By पं. नरेंद्र शर्मा
शस्त्र पूजा, शमी वृक्ष, नया व्यापार और विजय मुहूर्त

आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है। वर्ष 2026 में विजयादशमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय का स्मरण किया जाता है।
नई दिल्ली के आधार पर अपराह्न पूजा का समय लगभग 1:14 बजे से 3:30 बजे तक रहेगा। विजय मुहूर्त लगभग 1:59 बजे से 2:45 बजे तक माना जा रहा है। कुछ पंचांगों में शस्त्र पूजा के लिए 1:42 बजे से 2:28 बजे तक का समय भी बताया गया है। शहर, सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर संभव है। अंतिम पूजा समय स्थानीय पंचांग से अवश्य मिलाएं।
| अनुष्ठान | उपयुक्त समय | मुख्य सामग्री |
|---|---|---|
| अपराजिता पूजा | अपराह्न काल | पुष्प, रोली, अक्षत, दीपक और नैवेद्य |
| शस्त्र पूजा | विजय मुहूर्त | शस्त्र, औजार, वाहन या कार्य उपकरण |
| शमी पूजा | अपराह्न काल | शमी पत्र, जल, रोली और पुष्प |
| व्यापार आरंभ | विजय मुहूर्त | लेखा पुस्तक, दीपक, गणेश और लक्ष्मी पूजन |
| वाहन पूजा | विजय मुहूर्त या शुभ समय | जल, रोली, अक्षत, पुष्प और दीपक |
| रावण दहन | सूर्यास्त के बाद | सुरक्षित सार्वजनिक आयोजन |
विजयादशमी की सबसे प्रसिद्ध कथा रामायण से जुड़ी है। भगवान श्रीराम ने धर्म, सत्य और मर्यादा के पक्ष में खड़े होकर रावण का वध किया। रावण विद्वान, शक्तिशाली और शिव भक्त था, लेकिन उसका अहंकार, अधर्म और पराई स्त्री के प्रति अन्याय उसके पतन का कारण बना।
इस कथा का संदेश यह है कि ज्ञान और शक्ति के बावजूद यदि विवेक और मर्यादा का अभाव हो, तो व्यक्ति अपने ही गुणों को विनाश का कारण बना सकता है। रावण का पुतला जलाना बाहरी परंपरा है, लेकिन वास्तविक दशहरा तब होता है जब व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्याय को पहचानता है।
देवी परंपरा में विजयादशमी माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ी है। महिषासुर जड़ता, हिंसा और अनियंत्रित शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। देवी का युद्ध धर्म की रक्षा और संतुलन की पुनर्स्थापना का संकेत है।
रावण दहन को केवल आतिशबाजी और सार्वजनिक आयोजन तक सीमित करना इस पर्व के गहरे अर्थ को छोटा कर देता है। रावण का पुतला मनुष्य के भीतर मौजूद दस प्रमुख विकारों का प्रतीक माना जाता है।
रावण दहन से पहले व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि इन दोषों में से कौन सा उसके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है। केवल पुतला जलाने से कोई दोष समाप्त नहीं होता। दोष तब घटता है जब व्यक्ति उसके कारणों को पहचानकर व्यवहार में सुधार करता है।
घर में आग जलाकर पुतला दहन करना सुरक्षित नहीं है। यह प्रतीकात्मक संकल्प दीपक, प्रार्थना और आत्मचिंतन के माध्यम से भी किया जा सकता है।
भगवान श्रीराम की विजय केवल युद्ध में जीत नहीं थी। यह मर्यादा, सत्य, धैर्य, रणनीति और सहयोग की विजय थी। श्रीराम ने व्यक्तिगत दुख के बावजूद धर्म और लोककल्याण के मार्ग को नहीं छोड़ा।
