चैत्र मास में सूर्य और चंद्र ग्रहण का ज्योतिषीय प्रभाव: संवत्सर आरंभ पर ग्रहण के परिणाम

By पं. अभिषेक शर्मा

संवत्सर आरंभ पर ग्रहण, सूतक काल का विज्ञान, 12 राशियों पर प्रभाव और मंत्र-सिद्धि

चैत्र मास ग्रहण प्रभाव: सूर्य-चंद्र ग्रहण, सूतक, 12 राशियां और उपाय

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं चैत्र ग्रहणों की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक ज्योतिष, वाराहमिहिर कृत 'बृहत्संहिता', नारद संहिता और खगोलीय संहिताओं में नव संवत्सर के प्रथम मास-चैत्र मास-में घटित होने वाले सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण को संपूर्ण भू-मंडल, राष्ट्रों के शासन तंत्र, मौसम चक्र और जन-मानस के लिए सर्वाधिक संवेदनशील, युगांतकारी और सूक्ष्म प्रभाव डालने वाला खगोलीय घटनाक्रम माना गया है। हिन्दू काल-गणना के अनुसार चैत्र का महीना केवल एक साधारण मास नहीं, अपितु संपूर्ण वर्ष (संवत्सर) का उद्गम स्थल है। इस आरंभिक मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा पर जब राहु और केतु की छाया सूर्य अथवा चंद्रमा को आच्छादित करती है, तो उसका प्रभाव केवल कुछ घंटों तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह आगामी छह से बारह महीनों की वैश्विक और सामाजिक दिशा को गहराई से प्रभावित करता है।

खगोलीय दृष्टि से जब चैत्र अमावस्या (दर्श अमावस्या) पर सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में आते हैं और चंद्रमा सूर्य के बिंब को ढक लेता है तब सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) घटित होता है। यह ग्रहण प्रायः गुरु की मीन राशि अथवा मंगल की मेष राशि और रेवती, अश्विनी या भरणी नक्षत्रों में लगता है। इसके विपरीत, जब चैत्र पूर्णिमा पर पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के मध्य आ जाती है और पृथ्वी की प्रच्छाया चंद्रमा पर पड़ती है तब चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) घटित होता है, जो कन्या या तुला राशि और चित्रा अथवा स्वाति नक्षत्र में आकार लेता है। चैत्र संवत्सर के आरंभ में ग्रहण का लगना संपूर्ण वर्ष के 'मंत्रिमंडल' और 'राजा-मंत्री' के फलादेश में आकस्मिक उथल-पुथल, प्राकृतिक आपदाओं, सत्ता-परिवर्तन और आर्थिक उतार-चढ़ाव का खगोलीय पूर्व-संकेत माना जाता है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व खगोलीय विवरण
संभावित तिथियां चैत्र अमावस्या (सूर्य ग्रहण) एवं चैत्र पूर्णिमा (चंद्र ग्रहण)
खगोलीय छाया ग्रह राहु (उत्तरी चंद्र नोड) अथवा केतु (दक्षिणी चंद्र नोड)
संभावित राशियां सूर्य ग्रहण: मीन अथवा मेष राशि | चंद्र ग्रहण: कन्या अथवा तुला राशि
संवेदनशील नक्षत्र रेवती, अश्विनी, भरणी (सूर्य ग्रहण) | चित्रा, हस्त, स्वाति (चंद्र ग्रहण)
सूतक काल का मान सूर्य ग्रहण: 4 प्रहर (12 घंटे पूर्व) | चंद्र ग्रहण: 3 प्रहर (9 घंटे पूर्व)
मुख्य वेध व स्पर्श काल स्पर्श (प्रारंभ), मध्य (चरम), मोक्ष (शुद्धि/समाप्ति)
प्रमुख प्रभावित क्षेत्र सत्ता-प्रतिष्ठान, विश्व अर्थव्यवस्था, मानसूनी वर्षा, जन-स्वास्थ्य
मुख्य अधिष्ठाता सत्ता भुवन भास्कर सूर्य, चंद्र देव, महामृत्युंजय शिव, जगतजननी दुर्गा
अभीष्ट आध्यात्मिक साधना मंत्र-सिद्धि, आत्म-शुद्धि, ग्रह-दोष निवारण, महा-दान

