By पं. सुव्रत शर्मा
सिंधी समाज का नववर्ष और जल देवता वरुण के अवतार का प्राकट्य

सनातन वैदिक काल गणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि संपूर्ण विश्व में फैले सिंधी समुदाय के लिए वर्ष का सबसे पवित्र, पावन और अलौकिक दिवस माना जाता है। सिंधी संस्कृति और भाषा में चैत्र मास को अत्यंत आदर के साथ 'चेट' (Chet) कहा जाता है तथा द्वितीया तिथि के उदित होते हुए बाल-चंद्रमा को 'चंड' (Chand) के रूप में संबोधित किया जाता है। इस प्रकार 'चेट' मास में शुक्ल पक्ष के 'चंड' के दिव्य दर्शन होने के कारण इस महापर्व को अनादि काल से 'चेटीचंड' (Cheti Chand) की संज्ञा दी गई है।
वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) के ठीक अगले दिन उदित होती है। खगोलीय दृष्टि से यह वह समय होता है जब चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट रहने वाली अमावस्या की शून्यता को पार कर अपनी द्वितीया कला में प्रवेश करता है। इस दिन आकाश में चमकने वाला सूक्ष्म, उज्ज्वल और मनोहर बाल-चंद्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, अपितु जल तत्त्व और मन की शीतलता के पुनरुत्थान का साक्षात प्रतीक होता है। ज्योतिष शास्त्र में द्वितीया तिथि के स्वामी देवाधिदेव महादेव शिव माने गए हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा का बाल स्वरूप सदैव सुशोभित रहता है। सिंधी परंपरा में इसी पावन तिथि पर जल के अधिष्ठाता देवता भगवान वरुण देव ने अत्याचारों का शमन करने और धर्म की रक्षा करने हेतु बालक 'उडेरोलाल' (भगवान झूलेलाल) के रूप में अपना ऐतिहासिक अवतार ग्रहण किया था।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास (चेट), शुक्ल पक्ष, द्वितीया तिथि (चंड) |
| पर्व का शास्त्रीय नाम | चेटीचंड, झूलेलाल जयंती, सिंधी नववर्ष महापर्व |
| खगोलीय चंद्र स्थिति | बाल-चंद्रमा का उदय (अश्विनी अथवा भरणी नक्षत्र संयोग) |
| अधिष्ठाता मुख्य देव | जल देवता वरुण देव (अवतार: भगवान झूलेलाल / उडेरोलाल) |
| ऐतिहासिक अवतार काल | 10वीं शताब्दी (विक्रम संवत 1007 / 950-951 ईस्वी) |
| अवतार स्थल | नसरपुर तीर्थ, सिंधु नदी का पावन तट (सिंध प्रांत) |
| प्रधान पवित्र प्रतीक | ज्योति स्वरूप अखंड दीप, बहराणा साहिब, पल्लव और छेज |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | जल तत्त्व शुद्धि, धार्मिक स्वाधीनता, भय-मुक्ति और सुख-समृद्धि |
चेटीचंड के इस महापर्व पर वरुण देव की अमृतमयी कृपा प्राप्त करने, परिवार में सुख-शांति स्थापित करने और अपने धर्म की रक्षा का पावन संकल्प लेने हेतु प्रत्येक साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
चेटीचंड केवल एक नववर्ष का उत्सव नहीं है, अपितु यह भारतवर्ष के धार्मिक स्वाभिमान और आस्था की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदानों और तपस्या का अमर विजय पर्व है। इस पावन पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 10वीं शताब्दी के मध्य (विक्रम संवत 1007) की है, जब सिंध के ठट्टा नगर पर मिरखशाह (Markh Shah) नामक एक अत्यंत क्रूर, धर्मांध और आततायी मुस्लिम शासक का आधिपत्य था।
