भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी (चैत्र कृष्ण चतुर्थी): मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले गणेश जी का पूजन

By पं. अमिताभ शर्मा

मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले गणेश जी का पूजन, चंद्रमा की शाप-मुक्ति और चंद्र अर्घ्य

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी: पूजा विधि, कथा, चंद्र अर्घ्य और 21 दूर्वा

पंचांग विवरण एवं भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक कालगणना, गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी' (Sankashti Chaturthi) के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। 'संकष्टी' संस्कृत शब्द 'संकट हरण' से व्युत्पन्न है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-समस्त विघ्नों, व्याधियों, क्लेशों और बाधाओं का समूल नाश करने वाली तिथि। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विशेष रूप से 'भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी' (Bhalachandra Sankashti Chaturthi) के पावन नाम से अभिहित किया जाता है।

संस्कृत वांग्मय में 'भाल' का अर्थ मस्तक (ललाट) और 'चंद्र' का अर्थ शशि अथवा सोम है। अतः भालचंद्र का स्वरूप वह परम तेजस्वी विग्रह है, जिनके मस्तक पर अमृतमयी अर्धचंद्र सुशोभित है।

खगोलीय दृष्टि से चैत्र कृष्ण चतुर्थी वसंत ऋतु के अवसान और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का वह संधिकाल है जब सूर्य देव मीन राशि के अंतिम जल-तत्त्वीय अंशों में संचरण करते हैं और चंद्रमा तुला अथवा वृश्चिक राशि के अनुराधा/विशाखा नक्षत्रों में गोचर करते हैं। इस संधिकाल में चंद्रमा का आकार घटने (Waning Phase) के कारण मानव मस्तिष्क के जल-तत्त्व और भावनात्मक संतुलन में क्षीणता आती है। संकष्टी चतुर्थी की साधना रात्रि के समय चंद्रोदय व्यापिनी मानी जाती है। इस पावन निशा में भगवान विघ्नहर्ता गणेश के साथ चंद्र देव की पूजा और उन्हें अर्घ्य समर्पित करने से जन्मकुंडली का चंद्र दोष, कलंक, मानसिक अशांति, अवसाद और अज्ञात भय क्षणभर में भस्म हो जाते हैं।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, कृष्ण पक्ष
तिथि चतुर्थी तिथि (संकष्टी चतुर्थी, चंद्रोदय व्यापिनी)
पर्व का शास्त्रीय नाम भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी, संकटनाशन चतुर्थी
मुख्य अधिष्ठाता देव भगवान श्री भालचंद्र गणेश (मस्तक पर चंद्रधारी विग्रह)
साथ पूज्य सत्ता चंद्र देव (सोम / रोहिणी पति)
मुख्य तात्विक स्वरूप जल तत्त्व व पृथ्वी तत्त्व का संतुलन, मूलाधार व आज्ञा चक्र शोधन
विशिष्ट पूजन समय रात्रि चंद्रोदय काल (Moonrise Time)
प्रधान पारंपरिक भोग मोदक, तिल-गुड़ के लड्डू, दूर्वा, शमी पत्र, पंचामृत
संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह केतु (विघ्नहर्ता गणेश) एवं चंद्रमा (मन का कारक)
अभीष्ट आध्यात्मिक फल संकट मुक्ति, कलंक निवारण, मानसिक एकाग्रता, बुद्धि व विवेक वृद्धि

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के इस पावन व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर रात्रि चंद्रोदय तक कठोर शास्त्रीय आचार नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व उठकर शीतल अथवा ताजे जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात स्वच्छ लाल अथवा पीले रंग के सूती वस्त्र धारण कर भगवान सूर्यनारायण को तांबे के पात्र से तीन बार जलार्पण करना।
  • गृह मंदिर में भगवान गणेश के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर हाथ में जल, अक्षत, दूर्वा और सिक्का लेकर 'संकष्टी चतुर्थी व्रत' का संकल्प लेना।
  • दिनभर पूर्ण सात्विक उपवास रखना; केवल जल, दूध अथवा बिना नमक का फलाहार ग्रहण करना तथा क्रोध, कलह और असत्य भाषण से सर्वथा दूर रहना।
  • दिनभर 'ॐ गं गणपतये नमः' अथवा 'ॐ भालचन्द्राय नमः' मंत्र का मानसिक अथवा उपांशु जप करते रहना।
  • भगवान गणेश को 21 दूर्वा दल (प्रत्येक जोड़े में) विशिष्ट मंत्रों के साथ अर्पित करना तथा लाल सिंदूर का तिलक लगाना।
  • सायंकाल पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर गणेश जी की षोडशोपचार पूजा संपन्न करना और संकष्टी व्रत कथा का श्रवण करना।
  • रात्रि में स्थानीय पंचांग के अनुसार जब चंद्रमा उदित हो तब चांदी अथवा तांबे के पात्र में कच्चा गाय का दूध, जल, अक्षत, रोली और श्वेत पुष्प मिलाकर चंद्रमा को तीन बार अर्घ्य देना।
  • अर्घ्य समर्पण के उपरांत गणेश जी को भोग लगाए गए तिल-गुड़ के लड्डू अथवा मोदक से व्रत का पारण करना।

