चैत्र अमावस्या: संवत की प्रथम अमावस्या, पितृ तर्पण और कालसर्प दोष का अचूक निवारण

By पं. संजीव शर्मा

संवत की प्रथम अमावस्या, पितृ तर्पण और कालसर्प दोष का अचूक निवारण

चैत्र अमावस्या: पितृ तर्पण विधि, कालसर्प दोष उपाय और मुहूर्त

पंचांग विवरण एवं चैत्र अमावस्या का खगोलीय संधिकाल

सनातन वैदिक कालगणना में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को 'चैत्र अमावस्या' अथवा लोक परंपरा में 'भूतड़ी अमावस्या' व 'दर्श अमावस्या' कहा जाता है। यह संवत्सर चक्र की अत्यंत संवेदनशील, गूढ़ और आध्यात्मिक दृष्टि से निर्णायक तिथि है। हिन्दू चांद्र पंचांग के अनुसार यह संपूर्ण चांद्र वर्ष की अंतिम तिथि (अमावस्या) होती है, जिसके उपरांत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत्सर (नया हिन्दू वर्ष) और वासंती नवरात्रि का पावन शुभारंभ होता है। इस प्रकार यह तिथि पुराने वर्ष के समस्त मानसिक, शारीरिक, दैहिक और पितृ-ऋणों को विसर्जित करने का अंतिम खगोलीय द्वार है।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चैत्र अमावस्या के दिन भुवन भास्कर सूर्य देव और मन के कारक चंद्रमा दोनों एक साथ, एक ही अंश के समीप, गुरु की जल-तत्त्वीय राशि 'मीन' (Pisces) में संचरण करते हैं। मीन राशि कालपुरुष चक्र की बारहवीं और अंतिम राशि है, जो मोक्ष, व्यय, अंत और विसर्जन का प्रतीक है। सूर्य (अग्नि-तत्त्व व आत्मा) और चंद्रमा (जल-तत्त्व व मन) की यह युति अंतरिक्ष में एक शून्य-ऊर्जा क्षेत्र (Gravitational Null Point) निर्मित करती है। इस दिन चंद्र मंडल से पृथ्वी पर आने वाली किरणें न्यूनतम हो जाती हैं, जिससे सूक्ष्म लोकों (विशेषकर पितृलोक और प्रेतलोक) के द्वार उन्मुक्त होते हैं। यही कारण है कि इस तिथि को पितरों के तर्पण, श्राद्ध और कालसर्प दोष शांति के लिए वर्ष की सबसे प्रभावी अमावस्या माना गया है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, कृष्ण पक्ष
तिथि अमावस्या तिथि (तीसवीं तिथि, संवत की अंतिम अमावस्या)
पर्व का शास्त्रीय नाम चैत्र दर्श अमावस्या, पितृ अमावस्या, भूतड़ी अमावस्या
खगोलीय ग्रह युति मीन राशि में सूर्य एवं चंद्रमा की पूर्ण युति (अमावस्या योग)
नक्षत्र गोचर उत्तराभाद्रपदा अथवा रेवती नक्षत्र (बुध/शनि प्रभाव)
मुख्य अधिष्ठाता देव पितृेश्वर अर्यमा, भगवान यमराज, देवाधिदेव महादेव शिव
प्रमुख तात्विक स्वरूप जल तत्त्व एवं आकाश तत्त्व का शोधन, तमो-विसर्जन
मुख्य पावन नदियां मोक्षदायिनी गंगा, नर्मदा, क्षिप्रा (उज्जैन), गोदावरी
अभीष्ट आध्यात्मिक फल पितृ दोष मुक्ति, कालसर्प दोष शांति, प्रेत बाधा निवारण, कुल वृद्धि

चैत्र अमावस्या के इस पावन संधिकाल पर पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने, कुल के संचित दोषों को शांत करने और आगामी नव संवत्सर में मंगलमय प्रवेश हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व शैया त्यागकर दोनों हथेलियों का दर्शन करना और भूमि-स्पर्श कर पितरों का मानसिक स्मरण करना।
  • किसी पवित्र तीर्थ (गंगा, नर्मदा, क्षिप्रा आदि) में जाकर स्नान करना; यदि तीर्थ गमन संभव न हो, तो सामान्य जल में गंगाजल, काले तिल और कुश डालकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर (अपसव्य होकर) पितरों के निमित्त तीन बार जलांजलि समर्पित करना।
  • गृह मंदिर अथवा देवालय में भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक कर महामृत्युंजय मंत्र अथवा रुद्राष्टकम का पाठ करना।
  • दिनभर पूर्ण सात्विक दिनचर्या का पालन करना; तामसिक भोजन, प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बाल व नाखून काटने और मैथुन से सर्वथा दूर रहना।
  • दोपहर के समय (कुतुप और रोहिणी मुहूर्त में) पितरों के निमित्त पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी को भोजन) अर्पित करना।
  • सायंकाल के समय पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध सरसों के तेल अथवा तिल के तेल का चौमुखी दीपक प्रज्वलित कर सात बार परिक्रमा करना।
  • नदी या जलाशय के तट पर जाकर पितरों की तृप्ति और अपनी आत्म-शांति हेतु दीपदान संपन्न करना।