चैत्र मास में ग्रहण के वेध और सूतक काल के दौरान पर्यावरण में व्याप्त होने वाली दूषित विद्युत-चुंबकीय और सूक्ष्म परा-किरणों के दुष्प्रभावों से बचने हेतु साधक को शास्त्रोक्त नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • सूतक काल प्रारंभ होते ही भोजन पकाने, अन्न ग्रहण करने, शयन करने और जल-पान से यथासंभव बचना; केवल वृद्ध, बालक, रोगी और गर्भवती महिलाओं को आवश्यकतानुसार छूट होना।
  • सूतक काल से पूर्व ही घर में रखे समस्त जल-पात्रों, दूध, घी, तेल, पके हुए भोजन और अचार में कुशा (दर्भ घास) अथवा ताजे तुलसी पत्र डालना।
  • ग्रहण स्पर्श के समय सवस्त्र शीतल जल अथवा गंगाजल मिले जल से स्नान करना और पूजा स्थल पर देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्पर्श न करना (पट बंद रखना)।
  • ग्रहण काल के दौरान केवल अपने गुरु मंत्र, गायत्री महामंत्र, महामृत्युंजय मंत्र अथवा अपने इष्टदेव के नाम का शांत चित्त से एकाग्र मानसिक जप करना।
  • गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के समय घर के भीतर ही रहना; किसी भी प्रकार की नुकीली वस्तु (कैंची, चाकू, सुई) का प्रयोग न करना और शरीर पर गेरू (लाल मिट्टी) का लेप लगाना।
  • ग्रहण मोक्ष (समाप्ति) होते ही सर्वप्रथम संपूर्ण घर में गंगाजल का छिड़काव करना और पुनः शुद्ध जल से स्नान कर वस्त्र बदलना।
  • स्नान के पश्चात अपने सामर्थ्यानुसार गेहूं, चावल, गुड़, तांबा, तिल, सफेद वस्त्र और दक्षिणा का संकल्प लेकर जरूरतमंदों को दान करना।
  • ग्रहण शुद्धि के पश्चात ही घर में ताजा भोजन बनाकर सर्वप्रथम भगवान को भोग लगाना और तदुपरांत स्वयं ग्रहण करना।

बृहत्संहिता के अनुसार चैत्र ग्रहण का मेदिनी फल: राजा, राष्ट्र और वर्षा पर प्रभाव

आचार्य वाराहमिहिर ने अपने अमर ग्रंथ 'बृहत्संहिता' के 'राहुचार' अध्याय में चैत्र मास में पड़ने वाले ग्रहणों के मेदिनी (Mundane) प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म और सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया है:

चैत्रेऽभ्युदिते राहुः सस्यविनाशं करोति भूमीनाम्।
शस्त्रभयं नृपपीडां दुर्भिक्षं चापि सम्प्रवदन्ति॥

अर्थात: यदि चैत्र मास में राहु द्वारा सूर्य अथवा चंद्रमा ग्रसित होते हैं, तो यह पृथ्वी पर फसलों (सस्य) के आंशिक विनाश, शासकों (राजाओं) के लिए गंभीर संकट, सीमांत शस्त्र-भय (युद्ध की आशंका) और महंगाई व दुर्भिक्ष का सूचक होता है।

खगोलीय सूर्य और चंद्र ग्रहण का आरेख और चैत्र मास में पृथ्वी पर इसका प्रभाव

1. चैत्र अमावस्या का सूर्य ग्रहण: सत्ता और शासन तंत्र में उथल-पुथल

सूर्य साक्षात राजा, शासन-सत्ता, प्रशासनिक व्यवस्था और राज्य के संप्रभु नेतृत्व का कारक है।

  • शासकों के लिए संकट: जब संवत्सर के आरंभ में चैत्र अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लगता है, तो विश्व के प्रमुख लोकतांत्रिक अथवा राजतंत्रीय देशों के शीर्ष नेतृत्व को भयंकर जन-आक्रोश, आंतरिक विद्रोह अथवा अचानक सत्ता-परिवर्तन का सामना करना पड़ता है।
  • वैश्विक कूटनीति में तनाव: देशों के मध्य गुप्त संधियां टूटती हैं और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य गतिशीलता बढ़ जाती है।
  • अग्नि व प्राकृतिक आपदाएं: सूर्य का संबंध अग्नि-तत्त्व से होने के कारण जंगलों में भीषण आग (Wildfires), ज्वालामुखी विस्फोट और अत्यधिक गर्मी से सूखे की स्थिति बनती है।

