By पं. अमिताभ शर्मा
संतान सुख, सौभाग्य और देवी ललिता की कृपा का मार्ग

आश्विन शुक्ल पंचमी को ललिता पंचमी या उपांग ललिता व्रत मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 15 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि 15 अक्टूबर को रात्रि 1 बजकर 13 मिनट से प्रारंभ होकर 16 अक्टूबर को प्रातः 3 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। व्रत और पूजा का पालन स्थानीय सूर्योदय, पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार करना चाहिए।
कुछ पंचांग तिथि के समाप्ति समय और सूर्योदय के आधार पर व्रत की तारीख में अंतर दिखा सकते हैं। इसलिए अंतिम निर्णय स्थानीय पंचांग से लेना उचित है। ललिता पंचमी शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन आती है। इसी दिन अनेक परिवारों में स्कंदमाता की पूजा भी की जाती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | ललिता पंचमी और उपांग ललिता व्रत |
| वर्ष 2026 की प्रमुख तिथि | 15 अक्टूबर, गुरुवार |
| तिथि | आश्विन शुक्ल पंचमी |
| तिथि आरंभ | 15 अक्टूबर को रात्रि 1 बजकर 13 मिनट |
| तिथि समाप्त | 16 अक्टूबर को प्रातः 3 बजकर 25 मिनट |
| नवरात्रि क्रम | पांचवां दिन |
| संबंधित देवी | ललिता त्रिपुरसुंदरी और स्कंदमाता |
| पूजा का भाव | सौंदर्य, ज्ञान, मातृशक्ति और सौभाग्य |
| प्रमुख अर्पण | लाल या गुलाबी पुष्प, अक्षत, कुमकुम, फल और नैवेद्य |
| पाठ | ललिता सहस्रनाम, ललिता त्रिशती या देवी स्तुति |
| व्रत नियम | स्वास्थ्य और परिवार की परंपरा के अनुसार |
ललिता पंचमी का व्रत विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा संतान सुख, परिवार की शांति, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति की कामना से रखा जाता है। फिर भी यह व्रत केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं है। कोई भी श्रद्धालु देवी ललिता की पूजा कर सकता है।
ललिता शब्द का अर्थ कोमल, सुंदर, सहज और लीला करने वाली शक्ति से जुड़ा है। देवी ललिता को त्रिपुरसुंदरी, षोडशी और राजराजेश्वरी जैसे नामों से भी जाना जाता है। श्रीविद्या परंपरा में वे परम शक्ति के सौम्य, पूर्ण और ज्ञानमय रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं।
त्रिपुरसुंदरी का अर्थ तीनों पुरियों या तीनों स्तरों में सुंदरता और संतुलन स्थापित करने वाली देवी है। इन तीन स्तरों को शरीर, मन और चेतना के रूप में भी समझा जा सकता है। जब शरीर स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि धर्मपूर्ण दिशा में चले तब जीवन में वास्तविक सौंदर्य प्रकट होता है।
देवी ललिता की पूजा केवल भौतिक सौभाग्य के लिए नहीं है। इसका गहरा भाव यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में प्रेम, मर्यादा, विवेक और कोमलता को स्थान दे। सौंदर्य का अर्थ केवल रूप नहीं है। मधुर वाणी, पवित्र विचार, संतुलित व्यवहार और करुणामय हृदय भी ललिता तत्त्व के रूप माने जाते हैं।
शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन नवदुर्गा में स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता की गोद में भगवान कार्तिकेय या स्कंद विराजमान रहते हैं। वे मातृत्व, संरक्षण, साहस और संतान की मंगल कामना का प्रतीक हैं।
