By पं. संजीव शर्मा
सूर्य ग्रह योग प्रभाव कुंडली विस्तार

सूर्य समस्त विश्व की आत्मा है। इसलिए सूर्य को जगतपति ज्योति स्वरूप ईश्वर नारायण का स्वरूप माना गया है। वेदों में सूर्य को अग्नि का स्वरूप भी मानते हैं। इसी कारण सूर्य में सृजनात्मक प्रभाव होने से सृष्टि का क्रम सूर्य से चलता है। सूर्य के अंदर नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा दोनों का प्रभाव रहता है। सूर्य की शक्ति के बिना जातक सांसारिक जीवन में और आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में उन्नति पाना मुश्किल होता है। शास्त्रों के अनुसार जितने भी यज्ञ कर्म होते हैं इसका साक्षी सूर्य होता है। सूर्य ही आत्मबल का कारक है। यह मूल सिद्धांत ज्योतिष की नींव है। प्राचीन ग्रंथ इसकी पुष्टि करते हैं।
सूर्य वैज्ञानिक आधार से देखें तो समस्त ग्रह सूर्य का बल प्राप्त करके अपना शुभ फल देने में सामर्थ्य रखते हैं। सूर्य की किरणों से चंद्रमा में शुभत्व प्राप्त होता है। जो पूर्णिमा का प्रकाश सूर्य से ही मिलता है। चंद्रमा सूर्य से शक्ति प्राप्त करने पर जातक के मन की स्थिरता को दर्शाता है। जब सूर्य चंद्रमा को सकारात्मक प्रभाव देता है तो माता के उच्चकोटि के संस्कार और सहयोग मिलता है। पूर्णिमा की रात्रि विशेष शांति प्रदान करती है। मातृ सुख बढ़ता है।
मंगल ग्रह के अंदर जोश साहस पराक्रम बल सूर्य से ही प्राप्त करता है। सूर्य की ऊर्जा शक्ति प्राप्त करने के बाद मंगल जातक के अंदर कठिनाई और परेशानी का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है। मंगल का शुभ और अशुभ फल उस जातक की कुंडली में सकारात्मक और नकारात्मक स्थिति पर निर्भर करता है। सूर्य का प्रकाश बुध को प्राप्त होता है तो बुधादित्य योग का निर्माण करता है। जो जातक के मानसिक स्थिरता बुद्धिबल विद्वत्ता और आत्म चेतना की शक्ति सूर्य की दीप्तिमान ऊर्जा से मिलती है। बुध तेज बुद्धि का प्रतीक बनता है। वाणी कुशलता बढ़ती है।
गुरु के विषय में कहा जाता है कि सूर्य का गुरु गुरु है। इसी गुरु ग्रह से जातक को गृहस्थ सुख समृद्धि ज्ञान और विवेक का पता चलता है। किंतु गुरु ग्रह को आत्म प्रकाश प्राण शक्ति सूर्य से ही मिलती है। जिससे जातक को धार्मिक और शुभ मार्ग पर चलने की शक्ति की प्रेरणा मिलती है। गुरु की दृष्टि जीवन को दिशा देती है। शुक्र आनंद ऐश्वर्य धन और स्त्री सुख का कारक है। पर वह जब तक सूर्य की किरणों से ही दीप्तिमान नहीं होता तो शुक्र अपना कोई प्रभाव नहीं दिखाता। सूर्य जब शुक्र को ऊर्जा का स्रोत प्रभावित करता है तभी जातक को संसार के भौतिक सुख का आनंद मिलता है। जो स्त्री और पुरुष को संभोग करने की क्षमता प्रदान करता है। वैवाहिक सुख इसी से जुड़ा है।
शनि कर्म का कारक है। वही कर्म करने के लिए सूर्योदय होना अर्थात दिन का होना जरूरी है। वह शक्ति शनि को सूर्य से ही प्राप्त होती है। सूर्य से प्राप्त शक्ति शनि न्याय पूर्वक कर्म करने की क्षमता देता है। जब सूर्य नकारात्मक प्रभाव में राहु केतु के साथ होता है तो जातक के अंदर आत्मबल में कमी पैदा होती है। ऐसा जातक अपने कार्यक्षेत्र में विशेष प्रभाव नहीं दिखा पाता। जिसके कारण असंतोष और परेशानी का सामना करना पड़ता है। यहां एक बात विशेष है। जब राहु या केतु के साथ सूर्य ग्रहण बनाता है उस समय शनि या मंगल भी युति बना रहे हों तो राष्ट्र पर अधिक परेशानी महामारी कष्ट और भय रहता है। ऐसे योग प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े होते हैं। सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है।
