By पं. सुव्रत शर्मा
भौम व सोम प्रदोष का रहस्य, ऋणमुक्तेश्वर रुद्राभिषेक, हलाहल कथा और चंद्र शांति

सनातन वैदिक पंचांग, शिव महापुराण, लिंग पुराण और निर्णयसिंधु में प्रत्येक मास के दोनों पक्षों (कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष) की त्रयोदशी तिथि को देवाधिदेव महादेव शिव की परम प्रिय तिथि 'प्रदोष व्रत' के रूप में विधिपूर्वक मनाया जाता है। 'प्रदोष' का शाब्दिक अर्थ है-सूर्यास्त के ठीक बाद का वह पावन संधिकाल (संध्या के 2 मुहूर्त अथवा लगभग 45 से 90 मिनट की अवधि), जब भगवान नटराज कैलाश पर्वत पर आनंद तांडव करते हैं और समस्त देवी-देवता उनकी स्तुति में उपस्थित होते हैं।
चैत्र मास हिन्दू संवत्सर (नव वर्ष) का संधिकाल मास है। इस मास में पड़ने वाले दोनों प्रदोष व्रत संपूर्ण वर्ष की आध्यात्मिक ऊर्जा, कर्म-शोधन और आर्थिक स्थिरता की आधारशिला माने गए हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से जब त्रयोदशी तिथि का संचरण सूर्यास्त वेला (प्रदोष काल) में होता है और उस दिन सप्ताह का विशिष्ट वार (दिन) उपस्थित होता है, तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण |
|---|---|
| मास एवं तिथियां | चैत्र मास, कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष त्रयोदशी |
| मुख्य अधिष्ठाता सत्ता | देवाधिदेव महादेव शिव एवं माता भगवती जगदम्बा पार्वती |
| विशिष्ट पूजन काल | प्रदोष काल (सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पूर्व व 45 मिनट पश्चात) |
| वार भेद से नामकरण | मंगलवार: भौम प्रदोष (ऋण मुक्ति) | सोमवार: सोम प्रदोष (मनोकामना सिद्धि) |
| संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह | भौम प्रदोष: मंगल ग्रह (भूमि, रक्त, ऋण) | सोम प्रदोष: चंद्र ग्रह (मन, जल) |
| मुख्य तात्विक शोधन | अग्नि तत्त्व (भौम) एवं जल तत्त्व (सोम) का परम संतुलन |
| प्रमुख अभिषेक द्रव्य | गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, गन्ने का रस, शहद, भस्म, लाल/सफेद चंदन |
| प्रिय पत्र व पुष्प | तीन पत्तों वाले अक्षत बिल्वपत्र, शमी पत्र, धतूरा, मदार, अपराजिता |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | जन्म-जन्मांतरों के पापों का क्षय, दारिद्र्य नाश, अकाल मृत्यु निवारण, आरोग्य |
चैत्र मास के प्रदोष व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर प्रदोष काल की पूजा और पारण तक शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
स्कंद पुराण के ब्रह्मोत्तर खंड और शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में प्रदोष व्रत के प्रादुर्भाव और इसके आध्यात्मिक औचित्य की अत्यंत पावन कथा प्राप्त होती है।
समुद्र मंथन के समय जब क्षीरसागर से संसार को भस्म करने वाला कालकूट (हलाहल) विष प्रकट हुआ, तो देवताओं और असुरों की प्रार्थना पर भगवान सदाशिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा हेतु उस भयंकर विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया और अपने कंठ में रोक लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।
विष के तीव्र दाह को शांत करने हेतु देवताओं ने शिवजी की स्तुति की। भगवान शिव ने उस संताप को सहज भाव से स्वीकार करते हुए त्रयोदशी तिथि की सूर्यास्त वेला (प्रदोष काल) में संपूर्ण ब्रह्मांड को अभयदान दिया और कैलाश पर्वत पर आनंद-तांडव नृत्य प्रारंभ किया।