इसी पंचमी तिथि को कई क्षेत्रों में ललिता पंचमी भी मनाई जाती है। दोनों पूजा परंपराओं का केंद्र मातृशक्ति है, लेकिन दोनों के स्वरूप और साधना भाव अलग हो सकते हैं। स्कंदमाता का भाव पालन, सुरक्षा और मातृत्व से जुड़ा है। ललिता त्रिपुरसुंदरी का भाव सौंदर्य, ज्ञान, चेतना और श्रीविद्या से जुड़ा है।
इस दिन दोनों देवियों का स्मरण करने से मातृशक्ति के दो आयाम सामने आते हैं।
| देवी स्वरूप | मुख्य भाव |
|---|---|
| स्कंदमाता | मातृत्व, संरक्षण और संतान कल्याण |
| ललिता त्रिपुरसुंदरी | सौंदर्य, ज्ञान, प्रेम और चेतना |
| राजराजेश्वरी | शासन, गरिमा और आत्मबल |
| षोडशी | पूर्णता, सोलह कलाएं और संतुलन |
कुछ परंपराओं में ललिता को पार्वती और दुर्गा का रूप माना जाता है। श्रीविद्या परंपरा में वे परमेश्वरी और श्रीचक्र की अधिष्ठात्री हैं। अलग अलग संप्रदायों में उनके स्वरूप की व्याख्या भिन्न हो सकती है। इन भिन्नताओं का सम्मान करना आवश्यक है।
ललिता पंचमी का व्रत श्रद्धा, सौभाग्य, संतान सुख, वैवाहिक शांति और मानसिक संतुलन की कामना से रखा जाता है। स्त्रियों के लिए यह व्रत विशेष रूप से मातृशक्ति और परिवार की मंगल कामना से जुड़ा हुआ माना जाता है।
परंपरागत मान्यता के अनुसार देवी ललिता की आराधना से निम्न भावों को बल मिलता है।
• संतान प्राप्ति की कामना
• संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना
• दांपत्य जीवन में सौम्यता
• घर में सुख और शांति
• मन की चंचलता में कमी
• आत्मसम्मान और आंतरिक गरिमा
• विद्या, कला और वाणी में मधुरता
• आर्थिक जीवन में संतुलन
इन फलों को निश्चित सांसारिक गारंटी की तरह नहीं समझना चाहिए। व्रत मन को अनुशासित करता है, प्रार्थना को दिशा देता है और व्यक्ति को अपने आचरण में सुधार के लिए प्रेरित करता है। संतान संबंधी कठिनाई होने पर चिकित्सा परामर्श लेना भी आवश्यक है। पूजा और चिकित्सा एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
व्रत से एक दिन पहले घर और पूजा स्थल की सफाई करनी चाहिए। पूजा के लिए अत्यधिक सामग्री जुटाने की आवश्यकता नहीं है। देवी को श्रद्धा से अर्पित किया गया एक स्वच्छ पुष्प भी पर्याप्त हो सकता है।
| सामग्री | उपयोग |
|---|---|
| देवी ललिता का चित्र या प्रतिमा | स्थापना और ध्यान |
| स्वच्छ चौकी और वस्त्र | पूजा आसन |
| कुमकुम और हल्दी | मंगल तिलक |
| अक्षत | संकल्प और अर्पण |
| लाल या गुलाबी पुष्प | देवी को अर्पण |
| दीपक और घी | प्रकाश और चेतना |
| धूप या सुगंधित सामग्री | वातावरण की शुद्धि |
| फल और नैवेद्य | भोग |
| दूध, दही, घी, शहद और चीनी | पंचामृत |
| जल और तांबे का पात्र | आचमन और अर्पण |
| लाल चुनरी | देवी अलंकरण |
| दक्षिणा या दान सामग्री | सेवा और कृतज्ञता |
सामग्री उपलब्ध न हो तो पूजा रोकने की आवश्यकता नहीं है। स्वच्छ जल, दीपक, पुष्प और श्रद्धा से भी देवी का स्मरण किया जा सकता है।
ललिता पंचमी की पूजा प्रातः स्नान के बाद की जा सकती है। पूजा के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना शुभ माना जाता है। कुछ परंपराओं में देवी को ईशान कोण में स्थापित किया जाता है।
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं
देवी ललिता का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें
दीपक और धूप जलाएं
गणेश जी, शिव और पार्वती का स्मरण करें
व्रत का संकल्प लें
देवी को जल, अक्षत, कुमकुम, हल्दी और पुष्प अर्पित करें
लाल चुनरी, फल और नैवेद्य अर्पित करें
ललिता मंत्र या ललिता सहस्रनाम का पाठ करें
देवी की कथा या स्तुति पढ़ें
आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें
प्रसाद वितरित करें और सामर्थ्य अनुसार दान करें
संकल्प में अपना नाम, गोत्र, तिथि और पूजा का उद्देश्य लिया जा सकता है। संतान सुख की कामना करने वाले दंपती संतान के स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और जीवन में धर्म की प्रार्थना करें।
ललिता उपासना में मंत्र का विशेष स्थान है। सामान्य गृहस्थ सरल मंत्र का जप कर सकते हैं। जप करते समय उच्चारण स्पष्ट रखें और मन में देवी के प्रति श्रद्धा बनाए रखें।
ॐ ललितायै नमः
इसका अर्थ है देवी ललिता को नमस्कार। यह मंत्र सरल है और सामान्य पूजा में जपा जा सकता है।
ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दर्यै नमः
इस मंत्र में ऐं विद्या, ह्रीं शक्ति और श्रीं सौंदर्य तथा समृद्धि का बीज भाव माना जाता है। श्रीविद्या के विस्तृत मंत्रों का जप गुरु दीक्षा और उचित मार्गदर्शन के साथ करना चाहिए।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
इसका अर्थ है जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार बार नमस्कार।
ललिता सहस्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ करने की परंपरा भी है। यदि पूरा पाठ संभव न हो तो देवी नाम स्मरण और सरल मंत्र जप किया जा सकता है।
ललिता पंचमी स्त्रियों के लिए इसलिए विशेष मानी जाती है क्योंकि देवी ललिता में मातृत्व, सौंदर्य, ज्ञान, आत्मबल और करुणा के सभी आयाम जुड़े हैं। विवाहित स्त्रियां दांपत्य सुख और परिवार की शांति के लिए व्रत रखती हैं। अविवाहित कन्याएं योग्य जीवनसाथी और शुभ वैवाहिक जीवन की कामना कर सकती हैं। माताएं संतान के स्वास्थ्य और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
लेकिन देवी ललिता का संदेश केवल पारिवारिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं है। वे स्त्री के आत्मसम्मान, ज्ञान, रचनात्मकता और निर्णय शक्ति का भी प्रतीक हैं। इसलिए इस दिन स्त्रियां अपने स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और मानसिक शांति के लिए भी संकल्प ले सकती हैं।
• अपनी सेहत की उपेक्षा न करने का संकल्प
• परिवार में सम्मानपूर्वक संवाद रखने का प्रयास
• बच्चों पर प्रेम के साथ अनुशासन रखने का भाव
• अपनी शिक्षा या कला को आगे बढ़ाने की इच्छा
• आर्थिक निर्णयों में विवेक
• अपमान और अन्याय के सामने आत्मसम्मान की रक्षा
देवी की पूजा तभी पूर्ण मानी जा सकती है जब स्त्री के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र विचार का स्थान बने।
संतान सुख की कामना से ललिता पंचमी का व्रत रखने की परंपरा है। इस दिन देवी को दूध से बनी मिठाई, फल और पंचामृत अर्पित किया जाता है। कुछ परिवार स्कंदमाता की पूजा भी करते हैं क्योंकि वे भगवान स्कंद की माता हैं।