रामायण की कथा यह बताती है कि सही उद्देश्य के लिए सही सहयोग भी आवश्यक है। हनुमान, सुग्रीव, जामवंत और वानर सेना ने मिलकर धर्म की विजय में योगदान दिया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी बड़ा कार्य अकेले अहंकार से नहीं, सहयोग और विश्वास से पूरा होता है।
देवी महात्म्य में माँ दुर्गा को देव शक्तियों के सामूहिक तेज से प्रकट बताया गया है। देवताओं ने अपने अस्त्र और शक्तियां देवी को प्रदान कीं। देवी ने महिषासुर और उसकी आसुरी सेना का सामना किया।
महिषासुर का रूप बदलना मन की अस्थिरता और छिपे हुए अहंकार का प्रतीक है। कभी वह शक्ति का प्रदर्शन करता है, कभी छल का और कभी हिंसा का। देवी का शस्त्र सत्य, विवेक और धर्म की शक्ति है।
विजयादशमी पर माँ दुर्गा की विजय यह सिखाती है कि करुणा का अर्थ दुर्बलता नहीं है। जब अन्याय बढ़ जाए तब धर्म की रक्षा के लिए साहस और दृढ़ता आवश्यक हो जाती है।
विजयादशमी पर शस्त्र पूजा की परंपरा प्राचीन है। क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते थे। कारीगर अपने औजारों, किसान कृषि उपकरणों और व्यापारी लेखा पुस्तकों की पूजा करते थे। आज के समय में शस्त्र पूजा का अर्थ जीवन और कार्य में उपयोग होने वाले सभी साधनों का सम्मान है।
शस्त्र केवल तलवार, धनुष या बंदूक नहीं है। चिकित्सक के उपकरण, चालक का वाहन, विद्यार्थी की पुस्तक, किसान का हल, कलाकार का वाद्य, लेखक का लेखन साधन और कार्यालय का कंप्यूटर भी कार्य के शस्त्र माने जा सकते हैं।
शस्त्र पूजा का मूल संदेश है कि साधन का सम्मान तभी सार्थक है जब उसका उपयोग धर्मपूर्ण उद्देश्य के लिए हो। हथियार की पूजा करके हिंसा करना या व्यापार उपकरण की पूजा करके छल करना इस परंपरा के विपरीत है।
विजयादशमी पर शमी पत्र और शमी वृक्ष की पूजा की जाती है। महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे। समय आने पर उन्होंने शस्त्र वापस लेकर धर्म की रक्षा की।
शमी वृक्ष धैर्य, छिपी हुई शक्ति, रक्षा और विजय का प्रतीक है। इसकी पूजा साधक को याद दिलाती है कि हर शक्ति को हर समय प्रदर्शित करना जरूरी नहीं। उचित समय आने पर सामर्थ्य का धर्मपूर्ण उपयोग करना भी बुद्धिमानी है।
शमी पत्र को सोने का वास्तविक विकल्प नहीं मानना चाहिए। यह धर्मपूर्ण समृद्धि, विजय और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
विजयादशमी को कई परंपराओं में अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इसका अर्थ है कि इस दिन शुभ कार्यों के लिए सामान्य मुहूर्त चयन की आवश्यकता कम मानी जाती है। फिर भी बड़े व्यापार, भूमि, साझेदारी या निवेश के लिए कुंडली, दस्तावेज और व्यावहारिक योजना की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
नया व्यापार शुरू करने के लिए विजय मुहूर्त या अपराह्न काल चुना जा सकता है। गणेश, लक्ष्मी और अपने इष्ट देव की पूजा करके खाता पुस्तक, व्यापार उपकरण और प्रथम लेनदेन का शुभारंभ किया जा सकता है।
अबूझ मुहूर्त का अर्थ यह नहीं कि बिना योजना के कोई भी आर्थिक निर्णय लाभकारी होगा। बाजार, पूंजी, कानूनी नियम, साझेदार और ग्राहक की वास्तविक स्थिति को समझना आवश्यक है।