मिरखशाह के दरबारियों और मौलवियों ने उसे भड़काया कि यदि वह सिंध की संपूर्ण हिंदू प्रजा को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित कर दे, तो उसे जन्नत प्राप्त होगी। मिरखशाह ने सिंध के हिंदू धर्मगुरुओं और पंचों को अपने राजदरबार में तलब किया और उनके सम्मुख एक अत्यंत कठोर फरमान सुनाया: "या तो संपूर्ण हिंदू समाज इस्लाम स्वीकार करे, अन्यथा सभी को मृत्युदंड दिया जाएगा।"
इस भयानक संकट को देखकर सिंध के तत्कालीन हिंदुओं ने मिरखशाह से विचार करने हेतु कुछ दिनों का समय मांगा। मिरखशाह ने उन्हें केवल चालीस दिनों की मोहलत दी। जब कोई सांसारिक राजा अथवा सेना उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आई तब सिंध के हिंदुओं ने सांसारिक सहायताओं की आशा छोड़कर संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनकर्ता और जल के अधिपति साक्षात वरुण देव की शरण में जाने का निर्णय लिया।
| ऐतिहासिक चरण | चालीहा तपस्या का विवरण | आध्यात्मिक व भौतिक प्रभाव |
|---|---|---|
| प्रथम 10 दिन | अन्न का त्याग, केवल जल ग्रहण, भूमि शयन | शारीरिक तपस्या और अहंकार का संपूर्ण विसर्जन |
| 11 से 20 दिन | निरंतर वरुण गायत्री व वैदिक ऋचाओं का गान | मानसिक एकाग्रता और सामूहिक संकल्प का जागरण |
| 21 से 30 दिन | सिंधु नदी के शीतल जल में खड़े रहकर स्तुति | आर्तनाद, करुण प्रार्थना और शरणागति भाव की पराकाष्ठा |
| 31 से 39 दिन | अखंड ज्योति प्रज्वलन और मौन उपवास | वायुमंडल में सूक्ष्म दैवीय स्पंदनों का तीव्र संचार |
| 40वां दिन | आकाशवाणी और वरुण देव का अभयदान | भगवान झूलेलाल के अवतार की घोषणा और भय का नाश |
सिंध के हजारों स्त्री, पुरुष, वृद्ध और बच्चे सिंधु नदी के पावन तट पर एकत्र हो गए। उन्होंने न तो अपने केश संवारे, न नवीन वस्त्र पहने, न अन्न का एक भी दाना ग्रहण किया और न ही अपने पैरों में जूते पहने। वे दिन-रात धूप, धूल और ठंड को सहते हुए केवल सिंधु के पावन जल में खड़े होकर आर्त भाव से रो-रोकर प्रार्थना करते रहे। इस 40 दिनों के कठोर तप को सिंधी संस्कृति में आज भी 'चालीहा साहिब' (Chaliha Sahib) के नाम से जाना जाता है।
चालीसवें दिन की मध्यरात्रि को सिंधु नदी के अथाह जल से एक अत्यंत दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। उस अलौकिक प्रकाश के मध्य में जल के देवता भगवान वरुण देव प्रकट हुए और संपूर्ण आकाश में एक गंभीर, मधुर और आश्वस्त करने वाली आकाशवाणी गूंज उठी:
"हे मेरे प्रिय भक्तों! भयभीत मत हो। तुम्हारी सच्ची निष्ठा, तपस्या और आर्त पुकार मैंने सुन ली है। मैं नसरपुर के धर्मपरायण रतनचंद लोहाना की धर्मपत्नी माता देवकी के गर्भ से चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन एक बालक के रूप में जन्म लूंगा। मैं अधर्म का नाश करूंगा, मिरखशाह के अहंकार को चूर-चूर करूंगा और तुम्हारी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करूंगा।"
