By अपर्णा पाटनी
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के बीच अंतर और ज्योतिषीय दृष्टिकोण

हिंदू कैलेंडर को ठीक से समझने के लिए केवल तिथि और वार जानना काफी नहीं होता, चंद्रमा के बढ़ने और घटने का क्रम, अर्थात शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, उतना ही महत्त्व रखते हैं। इन्हीं दो पक्षों में से एक है कृष्ण पक्ष, जिसे परंपरा में घटते चंद्रमा का काल माना जाता है। इस अवधि में चंद्रमा धीरे धीरे अपने पूर्ण आकार से कम होता हुआ अमावस्या की ओर बढ़ता है, इसलिए इसे प्रतीकात्मक रूप से अंतर्मुखी, शांत और संकुचित ऊर्जा का समय भी कहा जा सकता है।
संस्कृत भाषा में "कृष्ण" शब्द का अर्थ है गहरा, काला या अंधकारयुक्त और "पक्ष" का अर्थ है पक्ष या समय का खंड। इस तरह कृष्ण पक्ष उस पक्ष को कहा जाता है, जब चंद्रमा का उजाला घटता जाता है और रातें अपेक्षाकृत अधिक अंधेरी होती जाती हैं।
हिंदू चंद्र मास को दो भागों में बाँटा जाता है।
कृष्ण पक्ष को कई ग्रंथों और परंपराओं में वध्य पक्ष भी कहा गया है, जिसका संकेत यह है कि यह काल अधिक संयम, साधना और अंतःचिंतन के लिए उपयुक्त माना गया है, न कि बाह्य उत्सवों की अधिकता के लिए।
एक चंद्र मास में लगभग 30 तिथियाँ मानी जाती हैं, जिनमें से आधी शुक्ल पक्ष और आधी कृष्ण पक्ष से जुड़ी होती हैं। कृष्ण पक्ष का संबंध पूर्णिमा के बाद से अमावस्या तक के चरण से है।
कृष्ण पक्ष की तिथियों का क्रम इस प्रकार माना जाता है।
| क्रम | तिथि का नाम |
|---|---|
| 1 | पूर्णिमा |
| 2 | प्रतिपदा |
| 3 | द्वितीया |
| 4 | तृतीया |
| 5 | चतुर्थी |
| 6 | पंचमी |
| 7 | षष्ठी |
| 8 | सप्तमी |
| 9 | अष्टमी |
| 10 | नवमी |
| 11 | दशमी |
| 12 | एकादशी |
| 13 | द्वादशी |
| 14 | त्रयोदशी |
| 15 | चतुर्दशी |
इनके बाद आने वाली अमावस्या, चंद्र चक्र के उस बिंदु को दिखाती है जहाँ चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य की ऐसी स्थिति में होता है कि उसका प्रकाशित भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता।
परंपरा में कृष्ण पक्ष को अक्सर अपेक्षाकृत कम शुभ या अशुभ काल के रूप में वर्णित किया गया है, विशेष रूप से नए और बड़े कार्यों के आरंभ के संदर्भ में।
इसके बावजूद, कृष्ण पक्ष को केवल नकारात्मक रूप में देखना भी अधूरा दृष्टिकोण होगा। कई प्रकार के धार्मिक कार्य और साधनाएँ इसी पक्ष में अधिक गहराई से फल देती हैं।
कुछ वैदिक ज्योतिष परंपराओं में यह विचार भी मिलता है कि केवल शुक्ल या कृष्ण पक्ष को पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ नहीं कहा जा सकता।
विशेष रूप से यह दृष्टि मिलती है कि।
इससे संकेत यह मिलता है कि यदि कोई व्यक्ति केवल नाम के आधार पर कृष्ण पक्ष को अस्वीकार कर दे, तो वह कई ऐसे अवसर खो सकता है जो वास्तव में काफी शुभ या संतुलित हों। वास्तविक निर्णय में तिथि, नक्षत्र, योग और व्यक्तिगत कुंडली के योग भी देखे जाते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से चंद्रमा मन, भावनाएँ और आंतरिक लय का प्रतिनिधि है। कृष्ण पक्ष में जब चंद्रमा घटता है, तो इसे कई बार अहं और बाहरी आसक्तियों को छोड़ने का संकेत भी माना जाता है।