संतान संबंधी प्रार्थना करते समय केवल जन्म की इच्छा नहीं बल्कि स्वस्थ, सदाचारी और करुणामय संतान की कामना करनी चाहिए। भावी माता पिता को अपने जीवन में भी प्रेम, धैर्य, जिम्मेदारी और स्वस्थ वातावरण विकसित करने का संकल्प लेना चाहिए।
संतान प्राप्ति में कठिनाई हो तो चिकित्सकीय जांच, उचित उपचार और विशेषज्ञ परामर्श आवश्यक है। धार्मिक व्रत मन को सहारा दे सकता है, लेकिन उपचार का स्थान नहीं ले सकता।
ललिता पंचमी का व्रत परिवार की परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार रखा जा सकता है। कुछ लोग निर्जल या निराहार व्रत रखते हैं। सामान्य गृहस्थों के लिए फलाहार या सात्विक अल्पाहार अधिक सुरक्षित हो सकता है।
| व्रत विकल्प | उपयुक्त भोजन |
|---|---|
| फलाहार | फल, दूध और नारियल पानी |
| एक समय भोजन | साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और कुट्टू |
| हल्का व्रत | फल, दही और मखाना |
| सामान्य सात्विक आहार | बिना प्याज लहसुन का ताजा भोजन |
| स्वास्थ्य आधारित आहार | चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार भोजन |
व्रत में अत्यधिक नमक, तला भोजन और बहुत अधिक मिठाई से बचना चाहिए। शरीर में पानी की कमी न होने दें। गर्भवती स्त्रियों, स्तनपान कराने वाली माताओं, मधुमेह से पीड़ित लोगों और नियमित औषधि लेने वालों को उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
ललिता पंचमी को केवल इच्छा पूर्ति का दिन मानना देवी के स्वरूप को सीमित करना है। ललिता त्रिपुरसुंदरी जीवन में सौंदर्य और विवेक का संतुलन सिखाती हैं। उनका सौंदर्य बाहरी आकर्षण से आगे जाकर विचार, भाषा और व्यवहार में दिखाई देता है।
सौभाग्य का अर्थ केवल आभूषण, धन या वैवाहिक स्थिति नहीं है। सौभाग्य में स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, परिवार का सहयोग, सम्मान, ज्ञान और संतोष भी शामिल हैं।
देवी ललिता की आराधना व्यक्ति को यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है।
• क्या जीवन में प्रेम और अनुशासन का संतुलन है
• क्या घर में स्त्रियों का सम्मान है
• क्या धन का उपयोग विवेक से हो रहा है
• क्या ज्ञान और कला के लिए समय दिया जा रहा है
• क्या संबंधों में केवल अधिकार है या करुणा भी है
इन प्रश्नों का उत्तर ही ललिता तत्त्व को जीवन में स्थान देता है।
श्रीविद्या परंपरा में श्रीचक्र को देवी ललिता का दिव्य रूप माना जाता है। श्रीचक्र में अनेक त्रिकोण, आवरण और केंद्र बिंदु होते हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ बाहरी संसार से भीतर की चेतना तक की यात्रा से जोड़ा जाता है।
सामान्य गृहस्थ श्रीचक्र की जटिल पूजा बिना गुरु मार्गदर्शन के न करें। वे देवी का चित्र, सरल मंत्र, दीप और पुष्प पूजा कर सकते हैं। श्रीचक्र की स्थापना या विशेष आवरण पूजा के लिए दीक्षित साधक और योग्य आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक माना जाता है।
श्रीचक्र का केंद्रीय बिंदु एकाग्र चेतना का प्रतीक है। बाहरी रेखाएं जीवन की अनेक इच्छाओं, संबंधों और अनुभवों का संकेत देती हैं। साधना का उद्देश्य इन सबको नष्ट करना नहीं बल्कि संतुलित करके चेतना के केंद्र तक पहुंचना है।