इस आकाशवाणी को सुनकर संपूर्ण हिंदू समाज में नवजीवन का संचार हो गया और उन्होंने वरुण देव के चरणों में कृतज्ञता के अश्रु अर्पित किए।
आकाशवाणी के सत्य स्वरूप चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को नसरपुर के पवित्र नगर में श्री रतनचंद ठक्कर (लोहाना) के घर माता देवकी की पावन कोख से एक परम तेजस्वी और अलौकिक बालक ने जन्म लिया। जैसे ही उस बालक का प्राकट्य हुआ, संपूर्ण कक्ष में एक दिव्य सुगंध फैल गई और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
ज्योतिषियों ने उस बालक के चरण-चिन्हों और ललाट के तेज को देखकर घोषणा की कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु साक्षात जल और प्रकाश का अवतार है। उनका पालना (झूला) बिना किसी मानवीय सहारे के अपने आप धीरे-धीरे झूलने लगता था, जिसके कारण संपूर्ण नसरपुर के लोग उन्हें अत्यंत वात्सल्य भाव से 'झूलेलाल' (झूलने वाले लाल) कहने लगे। जब वे जल की लहरों पर खेलते और तैरते हुए दिखाई देते, तो उन्हें 'उडेरोलाल' (उड़ने वाले अथवा जल पर तैरने वाले प्रभु) कहा गया।
जब मिरखशाह को इस बालक के जन्म का समाचार मिला, तो उसने अपने सबसे चतुर वफादार वजीर अहिरियो को बालक की वास्तविकता जानने के लिए नसरपुर भेजा:
महल को जलते और डूबते देखकर मिरखशाह का संपूर्ण अहंकार मिट्टी में मिल गया। वह नंगे पैर दौड़ता हुआ आया और भगवान झूलेलाल के चरणों में गिरकर रोते हुए क्षमा याचना करने लगा। भगवान झूलेलाल ने अत्यंत करुणा भाव से अग्नि और जल को शांत कर दिया और मिरखशाह को सनातन धर्म का अमर उपदेश दिया:
"हे मिरखशाह! सुन, ईश्वर एक ही है। जिसे तुम अल्लाह कहते हो, वही हमारे श्री हरि और वरुण देव हैं। कुरान और वेद एक ही परम सत्ता का गुणगान करते हैं। किसी भी मनुष्य पर उसकी आस्था के विरुद्ध अत्याचार करना ईश्वर के प्रति सबसे बड़ा अपराध है। जा, आज से अपने राज्य में हिंदू और मुस्लिम दोनों को अपनी-अपनी पद्धति से पूजा करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान कर।"
मिरखशाह ने भगवान झूलेलाल के चरणों में नतमस्तक होकर आजीवन धार्मिक सहिष्णुता और न्याय का पालन करने की शपथ ली।
सिंधी संस्कृति में भगवान झूलेलाल की उपासना का सर्वोच्च प्रतीक 'बहराणा साहिब' (Bahrana Sahib) है। चेटीचंड के दिन प्रत्येक सिंधी घर और मंदिर में बहराणा साहिब की स्थापना और पूजन का विधान अनिवार्य माना गया है। यह केवल एक पूजा की थाली नहीं है, अपितु यह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को एक साथ जाग्रत करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और तांत्रिक वेदी-यंत्र है।
बहराणा साहिब के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक सामग्री का अपना गहरा आध्यात्मिक और तात्विक रहस्य होता है:
| बहराणा साहिब का घटक | तात्विक व भौतिक स्वरूप | आध्यात्मिक व सूक्ष्म ऊर्जा प्रभाव | दार्शनिक व पौराणिक प्रतीक |
|---|---|---|---|
| कांसे अथवा पीतल का थाल | मजबूत, शुद्ध धातु का पात्र | नकारात्मक तरंगों का परावर्तन | पृथ्वी तत्त्व व आधार वेदी |
