चैत्र पूर्णिमा: चित्रा नक्षत्र की पूर्ण अमृतमयी रात, सत्यनारायण कथा और चंद्र अर्घ्य

By पं. नीलेश शर्मा

चित्रा नक्षत्र का विज्ञान, सत्यनारायण कथा के 5 अध्याय और चंद्र अर्घ्य

चैत्र पूर्णिमा: सत्यनारायण पूजा विधि, चंद्र अर्घ्य और चित्रा नक्षत्र

पंचांग विवरण एवं चैत्र पूर्णिमा की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक कालगणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को 'चैत्र पूर्णिमा' अथवा 'चैत्री पूनम' के पावन महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह सनातन नव संवत्सर (नए हिंदू वर्ष) की सर्वप्रथम पूर्णिमा है। चैत्र पूर्णिमा न केवल चैत्र मास के तीस दिवसीय चक्र की पूर्णता का प्रतीक है, अपितु यह संपूर्ण भचक्र में ऋतुराज वसंत के विदाई और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का सबसे जाग्रत खगोलीय संधिकाल भी है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जिस नक्षत्र में चंद्रमा पूर्णिमा के दिन पूर्ण रूप से संचरण करता है, उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नामकरण होता है। चैत्र मास का नामकरण आकाशगंगा के सर्वाधिक चमकीले, तेजस्वी और मोती के समान आभा वाले 'चित्रा' नक्षत्र के आधार पर हुआ है।

खगोलीय दृष्टि से चैत्र पूर्णिमा की रात्रि अंतरिक्षीय ऊर्जा का चरम बिंदु होती है। इस पावन निशा में भुवन भास्कर सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष (अग्नि तत्त्व) में स्थित होते हैं, जबकि चंद्रमा अपनी पूर्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर तुला राशि और चित्रा नक्षत्र (वायु व जल तत्त्व के संगम) में ठीक 180 अंश के कोणीय अंतर पर आमने-सामने स्थित होते हैं। चित्रा नक्षत्र के अधिष्ठाता देवशिल्पी 'त्वष्टा' (विश्वकर्मा) हैं और इसके ग्रह स्वामी पराक्रमी 'मंगल' (Mars) हैं। चंद्रमा के शीतल जल-तत्त्व और चित्रा नक्षत्र के आग्नेय मंगल-तत्त्व का यह दुर्लभ संयोग मानव मस्तिष्क के स्नायु तंत्र, रक्त संचार और भावनात्मक संतुलन पर सीधा प्रभाव डालता है। इस रात की गई जल साधना, चंद्र अर्घ्य और भगवान सत्यनारायण का अर्चन मनुष्य की आंतरिक चंचलता को शांत कर दीर्घायु, तेजस्विता और असीम मानसिक शांति प्रदान करता है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व खगोलीय विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, शुक्ल पक्ष
तिथि पूर्णिमा तिथि (संवत्सर की प्रथम पूर्णिमा)
नक्षत्र गोचर चित्रा नक्षत्र (कन्या/तुला राशि संधि, मंगल शासित)
सौर स्थिति सूर्य देव का मेष राशि में संचरण (उच्च सौर क्षेत्र)
चंद्र स्थिति पूर्ण चंद्र (16 कलाएं, 180° समसप्तक दृष्टि)
मुख्य अधिष्ठाता देव भगवान श्री सत्यनारायण (विष्णु), चंद्र देव, चित्रगुप्त
प्रमुख तात्विक स्वरूप अग्नि व जल तत्त्व का परम संतुलन, सोम-रस प्रस्फुटन
प्रमुख पावन नदियां मोक्षदायिनी गंगा, यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा, गोदावरी
मुख्य पारम्परिक भोग पंजीरी (गेहूं के भुने आटे की), पंचामृत, केला, खीर, तुलसी
अभीष्ट आध्यात्मिक फल मानसिक शांति, अकाल मृत्यु भय नाश, पाप क्षय, लक्ष्मी प्राप्ति