पौराणिक पृष्ठभूमि: चंद्रमा का अहंकार और भालचंद्र स्वरूप का प्राकट्य

गणेश पुराण के उपासना खंड और ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड में भगवान गणेश के 'भालचंद्र' कहलाने की अत्यंत रोचक, अलौकिक और दार्शनिक कथा प्राप्त होती है।

सृष्टि के आरंभ में चंद्र देव को अपने असीम शारीरिक सौंदर्य, धवल कांति और 27 नक्षत्र पत्नियों के प्रेम का अत्यधिक अहंकार हो गया था। वे स्वयं को त्रिभुवन का सबसे सुंदर और आकर्षक देव मानने लगे थे।

एक बार भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी की संध्या को भगवान गजानन अपने मूषक (चूहे) पर सवार होकर मोदकों का भोग लगाकर कैलाश लौट रहे थे। मार्ग में मूषक के सामने एक सर्प आ गया, जिससे भयभीत होकर मूषक उछल पड़ा और भगवान गणेश लड़खड़ाकर भूमि पर गिर पड़े। इस आकस्मिक घटना को आकाश से देख रहे चंद्र देव अपनी हंसी न रोक सके। अहंकार के मद में चूर होकर चंद्रमा ने गणेश जी के विशाल उदर (पेट) और गज-मुख (हाथी के मुख) का उपहास उड़ाते हुए ठहाका लगाया।

घटनाक्रम सोपान पौराणिक एवं आध्यात्मिक विवरण अंतर्निहित दार्शनिक संदेश
चंद्रमा का रूप-गर्व 27 नक्षत्रों के स्वामी होने का मद भौतिक सौंदर्य का अहंकार अंततः पतन का कारण बनता है
गणेश जी का उपहास विनायक के स्थूल स्वरूप पर ठहाका लगाना बाह्य रूप देखकर किसी के आंतरिक ब्रह्म-तत्त्व की उपेक्षा करना पाप है
गणेश जी का शाप चंद्रमा का संपूर्ण रूप नष्ट होना, क्षय रोग अहंकार का तत्काल खंडन, ऊर्जा और कांति का लोप
सृष्टि में अंधकार औषधियों का सूखना, समुद्र का रुकना शीतलता और सोम-रस के बिना जीवन असंभव है
चैत्र मास में तपस्या चंद्रमा द्वारा चैत्र कृष्ण चतुर्थी पर घोर तप सच्चे पश्चाताप से ही शाप-मुक्ति और नव-जीवन संभव है
भाल पर धारण गणेश जी द्वारा चंद्र को अपने मस्तक पर बैठाना परमात्मा क्षमाशील हैं; वे शरणागत को अपना मुकुट बना लेते हैं

चंद्रमा का यह अहंकारी उपहास देखकर प्रथम पूज्य भगवान गणेश अत्यंत कुपित हो गए। उन्होंने अपनी सूंड उठाकर चंद्रमा को तत्काल शाप दे दिया:

"रे अभिमानी चंद्रमा! तूने अपने रूप के मद में आकर सृष्टि के आदि-कारण का उपहास उड़ाया है। अतः तू इसी क्षण अपनी संपूर्ण कांति, चमक और सौंदर्य से विहीन होकर पूर्णतः काला (रूप-हीन) हो जा! आज से जो भी प्राणी तुझे देखेगा, वह समाज में कलंकित और अपमानित होगा!"