संवत की अंतिम अमावस्या और पितृ तृप्ति का आध्यात्मिक विज्ञान

सनातन धर्म में किसी भी नवीन कार्य, नवीन संवत्सर अथवा मांगलिक अनुष्ठान का आरंभ करने से पूर्व पितरों को तृप्त करना अनिवार्य माना गया है। तैत्तिरीय संहिता और गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति अपने पूर्वजों (पितरों) को संतुष्ट किए बिना देवताओं की पूजा करता है, उसकी पूजा निष्फल हो जाती है, क्योंकि देवता तभी प्रसन्न होते हैं जब कुल के पितृ तृप्त और शांत हों।

चैत्र अमावस्या संवत्सर के समापन की अंतिम वेला है। वैदिक मान्यता के अनुसार इस दिन हमारे पितृ अपने लोक (पितृलोक) से उतरकर अपने-अपने वंशजों के द्वार पर इस आशा से आते हैं कि उनका कुल उन्हें जल, तिल और अन्न का भाग देकर विदा करेगा।

पितृ तृप्ति के तीन आधारभूत स्तंभ

  1. काले तिल (तिल तत्त्व): भगवान विष्णु के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न हुए तिल तामसिक ऊर्जा को नष्ट करने और सूक्ष्म शरीरों को तृप्त करने की अद्वितीय क्षमता रखते हैं। तिल के बिना दिया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुंचता।
  2. कुश (दर्भा): कुश की उत्पत्ति भगवान विष्णु के वराह अवतार के रोमों से हुई मानी जाती है। कुश विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा का प्राकृतिक सुचालक और पवित्र फिल्टर है, जो तर्पण के समय नकारात्मक प्रेत तरंगों को रोककर केवल सात्विक पितृ शक्तियों को आकर्षित करता है।
  3. दक्षिण दिशा (यम का मार्ग): खगोलीय रूप से दक्षिण दिशा अधोलोक और पितृलोक की दिशा है। जब साधक दक्षिण की ओर मुख करके अर्घ्य देता है, तो वह सीधे पितरों के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ जाता है।
पितृ श्रेणी निवास व स्वरूप तर्पण का अभीष्ट फल
पिता, पितामह, प्रपितामह पितृलोक के प्रत्यक्ष पूर्वज (अग्निष्वात्त) वंश वृद्धि, कुल की रक्षा, पारिवारिक सौहार्द
माता, मातामह, प्रमातामह मातृकुल के पूर्वज (बर्हिषद) मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन, आरोग्यता
अज्ञात व अकाल मृत आत्माएं वायुमंडल में विचरण करने वाली सूक्ष्म आत्माएं अकाल मृत्यु भय निवारण, आकस्मिक बाधा शांति

कालसर्प दोष एवं राहु-केतु पीड़ा का अचूक निवारण

वैदिक ज्योतिष में 'कालसर्प दोष' एक अत्यंत जटिल और पीड़ादायक योग माना जाता है। जब जन्मकुंडली में समस्त सातों ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) छाया ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक तरफ आ जाते हैं तब पूर्ण कालसर्प दोष का निर्माण होता है।

चैत्र अमावस्या कालसर्प दोष की शांति के लिए वर्ष का सबसे शक्तिशाली दिन क्यों है?

  • मीन राशि का प्रभाव: मीन राशि कालसर्प की पूंछ (केतु) और जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है।
  • सूर्य-चंद्र की शून्यता: अमावस्या के दिन जब सूर्य और चंद्र दोनों राहु-केतु के अक्ष पर होते हैं, तो नाग शक्तियों की ऊर्जा धरातल पर अत्यधिक जाग्रत होती है।