2. चैत्र पूर्णिमा का चंद्र ग्रहण: जन-मानस, जल और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

चंद्रमा मन, जल-संसाधनों, औषधियों, जनता की सामान्य मानसिकता और कृषि का अधिष्ठाता है।

  • मानसिक अवसाद और जन-आंदोलन: चैत्र पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगने से सामान्य जनता में अशांति, भय, असंतोष और भावनात्मक उद्वेग फैलता है, जिससे बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हड़तालें और जन-आंदोलन होते हैं।
  • जल-संकट और समुद्री आपदाएं: चंद्रमा पृथ्वी के जल-तत्त्व को नियंत्रित करता है; अतः यह ग्रहण चक्रवाती तूफानों, सुनामी, असमय भारी वर्षा अथवा भूजल के दूषित होने का कारण बनता है।
  • वित्तीय बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव: शेयर बाजार, मुद्रा बाजार (Forex) और बैंकिंग क्षेत्र में अचानक बड़ी गिरावट अथवा अस्थिरता देखी जाती है।
ग्रहण का प्रकार संधिकाल तिथि व राशि प्राथमिक प्रभावित वर्ग मेदिनी व वैश्विक परिणाम
सूर्य ग्रहण चैत्र अमावस्या (मीन / मेष) राष्ट्राध्यक्ष, प्रशासनिक अधिकारी, सेना, सत्ताधारी दल राजनीतिक विद्रोह, सीमा विवाद, अग्निकांड, सत्ता-पतन
चंद्र ग्रहण चैत्र पूर्णिमा (कन्या / तुला) सामान्य जनता, व्यापारी, लेखक, किसान, महिलाएं मानसिक अशांति, जल-प्रकोप, शेयर बाजार में गिरावट, मंदी

सूतक काल, स्पर्श, मध्य और मोक्ष का गणितीय व शास्त्रीय विज्ञान

ग्रहण के दौरान केवल वह समय ही अशुभ नहीं होता जब चंद्रमा या सूर्य ढके होते हैं, अपितु उससे कई घंटे पूर्व ही अंतरिक्षीय विकिरण (Cosmic Radiation) का प्रवाह दूषित हो जाता है, जिसे शास्त्रीय भाषा में 'सूतक काल' (वेध काल) कहा जाता है।

1. सूतक काल की गणना का नियम

  • सूर्य ग्रहण का सूतक: सूर्य ग्रहण के स्पर्श से ठीक 4 प्रहर (12 घंटे) पूर्व सूतक काल प्रारंभ हो जाता है।
  • चंद्र ग्रहण का सूतक: चंद्र ग्रहण के स्पर्श से ठीक 3 प्रहर (9 घंटे) पूर्व सूतक काल आरंभ होता है।
  • अपवाद नियम: यदि ग्रहण का मोक्ष सूर्यास्त अथवा सूर्योदय के समय हो, तो उसके नियम स्थानीय पंचांग के अनुसार वेध-काल की गणना पर निर्भर करते हैं।

2. कुशा (दर्भ) और तुलसी पत्र का जैव-भौतिकीय रहस्य

सूतक काल लगते ही खाद्य पदार्थों में कुशा अथवा तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा केवल आस्था नहीं, अपितु एक सिद्ध जैव-भौतिकीय (Biophysical) तकनीक है:

  • कुशा घास (Desmostachya bipinnata): कुशा में प्राकृतिक रूप से उच्च एक्स-रे और गामा-रे अवशोषण क्षमता होती है। यह एक प्राकृतिक नैनो-कवच की भांति कार्य करती है, जो ग्रहण काल में उत्सर्जित होने वाली हानिकारक पराबैंगनी और विद्युत-चुंबकीय किरणों को भोजन के कार्बनिक अणुओं को नष्ट करने से रोकती है।
  • तुलसी के पत्ते: तुलसी में प्रचुर मात्रा में 'यूजेनॉल' और वाष्पशील तेल होते हैं, जो पराबैंगनी विकिरण से भोजन में पनपने वाले हानिकारक जीवाणुओं को निष्प्रभावी कर देते हैं, जिससे भोजन बासी और विषैला नहीं होता।

गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष आचार संहिता और सावधानियां

सनातन धर्म और आधुनिक भ्रूण-विज्ञान (Embryology) दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ग्रहण के समय वातावरण में सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों का भारी असंतुलन होता है। गर्भस्थ शिशु की कोशिकाएं (Cells) इस समय तेजी से विभाजित हो रही होती हैं, अतः उन पर इन विकिरणों का प्रभाव सर्वाधिक पड़ता है।

गर्भवती महिलाओं को चैत्र ग्रहण के दौरान निम्नलिखित नियमों का अनिवार्य पालन करना चाहिए:

  1. घर से बाहर न निकलना: ग्रहण काल में खुली धूप अथवा चांदनी में सीधे संपर्क में आने से बचें, ताकि हानिकारक किरणों का सीधा प्रभाव गर्भ पर न पड़े।
  2. धारदार वस्तुओं का निषेध: ग्रहण के समय चाकू, कैंची, सुई, ब्लेड अथवा किसी भी काटने-छीलने वाले औजार का प्रयोग न करें। मान्यता है कि इससे शिशु के अंगों में विकृति (Cleft lip आदि) आ सकती है।
  3. पेट पर गेरू का लेप: गर्भवती स्त्री को अपनी नाभि और उदर के चारों ओर प्राकृतिक गेरू (लाल मिट्टी) का स्वास्तिक अथवा लेप लगाना चाहिए। गेरू लौह-तत्व युक्त प्राकृतिक अवरोधक (Physical Barrier) है जो नकारात्मक किरणों को सोख लेता है।
  4. संतान गोपाल मंत्र का जप: ग्रहण काल में बैठकर संतान गोपाल स्तोत्र अथवा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का पाठ करते हुए हाथ में एक सूखा नारियल रखना चाहिए, जिसे ग्रहण मोक्ष के बाद बहते जल में प्रवाहित कर दिया जाए।

सभी 12 राशियों पर चैत्र ग्रहण का प्रभाव एवं अचूक ज्योतिषीय उपाय

ग्रहण जिस राशि और नक्षत्र में घटित होता है, उस राशि के साथ-साथ अन्य सभी राशियों पर भी इसका शुभाशुभ प्रभाव पड़ता है। नीचे 12 राशियों पर सामान्य फलादेश और शांति उपाय दिए गए हैं:

1. मेष राशि (Aries)

यदि ग्रहण मेष राशि में लगे, तो सिरदर्द, अत्यधिक मानसिक तनाव, निर्णय लेने में भ्रम और वैवाहिक जीवन में तनाव हो सकता है।

  • उपाय: लाल मसूर की दाल और तांबे का दान करें; 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जप करें।

2. वृषभ राशि (Taurus)

अनावश्यक खर्चों में अचानक भारी वृद्धि, अनिद्रा, नेत्र विकार और गुप्त शत्रुओं की सक्रियता से सतर्क रहें।

  • उपाय: सफेद चावल, चीनी और दूध का दान किसी जरूरतमंद को दें।

3. मिथुन राशि (Gemini)

आर्थिक लाभ के नए अवसर मिलेंगे, परंतु बड़े भाइयों अथवा मित्रों के साथ वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।

  • उपाय: हरी मूंग की दाल और हरे वस्त्र का दान करें; विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

4. कर्क राशि (Cancer)

कार्यक्षेत्र और करियर में अचानक परिवर्तन अथवा तनाव, पिता के स्वास्थ्य की चिंता और सामाजिक प्रतिष्ठा पर सतर्कता।

  • उपाय: शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पित करें और चांदी का दान करें।

5. सिंह राशि (Leo)

भाग्य में रुकावटें, पिता से मतभेद, लंबी यात्राओं में कष्ट और धार्मिक कार्यों से विरक्ति का अनुभव।

  • उपाय: गेहूं, गुड़ और तांबे का सिक्का दान करें; आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

6. कन्या राशि (Virgo)

स्वास्थ्य के प्रति अत्यधिक सतर्कता आवश्यक, अचानक चोट या दुर्घटना का भय, पैतृक संपत्ति के मामलों में विलंब।

  • उपाय: पक्षियों को हरा चारा और दाना डालें; 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करें।

7. तुला राशि (Libra)

