By पं. संजीव शर्मा
घर में सही दिशा और समय के अनुसार कार्यों को योजना बनाना

भारतीय परंपरा में सूर्य को केवल प्रकाश का स्रोत नहीं माना जाता बल्कि दिनचर्या और वास्तु शास्त्र दोनों का आधार भी समझा जाता है। जब घर का निर्माण और हमारी दिनचर्या सूर्य की दिशा और गति को ध्यान में रखकर तय की जाती है तो जीवन में अधिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा अनुभव की जा सकती है। इसी विचार पर आधारित यह सरल लेकिन गहरी समझ है कि दिन के अलग अलग समय पर कौन सा कार्य अतिशुभ माना गया है और घर में संबंधित कमरों की दिशा कैसी होनी चाहिए।
सूर्य दिन भर में आकाश के जिस पथ से गुजरता हुआ प्रतीत होता है उसी के अनुसार वास्तु शास्त्र आठ प्रमुख समयखंडों की चर्चा करता है। हर समयखंड में सूर्य की अनुमानित दिशा अलग होती है और उसी के अनुसार यह बताया जाता है कि कौन सा काम उस समय शुभ रहेगा और घर में कौन सा कक्ष किस दिशा में बनाने से लाभ मिलता है।
वास्तु शास्त्र का मूल विचार यह है कि मनुष्य की दिनचर्या और भवन की रचना प्रकृति की लय के साथ जुड़ी होनी चाहिए। सूर्य की गति इस प्राकृतिक लय का सबसे स्पष्ट संकेत है। सुबह से रात तक सूर्य की दिशा बदलने के साथ साथ प्रकाश का स्तर तापमान और वातावरण की गुणवत्ता भी बदलती रहती है।
यदि घर की योजना और हमारे रोज़मर्रा के काम इन परिवर्तनों के अनुरूप हों तो स्वास्थ्य में सुधार ऊर्जा का स्तर बेहतर और मानसिक स्थिति अधिक स्थिर रह सकती है। इसीलिए कहा गया है कि भवन निर्माण भी सूर्य की दिशा को ध्यान में रखकर हो और दैनिक कर्म जैसे पूजा अध्ययन भोजन विश्राम और निद्रा भी सूर्य के समयानुसार हों।
रात्रि 3 बजे से सुबह 6 बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। इस काल में सूर्य की मानी गई दिशा घर के उत्तर पूर्व भाग से जुड़ी मानी जाती है। वातावरण अपेक्षाकृत शांत होता है और मन भी दिन की उलझनों से मुक्त रहता है।
वास्तु और ज्योतिष दोनों की दृष्टि से यह समय चिंतन मनन और अध्ययन के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मंत्रजप ध्यान और आध्यात्मिक साधना भी इसी समय अधिक फलदायी कही गई है। जो लोग अपने दिन की शुरुआत इसी समय साधना या आत्मचिंतन से करते हैं वे प्रायः पूरे दिन अधिक हल्का और केंद्रित अनुभव कर सकते हैं।
सुबह 6 बजे से 9 बजे तक सूर्य घर के पूर्वी हिस्से में माना जाता है। इस समय सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत कोमल और जीवनदायी मानी जाती हैं। वास्तु शास्त्र इसीलिए सलाह देता है कि घर की योजना ऐसी हो कि पूर्व दिशा से आने वाली यह प्राकृतिक रोशनी घर के भीतर आसानी से प्रवेश कर सके।
सुबह के समय दरवाजे और खिड़कियां खोलना स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभकारी माना गया है। इससे न केवल घर का वातावरण ताज़ा होता है बल्कि नमी और जड़ता भी कम होती है। पूर्व की ओर खुलने वाली खिड़कियां रहने वाले कक्षों या बैठक के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती हैं।
प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक सूर्य घर के दक्षिण पूर्व भाग से संबंधित माना जाता है। यह समय विशेष रूप से भोजन पकाने और स्नान जैसे कार्यों के लिए शुभ बताया गया है। वास्तु में दक्षिण पूर्व को अग्नि से जुड़ी दिशा माना जाता है इसलिए रसोईघर का स्थान यहां होना बहुत उपयुक्त माना जाता है।