कालसर्प दोष निवारण के अचूक शास्त्रीय उपाय

  1. उज्जैन अथवा नासिक में त्रिपिंडी श्राद्ध व रुद्राभिषेक: चैत्र अमावस्या के दिन क्षिप्रा नदी (उज्जैन) के रामघाट अथवा गोदावरी (त्र्यंबकेश्वर) के तट पर चांदी के नाग-नागिन के जोड़े का पूजन कर रुद्राभिषेक कराना कालसर्प दोष को जड़ से समाप्त करता है।
  2. चांदी के नाग-नागिन का जल प्रवाह: एक जोड़े तांबे अथवा चांदी के नाग-नागिन का षोडशोपचार पूजन करें। उन पर कच्चा दूध, काले तिल और बिल्वपत्र अर्पित करें। इसके पश्चात ॐ नागदेवताय नमः अथवा 'ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्' मंत्र का 108 बार जप कर उन्हें बहते हुए पवित्र जल में प्रवाहित कर दें।
  3. सूखे नारियल का तांत्रिक उपाय: एक सूखा जटा वाला नारियल लें। उसमें चाकू से छोटा सा छेद करें। उसमें काले तिल, जौ, शक्कर और थोड़ा सा सरसों का तेल भरें। अपने सिर से सात बार घड़ी की सुई की दिशा में उसार कर उसे किसी पुराने पीपल के वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर दबा दें अथवा जल में प्रवाहित करें। इससे राहु का अनिष्टकारी प्रभाव शांत होता है।

नदी स्नान, तर्पण और श्राद्ध की शास्त्रीय विधि

चैत्र अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करने का केवल धार्मिक ही नहीं, अपितु गहरा जैव-ऊर्जात्मक (Bio-energetic) लाभ है। अमावस्या के दिन जल स्रोतों में चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण जल के अणुओं का आयनीकरण (Ionization) बदल जाता है, जिससे स्नान करने से शरीर के संचित विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।

चरणबद्ध तर्पण विधि

  1. प्रातः कालीन शुद्धि: नदी अथवा घर में स्नान के उपरांत स्वच्छ सफेद सूती वस्त्र पहनें। कुश की पवित्री (अंगूठी) अनामिका उंगली में धारण करें।
  2. ताम्र पात्र संयोजन: तांबे के एक बड़े चौड़े पात्र में शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, काले तिल, जौ, सफेद पुष्प और कुश का अग्रभाग रखें।
  3. देव व ऋषि तर्पण: पूर्वाभिमुख होकर जनेऊ को बाएं कंधे पर रखकर (सव्य होकर) ब्रह्मा, विष्णु, शिव और ऋषियों के निमित्त जल की एक-एक अंजलि समर्पित करें।
  4. दिव्य पितृ तर्पण: उत्तराभिमुख होकर जनेऊ को कंठी की भांति गले में डालकर (निवीती होकर) दिव्य पितरों को दो-दो अंजलि जल दें।
  5. स्व-पितृ तर्पण: दक्षिणाभिमुख होकर, दोनों घुटनों को मोड़कर भूमि पर बैठकर (अपसव्य होकर, जनेऊ दाएं कंधे पर) अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों का नाम, गोत्र उच्चारित करते हुए अंगूठे के माध्यम से जल की तीन-तीन अंजलि अर्पित करें:

    ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अमुक गोत्रः अस्मत्पिता (पिता का नाम) शर्मा/वर्मा तृप्यन्तामिदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः।

  6. पंचबलि कर्म: भोजन तैयार होने के पश्चात पांच पत्तों पर भोजन का अंश निकालें:
    • गो-बलि: गाय के लिए (गौमाता को प्रणाम कर खिलाएं)।
    • श्वान-बलि: कुत्ते के लिए (भैरव रूप मानकर दें)।
    • काक-बलि: कौए के लिए (यम का दूत मानकर छत पर रखें)।
    • देवादि-बलि: देवताओं और अग्नि के लिए (अग्नि में आहुति दें)।
    • पिपीलिकादि-बलि: चींटियों के लिए (वृक्ष की जड़ में शक्कर मिश्रित आटा डालें)।

पीपल पूजा, दीपदान और 'भूतड़ी अमावस्या' का तंत्र विज्ञान

लोक परंपरा में चैत्र अमावस्या को 'भूतड़ी अमावस्या' कहा जाता है। इसका तात्विक अर्थ यह है कि इस दिन भूत (अर्थात जो बीत चुका है, अतीत की आत्माएं, अतृप्त प्रेत और नकारात्मक ऊर्जाएं) अत्यंत सक्रिय होती हैं। यदि किसी व्यक्ति पर कोई मानसिक अवसाद, अज्ञात भय अथवा नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव हो, तो इस दिन किए गए अनुष्ठान उसे पूरी तरह बंधन-मुक्त कर देते हैं।