इसलिए यद्यपि कई लोग इसे अशुभ कहते हैं, पर आध्यात्मिक साधक के लिए यह पक्ष अंदर की सफाई और पुनर्संरचना का महत्त्वपूर्ण चरण हो सकता है।
जब विवाह, संतान का नामकरण, नया घर या व्यापार शुरू करने जैसे बड़े निर्णय लिए जाते हैं, तो अनुभवी ज्योतिषी केवल यह नहीं देखते कि पक्ष कौन सा है बल्कि।
फिर भी, सामान्य मार्गदर्शन के रूप में बहुत से परिवार यह मानते हैं कि शुक्ल पक्ष अधिक मांगलिक और कृष्ण पक्ष अधिक साधना प्रधान होता है, इसीलिए सामान्य परिस्थितियों में नए शुभ आरंभ के लिए शुक्ल पक्ष को प्राथमिकता दी जाती है।
कभी कभी यह धारणा बन जाती है कि कृष्ण पक्ष में कुछ भी अच्छा नहीं किया जा सकता, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अधिक संतुलित है।
इसलिए कृष्ण पक्ष को केवल डर या निषेध के रूप में नहीं बल्कि समझदारी से उपयोग करने योग्य समय के रूप में देखना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।
कृष्ण पक्ष का चक्र हर महीने आता है और हर बार यह मौका देता है कि कुछ न कुछ पुराना छोड़ा जाए।
इस तरह कृष्ण पक्ष केवल "डार्क साइड" की तरह नहीं बल्कि एक आवश्यक आध्यात्मिक पड़ाव के रूप में सामने आता है, जहाँ प्रकाश की तैयारी के लिए कुछ अंधेरा आवश्यक हो जाता है।
क्या कृष्ण पक्ष हमेशा अशुभ होता है
कृष्ण पक्ष को सामान्यतः बड़े नए कार्यों के लिए कम अनुकूल माना जाता है, पर यह पूरी तरह अशुभ नहीं है। अनेक व्रत, साधना, पितृ कार्य और आंतरिक परिवर्तन के लिए यह पक्ष बहुत सहायक हो सकता है।
शादी या गृह प्रवेश के लिए कृष्ण पक्ष उपयुक्त है या नहीं
आमतौर पर विवाह और गृह प्रवेश जैसे मंगल कार्य शुक्ल पक्ष में देखे जाते हैं, पर यदि किसी कारणवश कृष्ण पक्ष में ही करना हो, तो अनुभवी ज्योतिषी तिथि, नक्षत्र और व्यक्तिगत कुंडली देखकर ही निर्णय की सलाह देते हैं।
कृष्ण पक्ष में कौन से आध्यात्मिक कार्य अधिक फलदायी माने जा सकते हैं
जप, ध्यान, व्रत, उपवास, डिटॉक्स, भूले हुए संकल्पों की समीक्षा, पितरों के लिए कर्म और नकारात्मक आदतों को छोड़ने का प्रयास, यह सब कृष्ण पक्ष में विशेष रूप से सार्थक हो सकता है।
क्या हर मास में कृष्ण पक्ष की ऊर्जा समान रहती है
हर चंद्र मास का भाव अलग होता है, इसलिए व्रत, पर्व और संयम के प्रकार भी बदलते रहते हैं। फिर भी घटते चंद्रमा की मूल थीम, यानी छोड़ने और अंतर्मुखता, हर मास के कृष्ण पक्ष में किसी न किसी रूप में सक्रिय रहती है।
कृष्ण पक्ष को जीवन में व्यावहारिक रूप से कैसे उपयोग किया जा सकता है
कोई व्यक्ति इस पक्ष में अनावश्यक खर्च, विवाद और भारी निर्णयों से बचकर, अपने शरीर और मन को हल्का करने पर ध्यान दे सकता है। पुरानी फाइलें, भावनाएँ और ग़लत आदतें साफ करने के लिए हर महीने का कृष्ण पक्ष एक स्वाभाविक मौका दे सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, मुहूर्त
इनके क्लाइंट: म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें