शारदीय नवरात्रि 2026 पंचांग

By पं. नीलेश शर्मा

घटस्थापना मुहूर्त, चौघड़िया, तिथि परिवर्तन और नवदुर्गा पूजा

शारदीय नवरात्रि 2026: तिथियां और घटस्थापना मुहूर्त

सामग्री तालिका

पहले जानें तिथि और मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि 2026 में रविवार, 11 अक्टूबर से आरंभ होगी और मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ पूर्ण होगी। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात लगभग 9:19 बजे आरंभ होकर 11 अक्टूबर की रात लगभग 9:30 बजे समाप्त होगी। इसलिए घटस्थापना 11 अक्टूबर को ही की जाएगी।

नई दिल्ली के आधार पर घटस्थापना का मुख्य मुहूर्त प्रातः 6:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। वैकल्पिक अभिजीत मुहूर्त 11:44 बजे से 12:31 बजे तक माना जा रहा है। सूर्योदय, स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

शारदीय नवरात्रि 2026 की प्राथमिक जानकारी

  1. आरंभ: रविवार, 11 अक्टूबर 2026
  2. समापन: मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
  3. पक्ष: आश्विन शुक्ल पक्ष
  4. घटस्थापना: 11 अक्टूबर
  5. मुख्य मुहूर्त: प्रातः 6:19 बजे से 10:12 बजे तक
  6. अभिजीत मुहूर्त: प्रातः 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
  7. अष्टमी: 19 अक्टूबर
  8. नवमी: 20 अक्टूबर
  9. विजयादशमी: 20 अक्टूबर
  10. मुख्य अनुष्ठान: कलश स्थापना, अखंड दीप, नवदुर्गा पूजा, व्रत, हवन और कन्या पूजन
  11. सावधानी: राहुकाल और अशुभ समय में घटस्थापना न करें
  12. मूल भाव: शक्ति, अनुशासन, भक्ति और आत्मसुधार
दिन तारीख तिथि देवी रूप प्रमुख पूजा
1 11 अक्टूबर प्रतिपदा शैलपुत्री घटस्थापना और जौ बोना
2 12 अक्टूबर द्वितीया ब्रह्मचारिणी तप और जप
3 13 अक्टूबर तृतीया चंद्रघंटा साहस और रक्षा
4 14 अक्टूबर चतुर्थी कूष्मांडा स्वास्थ्य और सृजन
5 15 अक्टूबर पंचमी स्कंदमाता मातृत्व और संतान सुख
6 16 अक्टूबर षष्ठी कात्यायनी धर्म रक्षा और विवाह मंगल
7 17 अक्टूबर सप्तमी कालरात्रि भय निवारण
8 18 अक्टूबर सप्तमी जारी विशेष देवी साधना अष्टमी तैयारी
9 19 अक्टूबर अष्टमी महागौरी कन्या पूजन और संधि पूजा
10 20 अक्टूबर नवमी सिद्धिदात्री हवन, पूर्णाहुति और विजयादशमी

तिथि क्षय और वृद्धि का गणित

हिन्दू पंचांग की तिथियां सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित होती हैं। सूर्य और चंद्रमा के बीच लगभग 12 अंश का अंतर एक तिथि माना जाता है। चंद्रमा की गति समान नहीं रहती, इसलिए किसी तिथि की अवधि 24 घंटे से कम या अधिक हो सकती है।

जब कोई तिथि दो सूर्योदयों के बीच समाप्त हो जाती है और किसी सूर्योदय पर दिखाई नहीं देती, तब उसे तिथि क्षय कहा जाता है। जब कोई तिथि दो सूर्योदयों तक बनी रहती है, तब उसे तिथि वृद्धि कहा जाता है।

