By पं. नीलेश शर्मा
चैत्र मास के दोनों पक्षों का 30-दिवसीय पंचांग, 10 महापर्व, नक्षत्र गोचर और अंग्रेजी तारीखें

सनातन वैदिक कालगणना, वेदांग ज्योतिष और सूर्य सिद्धांत के अनुसार चैत्र मास संपूर्ण संवत्सर (वर्ष चक्र) का सर्वप्रथम और सर्वाधिक तेजस्वी मास है। यह मास वसंत ऋतु के परिपक्व सौंदर्य और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का वह खगोलीय संधि-स्थल है जहाँ शीतकाल की सुप्तावस्था समाप्त होकर संपूर्ण प्रकृति नवजीवन, नव-पल्लव और नव-ऊर्जा से स्पंदित हो उठती है। हिन्दू पंचांग का यह प्रथम मास लूनी-सोलर (चांद्र-सौर) प्रणाली का अद्भुत समन्वय है, जिसमें चांद्र गणना के अनुसार कृष्ण पक्ष से संवत का समापन और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवीन 'नव संवत्सर' (Hindu New Year) का भव्य प्रादुर्भाव होता है।
खगोलीय दृष्टिकोण से इस मास का नामकरण चंद्रमा के 27 नक्षत्रों में से 14वें नक्षत्र 'चित्रा' के आधार पर हुआ है। चैत्र पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रमा अपनी पूर्ण सोलह कलाओं के साथ कन्या और तुला राशि की संधि पर स्थित चित्रा नक्षत्र (Spica) के समीप संचरण करता है। इस मास के दौरान भुवन भास्कर सूर्य देव गुरु की जल-तत्त्वीय राशि मीन की अंतिम सीमा को पार कर मंगल की चर-अग्नि राशि मेष (Aries) में प्रविष्ट होते हैं, जहाँ वे 10° पर अपने परम उच्च (Deeply Exalted) रूप को प्राप्त करते हैं। इस संक्रमण के साथ ही खरमास समाप्त होता है और 16 संस्कारों के शुभ द्वार पुनः खुल जाते हैं।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पंचांगीय विवरण |
|---|---|
| मास क्रम व अधिष्ठाता | प्रथम मास (संवत्सर का मुख) | भगवान विष्णु एवं सूर्य नारायण |
| पक्ष विभाजन | कृष्ण पक्ष (प्रथम 15 दिन) एवं शुक्ल पक्ष (अंतिम 15 दिन) |
| खगोलीय सौर संक्रमण | मीन राशि से मेष राशि में सूर्य का प्रवेश (मेष संक्रांति / सौर नववर्ष) |
| नक्षत्र आधार | चित्रा नक्षत्र (कन्या 23°20' से तुला 06°40', स्वामी: मंगल) |
| मुख्य चांद्र पर्व | शीतला अष्टमी, पापमोचिनी एकादशी, नव संवत्सर, राम नवमी, हनुमान जयंती |
| मुख्य सौर पर्व | मेष संक्रांति, सतुआनी, बैसाखी, विषु, पुथंडु, पोइला बैशाख |
| आहार आचार संहिता | 'चैत्रे गुड़ं त्यजेत्' (गुड़ का त्याग, सत्तू, मटका जल व नीम-प्राशन) |
| तात्विक संतुलन | जल तत्त्व (मीन/चंद्रमा) से अग्नि तत्त्व (मेष/सूर्य) की ओर महा-संक्रमण |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | संपूर्ण वर्ष हेतु नव-ऊर्जा, कर्म-शुद्धि, पितृ-तृप्ति, आत्म-जागरण |
चैत्र मास का कृष्ण पक्ष बीते हुए वर्ष का अंतिम पखवाड़ा होता है। यह 15 दिनों की अवधि बाह्य प्रदर्शन के स्थान पर अंतर्मुखी होने, अपने संचित पापों का प्रायश्चित करने, पितरों के निमित्त तर्पण करने और शीतला अष्टमी व पापमोचिनी एकादशी के माध्यम से शरीर व मन को विष-मुक्त (Detoxify) करने की पावन वेला है।
| चांद्र तिथि | अंग्रेजी दिनांक (मानक संदर्भ) | प्रमुख नक्षत्र | शास्त्रीय योग | प्रमुख पर्व, व्रत एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान |
|---|---|---|---|---|
| प्रतिपदा | 16 मार्च | हस्त | वृद्धि | चैत्र कृष्ण पक्षारंभ, वसंतोत्सव (धुलेंडी), अबीर-गुलाल उत्सव |
| द्वितीया | 17 मार्च | चित्रा | ध्रुव | भ्रातृ द्वितीया (भाई दूज - होली के बाद), यमुना स्नान |