पूजन घटक प्रयुक्त सामग्री अनुष्ठान विधि आध्यात्मिक व भौतिक प्रभाव
पीपल वृक्ष पूजन कच्चा दूध, जल, तिल, रोली पीपल की जड़ में जलार्पण व 7 परिक्रमा तैंतीस कोटि देव व पितृ कृपा, सुख-शांति
चौमुखी दीपदान सरसों का तेल, मिट्टी का दीया पीपल की जड़ में सायंकाल प्रज्वलन शनि व यम पीड़ा मुक्ति, अकाल मृत्यु निवारण
नदी दीपदान आटे का दीपक, गोघृत दोने में रखकर नदी में प्रवाहित करना कुल के पितरों को परलोक में प्रकाश व तृप्ति
छाया दान कांसे की कटोरी, सरसों तेल अपना मुख देखकर तेल का दान करना असाध्य रोगों और दुर्घटनाओं से पूर्ण रक्षा

पीपल वृक्ष का विज्ञान

अथर्ववेद और श्रीमद्भगवद्गीता (अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्) में पीपल को साक्षात भगवान का स्वरूप कहा गया है। अमावस्या के दिन दोपहर 12 बजे तक पीपल के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं और पितरों का साक्षात वास होता है। इस दिन पीपल की जड़ में कच्चा दूध मिश्रित जल अर्पित करने और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने से जन्मकुंडली का पितृ दोष तत्काल शांत हो जाता है।


चैत्र अमावस्या का दार्शनिक संदेश: विसर्जन से ही नव-सृजन

चैत्र अमावस्या हमें सनातन जीवन दर्शन का यह सर्वोच्च पाठ पढ़ाती है कि जब तक पुराना विसर्जित नहीं होगा तब तक नए का प्राकट्य संभव नहीं है।

यह अमावस्या हमें यह स्मरण कराती है कि हमारे वर्तमान जीवन का जो सुंदर महल खड़ा है, उसकी नींव हमारे पूर्वजों (पितरों) के त्याग, परिश्रम और संस्कारों पर टिकी है। जो मनुष्य अपनी जड़ों को भूल जाता है, वह उस वृक्ष की भांति सूख जाता है जिसकी जड़ें काट दी गई हों। पितृ तर्पण केवल मृत पूर्वजों की पूजा नहीं है, अपितु यह अपनी वंश परंपरा, अपने संस्कारों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की असीम अभिव्यक्ति है।

अमावस्या का घोर अंधकार हमें यह विश्वास दिलाता है कि अंधकार कितना भी सघन क्यों न हो, वह केवल एक रात्रि का मेहमान है। इस अमावस्या के विसर्जन के साथ ही पुराने संवत के समस्त दुख, दारिद्र्य और व्याधियां समाप्त हो जाती हैं और अगली ही सुबह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का स्वर्णिम सूर्य उदित होकर संपूर्ण सृष्टि को नव-जीवन और वासंती नवरात्रि के पावन प्रकाश से आलोकित कर देता है।


FAQ

चैत्र अमावस्या को 'भूतड़ी अमावस्या' क्यों कहा जाता है?
इस दिन शीत-ग्रीष्म संधिकाल और चंद्र शून्यता के कारण सूक्ष्म अतृप्त आत्माएं व नकारात्मक ऊर्जाएं सक्रिय होती हैं; इनके शमन और प्रेत बाधा निवारण हेतु इसे लोकभाषा में भूतड़ी अमावस्या कहा जाता है।

चैत्र अमावस्या के दिन पितृ तर्पण का सर्वोत्तम समय कौन सा है?
पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए दिन का 'कुतुप मुहूर्त' (पूर्वाह्न 11:36 से 12:24) और 'रोहिणी मुहूर्त' (दोपहर 12:24 से 01:15) सर्वोत्तम माना गया है।

क्या चैत्र अमावस्या के दिन कालसर्प दोष की पूजा कराई जा सकती है?
हाँ, चैत्र अमावस्या संवत की अंतिम अमावस्या और मीनस्थ सूर्य-चंद्र की युति होने के कारण कालसर्प दोष, राहु-केतु शांति और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है।

अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा किस समय करनी चाहिए?
पीपल की पूजा प्रातः काल सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे तक करना श्रेयस्कर है; सायंकाल केवल सरसों के तेल का चौमुखी दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।

पितृ तर्पण में काले तिल और कुश का उपयोग क्यों अनिवार्य है?
काले तिल भगवान विष्णु के स्वेद से उत्पन्न हैं जो पितरों को सीधे तृप्त करते हैं और कुश पवित्र ऊर्जा का संवाहक है जो तर्पण के दौरान नकारात्मक तरंगों को रोकता है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