कैलासशैलभुवने त्रिजगज्जनित्रीं गौरीं निवेश्य कनकाञ्चितरत्नपीठे।
नृत्यं विधातुमभिवाञ्छति शूलपाणौ देवाः प्रदोषसमये समुपासते तम्॥
अर्थात: प्रदोष काल के समय जब भगवान शूलपाणि शिव माता पार्वती को रत्नजड़ित सुवर्ण सिंहासन पर बैठाकर नृत्य करना प्रारंभ करते हैं, उस समय सरस्वती वीणा बजाती हैं, इंद्र वेणु (बांसुरी) बजाते हैं, ब्रह्मा जी ताल देते हैं, लक्ष्मी जी गायन करती हैं, भगवान विष्णु मृदंग बजाते हैं और समस्त देवता उनके चरणों की वंदना करते हैं।
इस पावन वेला में भगवान शिव अत्यंत प्रसन्नचित्त, दयालु और वरद मुद्रा में होते हैं। इस समय जो भी साधक सच्चे हृदय से शिवलिंग पर एक लोटा जल और एक बिल्वपत्र भी अर्पित कर देता है, भगवान आशुतोष उसके जन्म-जन्मांतरों के पापों और दारिद्र्य को उसी प्रकार भस्म कर देते हैं जैसे दावानल सूखे वन को जलाकर राख कर देता है।
जब चैत्र मास में प्रदोष व्रत 'मंगलवार' को पड़ता है, तो वह 'भौम प्रदोष' कहलाता है। वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्रों में भौम प्रदोष को 'ऋणहर्ता प्रदोष' कहा गया है।
वैदिक ज्योतिष में मंगल को 'भूमिपुत्र', 'अंगारक' और 'ऋणहर्ता' माना गया है:
भौम प्रदोष के दिन भगवान शिव के 'ऋणमुक्तेश्वर' स्वरूप का ध्यान किया जाता है।
| भौम प्रदोष घटक | शास्त्रीय व ज्योतिषीय विधान | साधक के जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव |
|---|---|---|
| मुख्य अभिषेक द्रव्य | गन्ने का रस, लाल चंदन, शहद, मसूर दाल | आर्थिक अवरोधों का नाश, पुराने कर्जों से मुक्ति |
| विशेष अर्पित पुष्प | लाल कनेर, लाल गुड़हल, 108 बिल्वपत्र | संपत्ति व भूमि विवादों में कानूनी विजय |
| अचूक स्तोत्र पाठ | स्कंद पुराणोक्त 'ऋणमोचन मंगल स्तोत्र' | व्यापारिक दिवालियापन और घाटे से तत्काल सुरक्षा |
| दान सामग्री | तांबे का पात्र, गुड़, मसूर दाल, लाल वस्त्र | मंगल दोष, रक्त विकार और भाइयों से कलह शांति |
जब चैत्र मास का प्रदोष व्रत 'सोमवार' को पड़ता है, तो वह 'सोम प्रदोष' कहलाता है। भगवान शिव स्वयं मस्तक पर चंद्रमा को धारण करने वाले 'चंद्रशेखर' हैं।
ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है: "चंद्रमा मनसो जातः"। चैत्र मास में जब सूर्य मेष में जाकर अत्यंत तीक्ष्ण हो जाता है, तो मानव मस्तिष्क का जल-तत्त्व और न्यूरो-केमिकल संतुलन प्रभावित होता है।
सोम प्रदोष के दिन शिवलिंग का कच्चे दूध, दही, देसी घी, शहद और शर्करा (पंचामृत) से अभिषेक करने के पश्चात सफेद चंदन का लेप लगाना चाहिए और 11 सफेद आक (मदार) के फूल अर्पित करने चाहिए। इससे व्यक्ति के अंतःकरण में आध्यात्मिक शांति और एकाग्रता की स्थापना होती है।
चैत्र मास के प्रदोष व्रत पर घर अथवा शिवालय में प्रदोष काल के दौरान निम्नलिखित क्रमबद्ध शास्त्रीय विधि से पूजन संपन्न करना चाहिए:
ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे त्रयोदशी तिथौ, प्रदोष काले, मम सकल कायिक-वाचिक-मानसिक पाप क्षयार्थं, सर्व-ऋण विमोचनार्थं (भौम प्रदोषे) / मानसिक-शांति प्राप्त्यर्थं (सोम प्रदोषे), श्री साम्ब-सदाशिव प्रीतये प्रदोष पूजनमहं करिष्ये।
ॐ नमः शिवाय॥
अथवा
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्य pushीय मामृतात्॥
इसके पश्चात भौम प्रदोष पर 'ऋणमोचन मंगल स्तोत्र' और सोम प्रदोष पर 'शिव पंचाक्षर स्तोत्र' अथवा 'दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र' का पाठ करें।
