चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी: मध्याह्न काल में गणेश पूजन, वरद विनायक स्वरूप और बुद्धि-सिद्धि के नए मार्ग

By पं. नरेंद्र शर्मा

वरद विनायक स्वरूप, मध्याह्न पूजन का विज्ञान, 21 दूर्वा अर्पण और अथर्वशीर्ष पाठ

चैत्र विनायक चतुर्थी: मध्याह्न पूजा विधि, वरद विनायक और अथर्वशीर्ष

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक कालगणना, मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'विनायक चतुर्थी' (Vinayaka Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। जहाँ कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी रात्रि चंद्रोदय व्यापिनी होकर संकटों के निवारण हेतु पूजित होती है, वहीं शुक्ल पक्ष की विनायक चतुर्थी मध्याह्न काल व्यापिनी (Midday hours) होकर नव-ज्ञान, मेधा बुद्धि, विवेक, ऐश्वर्य और नवीन कार्यों के आरंभ की अधिष्ठात्री मानी गई है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का महत्व इसलिए अनंत गुना बढ़ जाता है क्योंकि यह हिन्दू नव संवत्सर (नए वर्ष) की सर्वप्रथम विनायक चतुर्थी है।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चैत्र शुक्ल चतुर्थी वासंती नवरात्रि के चतुर्थ दिवस घटित होती है, जिस दिन जगतजननी आदिशक्ति के चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्मांड की उपासना भी संपन्न होती है। इस समय भुवन भास्कर सूर्य देव मीन राशि के अंतिम चरणों में गतिशील होते हैं और चंद्रमा मेष अथवा वृषभ राशि के कृतिका या रोहिणी नक्षत्रों में संचरण करता है। रोहिणी चंद्रमा की परम प्रिय और उच्च राशि का नक्षत्र है। कालपुरुष के सिद्धांत के अनुसार, चतुर्थी तिथि के स्वामी स्वयं प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं और इसके तत्वीय अधिष्ठाता बुध ग्रह (बुद्धि के कारक) और केतु (मोक्ष व विघ्न निवारण के कारक) हैं। जब सूर्य का मध्याह्न तेज अपने चरम पर होता है (अभिजित मुहूर्त के समीप) तब वरद विनायक की आराधना से मस्तिष्क की सुप्त नाड़ियों में ज्ञान और तीक्ष्ण प्रज्ञा का संचार होता है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, शुक्ल पक्ष
तिथि चतुर्थी तिथि (नव संवत्सर की प्रथम विनायक चतुर्थी)
पर्व का शास्त्रीय नाम चैत्र विनायक चतुर्थी, वरद विनायक चतुर्थी, सुख-समृद्धि चतुर्थी
मुख्य अधिष्ठाता स्वरूप भगवान श्री वरद विनायक (वरदान देने वाले विघ्नहर्ता)
समकालिक नवरात्रि देवी माँ कूष्मांडा (अनाहत व सूर्य-मंडल अधिष्ठात्री)
विशिष्ट पूजन काल मध्याह्न काल (पूर्वाह्न 11:00 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक)
मुख्य तात्विक स्वरूप अग्नि व पृथ्वी तत्त्व का समन्वय, मूलाधार से सहस्रार तक प्रज्ञा प्रवाह
प्रधान पारंपरिक भोग 21 मोदक, बेसन के लड्डू, 21 दूर्वा दल, लाल गुड़हल, सिंदूर
संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह बुध देव (बुद्धि व व्यापार), केतु (अवरोध निवारण)
अभीष्ट आध्यात्मिक फल बुद्धि व विवेक जागृति, वास्तु दोष शमन, व्यापारिक अड़चनों का नाश

