
परंपरा में इसे पुत्र की दीर्घायु से जोड़ा गया, लेकिन इसका व्यापक अर्थ सभी संतानों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा और कल्याण की प्रार्थना है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