By पं. नीलेश शर्मा
माँ महागौरी का पूजन, संधि पूजा का तांत्रिक रहस्य और कन्या पूजन विधान

सनातन वैदिक कालगणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को 'महाअष्टमी' अथवा 'दुर्गा अष्टमी' के नाम से जाना जाता है। यह वासंती नवरात्रि का सर्वाधिक ऊर्जावान और तांत्रिक दृष्टि से जाग्रत दिवस है। इस दिन आदिशक्ति भगवती दुर्गा के आठवें विग्रह-माँ महागौरी-की विधिवत उपासना संपन्न होती है।
खगोलीय दृष्टि से यह वह कालखंड है जब सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष के अत्यंत सन्निकट पहुँचकर अपनी किरणों में तेज और उष्णता का संचार करते हैं, जबकि चंद्रमा आर्द्रा अथवा पुनर्वसु नक्षत्र के प्रभाव से जल-तत्त्व और भावनात्मक संतुलन को नियंत्रित करता है। महाअष्टमी की तिथि प्रकृति में तमोगुण के पूर्ण शमन और शुद्ध सत्वगुण के प्राकट्य का प्रतीक है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय व आध्यात्मिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | अष्टमी तिथि (महाअष्टमी) |
| अधिष्ठात्री देवी | भगवती माँ महागौरी (अष्टम दुर्गा) |
| संबद्ध चक्र | सहस्रार चक्र (अमृत प्रवाह) |
| तात्विक स्वरूप | विशुद्ध सत्व, क्षमा, परम शांति और कांति |
| प्रमुख तांत्रिक अनुष्ठान | संधि पूजा (अष्टमी-नवमी का 48 मिनट का संधिकाल) |
| प्रमुख पारम्परिक भोग | हलवा, पूरी, काले चने और नारियल |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | संचित पापों का क्षय, राहु दोष शांति, अखंड सौभाग्य |
इस पावन तिथि पर माँ भगवती की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का पालन करना चाहिए।
देवीभागवत पुराण और शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ पार्वती ने हिमालय पर सहस्रों वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की थी।
तपस्या के दौरान उन्होंने धूप, वर्षा, शीत और धूल को सहन किया। पत्तों और वायु का भक्षण करने के कारण उनका शरीर अत्यंत क्षीण और कृष्ण वर्ण (काला) हो गया था। जब देवाधिदेव महादेव उनकी अनन्य निष्ठा से प्रसन्न हुए तब उन्होंने प्रकट होकर गंगा की पावन अमृतमयी जलधारा से माता के शरीर का अभिषेक किया।
गंगाजल के स्पर्श से माता पार्वती का काला शरीर विद्युत के समान देदीप्यमान, अत्यंत धवल और कांतिवान हो गया। उनकी श्वेत आभा शंख, चमेली के पुष्प और चंद्रमा के समान उज्ज्वल हो उठी, जिसके कारण उनका नाम 'महागौरी' पड़ा।
माँ महागौरी का वाहन वृषभ (बैल) है। वे चतुर्भुजा हैं; उनके एक दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे में त्रिशूल है, जबकि बाएं एक हाथ में डमरू और दूसरे में वरद मुद्रा है। उनका यह शांत स्वरूप यह संदेश देता है कि तपस्या की अग्नि में तपकर ही आत्मा का वास्तविक सौन्दर्य और तेज प्रकट होता है।
नवरात्रि के अनुष्ठान में 'संधि पूजा' को शक्ति उपासना का चरमोत्कर्ष माना गया है। देवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण) के अनुसार, यह वही क्षण है जब माँ दुर्गा ने असुर चंड और मुंड का संहार करने हेतु अपने भाल (मस्तक) से अत्यंत विकराल और संहारक रूप 'माँ चामुंडा' को प्रकट किया था।
संधि पूजा संपूर्ण 48 मिनट (दो घटी) की अवधि में संपन्न होती है:
इस 48 मिनट के संधिकाल में ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सबसे तीव्र और आग्नेय रूप में होती है। इस समय किए गए मंत्र जप और आहुतियां सहस्रों गुना अधिक फलदायी होती हैं।
| अनुष्ठान घटक | प्रयुक्त सामग्री | तांत्रिक व आध्यात्मिक विधान |
|---|---|---|
| 108 दीपदान | मिट्टी या पीतल के 108 दीपक, शुद्ध गोघृत | संधि काल के आरंभ होते ही 108 दीपों को एक साथ प्रज्वलित करना |
| 108 कमल पुष्प | ताजे लाल अथवा नील कमल | माँ चामुंडा को एक-एक मंत्र के साथ कमल अर्पित करना |
| सात्विक बलि | ककड़ी, कुम्हड़ा (पेठा) अथवा जायफल | अहंकार और काम-क्रोध की प्रतीकात्मक बलि देना |
| चामुंडा मंत्र जप | स्फटिक अथवा रुद्राक्ष माला | 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' मंत्र का तीव्र जप |
चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिन घर में माँ महागौरी की प्रसन्नता हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध विधि से पूजन संपन्न करें:
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
महाअष्टमी के दिन हलवा, पूरी और चने का भोग लगाने के पश्चात कन्या पूजन का आरंभ होता है। शास्त्रों में स्पष्ट विधान है कि 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याएं साक्षात नवदुर्गा की जीवंत प्रतिमाएं होती हैं।
माँ महागौरी का पर्व मनुष्य को बाह्य दिखावे से परे जाकर अंतर्मन की शुद्धि की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार गंगाजल के स्पर्श से माता पार्वती का संचित अंधकार और कालिख धुल गई थी, उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी वासनाओं और अहंकार को साधना की अग्नि में तपाकर ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसकी आत्मा भी निष्कलंक और महागौरी के समान प्रकाशित हो उठती है।
महाअष्टमी के दिन संधि पूजा का क्या महत्व है?
संधि पूजा अष्टमी और नवमी के मिलन काल (48 मिनट) में होती है; इसी समय माँ दुर्गा ने चंड-मुंड के संहार हेतु माँ चामुंडा का रूप धारण किया था।
माँ महागौरी को कौन सा भोग सर्वाधिक प्रिय है?
माँ महागौरी को नारियल, हलवा, पूरी और काले चने का भोग अत्यंत प्रिय है।
महाअष्टमी के दिन किस ग्रह की शांति होती है?
माँ महागौरी की साधना से छाया ग्रह राहु के दोष, कालसर्प पीड़ा और मानसिक भ्रम शांत होते हैं।
संधि पूजा के दौरान कितने दीपक जलाए जाते हैं?
संधि पूजा के दौरान देवी चामुंडा के निमित्त 108 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं और 108 कमल पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
कन्या पूजन में कन्याओं की आयु सीमा क्या होनी चाहिए?
कन्या पूजन में 2 वर्ष से 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन शास्त्र सम्मत माना गया है।
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