नव संवत्सर की इस प्रथम विनायक चतुर्थी पर भगवान वरद विनायक की कृपा प्राप्त करने, व्यापार में अटूट सफलता सुनिश्चित करने और बुद्धि के समस्त अवरोध दूर करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व शैया त्यागकर शीतल अथवा ताजे जल में गंगाजल और लाल चंदन मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात स्वच्छ, बिना सिले अथवा धौत लाल, नारंगी अथवा पीले रंग के सूती वस्त्र धारण करना।
  • गृह मंदिर की उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा को स्वच्छ कर लकड़ी की चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाना।
  • चौकी पर तांबे अथवा चांदी की थाली में भगवान वरद विनायक की धातु की प्रतिमा अथवा मिट्टी के विग्रह को स्थापित करना।
  • मध्याह्न काल (11:00 AM से 01:30 PM के मध्य) में गाय के शुद्ध घी का दीपक और गुग्गल की सुगंधित धूप प्रज्वलित करना।
  • भगवान गणेश के 12 पावन नामों का उच्चारण करते हुए 21 दूर्वा दल (प्रत्येक जोड़े में) और लाल सिंदूर अर्पित करना।
  • अथर्ववेदीय 'गणेश अथर्वशीर्ष' का कम से कम 3, 11 अथवा 21 बार एकाग्रचित्त होकर सस्वर पाठ करना।
  • भगवान को 21 मोदक अथवा बेसन के लड्डुओं का महा-नैवेद्य अर्पित करना और घर के प्रत्येक कमरे में शंख ध्वनि करना।
  • दिनभर सात्विक आहार का पालन करना; शाम के समय किसी नए ज्ञान, विद्या, पुस्तक अथवा व्यापारिक योजना का शुभारंभ करना।
  • इस दिन रात्रि के समय चंद्र दर्शन से बचना, क्योंकि भाद्रपद की भांति चैत्र शुक्ल चतुर्थी का चंद्र दर्शन भी दृष्टि दोष और मानसिक भ्रम उत्पन्न कर सकता है।

अष्टविनायक में 'वरद विनायक' स्वरूप और महड़ तीर्थ का रहस्य

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के 'महड़' (Mahad) गांव में स्थापित 'श्री वरद विनायक' (Varadavinayak) अष्टविनायक तीर्थों के चौथे प्रमुख गणपति हैं। चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी पर इसी वरद विनायक स्वरूप की साधना की जाती है।

1. 'वरद' का शाब्दिक व तात्विक अर्थ

संस्कृत में 'वरद' का अर्थ है-'भक्तों की समस्त सात्विक इच्छाओं को वरदान के रूप में पूर्ण करने वाले'। वरद विनायक का यह स्वरूप पूर्वमुखी है, उनकी सूंड बाईं ओर (वाममुखी) मुड़ी हुई है और उनके दोनों ओर ऋद्धि और सिद्धि विराजमान हैं। यह स्वरूप अत्यंत सौम्य, कृपालु और तत्काल फल देने वाला माना जाता है।

2. महड़ के नंदादीप का अखंड रहस्य

महड़ के वरद विनायक मंदिर की सबसे अलौकिक विशेषता यह है कि यहाँ गर्भगृह में एक अखंड दीपक प्रज्वलित है, जिसे 'नंदादीप' (Nandadeep) कहा जाता है। यह दीपक संवत 1848 (1892 ईस्वी) से आज तक बिना एक क्षण के लिए बुझे निरंतर प्रज्वलित है। यह अखंड ज्योति यह संदेश देती है कि जिस साधक के अंतःकरण में ज्ञान और भक्ति की ज्योति निरंतर जलती रहती है, उसके जीवन में अज्ञान और दरिद्रता का अंधकार कभी प्रवेश नहीं कर सकता।

3. गृत्समद ऋषि और वरद विनायक की पौराणिक कथा

गणेश पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में ऋषि गृत्समद (जिन्होंने गणेश जी के 'गाणपत्य संप्रदाय' और अनेक ऋचाओं का निर्माण किया) को अपने जन्म को लेकर एक गंभीर सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ा था। वे आत्म-ग्लानि और दुख से व्यथित होकर भद्रक वन (महड़) में चले गए।

वहाँ उन्होंने सहस्रों वर्षों तक कठोर तपस्या की और केवल वायु का भक्षण करते हुए एकाक्षरी गणेश मंत्र 'गं' का जप किया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में भगवान गणेश साक्षात प्रकट हुए और उन्होंने गृत्समद को गले लगाकर वरदान दिया: "हे मुनिवर! तुम समस्त वेदों के ज्ञाता, सूक्तों के रचयिता और मेरे परम प्रिय भक्त बनोगे। आज से मैं इस पावन वन में 'वरद विनायक' के नाम से निवास करूंगा और जो भी प्राणी यहाँ आकर मेरी शरण लेगा, उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।"

अष्टविनायक घटक ऐतिहासिक व भौगोलिक विवरण सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रभाव
विग्रह का नाम श्री वरद विनायक (चौथे अष्टविनायक) समस्त वैध कामनाओं की सिद्धि, ज्ञान का वरदान
तीर्थ स्थल महड़, खालापुर तालुका, रायगढ़ (महाराष्ट्र) मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन
विग्रह की दिशा पूर्वाभिमुख, वाममुखी सूंड (सौम्य भाव) गृहस्थों हेतु परम कल्याणकारी, शांत चित्त
अखंड नंदादीप 1892 ईस्वी से निरंतर प्रज्वलित गोघृत ज्योति अंतःकरण में अटूट ज्ञान और विवेक की स्थापना
ऋषि गृत्समद गणेश अथर्वशीर्ष के मुख्य मंत्र द्रष्टा सामाजिक कलंक से मुक्ति, आत्म-सम्मान की पुनःप्राप्ति