रसोई और स्नानघर प्रायः गीले और नमी वाले स्थान होते हैं। यदि यह दोनों कक्ष ऐसी दिशा में बने हों जहां दिन के समय अच्छी धूप आती हो तो वे जल्दी सूखते हैं और अधिक स्वास्थ्यकर बने रहते हैं। इसीलिए कहा गया है कि रसोई और स्नानघर वहां हों जहां सूर्य की रोशनी भरपूर मिले ताकि स्वच्छता और सेहत दोनों सुरक्षित रहें।
दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय विश्रांति काल माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की मानी हुई दिशा दक्षिण मानी गई है। वास्तु शास्त्र में सुझाव दिया गया है कि शयन कक्ष मुख्य रूप से इसी दिशा में बनाया जाए।
दोपहर के समय सूर्य की तीव्रता अधिक होती है इसलिए यह समय गहरे विश्राम के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल नहीं लगता। इसी कारण से शयन कक्ष के पर्दे थोड़े गहरे रंग के रखने की सलाह दी जाती है ताकि अत्यधिक तेज रोशनी सीधे भीतर न आए और कमरे का तापमान भी संतुलित बना रहे। इस प्रकार दक्षिण दिशा में शयन कक्ष रखकर और रोशनी को नियंत्रित कर शरीर और मन दोनों को उचित विश्राम दिया जा सकता है।
दोपहर 3 बजे से सायं 6 बजे तक को वास्तु शास्त्र अध्ययन और कार्य के लिए उपयुक्त मानता है। इस समय सूर्य की दिशा दक्षिण पश्चिम मानी जाती है। यह दिशा स्थिरता और गंभीरता से जुड़ी समझी जाती है।
यही कारण है कि घर का अध्ययन कक्ष या पुस्तकालय दक्षिण पश्चिम में रखना हितकारी माना जाता है। यहां बैठकर पढ़ाई करने या महत्वपूर्ण कार्य करने से मन अपेक्षाकृत अधिक एकाग्र और स्थिर रह सकता है। इस दिशा में बना अध्ययन कक्ष लंबे समय तक ध्यान की आवश्यकता वाले कामों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
सायं 6 बजे से रात 9 बजे तक का समय सामान्यतः खाने बैठने और हल्का पढ़ने या बातचीत करने का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य घर के पश्चिमी भाग से जुड़ा माना जाता है। वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि घर का भोजन कक्ष या बैठक कक्ष पश्चिम या पश्चिमी कोने में रखना अच्छा होता है।
जब परिवार इस समय एक साथ बैठकर भोजन करता है या दिन भर की बातें साझा करता है तो पश्चिम दिशा की प्राकृतिक लय इस माहौल को सहजता और अपनापन प्रदान करती है। इस स्थान पर शाम की हल्की प्राकृतिक रोशनी और फिर शांत होता आकाश एक प्रकार का संतुलित वातावरण तैयार करते हैं जो परिवारिक संबंधों को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
सायं 9 बजे से मध्यरात्रि तक सूर्य की मानी हुई दिशा उत्तर पश्चिम बताई जाती है। वास्तु के अनुसार यह दिशा शयन कक्ष के लिए भी उपयोगी मानी जाती है विशेष रूप से रात के विश्राम के लिए।
उत्तर पश्चिम दिशा में बने शयन कक्ष में रात के समय हवा का प्रवाह अच्छा माना जाता है और ऊर्जा अपेक्षाकृत संतुलित रहती है। इससे गहरी और शांत नींद में सहायता मिल सकती है। वैवाहिक जीवन के संदर्भ में भी इस दिशा को समझदारी और समन्वय बढ़ाने वाली दिशा के रूप में देखा जाता है।
मध्यरात्रि से तड़के 3 बजे तक का समय वास्तु अनुसार अत्यंत गोपनीय और सूक्ष्म प्रभावों वाला माना गया है। इस अवधि में सूर्य घर के उत्तरी भाग से जुड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर दिशा स्वयं में धन और समृद्धि की दिशा मानी जाती है।