शाप के प्रभाव से चंद्र देव उसी क्षण निस्तेज और काले हो गए। चंद्रमा की कांति लुप्त होते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में त्राहि-त्राहि मच गई। औषधियों का रस सूखने लगा, वनस्पतियां मुरझाने लगीं और समुद्र का जल-प्रवाह शांत हो गया। चंद्रमा लज्जा और भय के कारण मानसरोवर की कुमुदिनियों में जाकर छिप गए।

देवराज इंद्र और समस्त देवता परमपिता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने कहा: "गणपति परात्पर ब्रह्म हैं। उनके शाप का निवारण केवल वे स्वयं कर सकते हैं। चंद्र देव को चाहिए कि वे चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में कठोर तपस्या कर गणेश जी की शरण लें।"

चंद्रमा ने चैत्र मास में भगवान गणेश की बालू की प्रतिमा बनाकर घोर तपस्या की। वे निराहार रहकर केवल वायु पीकर 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करते रहे। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गजानन चंद्रमा की निष्कपट भक्ति और पश्चाताप से द्रवित होकर प्रकट हुए।

चंद्रमा ने अश्रुपूरित नेत्रों से साष्टांग दंडवत कर क्षमा मांगी: "हे दयानिधि! अहंकार के वशीभूत होकर मैंने आपका अपराध किया था। मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे क्षमादान दीजिए।"

भगवान गणेश ने अत्यंत वात्सल्य भाव से कहा: "हे चंद्रमा! मेरा शाप सर्वथा निष्फल नहीं हो सकता, परंतु तुम्हारे पश्चाताप से मैं परम प्रसन्न हूँ। कृष्ण पक्ष में तुम्हारी कलाएं क्रमशः घटेंगी और शुक्ल पक्ष में पुनः बढ़कर पूर्णिमा को तुम पूर्ण हो जाओगे।"

इसके उपरांत भगवान गणेश ने चंद्रमा की कांति को सदा के लिए अमर करने हेतु अपने हाथ से उठाकर चंद्रमा के सुंदर बाल-रूप को अपने 'भाल' (मस्तक) पर धारण कर लिया। चंद्रमा को मस्तक पर सुशोभित करने के कारण ही भगवान गणेश का पावन नाम 'भालचंद्र' विख्यात हुआ।


अष्टविनायक परंपरा में भालचंद्र: गिरजात्मज और लेण्याद्री का रहस्य

महाराष्ट्र की पावन धरा पर स्थापित 'अष्टविनायक' (Eight Ganeshas) के तीर्थों में भगवान गणेश के भालचंद्र स्वरूप का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

  • लेण्याद्री के श्री गिरजात्मज: पुणे जिले के जुन्नर के समीप लेण्याद्री पर्वत की बौद्ध कालीन गुफाओं में अष्टविनायक के छठे गणपति 'श्री गिरजात्मज' (Girijatmaja) विराजमान हैं। 'गिरिजा' (पार्वती) के 'आत्मज' (पुत्र) के रूप में माँ पार्वती ने पुत्र प्राप्ति हेतु इसी पर्वत पर 12 वर्षों तक घोर तपस्या की थी।
  • भालचंद्र का प्राकट्य स्थल: मुद्गल पुराण के अनुसार इसी लेण्याद्री पर्वत पर माँ पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को अवतार लिया था और आगे चलकर चंद्रमा का उद्धार कर अपने मस्तक पर बाल-चंद्रमा को धारण किया था।
  • अनोखा गुफा मंदिर: लेण्याद्री का यह मंदिर किसी कृत्रिम शिखर से नहीं बना बल्कि यह एक विशाल पर्वत को काटकर बनाई गई गुफा में स्थित है। यहाँ 307 सीढ़ियां चढ़कर दर्शन होते हैं। गर्भगृह में कोई कृत्रिम प्रकाश नहीं है; सूर्य की किरणें सीधे इस गुफा में प्रवेश कर भगवान भालचंद्र के विग्रह को प्रकाशित करती हैं।
अष्टविनायक विग्रह भौगोलिक स्थिति पौराणिक महत्व भालचंद्र तत्त्व
श्री गिरजात्मज लेण्याद्री (जुन्नर, पुणे) माता पार्वती की 12 वर्षीय तपस्या का फल बाल रूप, मस्तक पर चंद्र आभा, सौम्यता
श्री मयूरेश्वर मोरगांव (पुणे) सिंधुरासुर मर्दन, मयूर वाहन आदि-विनायक, कर्म-सिद्धि
श्री सिद्धिविनायक सिद्धटेक (अहमदनगर) भगवान विष्णु को मधु-कैटभ वध हेतु सिद्धि दक्षिणामुखी सूंड, मोक्ष प्रदाता
श्री बल्लालेश्वर पाली (रायगढ़) भक्त बल्लाल की निष्काम भक्ति से प्राकट्य भक्त-वत्सल, ब्राह्मण वेश