तिथि क्षय या वृद्धि में क्या करें

  1. सामान्य कैलेंडर के बजाय स्थानीय पंचांग देखें।
  2. सूर्योदय के समय उपस्थित तिथि को महत्व दें।
  3. अष्टमी और नवमी की वास्तविक स्थिति जांचें।
  4. संधि पूजा का समय तिथि परिवर्तन से तय करें।
  5. व्रत पारण के लिए नवमी और दशमी का विचार करें।
  6. भ्रम होने पर मंदिर या योग्य आचार्य से पूछें।
  7. तिथि वृद्धि को अशुभ संकेत न मानें।

तिथि क्षय और वृद्धि चंद्रमा की गति से बनने वाला पंचांग गणित है। इसका अर्थ देवी की नाराजगी या पूजा में बाधा नहीं है।

घटस्थापना का आध्यात्मिक महत्व

घटस्थापना नवरात्रि का आरंभिक और मुख्य अनुष्ठान है। कलश को जीवन, जल, सृष्टि और देवी चेतना का प्रतीक माना जाता है। कलश के भीतर का जल जीवन शक्ति का संकेत देता है और नारियल पूर्णता तथा चेतना का।

कलश के नीचे मिट्टी में जौ बोने की परंपरा है। जौ का अंकुरण बताता है कि साधना और शुभ कर्मों का फल धीरे धीरे विकसित होता है। नौ दिनों तक बढ़ते जौ साधक को नियमितता और धैर्य की याद दिलाते हैं।

घटस्थापना की सरल विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान को साफ करें।
  3. चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
  4. मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी भरें।
  5. जौ के बीज बोएं।
  6. कलश में जल, अक्षत, सुपारी और सिक्का रखें।
  7. आम के पत्ते और नारियल स्थापित करें।
  8. कलश पर मौली बांधें।
  9. माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र रखें।
  10. दीपक और धूप जलाएं।
  11. देवी का आवाहन कर संकल्प लें।
  12. पुष्प, रोली, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें।
  13. नौ दिनों तक पूजा स्थान स्वच्छ रखें।
  14. अखंड दीपक हो तो अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें।

नवदुर्गा के नौ रूप

माँ शैलपुत्री

प्रतिपदा को शैलपुत्री की पूजा होती है। वह स्थिरता, पर्वत जैसी दृढ़ता और जीवन की मजबूत नींव का प्रतीक हैं।

माँ ब्रह्मचारिणी

द्वितीया को ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है। वह तपस्या, संयम और निरंतर प्रयास की शक्ति हैं।

माँ चंद्रघंटा

तृतीया को चंद्रघंटा पूजी जाती हैं। उनका रूप साहस, सजगता और संकट में संतुलन का संकेत है।

माँ कूष्मांडा

चतुर्थी को कूष्मांडा का पूजन होता है। वह सृजन, प्रकाश और जीवन ऊर्जा की देवी हैं।

माँ स्कंदमाता

पंचमी को स्कंदमाता की पूजा होती है। वह मातृत्व, संरक्षण और वात्सल्य का रूप हैं।

माँ कात्यायनी

षष्ठी को कात्यायनी की आराधना की जाती है। उन्हें साहस, धर्म रक्षा और विवाह मंगल से जोड़ा जाता है।

माँ कालरात्रि

सप्तमी को कालरात्रि की पूजा होती है। वह भय, अज्ञान और नकारात्मकता के विनाश का प्रतीक हैं।

माँ महागौरी

अष्टमी को महागौरी पूजी जाती हैं। वह शुद्धता, करुणा और मानसिक शांति का रूप हैं।

माँ सिद्धिदात्री

नवमी को सिद्धिदात्री की आराधना होती है। वह सिद्धि, पूर्णता और आध्यात्मिक परिपक्वता की देवी हैं।

चौघड़िया और घटस्थापना

चौघड़िया दिन के समय को शुभ, लाभ, अमृत, चर, रोग, काल और उद्वेग जैसे भागों में बांटता है। अलग शहरों में सूर्योदय अलग होने के कारण चौघड़िया का समय भी बदलता है।

घटस्थापना के लिए शुभ, लाभ और अमृत चौघड़िया को कई परंपराओं में अनुकूल माना जाता है। फिर भी केवल चौघड़िया देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए। तिथि, लग्न, नक्षत्र, राहुकाल और स्थानीय सूर्योदय को साथ देखना आवश्यक है।