इसी कारण से कहा गया है कि कीमती वस्तुएं जेवरात और महत्वपूर्ण दस्तावेज रखने का स्थान घर के उत्तरी हिस्से में हो तो अच्छा रहता है। इस दिशा में बनी तिजोरी या सुरक्षित अलमारी घर की आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करने वाली मानी जाती है। रात के नितांत शांत समय में उत्तर दिशा की ऊर्जा अधिक केंद्रित मानी जाती है इसलिए इसे संरक्षण और सुरक्षा से जोड़ा गया है।
| समय अवधि | सूर्य की मानी गई स्थिति | वास्तु के अनुसार शुभ कार्य और स्थान |
|---|---|---|
| रात्रि 3 से सुबह 6 | उत्तर पूर्व | चिंतन मनन अध्ययन पूजाघर या ध्यान कक्ष |
| सुबह 6 से 9 | पूर्व | घर में प्रकाश प्रवेश मुख्य रहने के कक्ष |
| सुबह 9 से दोपहर 12 | दक्षिण पूर्व | भोजन पकाना रसोई और स्नानघर का स्थान |
| दोपहर 12 से 3 | दक्षिण | विश्रांति शयन कक्ष और आराम क्षेत्र |
| दोपहर 3 से शाम 6 | दक्षिण पश्चिम | अध्ययन कार्य कक्ष या पुस्तकालय |
| शाम 6 से रात 9 | पश्चिम | भोजन बैठकी परिवार के साथ समय |
| रात 9 से मध्यरात्रि | उत्तर पश्चिम | रात्रि शयन कक्ष के लिए उपयोगी |
| मध्यरात्रि से तड़के 3 बजे | उत्तर | तिजोरी कीमती वस्तुएं और दस्तावेज |
जब दिनचर्या और घर की रचना दोनों सूर्य के प्राकृतिक क्रम के अनुरूप हों तो जीवन सहज रूप से अधिक व्यवस्थित और शांत अनुभव किया जा सकता है। वास्तु शास्त्र यही सलाह देता है कि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार इन समय नियमों को अपनाने की कोशिश करे।
जो लोग नया घर बना रहे हों वे कमरों की दिशा तय करते समय इन बातों को ध्यान में रखें तो दीर्घकाल में स्वास्थ्य समृद्धि और मानसिक संतुलन तीनों स्तर पर लाभ महसूस कर सकते हैं। जो पहले से बने घर में रह रहे हों वे भी कम से कम अपनी दिनचर्या को इन समयों के अनुरूप ढालकर सूर्य की ऊर्जा का बेहतर लाभ ले सकते हैं।
ब्रह्म मुहूर्त में कौन से कार्य सबसे शुभ माने गए हैं?
ब्रह्म मुहूर्त रात्रि 3 से सुबह 6 के बीच माना जाता है और यह समय चिंतन मनन अध्ययन तथा जप और ध्यान जैसे आध्यात्मिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है क्योंकि इस समय मन स्वाभाविक रूप से शांत होता है।
सुबह 6 से 9 के बीच घर में क्या ध्यान रखना चाहिए?
इस समय सूर्य पूर्व दिशा में माना जाता है इसलिए घर की खिड़कियां और दरवाजे खोलकर प्राकृतिक रोशनी और ताज़ी हवा को भीतर आने देना अच्छा है जिससे नमी और भारीपन कम होता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभ मिलता है।
दक्षिण पूर्व में रसोई और स्नानघर रखना क्यों उचित माना जाता है?
सुबह 9 से दोपहर 12 के बीच सूर्य दक्षिण पूर्व में माना जाता है और यह दिशा अग्नि तत्व से जुड़ी मानी जाती है। यहां रसोई और स्नानघर होने से पर्याप्त धूप मिलती है जिससे यह गीले स्थान जल्दी सूखते हैं और अधिक स्वास्थ्यकर बने रहते हैं।
शयन कक्ष के लिए दक्षिण और उत्तर पश्चिम दिशा में क्या अंतर है?
दोपहर के विश्रांति काल में दक्षिण दिशा स्थिरता और आराम के लिए उपयुक्त मानी जाती है जबकि रात 9 से मध्यरात्रि तक उत्तर पश्चिम दिशा में शयन कक्ष हवा के प्रवाह और ऊर्जा संतुलन के कारण गहरी नींद और संबंधों में समन्वय के लिए लाभकारी मानी जाती है।
तिजोरी या कीमती वस्तुओं के लिए उत्तर दिशा को ही क्यों बेहतर माना गया है?
मध्यरात्रि से तड़के 3 बजे तक सूर्य की मानी गई दिशा उत्तर रहती है जो धन और समृद्धि की दिशा कही जाती है। इस दिशा में तिजोरी या कीमती सामान रखने से सुरक्षा और स्थिरता की भावना मजबूत होती है और वास्तु अनुसार इसे अतिशुभ माना गया है।
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