21 दूर्वा अर्पण का गूढ़ विज्ञान और तात्विक संतुलन

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश को 21 दूर्वा (Dub Grass) अर्पित करने का विधान केवल एक पूजा-प्रक्रिया नहीं है, अपितु यह एक गहरा जैव-ऊर्जात्मक और तांत्रिक रहस्य है।

अनलासुर वध और दूर्वा का संबंध

गणेश पुराण के अनुसार जब 'अनलासुर' नामक दैत्य अपने नेत्रों से अग्नि की ज्वालाएं उगलकर ऋषियों और मुनियों को जीवित निगल रहा था तब समस्त सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान गणेश ने अनलासुर को स्वयं निगल लिया।

अनलासुर को निगलते ही उसके पेट की भयानक आग्नेय ऊर्जा से गणेश जी के उदर और संपूर्ण शरीर में असहनीय जलन (दाह) होने लगी। देवताओं ने शीतल जल, चंद्रमा का अमृत और चंदन लगाया, परंतु गणेश जी का दाह शांत नहीं हुआ। अंततः कश्यप ऋषि ने 21 दूर्वा दल (प्रत्येक में तीन-तीन पत्तियां) एकत्रित कर भगवान गणेश के सिर पर अर्पित कीं। दूर्वा के स्पर्श मात्र से गणेश जी के शरीर का आंतरिक ताप शांत हो गया।

21 दूर्वा का तात्विक रहस्य

दूर्वा अमृत के समान शीतल और कभी न सूखने वाली वनस्पति है। मनुष्य शरीर में 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां, 5 प्राण, 5 पंचमहाभूत और 1 मन-ये मिलकर 21 तत्त्व बनते हैं। जब साधक 21 दूर्वा समर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपने इन 21 आंतरिक तत्त्वों को भगवान के चरणों में समर्पित कर अपनी आंतरिक वासनाओं और अहंकार के दाह को शांत करता है।

दूर्वा अर्पण क्रम प्रयुक्त शास्त्रीय मंत्र संबंधित आंतरिक तत्त्व आध्यात्मिक व शारीरिक फल
१. प्रथम जोड़ा ॐ गणाधिपाय नमः पृथ्वी तत्त्व / मूलाधार चक्र स्थिरता, शारीरिक बल व सुरक्षा
२. द्वितीय जोड़ा ॐ उमापुत्राय नमः जल तत्त्व / स्वाधिष्ठान चक्र मानसिक शांति, कामुकता का शमन
३. तृतीय जोड़ा ॐ विघ्ननाशनाय नमः अग्नि तत्त्व / मणिपुर चक्र जठराग्नि संतुलन, भय व चिंता मुक्ति
४. चतुर्थ जोड़ा ॐ विनायकाय नमः वायु तत्त्व / अनाहत चक्र हृदय की शुद्धि, अहंकार का विसर्जन
५. पंचम जोड़ा ॐ ईशपुत्राय नमः आकाश तत्त्व / विशुद्ध चक्र वाणी की सिद्धि, सत्य का प्रकटीकरण
६. षष्ठ जोड़ा ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः मन व बुद्धि / आज्ञा चक्र एकाग्रता, कुशाग्र प्रज्ञा, स्मरण शक्ति
७. सप्तम जोड़ा ॐ एकदन्ताय नमः अद्वैत चेतना द्वंद्व से मुक्ति, समभाव की प्राप्ति
८. अष्टम जोड़ा ॐ इभवक्त्राय नमः क्षमा व धीरता क्रोध का शमन, विशाल दृष्टिकोण
९. नवम जोड़ा ॐ मूषकवाहनाय नमः इंद्रिय निग्रह चंचल मन पर पूर्ण नियंत्रण
१०. दशम जोड़ा ॐ कुमारगुरवे नमः ज्ञान का विस्तार गुरु-कृपा, विद्या में सर्वोच्च सफलता
११. एकादश (एकल) ॐ भालचन्द्राय नमः सहस्रार / सोमरस मोक्ष प्राप्ति, अखंड आनंद, अमृत रस