देवी पूजा के बाद दान करने से साधना में करुणा का भाव जुड़ता है। संतान सुख की कामना करने वाले परिवार किसी बच्चे की शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य या पुस्तक की सहायता कर सकते हैं। स्त्रियों के लिए उपयोगी वस्त्र, स्वास्थ्य सामग्री और शिक्षा संबंधी सामग्री का दान भी किया जा सकता है।
| सेवा | आध्यात्मिक भाव |
|---|---|
| बालिका की शिक्षा में सहायता | विद्या और मातृशक्ति |
| बच्चों को भोजन | पालन और करुणा |
| महिला को उपयोगी वस्त्र | सम्मान और सुरक्षा |
| जरूरतमंद परिवार को राशन | अन्नपूर्णा भाव |
| पुस्तक दान | ज्ञान और वाणी |
| गौ या पशु सेवा | करुणा और संरक्षण |
दान में प्राप्तकर्ता का सम्मान बनाए रखना आवश्यक है। किसी की गरीबी का प्रदर्शन या फोटो लेकर दान को प्रचार बनाना देवी उपासना के भाव से मेल नहीं खाता।
ललिता पंचमी की पूजा में कुछ सामान्य सावधानियां रखनी चाहिए।
• बिना गुरु मार्गदर्शन के जटिल श्रीविद्या मंत्र का प्रयोग न करें
• संतान सुख के नाम पर भय फैलाने वाले व्यक्ति पर विश्वास न करें
• आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च न करें
• व्रत के कारण स्वास्थ्य खराब न होने दें
• देवी पूजा को केवल धन प्राप्ति का साधन न बनाएं
• परिवार की अन्य स्त्रियों का अपमान करके देवी की पूजा न करें
• पशु या प्रकृति को हानि पहुंचाकर पूजा सामग्री न जुटाएं
• पूजा के समय क्रोध और विवाद से बचें
देवी ललिता की साधना का आधार सौम्यता, सुंदरता, विवेक और प्रेम है। कठोरता, भय और अहंकार इस साधना के विपरीत भाव हैं।
शक्ति परंपरा में देवी ललिता को भंडासुर के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना से जुड़ी कथा में स्मरण किया जाता है। इस कथा का मूल संदेश यह है कि जब असुरता ज्ञान, तप और शक्ति का दुरुपयोग करने लगे तब देवी चेतना संतुलन स्थापित करती है।
भंडासुर बाहरी शत्रु के साथ भीतर की जड़ता, अहंकार और विवेकहीन इच्छा का भी प्रतीक माना जा सकता है। देवी ललिता का रथ, शस्त्र और सेना शक्ति के विभिन्न रूपों का संकेत हैं। इन प्रतीकों का अर्थ यह है कि चेतना में परिवर्तन के लिए केवल भावना नहीं बल्कि स्पष्ट ज्ञान, अनुशासन और साहस भी आवश्यक है।
ललिता पंचमी की पूजा स्त्रियों को कोमलता के साथ शक्ति और मातृत्व के साथ निर्णय क्षमता का स्मरण कराती है। यही कारण है कि यह व्रत घर और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
पंचमी तिथि को चंद्रमा की बढ़ती कला और मन की क्रमिक स्थिरता से जोड़ा जा सकता है। शारदीय नवरात्रि के शुक्ल पक्ष में साधक की ऊर्जा धीरे धीरे बाहर से भीतर की ओर जाने लगती है। पंचमी तक पूजा का क्रम स्थिर हो चुका होता है और मन में देवी के प्रति गहरा भाव विकसित होने लगता है।
ललिता उपासना में चंद्रमा, शुक्र और गुरु के भावों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
| ग्रह | ललिता तत्त्व से संबंध |
|---|---|
| चंद्रमा | मन, मातृत्व और भावनात्मक शांति |
| शुक्र | सौंदर्य, प्रेम, दांपत्य और कला |
| गुरु | संतान, ज्ञान, धर्म और आशीर्वाद |
| बुध | वाणी, शिक्षा और रचनात्मकता |
| सूर्य | आत्मसम्मान और नेतृत्व |
यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र, चंद्रमा या गुरु कमजोर हों तो ललिता उपासना मन को आध्यात्मिक सहारा दे सकती है। व्यक्तिगत ग्रह दोष का निर्णय केवल राशि देखकर नहीं करना चाहिए। जन्म कुंडली, दशा, गोचर और जीवन परिस्थिति का समग्र अध्ययन आवश्यक है।