| तृतीया | 18 मार्च | स्वाति | व्याघात | गणगौर व्रत का आरंभ (16 दिवसीय अखंड सौभाग्य व्रत की शुरुआत) |
| चतुर्थी | 19 मार्च | विशाखा | हर्षण | भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी (संकट नाशन व्रत, चंद्रोदय पूजन) |
| पंचमी | 20 मार्च | अनुराधा | वज्र | रंग पंचमी (देवताओं की होली, मालवा व महाराष्ट्र में महा-पर्व) |
| षष्ठी | 21 मार्च | ज्येष्ठा | सिद्धि | स्कंद षष्ठी (कार्तिकेय पूजन), चर्म-विकार मुक्ति विधान |
| सप्तमी | 22 मार्च | मूल | व्यतीपात | शीतला सप्तमी, बासोड़ा भोजन की तैयारी, शीतला माता वंदन |
| अष्टमी | 23 मार्च | पूर्वाषाढ़ा | वरीयान | शीतला अष्टमी (बसौड़ा), बासी शीतल अन्न भोग, चेचक-रक्षा |
| नवमी | 24 मार्च | उत्तराषाढ़ा | परिघ | नवमी श्राद्ध, भगवती चंडिका व शीतला निमित्त शांति पाठ |
| दशमी | 25 मार्च | श्रवण | शिव | दशमी व्रत, दिगंबर जैन धर्म के तप कल्याणक दिवस |
| एकादशी | 26 मार्च | धनिष्ठा | सिद्ध | पापमोचिनी एकादशी (कोटि-कोटि पापों का प्रायश्चित व मोक्ष) |
| द्वादशी | 27 मार्च | शतभिषा | साध्य | एकादशी व्रत पारण, वामन पूजन, तुलसी-शालिग्राम अर्चन |
| त्रयोदशी | 28 मार्च | पूर्वाभाद्रपदा | शुभ | भौम/सोम प्रदोष व्रत (शिव आराधना, असाध्य कर्जों से मुक्ति) |
| चतुर्दशी | 29 मार्च | उत्तराभाद्रपदा | शुक्ल | शिव चतुर्दशी, पितृ शांति जप, प्रेत बाधा व अकाल मृत्यु निवारण |
| अमावस्या | 30 मार्च | रेवती | ब्रह्म | चैत्र दर्श अमावस्या, पितृ तर्पण, महास्नान, कबाड़-विसर्जन |
चैत्र शुक्ल पक्ष सनातन संस्कृति का सबसे तेजस्वी और मांगलिक पखवाड़ा है। प्रतिपदा के दिन ब्रह्म मुहूर्त से ही नव संवत्सर (गुड़ी पड़वा/उगादि) का शंखनाद होता है, घटस्थापना के साथ वासंती नवरात्रि का 9 दिवसीय अनुष्ठान प्रारंभ होता है और नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का अवतरण होता है। इसी पक्ष में सूर्य का मेष राशि में ऐतिहासिक प्रवेश होता है, जिससे सौर नववर्ष प्रारंभ होता है।
| चांद्र तिथि | अंग्रेजी दिनांक (मानक संदर्भ) | प्रमुख नक्षत्र | शास्त्रीय योग | प्रमुख पर्व, व्रत एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक अनुष्ठान |
|---|---|---|---|---|
| प्रतिपदा | 31 मार्च | अश्विनी | ऐन्द्र | नव संवत्सर आरंभ, गुड़ी पड़वा, उगादि, चैत्र नवरात्रि घटस्थापना, नीम-गुड़ प्राशन |
| द्वितीया | 01 अप्रैल | भरणी | वैधृति | माँ ब्रह्मचारिणी पूजा, सिंधारा दूज, झूलेलाल जयंती (चेटीचंड) |
| तृतीया | 02 अप्रैल | कृत्तिका | विष्कुम्भ | माँ चंद्रघंटा पूजा, गणगौर तृतीया (गौरी तृतीया), मत्स्य जयंती |
| चतुर्थी | 03 अप्रैल | रोहिणी | प्रीति | माँ कूष्मांडा पूजा, चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी (मध्याह्न वरद विनायक अर्चन) |
| पंचमी | 04 अप्रैल | मृगशिरा | आयुष्मान | माँ स्कंदमाता पूजा, लक्ष्मी पंचमी (श्री पंचमी), नाग पूजन |
| षष्ठी | 05 अप्रैल | आर्द्रा | सौभाग्य | माँ कात्यायनी पूजा, यमुना छठ (यमुना जयंती), स्कंद षष्ठी |
| सप्तमी | 06 अप्रैल | पुनर्वसु | शोभन | माँ कालरात्रि पूजा, महासप्तमी, नवपत्रिका प्रवेश, सरस्वती आवाहन |
| अष्टमी | 07 अप्रैल | पुष्य | अतिगण्ड | दुर्गा महाष्टमी (अन्नपूर्णा परिक्रमा), महागौरी पूजा, कन्या पूजन, संधि पूजा |
| नवमी | 08 अप्रैल | आश्लेषा | सुकर्मा | श्री राम नवमी (प्रभु राम जन्मोत्सव), माँ सिद्धिदात्री, माँ तारा जयंती (संधिकाल) |
