By पं. नरेंद्र शर्मा
ब्रह्मा जी द्वारा ब्रह्मांड निर्माण और चैत्र प्रतिपदा का आदि-पर्व

सनातन वैदिक काल गणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को संपूर्ण ब्रह्मांड का उद्गम बिंदु (Cosmic Origin) माना गया है। यह वह पावन और अद्वितीय संधिकाल है जब अव्यक्त परब्रह्म से व्यक्त सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि केवल एक नए चांद्र संवत्सर का शुभारंभ नहीं है, अपितु यह साक्षात कालपुरुष का प्रथम श्वास, युगों का आदि-पर्व और सौर-चांद्र गतियों के सामंजस्य का महा-उत्सव है।
सूर्य सिद्धांत, वेदांग ज्योतिष, वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका और शतपथ ब्राह्मण में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि सृष्टि रचना के प्रथम अरुणोदय के समय समस्त ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) शून्य अंश (0°) पर स्थित होकर मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र के प्रथम पाद पर एक रेखा में विराजमान थे। यह दुर्लभ खगोलीय संयोजन सिद्ध करता है कि सनातन पंचांग किसी मानव-निर्मित मान्यता पर नहीं, अपितु प्रत्यक्ष ग्रह-नक्षत्र संचरण के विशुद्ध गणितीय विज्ञान पर आधारित है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय व ज्योतिर्विज्ञान विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा तिथि (प्रथम दिन) |
| पर्व का शास्त्रीय नाम | सृष्टि रचना दिवस, संवत्सर प्रतिपदा, नव संवत्सर |
| खगोलीय सौर स्थिति | सूर्य का मीन से मेष में संक्रमण (वसंत विषुव / Vernal Equinox) |
| खगोलीय चांद्र स्थिति | अमावस्या की शून्यता के पश्चात शुक्ल चंद्र कला का प्रथम प्रस्फुटन |
| अधिष्ठाता मुख्य देव | परमपिता ब्रह्मा जी, भुवन भास्कर सूर्य देव, आदिशक्ति योगमाया |
| ऐतिहासिक युग प्रवर्तन | सतयुग का शुभारंभ, प्रथम मन्वंतर (स्वायंभुव मन्वंतर) का आदि-काल |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | संचित तमो-नाश, ज्ञान-तेज की वृद्धि, सृजन ऊर्जा और मोक्ष सिद्धि |
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के इस आदि-पर्व पर ब्रह्मांडीय सृजन ऊर्जा को अपने अंतःकरण में जाग्रत करने और आगामी संवत्सर को मंगलमय बनाने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
हेमाद्रि के 'चतुर्वर्ग चिंतामणि', ब्रह्म पुराण और मत्स्य पुराण में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के संदर्भ में सृष्टि रचना का अत्यंत गंभीर और विशद वर्णन प्राप्त होता है। जब महाप्रलय के उपरांत संपूर्ण ब्रह्मांड घोर अंधकार और कारण-जल में विलीन था तब योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान श्री हरि विष्णु की नाभि से एक दिव्य सहस्रदल कमल प्रस्फुटित हुआ। उस पावन कमल के केंद्र से वेदों के ज्ञाता परमपिता ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ।
ब्रह्म पुराण का अमर श्लोक इस ऐतिहासिक और खगोलीय क्षण को स्पष्ट रूप से उद्घोषित करता है:
चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्जु प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥
अर्थात: परमपिता ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन, संपूर्ण प्रकाशमान सूर्योदय के क्षण ही इस चराचर जगत, काल के सूक्ष्मतम प्रभागों, ऋतुओं, महीनों, वर्षों और समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों की रचना का शुभारंभ किया था।
सृष्टि रचना का यह क्रम किसी भौतिक विस्फोट का परिणाम नहीं था, अपितु यह एक अत्यंत सुव्यवस्थित और चैतन्य मानसिक संकल्प (संकल्प सृष्टि) था। ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम अपने मन से सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार नामक चार मानस पुत्रों की रचना की। इसके पश्चात उन्होंने महर्षि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद जैसे प्रजापतियों को उत्पन्न किया, जिन्होंने इस ब्रह्मांड में जैविक और आध्यात्मिक जीवन का विस्तार किया।
| सृष्टि रचना का चरण | उत्पन्न तत्व व सत्ता | आध्यात्मिक व भौतिक दायित्व |
|---|---|---|
| प्रथम चरण (तत्व सृष्टि) | महतत्व, अहंकार, पंच तन्मात्राएं | संपूर्ण भौतिक पदार्थों का मूल आधार |
| द्वितीय चरण (काल सृष्टि) | त्रुटि, निमेष, मुहूर्त, प्रहर, दिन-रात | ब्रह्मांडीय गति और आयु का नियमन |
| तृतीय चरण (ब्रह्म मानस पुत्र) | सनकादि ऋषि व दस प्रजापति | ज्ञान, तपस्या और वंश विस्तार की नींव |
| चतुर्थ चरण (अधिष्ठाता शक्तियां) | अष्ट दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र | अंतरिक्ष, दिशाओं और प्राकृतिक शक्तियों का नियंत्रण |
| पंचम चरण (जैविक सृष्टि) | उद्भिज्ज, स्वेदज, अंडज और जरायुज | संपूर्ण जीव-जगत और मानवीय चेतना का प्रस्फुटन |
सनातन धर्म में समय (काल) को साक्षात ईश्वर का प्रवाह माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं: 'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो' अर्थात मैं ही संपूर्ण लोकों का क्षय और विस्तार करने वाला महाकाल हूँ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वह दिन है जहाँ से इस काल गणना का चक्र आरंभ होता है।
वैदिक ऋषियों ने काल के जो सूक्ष्म विभाजन किए हैं, वे आधुनिक क्वांटम भौतिकी और खगोल विज्ञान को भी आश्चर्यचकित कर देते हैं:
जब ये अहोरात्र संकलित होते हैं, तो वे मास और संवत्सर बनते हैं। वृहद स्तर पर यह काल चक्र चार युगों में विभाजित होता है:
इन चारों युगों के कुल योग (43,20,000 वर्ष) को एक 'चतुर्युगी' या 'महायुग' कहा जाता है। 71 महायुगों का एक 'मन्वंतर' होता है और 14 मन्वंतरों का एक 'कल्प' बनता है। एक कल्प परमपिता ब्रह्मा जी का एक दिन कहलाता है, जिसकी समाप्ति पर महाप्रलय होता है और पुनः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नई सृष्टि का बीजारोपण होता है।
मत्स्य पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, चाक्षुष मन्वंतर के अंत में जब संपूर्ण पृथ्वी प्रलय के अगाध जल में डूबने लगी थी तब भगवान श्री हरि विष्णु ने चैत्र मास में ही अपना प्रथम 'मत्स्य अवतार' धारण किया था।
सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) जब कृतमाला नदी में तर्पण कर रहे थे तब उनकी अंजलि में एक छोटी सी सुनहरी मछली आई। उस मछली ने राजा से रक्षा की प्रार्थना की। राजा ने उसे अपने कमंडल में रखा, परंतु वह मछली क्षणभर में इतनी विशाल हो गई कि उसे सरोवर और अंततः समुद्र में छोड़ना पड़ा। तब भगवान विष्णु ने अपने मत्स्य रूप को प्रकट कर मनु को आदेश दिया:
"आज से सातवें दिन संपूर्ण त्रिलोकी जलप्लावन में डूब जाएगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नौका तुम्हारे पास आएगी। तुम समस्त औषधियों, वनस्पतियों के बीजों, वेदों और सप्तऋषियों को लेकर उस नौका पर आरूढ़ हो जाना।"
प्रलय के उस भीषण झंझावात में भगवान मत्स्य ने एक विशाल सींग धारण किया और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर उस नौका को अपने सींग से बांध लिया। उन्होंने प्रलय के थपेड़ों से वेदों, ऋषियों और जीवन-बीजों की रक्षा की तथा हयग्रीव नामक दैत्य का संहार कर वेदों को पुनः ब्रह्मा जी को सौंपा। चैत्र प्रतिपदा का यह आदि-पर्व हमें स्मरण कराता है कि जब-जब धर्म और सृष्टि पर संकट आता है, परमात्मा स्वयं रक्षक बनकर अवतरित होते हैं।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन केवल दार्शनिक और पौराणिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु यह भारतवर्ष के इतिहास की महानतम घटनाओं का साक्षी रहा है:
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन अपने घर में सुख, शांति, समृद्धि और दैवीय ऊर्जा की स्थापना हेतु निम्नलिखित विधि से पूजन संपन्न करना चाहिए:
प्रातः काल घर के मुख्य द्वार की चौखट को जल से धोकर हल्दी और रोली से स्वस्तिक बनाएं। आम और अशोक के पत्तों का बंदनवार लगाएं। मुख्य द्वार अथवा छत पर तांबे या चांदी के कलश से युक्त रेशमी ध्वज (गुड़ी) स्थापित करें। यह ध्वज नकारात्मक शक्तियों को घर में प्रवेश करने से रोकता है।
पूजा के पश्चात परिवार के सभी सदस्य नीम की कोपलों, काली मिर्च, मिश्री, सेंधा नमक और अजवाइन से बना विशेष प्रसाद ग्रहण करें। यह प्रसाद शरीर के त्रिदोषों को शांत करता है और मन में यह भाव जाग्रत करता है कि जीवन के सुख (मीठा) और दुख (कड़वा) दोनों को समभाव से स्वीकार करना ही वास्तविक धर्म है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हमें यह परम सत्य सिखाती है कि सृष्टि का निर्माण कोई अतीत की मृत घटना नहीं है, अपितु यह प्रत्येक क्षण घटने वाली एक जीवंत प्रक्रिया है। जिस प्रकार ब्रह्मा जी ने शून्य में से ब्रह्मांड की रचना की, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी अपने जीवन को नए सिरे से रचने की अनंत क्षमता विद्यमान है।
जो बीत चुका है, वह केवल एक स्मृति है; जो आने वाला है, वह एक संभावना है। चैत्र प्रतिपदा का यह स्वर्णिम प्रभात हमें अपने पुराने प्रमाद, अज्ञान, संकीर्णताओं और दुर्बलताओं को त्यागकर एक नए उत्साह के साथ जीवन के महायज्ञ में प्रवृत्त होने का संदेश देता है। जब हम प्रकृति की इस सृजन ऊर्जा के साथ अपनी आत्मा को जोड़ लेते हैं, तो हमारा अंतःकरण स्वतः ही दिव्यता, ओज और शांति से परिपूर्ण हो जाता है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का प्रथम दिवस क्यों माना जाता है?
ब्रह्म पुराण के अनुसार इसी दिन प्रातः सूर्योदय के समय ब्रह्मा जी ने चराचर जगत, काल की इकाइयों, नक्षत्रों और ग्रहों की रचना प्रारंभ की थी।
सृष्टि रचना के समय ग्रहों की खगोलीय स्थिति क्या थी?
सूर्य सिद्धांत के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सभी सात मुख्य ग्रह मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र के प्रथम बिंदु (0°) पर एक साथ स्थित थे।
भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का चैत्र मास से क्या संबंध है?
प्रलय काल में जलप्लावन से वेदों, सप्तऋषियों और समस्त औषधियों के बीजों की रक्षा करने हेतु भगवान विष्णु ने चैत्र मास में ही मत्स्य अवतार धारण किया था।
चैत्र प्रतिपदा के दिन घटस्थापना क्यों की जाती है?
कलश को संपूर्ण ब्रह्मांड और तैंतीस कोटि देवताओं का प्रतीक माना जाता है; नव संवत्सर और वासंती नवरात्रि के आरंभ में कलश स्थापना से घर में दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
इस दिन नीम और मिश्री का प्रसाद खाने का क्या आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण है?
वैज्ञानिक दृष्टि से यह रक्त शोधन और मौसमी रोगों से रक्षा करता है, जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से यह सुख और दुख दोनों को समभाव से स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
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