व्रत का समापन परिवार की परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। यदि फलाहार रखा गया हो तो पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें। देवी को नैवेद्य अर्पित करके परिवार और जरूरतमंदों में प्रसाद बांटें।
समापन के समय निम्न भाव रखें।
• देवी के प्रति कृतज्ञता
• संकल्प में हुई भूलों के लिए क्षमा
• परिवार की शांति और स्वास्थ्य की प्रार्थना
• संतान और स्त्रियों के कल्याण का भाव
• अपने व्यवहार में सौम्यता लाने का संकल्प
यदि देवी की अस्थायी प्रतिमा स्थापित की गई हो तो अगले दिन परिवार की परंपरा के अनुसार उसका विसर्जन करें। विसर्जन में जल स्रोतों को प्रदूषित न करें। मिट्टी की प्रतिमा को स्वच्छ स्थान या घर के पौधों के पास सम्मानपूर्वक रखा जा सकता है, यदि स्थानीय परंपरा इसे स्वीकार करती हो।
ललिता पंचमी स्त्री शक्ति, संतान सुख और सौभाग्य की कामनाओं से जुड़ी पवित्र तिथि है। परंतु इसका आध्यात्मिक क्षेत्र इससे कहीं अधिक विस्तृत है। देवी ललिता जीवन में कोमलता के साथ विवेक, प्रेम के साथ मर्यादा, सौंदर्य के साथ सत्य और मातृत्व के साथ आत्मबल का संतुलन सिखाती हैं।
व्रत रखने वाला व्यक्ति यदि पूजा के साथ अपने व्यवहार में भी मधुरता लाता है, परिवार में सम्मान बढ़ाता है, जरूरतमंद की सहायता करता है और शरीर तथा मन की उचित देखभाल करता है तो ललिता पंचमी का भाव जीवन में स्थिर होता है।
देवी ललिता की कृपा केवल इच्छा पूरी होने में नहीं बल्कि इच्छा को शुद्ध करने में भी प्रकट होती है। जब मन शांत होता है, संबंधों में सौम्यता आती है और जीवन में ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है तब सौभाग्य का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।
ललिता पंचमी 2026 में कब मनाई जाएगी?
वर्ष 2026 में ललिता पंचमी 15 अक्टूबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। आश्विन शुक्ल पंचमी तिथि 15 अक्टूबर को रात्रि 1 बजकर 13 मिनट से 16 अक्टूबर को प्रातः 3 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। स्थानीय पंचांग से पुष्टि करनी चाहिए।
ललिता पंचमी पर किस देवी की पूजा की जाती है?
ललिता पंचमी पर देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की पूजा की जाती है। उन्हें षोडशी, राजराजेश्वरी और कई परंपराओं में पार्वती या दुर्गा का रूप भी माना जाता है।
क्या ललिता पंचमी का व्रत संतान सुख के लिए रखा जाता है?
परंपरा में यह व्रत संतान सुख, संतान के स्वास्थ्य, सौभाग्य और परिवार की शांति के लिए रखा जाता है। संतान संबंधी समस्या होने पर चिकित्सा परामर्श भी आवश्यक है।
ललिता पंचमी की सरल पूजा विधि क्या है?
स्नान करके देवी का चित्र स्थापित करें, दीपक जलाएं, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें, ललिता मंत्र या सहस्रनाम का पाठ करें, आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
ललिता पंचमी पर कौन सा मंत्र पढ़ना चाहिए?
सामान्य पूजा में ॐ ललितायै नमः मंत्र का जप किया जा सकता है। श्रीविद्या के विस्तृत मंत्रों का जप गुरु दीक्षा और उचित मार्गदर्शन से करना चाहिए।
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