चैत्र पूर्णिमा के इस अमृतमयी अवसर पर तीर्थ स्नान का पुण्य प्राप्त करने, चंद्र देव की अमृत किरणों का लाभ उठाने और श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व शैया का त्याग कर किसी पवित्र नदी, सरोवर अथवा घर में ही गंगाजल मिले शीतल जल से स्नान करना।
  • स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत अथवा पीले रंग के सूती/रेशमी वस्त्र धारण कर भगवान सूर्यनारायण को तांबे के पात्र से तीन बार अर्घ्य समर्पित करना।
  • हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और कुश लेकर सत्यनारायण व्रत एवं पूर्णिमा उपवास का शास्त्रीय संकल्प लेना।
  • गृह मंदिर को स्वच्छ कर ईशान कोण में सत्यनारायण भगवान की पूजा हेतु केले के खंभों और आम्र-पल्लवों से सुशोभित सुंदर मंडप का निर्माण करना।
  • दिनभर पूर्ण सात्विक दिनचर्या का पालन करना; अन्न, नमक और तामसिक विचारों का त्याग कर केवल फलाहार अथवा दुग्धाहार ग्रहण करना।
  • दोपहर अथवा प्रदोष काल में स्कंद पुराणोक्त 'श्री सत्यनारायण व्रत कथा' का सपरिवार श्रवण करना और शंख ध्वनि करना।
  • गेहूं के भुने हुए आटे में देसी घी, चीनी अथवा बूरा मिलाकर बनाई गई पंजीरी, पंचामृत और तुलसी दल का भगवान को नैवेद्य अर्पित करना।
  • रात्रि के समय जब पूर्ण चंद्रमा पूर्व दिशा में उदित हो तब तांबे अथवा चांदी के पात्र में कच्चा गाय का दूध, जल, अक्षत और सफेद पुष्प डालकर चंद्र देव को अर्घ्य देना।
  • खुली चांदनी रात में बैठकर कम से कम 15 से 20 मिनट तक त्राटक अथवा चंद्र ध्यान करना ताकि मस्तिष्क को शीतलता प्राप्त हो सके।

चित्रा नक्षत्र का विज्ञान और चंद्र-अमृत की वर्षा

वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्रों के चक्र में 14वां नक्षत्र 'चित्रा' (Spica) कहलाता है। खगोल विज्ञान के अनुसार चित्रा तारा वर्जिनिस (Virgo) तारामंडल का सबसे चमकीला तारा है, जो पृथ्वी से लगभग 250 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक द्वितारा (Binary Star) प्रणाली है।

वैदिक संहिताओं में चित्रा को 'स्वच्छ, चमकीला, सुंदर और विविध रंगों से युक्त रत्न' के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके अधिष्ठाता देवता 'त्वष्टा' हैं, जो सृष्टि के समस्त रूपों, आकारों और सौंदर्य के रचयिता हैं।

चैत्र पूर्णिमा पर चंद्रमा से अमृत प्रवाह का रहस्य

आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथ 'चरक संहिता' और 'सुश्रुत संहिता' में उल्लेख मिलता है कि पूर्णिमा की रात चंद्रमा से निकलने वाली किरणें केवल प्रकाश नहीं होतीं, अपितु वे 'सोम' (अमृत-रस) का प्रत्यक्ष वर्षण करती हैं।

  • औषधियों का कायाकल्प: चैत्र पूर्णिमा की रात पृथ्वी पर उगने वाली समस्त वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां और वृक्ष चंद्रमा की अमृत किरणों को अपनी कोशिकाओं में अवशोषित करते हैं। यही कारण है कि इस रात संचित की गई औषधियां दीर्घकालिक रोगों को नष्ट करने में सबसे शक्तिशाली मानी जाती हैं।
  • मानसिक तरंगों का सामंजस्य: मानव मस्तिष्क का 70% भाग जल-तत्त्व से निर्मित है। जिस प्रकार पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार-भाटा (High Tide) आता है, उसी प्रकार मानव मस्तिष्क की न्यूरो-केमिकल तरंगें भी पूर्णिमा के दिन सर्वाधिक सक्रिय होती हैं। यदि इस दिन तामसिक भोजन किया जाए, तो व्यक्ति में उन्माद, क्रोध और अवसाद बढ़ता है; परंतु यदि उपवास रखकर मंत्र जप किया जाए, तो कुंडलिनी शक्ति अत्यंत सुगमता से आज्ञा और सहस्रार चक्र की ओर ऊर्ध्वगामी हो जाती है।
खगोलीय व शारीरिक घटक पूर्णिमा का प्रभाव शास्त्रीय साधना का समाधान
मस्तिष्क का जल-तत्त्व ज्वार-भाटा के समान तरंगों में उभार 'ॐ सों सोमाय नमः' मंत्र जप एवं दूध-जल अर्घ्य
रक्त संचार व हृदय गति मंगल के चित्रा नक्षत्र के कारण रक्त में उष्णता सात्विक उपवास, नमक का पूर्ण त्याग
अंतःस्रावी ग्रंथियां (Hormones) मेलाटोनिन व सेरोटोनिन के स्राव में तीव्रता खुली चांदनी में त्राटक, ध्यान व स्वाध्याय
जठराग्नि व चयापचय अग्नि तत्त्व का मंद होना हल्का सुपाच्य फलाहार, भुने आटे की पंजीरी