| आटे का कलश (आटे की लोई) | शुद्ध गेहूं का गूंथा हुआ आटा | जीवनदायिनी पोषण ऊर्जा का संचय | अन्न-ब्रह्म व भौतिक देह का प्रतीक |
| चौमुखी अखंड दीपक | शुद्ध गाय का घी व सूती बत्ती | अज्ञान के अंधकार का समूल नाश | अग्नि तत्त्व व आत्मा का अमर प्रकाश |
| ताजे सुगंधित पुष्प व माला | गुलाब, मोगरा व गेंदे के फूल | चित्त की एकाग्रता व सात्विक सुगंध | सौंदर्य, कोमलता व भक्ति भाव |
| हरी इलायची, लौंग व मिश्री | पाचक, सुगंधित व मधुर द्रव्य | वाणी की मधुरता व इंद्रिय निग्रह | जीवन के मीठे व सुगंधित अनुभव |
| धूप अगरबत्ती व कपूर | सुगंधित धूमन द्रव्य | वायुमंडल की शुद्धि व तमो-नाश | वायु तत्त्व व विचारों की निर्मलता |
| सिंधु अथवा गंगाजल लोटा | शुद्ध शीतल अमृत जल | मानसिक शांति व पापों का प्रक्षालन | वरुण देव का साक्षात जल तत्त्व |
बहराणा साहिब की इस पावन थाली को सिर पर धारण करके जब श्रद्धालु नगर भ्रमण करते हैं, तो उस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से देखने वालों के नेत्रों के दोष, मानसिक अवसाद और संचित भय उसी क्षण शांत हो जाते हैं। सायंकाल के समय जब इस बहराणा साहिब को नदी अथवा सरोवर में विसर्जित किया जाता है, तो आटे का वह दीपक और मिश्री जल के जीवों (मछलियों और कछुओं) का आहार बनती है, जो सनातन धर्म के 'जीव दया' और प्रकृति पोषण के सर्वोच्च सिद्धांत को चरितार्थ करती है।
भगवान झूलेलाल की उपासना का सबसे भावुक और हृदयस्पर्शी अंग 'पल्लव पाना' (Pallav Paana) कहलाता है। सिंधी भाषा में पल्लव का अर्थ होता है अपने दुपट्टे, चादर अथवा वस्त्र के दोनों कोनों को दोनों हाथों से फैलाकर ईश्वर के सम्मुख झोली पसारना।
जब चेटीचंड के दिन आरती और स्तुति पूर्ण हो जाती है, तो संपूर्ण समाज एक साथ अत्यंत दीन और निष्कपट भाव से खड़ा होता है। पुरुष और महिलाएं अपने वस्त्र के आंचल को फैलाकर भगवान झूलेलाल के सम्मुख शीश झुकाते हैं और अश्रुपूरित नेत्रों से प्रार्थना करते हैं:
"तूंही तूं, तूंही तूं, ओ लाल साईं! असां जे मथे ते दया जो हथ रख।
सबनी जा बेड़ा पार कर, सबनी खे सुख, शांति ऐं निरोगता बख्श।
असां अज्ञानी आहियूं, असां जा समस्त पाप क्षमा कर ऐं धर्म जे मार्ग ते हलाए।"
(अर्थ: हे लाल साईं! केवल आप ही हैं, केवल आप ही हैं। हमारे शीश पर अपनी दया का अमृत हस्त रखिए। संसार के समस्त जीवों के जीवन रूपी बेड़े को भवसागर से पार उतारिए। सभी को सुख, शांति और स्वास्थ्य प्रदान कीजिए। हम अज्ञानी हैं, हमारे अपराधों को क्षमा कर हमें धर्म के मार्ग पर चलाइए।)
पल्लव के उपरांत सिंधी समाज का पारंपरिक लोकनृत्य 'छेज' संपन्न होता है। छेज नृत्य गुजरात के डांडिया अथवा गरबा के समान होता है, परंतु इसकी गति और ऊर्जा अत्यंत तीव्र होती है।
चेटीचंड के महापर्व पर प्रत्येक घर और लंगर (भंडारे) में दो प्रमुख पारंपरिक व्यंजन अनिवार्य रूप से तैयार किए जाते हैं और वितरित किए जाते हैं: उबले हुए नमकीन चने (छोला) और मीठे पीले चावल (ताहिरी)।