यदि आप वर्षों से भारी कर्जों के बोझ तले दबे हैं अथवा व्यापार में निरंतर आर्थिक हानि हो रही है, तो चैत्र मास के भौम प्रदोष के दिन निम्नलिखित उपाय साक्षात कल्पवृक्ष सिद्ध होते हैं:
| समस्या | ज्योतिषीय व तात्विक कारण | चैत्र भौम/सोम प्रदोष पर अचूक शास्त्रीय उपाय |
|---|---|---|
| असाध्य पुराना कर्ज | षष्ठ भाव में मंगल-राहु या अष्टमेश की पीड़ा | शिवलिंग पर गन्ने के रस से अभिषेक कर 'ऋणमोचन मंगल स्तोत्र' के 11 पाठ |
| भूमि या पैतृक संपत्ति विवाद | चतुर्थ भाव पर पापी ग्रहों का क्रूर प्रभाव | शिवलिंग पर तांबे के लोटे से लाल चंदन मिश्रित जल व 21 लाल कनेर फूल अर्पण |
| अत्यधिक मानसिक तनाव व अवसाद | चंद्र-शनि विष योग अथवा क्षीण चंद्रमा | सोम प्रदोष पर शिवलिंग पर 108 बार ॐ नमः शिवाय बोलते हुए कच्चा दूध अर्पण |
| व्यापार में लगातार घाटा | दशम भाव व धनेश का बंधन दोष | प्रदोष काल में शिवालय में चौमुखी घी का दीपक जलाकर दारिद्र्य दहन स्तोत्र पाठ |
प्रदोष व्रत का सर्वोच्च दार्शनिक संदेश केवल सांसारिक कामनाओं की पूर्ति अथवा ऋणों से मुक्ति पाना नहीं है, अपितु यह अंतःकरण के समस्त विकारों के ऋण से मुक्त होकर शुद्ध चेतना (शिव) में विलीन हो जाना है।
भगवान शिव संहारक भी हैं और परम कल्याणकारी (आशुतोष) भी। जब वे हलाहल विष पीते हैं, तो यह सिखाते हैं कि संसार की कड़वाहटों और कष्टों को शांत भाव से अपने भीतर समाहित कर लो, दूसरों पर उसका विष मत उगलना। और जब वे प्रदोष काल में तांडव नृत्य करते हैं, तो यह सिखाते हैं कि दुखों और अभावों के मध्य भी अपनी आत्मिक मस्ती और आनंद में लीन रहो।
भौतिक ऋण तो धन चुकाने से समाप्त हो जाते हैं, परंतु हमारे ऊपर जो देव-ऋण, पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण और प्रकृति-ऋण हैं, वे केवल त्याग, सेवा, परोपकार और शिव-भक्ति से ही चुकता होते हैं। जब साधक चैत्र मास के संधिकाल में भगवान शिव की शरण लेता है, तो उसका संपूर्ण वर्ष निष्पाप, निर्भय और दिव्य प्रकाश से आलोकित हो जाता है।
प्रदोष व्रत किस तिथि को और किस समय किया जाता है?
प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल: सूर्यास्त के 45 मिनट पूर्व से 45 मिनट बाद) किया जाता है।
भौम प्रदोष किसे कहते हैं और इसका क्या महत्व है?
जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे 'भौम प्रदोष' कहा जाता है; यह पुराने कर्जों से मुक्ति, भूमि विवादों के समाधान और मंगल दोष शांति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
सोम प्रदोष के दिन किस ग्रह के दोष शांत होते हैं?
सोम प्रदोष के दिन भगवान शिव की पूजा करने से कुंडली का 'चंद्र दोष' (विष योग, ग्रहण योग, नीच का चंद्रमा) शांत होता है और मानसिक तनाव व अनिद्रा से मुक्ति मिलती है।
प्रदोष काल में शिवलिंग पर किस रस से अभिषेक करने से ऋण मुक्ति मिलती है?
भौम प्रदोष के दिन शिवलिंग पर शुद्ध 'गन्ने के रस' (Sugarcane Juice) अथवा लाल चंदन मिश्रित जल से अभिषेक करने से असाध्य ऋणों से मुक्ति मिलती है।
शिवलिंग की पूरी परिक्रमा क्यों नहीं की जाती?
शिवलिंग की जलाधारी (सोमसूत्र) को लांघना शास्त्रों में वर्जित माना गया है, क्योंकि वहाँ से शक्ति-ऊर्जा का प्रवाह होता है; अतः केवल आधी परिक्रमा (अर्ध-प्रदक्षिणा) ही की जाती है।
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