यदि ग्रहण तुला राशि में लगे, तो दांपत्य जीवन में गहरा तनाव, व्यापारिक साझेदारियों में दरार और स्वास्थ्य शिथिलता।

  • उपाय: सफेद चंदन, इत्र और कपूर का दान करें; महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।

8. वृश्चिक राशि (Scorpio)

शत्रुओं पर भारी विजय, पुराने रोगों से मुक्ति और न्यायालयीन विवादों में सफलता, परंतु अचानक खर्च बढ़ेंगे।

  • उपाय: हनुमान चालीसा का 7 बार पाठ करें और गुड़-चने का दान करें।

9. धनु राशि (Sagittarius)

संतान पक्ष से चिंता, विद्यार्थियों की पढ़ाई में एकाग्रता का अभाव और प्रेम संबंधों में कड़वाहट की आशंका।

  • उपाय: चने की दाल, हल्दी और पीले फल का दान करें; गुरु मंत्र का जप करें।

10. मकर राशि (Capricorn)

पारिवारिक सुख में अशांति, माता के स्वास्थ्य में गिरावट, रक्तचाप और हृदय संबंधी विकारों के प्रति सचेत रहें।

  • उपाय: काले तिल, सरसों का तेल और कंबल का दान किसी निर्धन को दें।

11. कुंभ राशि (Aquarius)

पराक्रम और साहस में वृद्धि, रुके हुए सरकारी कार्य पूरे होंगे, परंतु छोटे भाई-बहनों से संबंध मधुर रखें।

  • उपाय: छाया दान करें (कांसे के कटोरे में सरसों का तेल डालकर अपना मुख देखकर दान करना)।

12. मीन राशि (Pisces)

यदि ग्रहण मीन राशि में लगे, तो संचित धन की हानि, वाणी दोष से कलह, दाहिनी आंख में पीड़ा और मानसिक अस्थिरता।

  • उपाय: पीली सरसों, चने की दाल और केले का दान करें; 'ॐ नमो नारायणाय' का जप करें।
राशि ग्रहण का भावगत प्रभाव मुख्य सावधानी ग्रहण मोक्ष के बाद अचूक दान
मेष लग्न / प्रथम भाव क्रोध, सिरदर्द व जीवनसाथी से तनाव लाल मसूर, तांबा व गुड़
वृषभ द्वादश भाव (व्यय) व्यर्थ व्यय, अनिद्रा व नेत्र रोग चावल, मिश्री व सफेद वस्त्र
मिथुन एकादश भाव (लाभ) मित्रों से अहंकार का टकराव हरी मूंग दाल व हरी सब्जियां
कर्क दशम भाव (कर्म) कार्यक्षेत्र पर अधिकारियों से विवाद कच्चा दूध, चांदी व सफेद मिठाई
सिंह नवम भाव (भाग्य) पिता का स्वास्थ्य, भाग्य में अड़चन गेहूं, गुड़ व लाल चंदन
कन्या अष्टम भाव (आयु) अचानक चोट, पेट विकार व कर्ज हरा चारा, कांसे का पात्र व फल
तुला सप्तम भाव (जाया) दांपत्य कलह, व्यापार में नुकसान खीर, कपूर, इत्र व चीनी
वृश्चिक षष्ठ भाव (रिपु) अत्यधिक उत्तेजना व भाइयों से विवाद गुड़-चना, तांबे का सिक्का व मसूर
धनु पंचम भाव (संतान) पढ़ाई में भटकाव, पेट में एसिडिटी चने की दाल, हल्दी व पीले वस्त्र
मकर चतुर्थ भाव (सुख) माता का स्वास्थ्य, पारिवारिक अशांति काले तिल, उड़द व सरसों का तेल
कुंभ तृतीय भाव (पराक्रम) भाई-बहनों से विवाद, यात्रा कष्ट छाया पात्र दान, कंबल व लोहा
मीन द्वितीय भाव (धन) कटु वाणी, संचित धन की हानि पीला पुखराज, हल्दी व बेसन के लड्डू

ग्रहण काल: मंत्र-सिद्धि और आध्यात्मिक साधना का महा-अवसर

जहाँ एक ओर जन-सामान्य के लिए ग्रहण काल एक सूतक और निषेध का समय है, वहीं तंत्र शास्त्र और उच्च यौगिक साधना में ग्रहण काल को 'स्वयंसिद्ध महापर्व' माना गया है।