चौघड़िया के उपयोग के नियम

  1. अपने शहर का सूर्योदय समय देखें।
  2. राहुकाल में घटस्थापना न करें।
  3. शुभ या अमृत काल को प्राथमिकता दें।
  4. अभिजीत मुहूर्त उपलब्ध हो तो उसका उपयोग करें।
  5. सामग्री पहले से तैयार रखें।
  6. निर्धारित समय छूट जाए तो वैकल्पिक शुभ समय चुनें।

मुहूर्त साधना को समय अनुशासन देता है। यह भय पैदा करने का माध्यम नहीं है।

अष्टमी, नवमी और कन्या पूजन

अष्टमी और नवमी नवरात्रि के महत्वपूर्ण दिन हैं। कई परिवार अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन करते हैं। बालिकाओं को देवी के बाल रूप के रूप में सम्मान देकर भोजन, फल, वस्त्र, दक्षिणा और उपयोगी वस्तुएं दी जाती हैं।

कन्या पूजन में बच्चे की सुविधा और इच्छा का सम्मान जरूरी है। किसी बालिका को जबरदस्ती पैर छूने, पूजा करने या चित्र खिंचवाने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए।

कन्या पूजन की सरल विधि

  1. पूजा स्थान और घर की सफाई करें।
  2. बालिकाओं के लिए स्वच्छ आसन रखें।
  3. रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
  4. हलवा, चना और पूरी जैसे सात्विक भोजन कराएं।
  5. फल और मिठाई दें।
  6. सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें।
  7. पुस्तक या उपयोगी वस्तु भेंट करें।
  8. बालिकाओं का सम्मान और आराम बनाए रखें।

नवरात्रि व्रत के नियम

नवरात्रि व्रत का उद्देश्य मन, इंद्रियों और दिनचर्या में संयम लाना है। निर्जल या कठोर व्रत सभी के लिए उपयुक्त नहीं होता।

  1. फल, दूध, दही, मखाना और व्रत अनाज लें।
  2. सेंधा नमक का उपयोग करें।
  3. अत्यधिक तला भोजन कम करें।
  4. पर्याप्त जल लें।
  5. कमजोरी या चक्कर होने पर व्रत सरल करें।
  6. गर्भवती, वृद्ध, बच्चे और रोगी चिकित्सक की सलाह लें।
  7. स्वास्थ्य बिगाड़ने वाला जागरण न करें।
  8. पारण के समय हल्का भोजन लें।

व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं है। शांत वाणी, सेवा, जप और सात्विक आहार भी व्रत का हिस्सा हैं।

नवमी हवन और पूर्णाहुति

नवमी को कई परिवार हवन करते हैं। हवन में घी, जौ, तिल, चावल, समिधा और हवन सामग्री अर्पित की जाती है। प्रत्येक आहुति के अंत में स्वाहा बोला जाता है।

हवन का क्रम

  1. सुरक्षित स्थान पर हवन कुंड रखें।
  2. अग्नि प्रज्वलित करें।
  3. गणेश और अग्नि पूजन करें।
  4. दुर्गा मंत्र के साथ आहुति दें।
  5. गायत्री मंत्र या नवर्ण मंत्र का जप करें।
  6. सीमित मात्रा में आहुति दें।
  7. पूर्णाहुति में नारियल, घी और गुड़ अर्पित करें।
  8. आरती और क्षमा प्रार्थना करें।
  9. प्रसाद बांटें।
  10. अग्नि शांत होने तक सुरक्षा रखें।

विजयादशमी और व्रत पारण

20 अक्टूबर 2026 को नवमी और विजयादशमी का क्रम एक ही दिन पड़ रहा है। स्थानीय पंचांग के अनुसार हवन, कन्या पूजन, व्रत पारण, दुर्गा विसर्जन और विजयादशमी के समय अलग हो सकते हैं।