सूर्य प्रेम का विशेष कारक माना गया है। जब सूर्य शुभ हो और शुभ ग्रहों से युति हो तो सूर्य उच्चकोटि और अनुशासन का प्रेम देता है। यही प्रेम पिता पुत्र से बने तो वह पुत्र के साथ उच्चकोटि और अनुशासन का प्रेम दर्शाता है। यही प्रेम संस्कार और मर्यादित होकर परिवार और समाज का प्रेरक होता है। जब सूर्य और शुक्र की शुभ युति होने पर यदि यह प्रेम पत्नी से बने तो वह प्रेम आदर्श और सुखमय को दर्शाता है। पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को राजा माना गया है। इसलिए सूर्य का दायित्व भी अधिक माना जाता है। कुंडली के विभिन्न दशा में यह अपना प्रभाव दिखाता है। वैसे सूर्य प्रकृति ग्रह है किंतु इसे क्रूर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है। जब यह जातक की कुंडली में अशुभ प्रभाव में आने या पीड़ित होने पर यह व्यक्ति विशेष को समस्याओं में भी डाल देता है। नेत्र रोग या हृदय संबंधी परेशानी उत्पन्न हो सकती है। पिता से विवाद संभव है।
सूर्य विभिन्न ग्रहों से मिलकर विशेष योगों का निर्माण करता है। सबसे पहले सूर्य जब गुरु से युति करता है तो एक राजा और मंत्री की युति मानी जाती है। सूर्य गुरु की शुभ युति गजकेसरी योग का निर्माण करता है। यह योग राजयोग है। ऐसा योग सांसारिक सुख आध्यात्मिक सुख के साथ साथ जातक को उच्च व्यक्तित्व भी प्रदान करता है। राजसी वैभव मिलता है। धन लाभ होता है।
दूसरा सूर्य बुध से युति होने पर कुंडली में बुधादित्य राजयोग का निर्माण करता है। इस योग में जातक शिक्षक प्रवक्ता प्रवचनकर्ता जैसे गुणों का संचार करता है। सरकारी सेवाएं विशेष राजयोग प्रदान करता है। उच्च पद प्राप्ति संभव है। व्यापार में सफलता मिलती है। तीसरा सूर्य चंद्र की युति। इस योग में सूर्य पिता और चंद्र माता की युति आ जाए तो व्यक्ति विशेष के मन और मस्तिष्क में विशेष सामंजस्य होता है। व्यक्ति उच्च विचारों वाला सौम्य प्रवृत्ति वाला होता है। किंतु चंद्रमा क्षीण होने के कारण मनोबल हीन और डरपोक होता है। भावनात्मक अस्थिरता रहती है। निर्णय लेने में कठिनाई होती है।
चौथा सूर्य मंगल की युति। राजा और सेनापति की युति ये दर्शाता है कि जातक पराक्रमी अपने मेहनत और बल से सभी सुख को पाने वाला होता है। नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। साहस बढ़ता है। पांचवा सूर्य और शुक्र की युति। जातक को कला संगीत और सुख सुविधा को पाने वाला होता है। कलात्मक प्रतिभा उभरती है। वैभव प्राप्त होता है। छठा सूर्य और शनि की युति। जातक को बहुत संघर्ष करने के बाद शुभ फल मिलता है। धैर्य परीक्षा होती है। स्थायी सफलता मिलती है। सातवां राहु केतु से जब सूर्य की युति होती है सूर्यग्रहण एक अशुभ योग बनता है। जिसमें जातक के शुभ प्रभावों में कमी आ जाती है। इस युति की वजह से जातक उलझनों में और समस्याओं से घिरा रहता है। किसी भी प्रकार के कार्य करने पर उसे अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उसे कार्य का पूरा होने का श्रेय भी नहीं मिलता है। आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है। निर्णय शक्ति प्रभावित होती है।
| योग | ग्रह युति | प्रभाव |
|---|---|---|
| गजकेसरी योग | सूर्य गुरु | उच्च व्यक्तित्व राजयोग |
| बुधादित्य योग | सूर्य बुध | बुद्धि सरकारी सुख |
| सूर्य चंद्र युति | सूर्य चंद्र | मन मस्तिष्क सामंजस्य |
| सूर्य मंगल युति | सूर्य मंगल | पराक्रम मेहनत सुख |
| सूर्य शुक्र युति | सूर्य शुक्र | कला संगीत सुख |
| सूर्य शनि युति | सूर्य शनि | संघर्ष पश्चात फल |
| सूर्यग्रहण योग | सूर्य राहु केतु | बाधाएं असफलता |
सूर्य महत्व से जुड़े सामान्य प्रश्न
सूर्य ज्योतिष में क्या महत्व रखता है?
सूर्य समस्त विश्व की आत्मा है। यह आत्मबल का कारक है। सभी ग्रहों को शक्ति प्रदान करता है।
सूर्य अन्य ग्रहों को कैसे प्रभावित करता है?
सूर्य की किरणों से चंद्रमा मंगल बुध गुरु शुक्र शनि को शक्ति मिलती है। प्रत्येक ग्रह अपना फल देने में सक्षम होता है।
सूर्य प्रेम का कारक क्यों है?
शुभ सूर्य उच्चकोटि अनुशासित प्रेम देता है। पिता पुत्र पत्नी से आदर्श संबंध दर्शाता है।
सूर्य के प्रमुख योग कौन से हैं?
गजकेसरी बुधादित्य सूर्य चंद्र युति मंगल युति शुक्र युति शनि युति और सूर्यग्रहण योग प्रमुख हैं।
सूर्य अशुभ होने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अशुभ सूर्य आत्मबल में कमी लाता है। राहु केतु से ग्रहण योग बाधाएं उत्पन्न करता है।
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