मध्याह्न काल में पूजन का खगोलीय और यौगिक विज्ञान

अक्सर भक्तों के मन में यह प्रश्न उठता है कि शिवजी की पूजा प्रदोष काल (संध्या) में, देवी की पूजा निशीथ काल (मध्यरात्रि) में, परंतु भगवान गणेश की पूजा मध्याह्न काल (दोपहर) में क्यों की जाती है?

1. अभिजित मुहूर्त और सूर्य का शिखर

मध्याह्न काल (दिन का आठवां मुहूर्त) वह समय होता है जब सूर्य आकाश के ठीक मध्य में होता है।

  • इस समय सूर्य की किरणें पृथ्वी पर लंबवत पड़ती हैं, जिससे छाया न्यूनतम हो जाती है। छाया का मिटना 'अहंकार और अज्ञान' के मिटने का प्रतीक है।
  • ज्योतिष में सूर्य को आत्मा और गणेश को बुद्धि का स्वामी माना गया है। मध्याह्न में जब आत्म-कारक सूर्य अपने सर्वोच्च स्थान पर होता है तब बुद्धि-दाता गणेश का अर्चन करने से आत्मा और बुद्धि का दिव्य एकाकार होता है।

2. यौगिक पिंगला नाड़ी का प्रवाह

योग शास्त्र के अनुसार, दोपहर 11 से 1 बजे के मध्य मानव शरीर में 'पिंगला नाड़ी' (सूर्य स्वर) सर्वाधिक सक्रिय होती है। पिंगला नाड़ी का संबंध तर्क, विश्लेषण, निर्णय-क्षमता, पाचन और क्रियान्वयन शक्ति से होता है।

  • जब इस समय साधक 21 दूर्वा अर्पित कर ॐ गं गणपतये नमः का जप करता है, तो पिंगला नाड़ी की अतिरिक्त उग्रता शांत होकर सुषुम्ना नाड़ी में समाहित हो जाती है।
  • यह क्रिया व्यक्ति के मस्तिष्क की न्यूरोनल फायरिंग को संतुलित कर उसे 'अल्फा स्टेट' (Alpha State of Consciousness) में ले जाती है, जिससे कठिन से कठिन व्यापारिक और शैक्षणिक निर्णय सहज हो जाते हैं।

अथर्ववेदीय 'गणेश अथर्वशीर्ष' का कंपन-विज्ञान (Sound Vibration)

चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी पर 'गणपति अथर्वशीर्ष' (Ganapati Atharvashirsha) का पाठ करना कल्पवृक्ष के समान फलदायी माना गया है। अथर्ववेद का यह उपनिषद गणेश-तत्त्व का सर्वोच्च दार्शनिक और ध्वन्यात्मक दस्तावेज है।

त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥

अथर्वशीर्ष के मुख्य वैज्ञानिक रहस्य

  1. मूल तत्त्व का उद्घाटन: अथर्वशीर्ष कहता है-"त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्"। भगवान गणेश रीढ़ की हड्डी के आधार में स्थित 'मूलाधार चक्र' में नित्य निवास करते हैं। विनायक चतुर्थी पर जब इसके 11 पाठ किए जाते हैं, तो मूलाधार चक्र जाग्रत होता है, जिससे साधक के जीवन में भौतिक स्थिरता (Financial & Emotional Grounding) आती है।
  2. त्रिगुणातीत चेतना: "त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः।" यह पाठ साधक को सत, रज, तम-इन तीनों गुणों और भूत, वर्तमान, भविष्य-इन तीनों कालों की चिंताओं से मुक्त कर वर्तमान क्षण में जीने का बल देता है।
  3. वास्तु दोषों का समूल नाश: जिस भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में अथर्वशीर्ष की संस्कृत ध्वनियां गूंजती हैं, वहाँ से ब्रह्म-राक्षस, प्रेत बाधा, नजर-दोष और दिशा-जनित वास्तु दोष स्वतः निष्कासित हो जाते हैं।

गणेश जी के 12 पावन नाम: 21 दूर्वा अर्पण का विशिष्ट विधान

विनायक चतुर्थी के दिन गणेश जी को 21 दूर्वा दल अर्पित करते समय नारद पुराण में वर्णित भगवान के 12 पावन नामों का स्मरण करने से प्रत्येक नाम एक विशेष चक्र और जीवन के क्षेत्र को जाग्रत करता है:

क्रम गणेश जी का पावन नाम नामावली का अर्थ जीवन में प्राप्त होने वाला विशिष्ट प्रभाव
१ सुमुख सुंदर व तेजस्वी मुख वाले मुख-मंडल पर आकर्षण, वाणी में ओज और सौम्यता
२ एकदन्त एक दांत धारण करने वाले अद्वैत का बोध, एकाग्रता, विरोधियों का शमन
३ कपिल बादामी/धूसर वर्ण वाले आभामंडल की शुद्धि, मानसिक विकारों का नाश
४ गजकर्णक हाथी जैसे विशाल कानों वाले उत्तम श्रवण शक्ति, ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता
५ लम्बोदर विशाल उदर (पेट) वाले समस्त रहस्यों को पचाने की शक्ति, सहनशीलता
६ विकट अत्यंत विकराल व संकटहारी असाध्य रोगों और भयंकर विपत्तियों से तत्काल रक्षा
७ विघ्ननाशक समस्त विघ्नों को हरने वाले कार्यों में अचानक आने वाली रुकावटों का समूल नाश
८ विनायक विशिष्ट नायक (नेता) नेतृत्व क्षमता, समाज और कार्यक्षेत्र में सर्वोच्च पद
९ धूम्रकेतु धुएं जैसे रंग की पताका वाले कलयुग के दुष्प्रभावों और तंत्र-बाधाओं से सुरक्षा
१० गणाध्यक्ष गणों के सर्वोच्च स्वामी संगठन शक्ति, मित्रों और सहयोगियों का पूर्ण समर्थन
११ भालचन्द्र मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले मानसिक शीतलता, क्रोध पर विजय, अवसाद मुक्ति
१२ गजानन हाथी के मस्तक वाले असीम विवेक, विशाल सोच, अहंकार का विसर्जन

चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी की सम्पूर्ण शास्त्रीय पूजन विधि

नव संवत्सर की इस प्रथम विनायक चतुर्थी पर घर अथवा कार्यस्थल में पूजन संपन्न करने हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध शास्त्रोक्त पद्धति का पालन करें:

  1. प्रातः कालीन शुद्धि एवं वेदी निर्माण: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। लकड़ी की चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाएं और उस पर कच्चे चावल से अष्टदल कमल बनाएं।
  2. वरद विनायक विग्रह प्रतिष्ठा: चौकी पर तांबे अथवा चांदी के पात्र में भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। उनके दाईं ओर ऋद्धि (ज्ञान) और बाईं ओर सिद्धि (ऐश्वर्य) का प्रतीक रूप में दो सुपारी स्थापित करें।
  3. संकल्प: मध्याह्न काल में हाथ में जल, रोली, अक्षत, दूर्वा और सिक्का लेकर संकल्प करें:

    ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे शुक्ल पक्षे विनायक चतुर्थी तिथौ, वरद विनायक प्रीतिकामनया, नव संवत्सरे मम सकल व्यापारिक-बौद्धिक विघ्न निवारणार्थं, ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त्यर्थं विनायक चतुर्थी पूजनमहं करिष्ये।

  4. पंचामृत अभिषेक: कच्चे गाय के दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल को मिलाकर दक्षिणावर्ती शंख द्वारा भगवान गणेश का अभिषेक करें। इसके पश्चात शुद्ध जल से स्नान कराकर विग्रह को पोंछें।
  5. सिंदूर व वस्त्र समर्पण: भगवान गणेश को शुद्ध गोघृत में मिला हुआ रक्त सिंदूर (ऑरेंज सिंदूर) अर्पित करें। नवीन पीताम्बरी वस्त्र और एक पवित्र सूती जनेऊ (यज्ञोपवीत) चढ़ाएं।
  6. 21 दूर्वा दल अर्पण: गंगाजल से धोए गए 21 दूर्वा दलों को दो-दो के जोड़े बनाकर ऊपर दिए गए 12 नामों और गणेश बीज मंत्र 'ॐ गं गणपतये नमः' का उच्चारण करते हुए भगवान के मस्तक और चरणों पर अर्पित करें।
  7. लाल पुष्प व शमी पत्र: भगवान को उनके परम प्रिय लाल गुड़हल के फूल, लाल गुलाब और शमी के पत्ते समर्पित करें।
  8. महा-नैवेद्य अर्पण: गाय के शुद्ध घी में बने 21 मोदक अथवा बेसन के लड्डू, ऋतु फल (विशेष रूप से केला), नारियल और लौंग-इलायची लगा मीठा पान अर्पित करें।
  9. अथर्वशीर्ष पाठ एवं आरती: धूप-दीप प्रज्वलित कर शांत चित्त से 'गणपति अथर्वशीर्ष' और 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' का पाठ करें। अंत में कर्पूर जलाकर सामूहिक आरती करें।