यह प्रसाद केवल परंपरा का निर्वाह नहीं है, अपितु यह वसंत से ग्रीष्म के संधिकाल में शरीर के त्रिदोषों को संतुलित करने का एक अत्यंत सटीक आयुर्वेदिक आहार है:
नमकीन चने और मीठी ताहिरी का यह संयुक्त प्रसाद शरीर को कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और इलेक्ट्रोलाइट्स का एक आदर्श संतुलन प्रदान करता है, जिससे ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय शरीर में निर्जलीकरण (Dehydration) नहीं होता।
भगवान झूलेलाल का प्राकट्य और उनका जीवन दर्शन संपूर्ण मानव जाति को यह अमर संदेश देता है कि जल ही जीवन है और सत्य ही सनातन है।
भगवान झूलेलाल किसी एक जाति, वर्ग अथवा संप्रदाय के देवता नहीं हैं; वे संपूर्ण मानवता के रक्षक हैं। उन्होंने तलवार के बल पर नहीं, अपितु प्रेम, करुणा, आत्म-तप और दैवीय तेज के बल पर धर्मांधता को परास्त किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जब मनुष्य सत्य और धर्म के पथ पर अडिग रहता है, तो स्वयं प्रकृति और जल के देवता उसकी रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
1947 के विभाजन के समय जब सिंधी समाज को अपनी पैतृक भूमि सिंध, अपनी संपत्ति, अपने मंदिर और अपने घर-द्वार छोड़कर केवल तन पर पहने वस्त्रों के साथ भारत आना पड़ा तब उनके पास कोई भौतिक साधन नहीं थे। परंतु उनके पास एक अटूट आध्यात्मिक संबल था-भगवान झूलेलाल का नाम और उनका आशीर्वाद: 'झूलेलाल बेड़ा पार'। उसी अदम्य आत्मबल और परिश्रम के सहारे सिंधी समाज ने शून्य से शुरुआत की और आज संपूर्ण विश्व में अपने व्यापार, दानशीलता, धर्मनिष्ठा और पुरुषार्थ का परचम लहराया।
आइए इस चेटीचंड पर हम भगवान झूलेलाल के पावन चरणों में शीश नवाएं, जल संरक्षण का संकल्प लें, धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता की रक्षा करें और उद्घोष करें: 'अखंड रहे सिंधी संस्कृति, अमर रहे झूलेलाल जो नाम'।
चेटीचंड का पर्व किस तिथि को मनाया जाता है?
चेटीचंड का महापर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को बाल-चंद्रमा के दर्शन के साथ अत्यंत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
भगवान झूलेलाल को किसका अवतार माना गया है?
भगवान झूलेलाल (उडेरोलाल) को साक्षात जल के अधिष्ठाता देवता भगवान वरुण देव का अवतार माना गया है।
सिंधी संस्कृति में 'चालीहा साहिब' का क्या इतिहास है?
सिंध के क्रूर शासक मिरखशाह के अत्याचारों से मुक्ति पाने हेतु सिंधु नदी के तट पर 40 दिनों तक किए गए कठोर जल-तप को चालीहा साहिब कहा जाता है।
बहराणा साहिब में कौन सी प्रमुख सामग्रियां रखी जाती हैं?
बहराणा साहिब में कांसे की थाली, आटे का चौमुखी अखंड दीपक, इलायची, लौंग, मिश्री, ताजे पुष्प, फल और पवित्र जल से भरा लोटा रखा जाता है।
चेटीचंड के दिन कौन सा पारंपरिक प्रसाद मुख्य रूप से वितरित किया जाता है?
इस दिन उबले हुए नमकीन चने (छोला) और केसर युक्त मीठे पीले चावल (ताहिरी) का पावन प्रसाद सभी श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।
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