| दशमी | 09 अप्रैल | मघा | धृति | नवरात्रि व्रत पारण, अपराजिता पूजन, धर्मराज दशमी, ध्वज विसर्जन |
| एकादशी | 10 अप्रैल | पूर्वाफाल्गुनी | शूल | कामदा एकादशी (समस्त सात्विक कामनाओं की पूर्ति, ब्रह्महत्या दोष मुक्ति) |
| द्वादशी | 11 अप्रैल | उत्तराफाल्गुनी | गण्ड | वामन द्वादशी, कामदा एकादशी पारण, तुलसी-विष्णु पूजन |
| त्रयोदशी | 12 अप्रैल | हस्त | वृद्धि | महावीर जयंती (24वें तीर्थंकर जन्म कल्याणक), अनंग त्रयोदशी, प्रदोष |
| चतुर्दशी | 13 अप्रैल | चित्रा | ध्रुव | नृसिंह चौदस पूर्वपीठिका, वैकुंठ चतुर्दशी भाव, मेष संक्रांति संधिकाल |
| पूर्णिमा | 14 अप्रैल | चित्रा | व्याघात | चैत्र पूर्णिमा, हनुमान जयंती, मेष संक्रांति (सतुआनी/बैसाखी/विषु), महास्नान |
चैत्र का यह संपूर्ण 30-दिवसीय कैलेंडर उन दिव्य संधियों से भरा हुआ है जो सनातन धर्म के विविध संप्रदायों (वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, गाणपत्य और जैन) को एक सूत्र में पिरोते हैं:
चैत्र मास का यह 30 दिनों का पंचांग कैलेंडर केवल तिथियों, वारों और नक्षत्रों की तालिका नहीं है; यह ब्रह्मांडीय चेतना के साथ मानवीय जीवन के तालमेल का आध्यात्मिक नक्शा (Spiritual Blueprint) है।
कृष्ण पक्ष हमें सिखाता है कि कैसे अपने अतीत के बोझ, दुर्गुणों और अहंकार को विसर्जित किया जाए; और शुक्ल पक्ष हमें यह प्रेरणा देता है कि कैसे ईश्वरीय तेज, ज्ञान और मर्यादा को धारण कर नवजीवन का आरंभ किया जाए। जब मनुष्य प्रकृति के इस 30-दिवसीय लयबद्ध चक्र के साथ अपने आहार, विचार और आचार को जोड़ लेता है, तो उसका संपूर्ण आगामी वर्ष शारीरिक आरोग्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक समृद्धि से परिपूर्ण हो जाता है।
चैत्र मास का नाम किस नक्षत्र के आधार पर रखा गया है?
चैत्र मास का नामकरण 14वें नक्षत्र 'चित्रा' (Spica) के आधार पर हुआ है, क्योंकि चैत्र पूर्णिमा के दिन चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में पूर्णता प्राप्त करता है।
हिन्दू नववर्ष चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से क्यों नहीं बल्कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है?
सनातन परंपरा में 'अंधकार से प्रकाश की ओर' जाने का नियम है; कृष्ण पक्ष क्षय और संकोच का प्रतीक है, जबकि शुक्ल पक्ष वृद्धि और नव-सृजन का प्रतीक है। ब्रह्मा जी ने शुक्ल प्रतिपदा के सूर्योदय पर ही सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।
चैत्र मास में कौन-से दो सबसे बड़े एकादशी व्रत आते हैं?
कृष्ण पक्ष में पापमोचिनी एकादशी (पापों का नाश करने वाली) और शुक्ल पक्ष में कामदा एकादशी (समस्त सात्विक कामनाओं को सिद्ध करने वाली) आती हैं।
मेष संक्रांति चैत्र के किस भाग में पड़ती है?
मेष संक्रांति प्रायः चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के अंतिम दिनों (त्रयोदशी, चतुर्दशी अथवा पूर्णिमा) में अंग्रेजी कैलेंडर के 13 या 14 अप्रैल को घटित होती है।
चैत्र पूर्णिमा के दिन किस महान देवता का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है?
चैत्र पूर्णिमा के पावन दिन भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार महाबली हनुमान जी का जन्मोत्सव (हनुमान जयंती) संपूर्ण भारत में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
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