संकष्टी चतुर्थी की सम्पूर्ण शास्त्रीय पूजन विधि

चैत्र कृष्ण चतुर्थी के दिन घर में संकट निवारण, कलंक मुक्ति और मानसिक शांति हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध विधि से पूजन संपन्न करना चाहिए:

  1. प्रातः कालीन शुद्धि एवं संकल्प: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। स्वच्छ लाल अथवा पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, रोली, अक्षत, दूर्वा और सिक्का लेकर संकल्प करें:

    ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे कृष्ण पक्षे संकष्टी चतुर्थी तिथौ, भालचंद्र गणेश प्रीतिकामनया, मम सकल मानसिक-शारीरिक संकट निवारणार्थं, कलंक-दोष शमनार्थं संकष्टी चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।

  2. पूजा वेदी का निर्माण: लकड़ी की चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाएं। उस पर अक्षत से अष्टदल कमल बनाएं। तांबे अथवा चांदी की थाली में भगवान भालचंद्र गणेश की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
  3. षोडशोपचार अर्चन:
    • पंचामृत स्नान: कच्चे दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें।
    • सिंदूर समर्पण: भगवान गणेश को शुद्ध गाय के घी में मिला हुआ रक्त सिंदूर अर्पित करें।
    • जनेऊ व वस्त्र: नवीन पीताम्बरी अथवा कलावा और जनेऊ चढ़ाएं।
  4. 21 दूर्वा और शमी पत्र अर्पण: 21 दूर्वा दलों को गंगाजल से धोकर दो-दो करके उपर्युक्त मंत्रों के साथ गणेश जी के चरणों और मस्तक पर अर्पित करें। साथ में शमी पत्र चढ़ाएं।
  5. महा-नैवेद्य अर्पण: गाय के घी में बने तिल-गुड़ के 21 लड्डू, मोदक, केला, मौसमी फल और बताशे अर्पित करें।
  6. संकटनाशन गणेश स्तोत्र पाठ: नारद पुराणोक्त 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' (प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्...) का कम से कम 3 अथवा 11 बार सस्वर पाठ करें।
  7. रात्रि चंद्र अर्घ्य विधान: पंचांग अनुसार चंद्रोदय के समय तांबे अथवा चांदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, अक्षत, रोली और सफेद फूल डालें। पूर्व दिशा में उदित चंद्रमा के सम्मुख खड़े होकर तीन बार अर्घ्य समर्पित करें:

    गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
    गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रिय रोहिणीपते॥

  8. आरती व पारण: कर्पूर से गणेश जी की आरती उतारें, चंद्रमा को प्रणाम करें और परिवार के बड़ों का चरण स्पर्श कर तिल-गुड़ के प्रसाद से व्रत का पारण करें।

ज्योतिषीय समाधान: चंद्र दोष, कलंक और अवसाद का निवारण

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है: "चंद्रमा मनसो जातः"। जब जन्मकुंडली में चंद्रमा राहु के साथ हो (ग्रहण योग), शनि के साथ हो (विष योग), केतु से पीड़ित हो अथवा नीच राशि (वृश्चिक) में 6ठे, 8वें या 12वें भाव में बैठा हो, तो जातक के जीवन में निम्नलिखित कष्ट आते हैं:

  • निरंतर अकारण मानसिक तनाव, घबराहट, पैनिक अटैक और गंभीर अवसाद (Depression)।
  • समाज में बिना किसी अपराध के झूठे आरोप लगना, चरित्र पर कलंक लगना और बदनामी होना।
  • माता के स्वास्थ्य को गंभीर संकट अथवा माता से संबंधों में कड़वाहट।
  • अनिद्रा, जल से भय और निर्णय लेने की क्षमता का क्षीण हो जाना।

भगवान भालचंद्र ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर उसे अभयदान दिया था। यही कारण है कि चैत्र कृष्ण संकष्टी चतुर्थी के दिन भालचंद्र गणेश की पूजा और चंद्र अर्घ्य इन समस्त दोषों को जड़ से समाप्त करने का अचूक रामबाण उपाय है।