स्कंद पुराणोक्त श्री सत्यनारायण कथा: उत्पत्ति, महात्म्य और पंच अध्याय

सनातन परंपरा में पूर्णिमा तिथि का पर्याय बन चुकी 'श्री सत्यनारायण व्रत कथा' का मूल स्रोत महर्षि वेदव्यास रचित 'स्कंद पुराण' का रेवा खंड है।

नैमिषारण्य तीर्थ में जब शौनकादि अठासी हजार ऋषियों ने परम ज्ञानी सूत जी से प्रश्न पूछा: "हे पूज्यवर! कलयुग में मनुष्य अल्पायु, साधनहीन और नाना प्रकार के क्लेशों से त्रस्त रहेगा। ऐसा कौन सा सरल, सुलभ और सार्वभौमिक उपाय है जिससे सांसारिक सुख भी प्राप्त हों और अंत में मोक्ष भी सुलभ हो?"

तब सूत जी ने बताया कि यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद ने वैकुंठ में भगवान नारायण से पूछा था और भगवान ने उन्हें 'श्री सत्यनारायण व्रत' का उपदेश दिया था।

सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः।
सत्यमेव परो धर्मः सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्॥

अर्थात: सत्य ही परम ब्रह्म है, सत्य ही परम तप है और सत्य ही परम धर्म है। जो मनुष्य सत्य रूपी नारायण की उपासना करता है, उसके जीवन के समस्त बंधन स्वतः कट जाते हैं।

कथा के पांच अध्यायों का दार्शनिक विश्लेषण

  1. प्रथम अध्याय (उद्भव व विधि): नारद जी का भूलोक भ्रमण, प्राणियों के दुख से द्रवित होना और भगवान नारायण द्वारा सत्यनारायण व्रत की अत्यंत सरल विधि (सवा सेर भुने गेहूं का आटा, शर्करा, घी, केला और दूध) का प्रतिपादन।
  2. द्वितीय अध्याय (शतानंद ब्राह्मण व काष्ठ विक्रेता): काशी के एक अत्यंत दरिद्र और भिक्षाजीवी ब्राह्मण 'शतानंद' का व्रत द्वारा संपन्न होना। एक निर्धन लकड़हारे (काष्ठ विक्रेता) द्वारा सत्य की शरण लेकर अपनी दरिद्रता को मिटाना। यह अध्याय सिखाता है कि सत्य के द्वार पर धनी और निर्धन का कोई भेद नहीं है।
  3. तृतीय अध्याय (साधु वैश्य और संकल्प-भंग): संतान प्राप्ति हेतु साधु वैश्य द्वारा व्रत का संकल्प लेना, परंतु कन्या 'कलावती' के जन्म और उसके विवाह के उपरांत भी लोभ और अहंकारवश व्रत को टालते रहना। व्यापार में दामाद सहित बंदी बन जाना। यह अध्याय सिखाता है कि ईश्वर से किया गया संकल्प भूलना ही जीवन के दुखों का मूल कारण है।
  4. चतुर्थ अध्याय (कारागार मुक्ति व रत्नावली नौका): साधु वैश्य की पत्नी लीलावती और कन्या कलावती द्वारा संकट काल में पुनः सत्यनारायण का स्मरण करना। राजा चंद्रकेतु द्वारा वैश्य को कारागार से मुक्त करना और समुद्र में भगवान द्वारा सन्यासी रूप में परीक्षा लेना। अहंकार के कारण नौका में लदे रत्नों का लता-पत्तों में बदल जाना और पुनः क्षमा मांगने पर अक्षय धन की प्राप्ति।
  5. पंचम अध्याय (राजा तुंगध्वज और अहंकार नाश): राजा तुंगध्वज द्वारा वन में ग्वालों द्वारा किए जा रहे सत्यनारायण पूजन की उपेक्षा करना और प्रसाद का तिरस्कार करना। परिणामस्वरूप समस्त पुत्रों और राज-वैभव का नष्ट होना। अंत में ग्वालों के साथ बैठकर पश्चाताप पूर्वक प्रसाद ग्रहण करने पर खोए हुए राज्य और संतानों की पुनः प्राप्ति।

भगवान सत्यनारायण की सम्पूर्ण शास्त्रीय पूजन विधि

चैत्र पूर्णिमा के पावन दिन घर में सुख, शांति, लक्ष्मी और आरोग्य की स्थापना हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध शास्त्रोक्त विधि से पूजन संपन्न करना चाहिए:

  1. मंडप एवं वेदी निर्माण: पूजा स्थल की उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा को स्वच्छ कर गंगाजल छिड़कें। लकड़ी की चौकी के चारों कोनों पर केले के चार छोटे खंभे बांधें और ऊपर आम के पत्तों का तोरण लगाएं। चौकी पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं।
  2. कलश स्थापना एवं अष्टदल कमल: चौकी के मध्य में कच्चे चावल (अक्षत) से अष्टदल कमल का निर्माण करें। उस पर तांबे अथवा पीतल का कलश स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, हल्दी की गांठ, सिक्का और दूर्वा डालें। कलश के मुख पर आम के पांच पल्लव रखकर ऊपर चावल से भरा पूर्णपात्र रखें और लाल वस्त्र में लिपटा जटा वाला नारियल स्थापित करें।
  3. विग्रह प्रतिष्ठा: कलश के आगे भगवान शालिग्राम अथवा भगवान श्री सत्यनारायण और माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। भगवान गणेश, नवग्रह, वरुण देव और लोकपालों का आवाहन करें।
  4. पंचामृत अभिषेक: दक्षिणावर्ती शंख में गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाकर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। इसके पश्चात गंगाजल से शुद्ध स्नान कराएं।
  5. शृंगार एवं तुलसी समर्पण: भगवान को पीताम्बरी वस्त्र, जनेऊ, पीला चंदन, अष्टगंध और कुमकुम अर्पित करें। भगवान को पीले गेंदे के फूल और तुलसी दल की माला पहनाएं। बिना तुलसी के सत्यनारायण भगवान भोग स्वीकार नहीं करते।
  6. महा-नैवेद्य (प्रसाद) समर्पण:
    • सपाद भक्ष्य (सवाया प्रसाद): सवा पाव अथवा सवा किलो गेहूं के आटे को गाय के शुद्ध घी में हल्का भूनें। उसमें बूरा (शर्करा), कटे हुए केले के टुकड़े, मखाना, किशमिश और तुलसी दल मिलाकर पावन पंजीरी बनाएं।
    • इसके साथ पंचामृत और ऋतु फल (विशेषकर केला और आम) अर्पित करें।
  7. कथा श्रवण व शंख ध्वनि: धूप-दीप प्रज्वलित कर शांत चित्त से पांचों अध्यायों की कथा का सपरिवार श्रवण करें। प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर शंख ध्वनि करें और 'श्री सत्यनारायण भगवान की जय' का उद्घोष करें।
  8. हवन एवं पूर्णाहुति: कथा के पश्चात छोटे से हवन कुंड में गाय के उपले सुलगाकर आम की समिधा, गाय के घी और खीर-पंजीरी से गायत्री मंत्र और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की 11 या 21 आहुतियां दें।
  9. आरती व प्रसाद वितरण: कर्पूर जलाकर भगवान की आरती उतारें। सर्वप्रथम प्रसाद भगवान के चरणों में अर्पित कर परिवार के सभी सदस्यों और पड़ोसियों में आदरपूर्वक वितरित करें। स्वयं भी प्रसाद ग्रहण कर उपवास पूर्ण करें।

चैत्र पूर्णिमा पर चंद्र अर्घ्य का विधान एवं मंत्र विज्ञान

चैत्र पूर्णिमा की रात्रि में जब चंद्रमा क्षितिज पर उदित होता है तब चंद्र देव को विधिवत अर्घ्य समर्पित करने से जन्मकुंडली के समस्त मानसिक विकार, अनिद्रा और चंद्र-जनित दोष शांत हो जाते हैं।

चंद्र अर्घ्य की शास्त्रीय सामग्री

  • चांदी अथवा तांबे का एक स्वच्छ पात्र (लोटा)।
  • गाय का कच्चा दूध (आधा कप) और शुद्ध शीतल जल।
  • बिना टूटे हुए चावल (अक्षत), सफेद चंदन और सफेद पुष्प (मोगरा या चमेली)।
  • मिश्री के कुछ दाने।

अर्घ्य समर्पण की विधि एवं मंत्र

रात्रि में चंद्रोदय के समय (सामान्यतः सायंकाल 06:30 से 07:30 के मध्य) पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। पात्र को अपने सिर से ऊपर दोनों हाथों से उठाएं। पात्र की जलधारा के मध्य से उदित होते हुए चंद्रमा के बिंब को अपनी दृष्टि से देखें और निम्नलिखित मंत्र का तीन बार उच्चारण करते हुए धीरे-धीरे जलधारा अर्पित करें:

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम॥
ॐ सों सोमाय नमः। ॐ चं चंद्रमसे नमः।