विजयादशमी पर आयुध पूजा, शमी पूजा, श्रीराम स्मरण और रावण दहन किया जाता है। नौ दिनों का व्रत रखने वाले साधक पारण स्थानीय पंचांग और परिवार परंपरा अनुसार करें।

ज्योतिषीय दृष्टि से शारदीय नवरात्रि

शुक्ल पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है। यह मन, ऊर्जा और चेतना के विस्तार का प्रतीक है। सूर्य, मंगल और गुरु से जुड़े गुण नवरात्रि में आत्मबल, साहस और धर्म का भाव देते हैं।

नवरात्रि पूजा कुंडली के ग्रह दोषों को स्वतः समाप्त करने की गारंटी नहीं देती। फिर भी नियमित साधना अनुशासन और निर्णय शक्ति बढ़ा सकती है। व्यक्तिगत उपाय के लिए दशा, गोचर, भाव और ग्रह स्थिति का पूरा अध्ययन आवश्यक है।

ग्रहों से जुड़े साधना भाव

  1. सूर्य: आत्मबल और नेतृत्व
  2. चंद्रमा: मन और भक्ति
  3. मंगल: साहस और रक्षा
  4. बुध: मंत्र, वाणी और विवेक
  5. गुरु: धर्म और ज्ञान
  6. शुक्र: सौंदर्य और समृद्धि
  7. शनि: अनुशासन और सेवा

शारदीय नवरात्रि का वास्तविक संदेश

शारदीय नवरात्रि 2026 का पंचांग केवल तारीखों की सूची नहीं है। यह साधक को स्थिरता, तपस्या, साहस, सृजन, संरक्षण, धर्म रक्षा, भय नाश, शुद्धता और सिद्धि की यात्रा पर ले जाता है।

घटस्थापना में बोए गए जौ बताते हैं कि शुभ परिवर्तन धीरे धीरे बढ़ते हैं। अखंड दीप निरंतरता का प्रतीक है। व्रत इंद्रिय संयम सिखाता है। कन्या पूजन करुणा जगाता है। हवन अहंकार और अशुद्ध भावों को अग्नि में समर्पित करने का संकेत है।

जब नवरात्रि की शक्ति सत्य, सेवा, साहस और अनुशासन के रूप में जीवन में दिखाई देने लगे, तब देवी पूजा अपने वास्तविक अर्थ तक पहुंचती है। नौ रातों का यह पर्व बाहरी उत्सव के साथ भीतर प्रकाश का भी उत्सव बन जाता है।

FAQ

शारदीय नवरात्रि 2026 कब शुरू होगी?

शारदीय नवरात्रि 2026 में 11 अक्टूबर से शुरू होगी और 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ पूर्ण होगी।

घटस्थापना का मुख्य मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली के अनुसार 11 अक्टूबर को घटस्थापना का मुख्य समय 6:19 बजे से 10:12 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त 11:44 बजे से 12:31 बजे तक रहेगा।

क्या नवरात्रि 2026 में तिथि वृद्धि है?

सप्तमी तिथि 17 और 18 अक्टूबर तक दिखाई देती है। इसके बाद अष्टमी 19 अक्टूबर और नवमी 20 अक्टूबर को आती है। स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

नवदुर्गा की पूजा किस दिन होती है?

प्रतिपदा पर शैलपुत्री, द्वितीया पर ब्रह्मचारिणी, तृतीया पर चंद्रघंटा, चतुर्थी पर कूष्मांडा, पंचमी पर स्कंदमाता, षष्ठी पर कात्यायनी, सप्तमी पर कालरात्रि, अष्टमी पर महागौरी और नवमी पर सिद्धिदात्री की पूजा होती है।

क्या घटस्थापना के लिए चौघड़िया देखना जरूरी है?

तिथि, लग्न, नक्षत्र, राहुकाल, चौघड़िया और स्थानीय सूर्योदय देखना उचित है। शुभ, अमृत या अभिजीत मुहूर्त उपलब्ध हो तो उसका उपयोग करें।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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