कई परिवार विजयादशमी पर नया वाहन खरीदने, वाहन पूजा करने या गृह प्रवेश की योजना बनाते हैं। यह दिन नए आरंभ के लिए शुभ माना जाता है, लेकिन गृह प्रवेश के लिए भवन की तैयारी, जल व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा और स्थानीय मुहूर्त का ध्यान रखना जरूरी है।
वाहन पूजा में वाहन की सफाई, रोली, अक्षत, पुष्प, दीपक और नारियल का उपयोग किया जा सकता है। वाहन चलाते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना ही सबसे बड़ी पूजा है।
विजयादशमी दशमी तिथि पर आती है। दशमी को कार्य पूर्णता, दिशा और विजय से जोड़ा जाता है। सूर्य आत्मबल का, मंगल साहस का, गुरु धर्म और मार्गदर्शन का तथा शनि अनुशासन और कर्मफल का प्रतीक है।
शमी पूजा में धैर्य और कर्म का भाव दिखाई देता है। शस्त्र पूजा मंगल की ऊर्जा को संयमित करती है। श्रीराम पूजा सूर्य के आत्मबल और धर्मपूर्ण नेतृत्व को स्मरण कराती है। इस प्रकार विजयादशमी कई ग्रह गुणों को संतुलित करने वाली साधना बन सकती है।
विजयादशमी इतिहास, धर्म और युद्ध कौशल तीनों को जोड़ने वाला पर्व है। रामायण से यह मर्यादा और रणनीति की शिक्षा देता है। देवी महात्म्य से यह शक्ति और धर्म रक्षा का संदेश देता है। शस्त्र पूजा से यह श्रम और साधनों का सम्मान सिखाता है। शमी पूजा से धैर्य और छिपी शक्ति का बोध होता है।
नया व्यापार शुरू करना, वाहन पूजा करना या औजारों का सम्मान करना तभी मंगलमय होगा जब उसके साथ ईमानदारी, परिश्रम और जिम्मेदारी जुड़ी हो। अबूझ मुहूर्त मन को शुभ शुरुआत का साहस देता है, लेकिन सफलता के लिए योजना और निरंतर कर्म आवश्यक हैं।
विजयादशमी पर रावण का पुतला जलता है, लेकिन वास्तविक विजय तब होती है जब व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार को पहचानता है। माँ दुर्गा की शक्ति तब प्रकट होती है जब साहस करुणा से, शस्त्र विवेक से और विजय विनम्रता से जुड़ती है। यही आश्विन शुक्ल दशमी का सबसे गहरा संदेश है।
विजयादशमी 2026 कब मनाई जाएगी?
विजयादशमी 2026 में मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह शारदीय नवरात्रि के समापन का दिन है।
विजयादशमी 2026 का विजय मुहूर्त क्या है?
नई दिल्ली के अनुसार विजय मुहूर्त लगभग 1:59 बजे से 2:45 बजे तक माना जा रहा है। स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करें।
क्या विजयादशमी को नया व्यापार शुरू कर सकते हैं?
हां, विजयादशमी को कई परंपराओं में अबूझ मुहूर्त माना जाता है। फिर भी व्यापार शुरू करने से पहले योजना, पूंजी, दस्तावेज और साझेदारी की जांच आवश्यक है।
विजयादशमी पर शमी पूजा क्यों की जाती है?
शमी वृक्ष को धैर्य, छिपी शक्ति, रक्षा और विजय का प्रतीक माना जाता है। पांडवों द्वारा शमी वृक्ष में शस्त्र छिपाने की कथा इससे जुड़ी है।
शस्त्र पूजा का आधुनिक अर्थ क्या है?
आज शस्त्र पूजा में हथियारों के साथ वाहन, औजार, पुस्तकें, लेखा साधन और कार्य उपकरणों का सम्मान भी शामिल किया जा सकता है। इनका उपयोग ईमानदारी और सुरक्षा से करना जरूरी है।
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