अर्घ्य देने के पश्चात अपने स्थान पर तीन बार प्रदक्षिणा करें। भूमि पर गिरे हुए जल में से एक बूंद अपनी अनामिका उंगली से उठाकर अपने दोनों नेत्रों और मस्तक पर लगाएं। यह क्रिया नेत्र ज्योति को बढ़ाती है और अवचेतन मन में दबे हुए तनाव को शांत करती है।


चित्रगुप्त पूजन: कर्मों के लेखा-जोखा की शुद्धि का पर्व

चैत्र पूर्णिमा के पावन दिन दक्षिण भारत और कायस्थ परंपरा में 'भगवान चित्रगुप्त' की विशेष पूजा का भी शास्त्रीय विधान है। यमराज के प्रधान सचिव और मनुष्यों के शुभ-अशुभ कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त का प्राकट्य भी इसी पूर्णिमा के संधिकाल से जुड़ा माना गया है।

  • कर्म-शुद्धि का संकल्प: इस दिन व्यापारी और साधक अपनी पुरानी खाता-पुस्तकों, लेखनी (कलम) और दवात का पूजन करते हैं।
  • पाप-विमोचन प्रार्थना: भगवान चित्रगुप्त के सम्मुख बैठकर मनुष्य अपने द्वारा वर्षभर में किए गए असत्य भाषण, छल और पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करता है और आगामी वर्ष में केवल धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने का लिखित संकल्प लेता है:

    चित्रगुप्त मसिभाजनं लेखनीसहितं विभो।
    मया कृतं शुभं कर्म पापं च परिमार्जय॥


दार्शनिक संदेश: सत्य ही शाश्वत नारायण है

चैत्र पूर्णिमा का संपूर्ण आध्यात्मिक दर्शन एक ही शाश्वत केंद्र बिंदु पर आकर टिकता है: सत्य ही ईश्वर है और सत्य का आचरण ही सर्वोच्च पूजा है।

हम संसार में चाहे कितने भी अनुष्ठान कर लें, बड़े-बड़े मंदिर बना लें अथवा कठिन तपस्या कर लें, परंतु यदि हमारे दैनिक जीवन में सत्य नहीं है, यदि हमारी वाणी में छल और हमारे व्यवहार में कपट है, तो भगवान सत्यनारायण हमसे कभी प्रसन्न नहीं हो सकते।

लकड़हारा निर्धन था, परंतु वह अपने श्रम और वाणी में सच्चा था, इसलिए भगवान ने उसे अपना लिया। साधु वैश्य के पास विपुल धन था, परंतु वह अपने वचनों में झूठा और अहंकारी था, इसलिए उसे घोर संकटों और कारागार का सामना करना पड़ा।

चैत्र पूर्णिमा की यह उज्ज्वल चांदनी रात हमें अपनी अंतरात्मा को सत्य के प्रकाश से आलोकित करने का निमंत्रण देती है। जिस प्रकार चंद्रमा सूर्य से प्रकाश प्राप्त कर संसार को शीतलता बांटता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी परमात्मा से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कर समाज में प्रेम, करुणा और सत्य की शीतलता का प्रसार करना चाहिए।


FAQ

चैत्र पूर्णिमा किस नक्षत्र में घटित होती है?
चैत्र पूर्णिमा सदैव आकाशगंगा के सर्वाधिक चमकीले 'चित्रा' नक्षत्र में घटित होती है, जिसके आधार पर इस मास का नाम चैत्र पड़ा है।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा का मूल स्रोत किस पुराण में है?
श्री सत्यनारायण व्रत कथा का मूल स्रोत महर्षि वेदव्यास रचित 'स्कंद पुराण' के रेवा खंड में वर्णित है।

सत्यनारायण भगवान के प्रसाद में 'सवाया' का क्या महत्व है?
सवाया (सवा पाव, सवा किलो) समृद्धि, प्रगति और ईश्वर के प्रति असीम श्रद्धा का प्रतीक है; यह दर्शाता है कि भक्त का प्रेम सांसारिक सीमाओं से एक कदम आगे है।

चैत्र पूर्णिमा की रात चंद्रमा को अर्घ्य देने से क्या लाभ होता है?
कच्चे दूध और जल से चंद्र अर्घ्य देने से मानसिक तनाव, अवसाद और अनिद्रा शांत होती है तथा कुंडली का चंद्र दोष समाप्त होकर चित्त में शीतलता आती है।

चित्रा नक्षत्र के स्वामी ग्रह और देवता कौन हैं?
चित्रा नक्षत्र के स्वामी ग्रह पराक्रमी 'मंगल' हैं और इसके अधिष्ठाता देवता देवशिल्पी 'त्वष्टा' (विश्वकर्मा) हैं।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