सूर्यग्रहे भवेत् सिद्धिः कोटिकोटिगुणा प्रिये।
जपमात्रेण मन्त्रस्य जायते खेचरी गतिः॥

अर्थात: सामान्य दिनों में किसी मंत्र के एक लाख जप से जो सिद्धि प्राप्त होती है, ग्रहण काल के मात्र दो-तीन घंटों के एकाग्र जप से कोटि गुना अधिक फल और मंत्र-सिद्धि तत्काल सिद्ध हो जाती है।

ग्रहण काल में साधना का शास्त्रीय विधान

  1. शुद्ध आसन की स्थापना: कुशा अथवा ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  2. मानसिक जप का नियम: ग्रहण काल में माला फेरने की भी आवश्यकता नहीं होती; केवल बंद नेत्रों से आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित कर मंत्र का अखंड मानसिक उच्चारण करना चाहिए।
  3. सिद्धि हेतु सर्वोत्तम मंत्र:
    • गायत्री महामंत्र: आत्मबल और बुद्धि की प्रखरता हेतु।
    • महामृत्युंजय मंत्र: असाध्य रोगों, अकाल मृत्यु और भय के समूल नाश हेतु।
    • श्री सूक्त व कनकधारा: आर्थिक दरिद्रता को मिटाकर स्थाई समृद्धि पाने हेतु।

दार्शनिक संदेश: अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय

चैत्र मास में घटित होने वाले ग्रहण हमें सनातन जीवन दर्शन का यह अमर पाठ पढ़ाते हैं कि संसार में कोई भी अंधकार, कोई भी संकट और कोई भी राहु-रूपी विपत्ति सदा के लिए नहीं ठहर सकती।

साक्षात भुवन भास्कर सूर्य और अमृतमयी चंद्रमा भी कुछ क्षणों के लिए राहु की छाया से आच्छादित होते हैं, परंतु वे उस अंधकार को चीरकर पुनः दोगुनी चमक और तेजस्विता के साथ बाहर निकलते हैं।

यदि आपके जीवन में भी इस संवत्सर के आरंभ में कोई संकट, विफलता, रोग अथवा बदनामी रूपी ग्रहण लगा है, तो धैर्य रखें। यह केवल एक अस्थायी खगोलीय और कर्मिक संधिकाल है। अपनी अंतरात्मा के सूर्य को साधना, तप और सेवा के बल पर जाग्रत रखिए; ग्रहण का मोक्ष अवश्यंभावी है और उसके उपरांत आपके जीवन में एक नया, देदीप्यमान और निष्कलंक सवेरा उदित होगा।


FAQ

चैत्र मास में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण किन तिथियों को घटित हो सकते हैं?
सूर्य ग्रहण सदैव चैत्र मास की 'अमावस्या तिथि' को और चंद्र ग्रहण सदैव चैत्र मास की 'पूर्णिमा तिथि' को घटित होता है।

सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का सूतक काल कितने समय पूर्व आरंभ होता है?
सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण स्पर्श से 12 घंटे (4 प्रहर) पूर्व और चंद्र ग्रहण का सूतक 9 घंटे (3 प्रहर) पूर्व प्रारंभ होता है।

ग्रहण के समय भोजन में तुलसी के पत्ते और कुशा क्यों डाले जाते हैं?
कुशा और तुलसी में प्राकृतिक रूप से हानिकारक पराबैंगनी और विद्युत-चुंबकीय किरणों को सोखने और रोगाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिससे भोजन दूषित नहीं होता।

ग्रहण मोक्ष के तुरंत बाद क्या करना अनिवार्य माना गया है?
ग्रहण समाप्त होते ही संपूर्ण घर में गंगाजल छिड़कना, सवस्त्र शुद्ध स्नान करना और अनाज, वस्त्र व दक्षिणा का दान करना अनिवार्य माना गया है।

ग्रहण काल को मंत्र-सिद्धि के लिए सर्वोत्तम क्यों माना जाता है?
ग्रहण काल में अंतरिक्षीय ऊर्जा का द्वार खुल जाता है, जिससे इस समय किया गया थोड़ा सा भी मंत्र जप सामान्य दिनों की तुलना में कोटि गुना अधिक फल देकर मंत्र को शीघ्र सिद्ध कर देता है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