व्यापारिक अड़चनें और वास्तु दोष निवारण के अचूक उपाय

यदि आपके व्यापार में निरंतर घाटा हो रहा हो, नई योजनाओं में अड़चनें आ रही हों अथवा घर में वास्तु दोष के कारण क्लेश रहता हो, तो चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी के दिन निम्नलिखित उपाय साक्षात कल्पवृक्ष सिद्ध होते हैं:

समस्या वास्तु व ज्योतिषीय कारण विनायक चतुर्थी पर अचूक शास्त्रीय उपाय
व्यापार में निरंतर रुकावट बुध ग्रह की दुर्बलता व 10वें भाव में दोष दुकान/कार्यालय की तिजोरी में श्वेतार्क (मदार) के गणेश जी स्थापित करें
घर में नकारात्मक ऊर्जा व क्लेश मुख्य द्वार पर वास्तु दोष (दक्षिण/नैऋत्य) मुख्य द्वार के ठीक ऊपर अंदर और बाहर आमने-सामने दो गणेश चित्र लगाएं
बच्चों की पढ़ाई में एकाग्रता की कमी पंचम भावस्थ राहु अथवा कमजोर बुध गणेश जी को 5 मोदक अर्पित कर विद्यार्थी को नित्य अथर्वशीर्ष का 1 पाठ कराएं
नई नौकरी व पदोन्नति में बाधा सूर्य-शनि द्वंद्व अथवा दशमेश का बंधन गणेश जी को 21 शमी पत्र चढ़ाकर 'ॐ वक्रतुण्डाय हुम्' का 108 बार जप करें

दार्शनिक संदेश: विघ्नों को अवसर में बदलने की प्रज्ञा

चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी का पावन पर्व मानव चेतना को सनातन जीवन दर्शन का यह सर्वोच्च रहस्य सिखाता है कि जीवन में विघ्न (बाधाएं) हमें रोकने के लिए नहीं, अपितु हमें तराशने और मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

भगवान गणेश का स्वरूप ही यह दर्शाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे स्थिर रहा जाए। छोटा सा मूषक उनका वाहन है, परंतु वे समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। विशाल गज-मुख असीम ज्ञान और धीरता का प्रतीक है और छोटा सा मुख यह सिखाता है कि बोलो कम और सुनो अधिक (विशाल कान)।

जब मनुष्य नव संवत्सर के आरंभ में वरद विनायक के चरणों में अपनी बुद्धि और अहंकार को समर्पित कर देता है, तो उसके भीतर का विवेक जाग्रत हो जाता है। सच्चा गणेश भक्त वही है जो अपने जीवन के प्रत्येक संकट को एक नई सीख मानकर धैर्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है।


FAQ

चैत्र शुक्ल विनायक चतुर्थी की पूजा किस समय की जाती है?
विनायक चतुर्थी की पूजा सदैव दिन के 'मध्याह्न काल' (दोपहर 11:00 बजे से 01:30 बजे के मध्य) में की जाती है, जबकि संकष्टी चतुर्थी की पूजा रात्रि चंद्रोदय के समय होती है।

चैत्र शुक्ल चतुर्थी पर किस गणेश स्वरूप की पूजा होती है?
इस दिन विशेष रूप से अष्टविनायक के चौथे स्वरूप 'भगवान वरद विनायक' (वरदान देने वाले विघ्नहर्ता) की पूजा का विधान है।

गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ विनायक चतुर्थी पर क्यों अनिवार्य माना गया है?
अथर्वशीर्ष मूलाधार चक्र को जाग्रत करता है, जिससे साधक के जीवन में आर्थिक स्थिरता, तीक्ष्ण बुद्धि और समस्त वास्तु दोषों का निवारण होता है।

विनायक चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से क्यों बचा जाता है?
चतुर्थी के चंद्रमा पर दृष्टि पड़ने से मिथ्या कलंक और मानसिक भ्रम का दोष लगता है; अतः इस रात चंद्रमा के सीधे दर्शन से बचने का विधान है।

गणेश जी को 21 मोदक चढ़ाने का क्या रहस्य है?
मोदक का अर्थ है 'आनंद देने वाला' (मोद + क); 21 मोदक मनुष्य की 21 आंतरिक प्रकृतियों को परमात्मा के आनंद रस में तृप्त करने का प्रतीक हैं।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


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