चंद्र जनित ग्रह दोष जीवन में दिखने वाले लक्षण भालचंद्र चतुर्थी पर अचूक शास्त्रीय उपाय
चंद्र-शनि विष योग निराशावादी सोच, आत्महत्या के विचार, अकेलापन गणेश जी को 21 तिल के लड्डू व नीले अपराजिता पुष्प अर्पण
चंद्र-राहु ग्रहण योग अज्ञात भय, बुरे स्वप्न, मतिभ्रम, झूठे आरोप कच्चे दूध से चंद्र अर्घ्य व संकटनाशन स्तोत्र का 11 पाठ
नीचस्थ चंद्रमा (वृश्चिक) भावनात्मक अस्थिरता, निर्णय-शून्यता, कफ विकार चांदी के पात्र में जल भरकर चंद्र दर्शन व ॐ सोमाय नमः जप
केतु की महादशा में कष्ट कार्यों में अचानक अड़चनें, वैराग्य, दुर्घटनाएं गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाकर सिंदूर का तिलक लगाना

दार्शनिक संदेश: अहंकार का क्षय और क्षमा का मुकुट

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का पावन पर्व मानव चेतना को सनातन जीवन दर्शन का यह अमर संदेश देता है कि अहंकार पतन की खाई में गिराता है, परंतु सच्चा पश्चाताप ईश्वर का मुकुट बना देता है।

चंद्रमा के पास रूप था, ऐश्वर्य था, कांति थी, परंतु जैसे ही उसके भीतर अहंकार का विष घुला, वह एक क्षण में कुरूप और निस्तेज हो गया। संसार का कोई भी भौतिक साधन मनुष्य को परमात्मा के कोप से नहीं बचा सकता यदि उसके भीतर विनय और मर्यादा नहीं है।

परंतु इस कथा का दूसरा पहलू और भी अधिक उदात्त और करुणामयी है। भगवान गणेश ने चंद्रमा के अपराध को केवल दंडित नहीं किया; जब चंद्रमा ने अपनी भूल स्वीकार कर ली, तो भगवान ने न केवल उसका रूप लौटाया बल्कि उस अपमानित और कलंकित चंद्रमा को उठाकर अपने मस्तक पर बैठा लिया!

यह परमात्मा के क्षमा-तत्त्व की पराकाष्ठा है। भगवान भालचंद्र हमें सिखाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती मानकर सच्चे हृदय से क्षमा मांगता है, तो उसे समाज में दुत्कारने के स्थान पर गले लगाना चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को मिटाकर गणेश-रूपी विवेक की शरण में जाता है, तो उसके जीवन के समस्त कलंक धुल जाते हैं और उसकी चेतना भालचंद्र के मस्तक की भांति शांत, शीतल और प्रकाशमान हो जाती है।


FAQ

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी किस तिथि को मनाई जाती है?
यह पर्व प्रतिवर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है; इसका मुख्य पूजन रात्रि में चंद्रोदय के समय संपन्न होता है।

भगवान गणेश को 'भालचंद्र' क्यों कहा जाता है?
शाप से क्षीण हुए चंद्रमा द्वारा पश्चाताप पूर्वक तपस्या करने पर भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को अपने 'भाल' (मस्तक) पर धारण कर लिया था, इसलिए उन्हें भालचंद्र कहा जाता है।

संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देना क्यों अनिवार्य है?
भगवान गणेश ने चंद्रमा को वरदान दिया था कि संकष्टी चतुर्थी पर जब तक साधक चंद्रमा को अर्घ्य नहीं देगा तब तक उसका व्रत पूर्ण नहीं माना जाएगा; चंद्र अर्घ्य से मानसिक शांति और कलंक-मुक्ति मिलती है।

गणेश जी को 21 दूर्वा ही क्यों चढ़ाई जाती हैं?
21 दूर्वा मनुष्य के 21 आंतरिक तत्त्वों (5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां, 5 प्राण, 5 महाभूत और 1 मन) का प्रतीक हैं; अनलासुर के संहार के पश्चात दूर्वा ने ही गणेश जी के उदर की जलन शांत की थी।

अष्टविनायक में भालचंद्र का संबंध किस मंदिर से माना गया है?
अष्टविनायक परंपरा में भालचंद्र स्वरूप का संबंध पुणे के जुन्नर स्थित 'लेण्याद्री के श्री गिरजात्मज' गणपति से माना गया है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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